Friday, 20 February 2026

कामोत्तेजना से बचने का उपाय :-----

 कामोत्तेजना से बचने का उपाय :-----

युवा साधकों के समक्ष सबसे बड़ी बाधा है ... कामोत्तेजना | यह एक सत्य है जिससे बचने के उपाय भी मनीषियों ने बताए हैं| विपरीत लिंग के व्यक्ति की उपस्थिति में युवा साधक कामोत्तेजित होकर एक उलझन में पड़ जाता है| जब ऐसी स्थिति आ जाये तो घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है|
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आप मेरुदंड सीधा रख कर बड़ी शांति से उड्डियान बन्ध करें यानि फेफड़ों से बलपूर्वक सारी हवा बाहर निकाल कर पेट को अन्दर सिकोड़ लें और ऐसा भाव करें कि जननांगों में एकत्र समस्त ऊर्जा बापस मेरुदंड में जा कर नाभि की ओर उठ रही है| जब साँस लेना आवश्यक हो जाये तो साँस लें और बार बार उड्डियान बन्ध करते रहें| ऐसा तब तक करते रहें जब तक कामोत्तेजना शांत नहीं हो जाए| यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि मनुष्य की नाभि में एक ऐसी शक्ति है जो जननांगों से लौटती हुई ऊर्जा को ह्रदय की ओर प्रेषित कर देती है| यही ऊर्जा एक दिव्य प्रेम और भक्ति में परावर्तित हो जाती है|
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साधक को दिन में तीन-चार बार खाली पेट तीनों बन्ध (मूलबन्ध, उड्डियानबन्ध और जलंधरबन्ध) एक साथ लगाकर अग्निसार क्रिया का अभ्यास करना चाहिए| उपरोक्त अभ्यास आपके ब्रह्मचर्य में तो सहायक होगा ही, आपकी ध्यान साधना और कुंडलिनी जागरण में भी सहायक होगा| कुण्डलिनी के बारे तरह तरह के उलटे सीधे लेख लिखकर अनेक भ्रांतियां फैलाई गयी हैं| कुण्डलिनी शक्ति आपकी प्राण ऊर्जा का ही एक घनीभूत रूप है| जिस ऊर्जा का आपकी बहिर्मुखी इन्द्रियों द्वारा निरंतर क्षय हो रहा है वही ऊर्जा ध्यान साधना में जब आपकी चेतना अंतर्मुखी हो जाती है तब मूलाधार चक्र में प्रकट हो कर ऊर्ध्वमुखी हो जाती है| यही कुण्डलिनी शक्ति है| इसका जागरण ही वीर्य का ऊर्ध्वगमन है| इसका आभास अजपा-जप के साधकों को भी शीघ्र हो जाता है|
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साधक को मांस, मछली, अंडा, मदिरा और गरिष्ट भोजन के आहार का पूर्ण त्याग करना होगा| किसी भी परिस्थिति में कुसंग का पूर्ण त्याग करना होगा| सत्साहित्य और सत्संग के बारे में जितना लिखा जाये उतना ही कम है| उपरोक्त साधना आपको न सिर्फ कामोत्तेजना से मुक्ति दिलाएगी बल्कि जीवन में तनाव को भी कम करेगी| याद रखें कि ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा तप है जो देवताओं को भी दुर्लभ है|
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धन्यवाद ! आप सब में भगवान नारायण को नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
February 20, 2013 at 7:33 am.
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पुनश्चः : तीनों बंध (मूल, उड्डियान और जलंधर) और अग्निसार क्रिया, किसी हठयोग शिक्षक से सीखिए| याद रखें कि ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा तप है जो देवताओं को भी दुर्लभ है|

शीघ्र ही आने वाले त्योहार महाशिवरात्रि व होली की शुभ कामनायें .....

 शीघ्र ही आने वाले त्योहार महाशिवरात्रि व होली की शुभ कामनायें .....

