Saturday, 27 June 2026

साक्षी भाव में निमित्त मात्र होकर कुछ भी न करने की साधना करें। एकमात्र कर्ता जगन्माता है ---

कुछ कुछ चर्चा पुरुषोत्तम-योग की भी करूंगा। ध्यान-योग की साधना में एकमात्र कर्ता तो पराशक्ति है जो कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में परमशिव का ध्यान कर रही है। एकमात्र कर्ता वे स्वयं ही है। हमारे सूक्ष्म शरीर का मेरूदण्ड यानि हमारी कमर, उनकी वेदी और उनका मंदिर है, जिस में वे मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र के मध्य में प्राण-तत्व के रूप में विचरण कर रही हैं। उनके विचरण की प्रतिक्रिया स्वरूप ही हमारी सांस चल रही है। वे स्वयं ही प्राण है। वे जब किसी भी देह को छोड़ देती हैं तो वह देह मृत हो जाती है। उनकी चंचलता ही हमारा मन है। उन्हें कर्ता बनाकर कूटस्थ सूर्यमण्डल में परमशिव का ध्यान करें। जो परमशिव हैं, वे ही पुरुषोत्तम हैं। उनमें कोई भेद नहीं है।

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ध्यानस्थ होकर सारी चेतना कूटस्थ में ले आयें। सारी सृष्टि आपकी परम ज्योति से आलोकित है। अपनी चेतना में लाखों करोड़ किलोमीटर ऊपर उठ जाएँ। जितना ऊपर उठ सकते हैं, उठते रहें, उठते रहें, उठते रहें। जब आप उच्चतम बिन्दु पर पहुँच जाओगे जहां से और ऊपर उठना संभव नहीं हो, वहाँ एक ज्योतिर्मय आलोक है जो हमारा घर है। निरंतर उसी की चेतना में रहें। उसे भूल से भी विस्मृत न करें।
उसी के बारे में गीता के पुरुषोत्तम-योग में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं ---
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
उसी के बारे में श्रुति भगवती कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥"
( कठोपनिषद् (२.२.१५) और मुण्डकोपनिषद् (२.२.१०) )
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अपनी चेतना में निरंतर वहीं रहें। जब भूल जाएँ तब याद आते ही फिर वहीं चले जाएँ। अपने सारे सांसारिक काम करते हुए भी उस "ऊर्ध्वमूल" की स्मृति बनी रहे। साधना में उसी का ध्यान करें।
ध्यान के आसन पर ध्यानस्थ होकर जब हम सांस लेते हैं, तब कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर प्रकाश रूप में मूलाधार चक्र से सहस्त्रारचक्र सहित सारे चक्रों को भेदती हुई एक सीधी रेखा में परमशिव तक जाती है, जहां वह कुछ क्षणों तक रुक कर परमशिव का आनंद लेती है। फिर प्रकाशरूप में जब लौटती है, तब परमात्मा की पूरी शक्ति उसमें होती है। वह समय सबसे अधिक महत्वपूर्ण समय है। वह परमात्मा का हमारे में अवतरण (Descent of the Divine) है। उस समय किसी भी तरह की कोई वासना न रहे। यह अभ्यास कब और कितनी बार करें, इसका आभास सूक्ष्म जगत के कुछ महापुरुषों से हमें हो जाता है। वे मेरा ही नहीं, हम सब का मार्गदर्शन करते हैं।
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यह साधना हमें निर्विकल्प समाधि में ले जाती है। भौतिक मृत्यु के समय यदि हम निर्विकल्प समाधि में स्थित होकर यह शरीर छोड़ते हैं, तब हमारा पुनर्जन्म इस मृत्यु लोक में नहीं, इससे भी बहुत अधिक उन्नत हिरण्यमय लोकों में होता है। वहाँ से अपनी इच्छा मात्र से हम इस पृथ्वी का भ्रमण भी कर सकते हैं। अनेक उन्नत लोक ऐसे भी हैं जहां हमारा पुनर्जन्म माता के गर्भ से नहीं, ईश्वर के संकल्प से ही होता है।
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एक और विधि है लेकिन मैं उसका वर्णन नहीं कर सकता, क्योंकि उससे एक बहुत प्रबल तेजस्विता उत्पन्न होती है, जिसके तेज को मैं सहन नहीं कर सकता। उसका अभ्यास उन्हीं के लिए है जिन्होंने ब्रह्मचर्य और सदाचार का जीवन जीया है। लगभग बीस वर्ष पूर्व इसका मैं नकारात्मक अनुभव ले चुका हूँ। अब तो पूरा मार्गदर्शन मुझे प्राप्त है।
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ईश्वर की प्रेरणा से यह सब लिख दिया, लेकिन इस विषय पर कोई चर्चा नहीं करूंगा, और न ही जिज्ञासुओं के प्रश्नों के उत्तर दूंगा। परमात्मा का ध्यान करें। सब जिज्ञासाओं का उत्तर मिल जाएगा, और सारे संशय दूर हो जाएँगे। ॐ तत् सत्॥
कृपा शंकर
२१ मई २०२६
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पुनश्च: --- कुछ बातें और भी हैं, लेकिन उनकी सार्वजनिक चर्चा की अनुमति नहीं है। आध्यात्म में वे गोपनीय हैं। उनका बोध स्वयं परमात्मा ही कराते हैं। ॐ ॐ ॐ !!

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