स्वयं भगवान का आदेश है, जिसे हम कभी भी नहीं भूलें ---
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"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥९:२७॥"
यानि -- हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो॥
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हमारे जीवन की सारी विषमताओं का कारण हमारा लोभ और अहंकार हैं। हम चाहे कितना भी जप-तप व पूजा-पाठ कर लें, लेकिन बिना वीतराग और स्थितप्रज्ञ हुए, कोई भी परमात्मा को उपलब्ध नहीं हो सकता। आध्यात्मिक मार्ग पर वीतरागता हमारी पहली उपलब्धि है, तत्पश्चात स्थितप्रज्ञता। यह कोई मनोरंजन का विषय नहीं है। हम यहाँ परमात्मा का चिंतन कर रहे हैं।
ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ।।
कृपा शंकर
27 जुलाई 2025