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आध्यात्मिक साधना और मंत्र सिद्धि के लिए चार रात्रियों का बड़ा महत्त्व है| ये हैं .... (१) कालरात्रि (दीपावली), (२) महारात्रि (महाशिवरात्रि), (३) मोहरात्रि (जन्माष्टमी). और (४) दारुण रात्रि (होली)| इन रात्रियों को किया गया ध्यान, जप-तप, भजन ... कई गुणा अधिक फलदायी होता है| इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए| भौतिक देह की चेतना से ऊपर उठने की साधना तो नित्य ही अवश्य करनी चाहिए| आत्म-विस्मृति सब दुःखों का कारण है| इन रात्रियों को अपने आत्म-स्वरुप यानि सर्वव्यापी परमात्मा का ध्यान यथासंभव अधिकाधिक करें| इन रात्रियों में सुषुम्ना नाड़ी में प्राण-प्रवाह अति प्रबल रहता है अतः निष्ठा और भक्ति से की गई साधना निश्चित रूप से सफल होती है| इस सुअवसर का सदुपयोग करें और समय इधर उधर नष्ट करने की बजाय आत्मज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म और राष्ट्र के अभ्युदय के लिए भी साधना करें| धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए एक विराट आध्यात्मिक ब्रह्मशक्ति के जागरण की हमें आवश्यकता है| यह कार्य हमें ही करना पड़ेगा| अन्य कोई विकल्प नहीं है|
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इस अवसर पर एक बार गीता के आत्मसंयमयोग का कुछ स्वाध्याय कर लेते हैं| भगवान कहते हैं ....
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः| यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते||६:२२||
भावार्थ : परमात्मा को प्राप्त करके वह योग में स्थित मनुष्य परम आनन्द को प्राप्त होकर इससे अधिक अन्य कोई सुख नहीं मानता हुआ भारी से भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता है।
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तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्| स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा||६:२३||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये कि दृड़-विश्वास के साथ योग का अभ्यास करते हुए सभी सांसारिक संसर्ग से उत्पन्न दुखों से बिना विचलित हुए योग समाधि में स्थित रहकर कार्य करे।
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सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः| मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ||६:२४||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये मन से उत्पन्न होने वाली सभी सांसारिक इच्छाओं को पूर्ण-रूप से त्याग कर और मन द्वारा इन्द्रियों के समूह को सभी ओर से वश में करे।
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शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया| आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ ||६:२५||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये क्रमश: चलकर बुद्धि द्वारा विश्वास-पूर्वक अभ्यास करता हुआ मन को आत्मा में स्थित करके, परमात्मा के चिन्तन के अलावा अन्य किसी वस्तु का चिन्तन न करे।
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यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌ | ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ ||६:२६||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये स्वभाव से स्थिर न रहने वाला और सदा चंचल रहने वाला यह मन जहाँ-जहाँ भी प्रकृति में जाये, वहाँ-वहाँ से खींचकर अपनी आत्मा में ही स्थिर करे।
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प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌ | उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌ ||६:२७||
भावार्थ : योग में स्थित मनुष्य का मन जब परमात्मा में एक ही भाव में स्थिर रहता है और जिसकी रज-गुण से उत्पन्न होने वाली कामनायें भली प्रकार से शांत हो चुकी हैं, ऎसा योगी सभी पाप-कर्मों से मुक्त होकर परम-आनन्द को प्राप्त करता है।
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः| सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते||६:२८||
भावार्थ : इस प्रकार योग में स्थित मनुष्य निरन्तर योग अभ्यास द्वारा सभी प्रकार के पापों से मुक्त् होकर सुख-पूर्वक परब्रह्म से एक ही भाव में स्थिर रहकर दिव्य प्रेम स्वरूप परम-आनंद को प्राप्त करता है।
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सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि| ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः||६:२९||
भावार्थ : योग में स्थित मनुष्य सभी प्राणीयों मे एक ही आत्मा का प्रसार देखता है और सभी प्राणीयों को उस एक ही परमात्मा में स्थित देखता है, ऎसा योगी सभी को एक समान भाव से देखने वाला होता है।
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यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति| तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति||६:३०||
भावार्थ : जो मनुष्य सभी प्राणीयों में मुझ परमात्मा को ही देखता है और सभी प्राणीयों को मुझ परमात्मा में ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता है।
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सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः| सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ||६:३१||
भावार्थ : योग में स्थित जो मनुष्य सभी प्राणीयों के हृदय में मुझको स्थित देखता है और भक्ति-भाव में स्थित होकर मेरा ही स्मरण करता है, वह योगी सभी प्रकार से सदैव मुझमें ही स्थित रहता है |
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आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन| सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः||६:३२||
भावार्थ : हे अर्जुन! योग में स्थित जो मनुष्य अपने ही समान सभी प्राणीयों को देखता है, सभी प्राणीयों के सुख और दुःख को भी एक समान रूप से देखता है, उसी को परम पूर्ण-योगी समझना चाहिये।
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आप सब को नमन और महाशिवरात्रि व होली की हार्दिक शुभ कामनाएँ!
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० मार्च २०२०

यह सृष्टि भगवान की है, उनकी प्रकृति अपने नियमों के अनुसार इस संसार को चला रही है ---

 यह सृष्टि भगवान की है, उनकी प्रकृति अपने नियमों के अनुसार इस संसार को चला रही है| प्रकृति के नियमों के अनुसार ही यह सृष्टि चलती रहेगी, उन नियमों को न जानना हमारी अज्ञानता है| हमारा कर्मयोग है कि जहाँ भी भगवान ने हमें रखा है, वहाँ हम निमित्त मात्र होकर अपने विवेक के प्रकाश में अपना सर्वश्रेष्ठ करते रहें|

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हम अपने पूर्व जन्मों के कर्मफल भोगने के लिए ही इस मनुष्य देह में जन्म लेते हैं, साथ-साथ नए कर्मों को करने का अवसर भी इस मनुष्य देह से ही प्राप्त होता है| प्रारब्ध कर्मफल तो भोगने ही पड़ते हैं, संचित कर्मों से छुटकारा पाने का उपाय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गीता में बताया गया है| जो भी हमारे प्रारब्ध में है, वह तो होकर ही रहेगा| लगभग ४० वर्ष पूर्व सन १९८१ ई. में ही मैं इस सांसारिक जीवन से विरक्त होकर सन्यास लेना चाहता था, पर उसका योग-संयोग इस जन्म में नहीं था| महामाया ने भटकाये रखा, और प्रारब्ध कर्मों का भोग भोगने के लिए विवश कर दिया| महामाया के समक्ष हम सब विवश हैं --
"ज्ञानिनामपी चेतांसी देवी भगवती ही सा| बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयष्छति||"
मैं जब अधिक ही अपनी पर उतर आया तो भगवती ने स्पष्ट उत्तर मुझे दे दिया कि एक पतंग की तरह तुम उड़ते ही उड़ते रहना चाहते हो, पर यह मत भूलो कि कर्मों की डोर से बंधे हुये हो| यह कर्मों की डोर तुम्हें खींच कर बापस इस संसार में ले आएगी| अतः प्रारब्ध कर्म तो तुम्हें भुगतने ही पड़ेंगे| कोई उपाय नहीं है| साथ-साथ यह निर्देश भी दे दिया कि यदि हो सके तो घर में ही एक अलग कोने की व्यवस्था कर लो जहाँ कम से कम व्यवधान हो, और परमशिव का ध्यान करो|
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गीता में भगवान हमें निमित्त मात्र होकर रहने को कहते हैं ---
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व, जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव, निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||११:३३||"
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मेरा अनुभव है कि भगवान ही भक्ति हैं, भगवान ही भक्त हैं, भगवान ही क्रिया और कर्ता हैं| जहां साधक होने का घमंड जन्म लेता है, उसी क्षण पतन होने लगता है| भूल कर भी कभी साधक, उपासक, भक्त या कर्ता होने का मिथ्या भाव मन में नहीं आना चाहिए| मैं यह बात अपनी निज अनुभूतियों से लिख रहा हूँ, कोई मानसिक कल्पना नहीं है| पतन का दूसरा द्वार हमारा लोभ है| एक बार ध्यान करते करते एक भाव-जगत में चला गया, जहाँ कोई अदृश्य शक्ति मुझसे पूछ रही थी कि तुम्हें क्या चाहिए| स्वभाविक रूप से मेरा उत्तर था कि आपके प्रेम के अतिरिक्त मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| मुझे उत्तर मिला कि -- "प्रेम का भी क्या करोगे? मैं स्वयं सदा तुम्हारे समक्ष हूँ, मेरे से अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है|" तत्क्षण मुझे मेरी अभीप्सा (तड़प, अतृप्त प्यास) का उत्तर मिल गया| एक असीम वेदना शांत हुई| अगले ही क्षण मैं फिर बापस सामान्य चेतना में लौट आया| वास्तव में हमें परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| वे हैं तो सब कुछ हैं, उनके बिना कुछ भी नहीं है|
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वे निरंतर हमारे हृदय में हैं| वे निकटतम से भी अधिक निकट, और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं| वे सदा हमारे हृदय में हैं| भगवान कहते हैं ---
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति| भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया||१८:६||"
" उमा दारु जोषित की नाईं| सबहि नचावत रामु गोसाईं||" (श्रीरामचरितमानस)
हम सब कठपुतलियाँ हैं भगवान के हाथों में| कठपुतली में थोड़ा अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) डाल दिया गया है, जो हमें दुःखी कर रहा है|
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अब और कहने के लिए कुछ भी नहीं बचा है| अंत में थोड़ा अति-अति संक्षेप में प्राणतत्व और परमशिव का अपना अनुभव भी साझा कर लेता हूँ| परमात्मा का मातृ रूप जिसे हम अपनी श्रद्धानुसार कुछ भी नाम दें, वे भगवती आदिशक्ति -- प्राण-तत्व के रूप में हमारी सूक्ष्म देह के मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी में सभी चक्रों को भेदते हुए विचरण कर रही हैं| जब तक उनका स्पंदन है, तभी तक हमारा जीवन है| वे ही साधक हैं, और वे ही कर्ता हैं| जिनका वे ध्यान कर रही हैं, उनको मैं मेरी श्रद्धा से परमशिव कहता हूँ, आप कुछ भी कहें| परमशिव एक अनुभूति है जो गहरे ध्यान में इस भौतिक देह के बाहर की अनंतता से भी परे होती है| वह अवर्णणीय है|
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सारी साधना वे जगन्माता, भगवती, आदिशक्ति ही स्वयं कर के परमशिव को अर्पित कर रही हैं| हम तो साक्षीमात्र हैं उस यजमान की तरह जिस की उपस्थिति इस यज्ञ में आवश्यक है| और कुछ भी नहीं| वे ही गुरु रूप में प्रकट हुईं और मार्गदर्शन किया| वे ही इस जीवात्मा का विलय परमशिव में एक न एक दिन कर ही देंगी| और कुछ भी नहीं चाहिए| उन परमशिव और जगन्माता को नमन !!
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||११:३९||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||११:४०||"
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० फरवरी २०२१