भगवान श्रीकृष्ण ने मुक्ति का और सुखी होने का एक सूक्ष्म सूत्र बताया है जो मेरे जैसे अकिंचन पतित व्यक्ति का भी उद्धार कर सकता है (इस के अतिरिक्त मेरे पास और कोई सामान नहीं है) ---
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गीता में अपनी परम कृपा कर के भगवान कहते हैं --
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥६:२५॥"
अर्थात् - शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥
Little by little, by the help of his reason controlled by fortitude, let him attain peace; and, fixing his mind on the Self, let him not think of any other thing.
अपने भाष्य में आचार्य शंकर कहते हैं -- "शनैःशनैः अर्थात् सहसा नहीं क्रम क्रम से उपरति को प्राप्त करे। किसके द्वारा बुद्धि द्वारा। कैसी बुद्धि द्वारा धैर्य से धारण की हुई अर्थात् धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा। तथा मन को आत्मा में स्थित करके अर्थात् यह सब कुछ आत्मा ही है उससे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है, इस प्रकार मन को आत्मा में अचल कर के अन्य किसी वस्तु का भी चिन्तन न करे। यह योग की परम श्रेष्ठ विधि है।
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लगता है भगवान ने यह निम्न सूत्र मेरे लिए ही बताया है। वे ही मेरे परम हितैषी हैं। भगवान आगे कहते हैं --
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
अर्थात् - यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे॥
When the volatile and wavering mind would wander, let him restrain it and bring it again to its allegiance to the Self.
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भगवान यहाँ सुखी होने उपाय भी बताते हैं ---
"प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥६:२७॥"
अर्थात् - जिसका मन प्रशान्त है, जो पापरहित (अकल्मषम्) है और जिसका रजोगुण (विक्षेप) शांत हुआ है, ऐसे ब्रह्मरूप हुए इस योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है॥
Supreme Bliss is the lot of the sage, whose mind attains Peace, whose passions subside, who is without sin, and who becomes one with the Absolute.
आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं -- "क्योंकि जिसका मन भलीभाँति शान्त है जिसका रजोगुण शान्त हो गया है अर्थात् जिसका मोहादि क्लेशरूप रजोगुण अच्छी प्रकार क्षीण हो चुका है, जो ब्रह्मरूप जीवन्मुक्त अर्थात् यह सब कुछ ब्रह्म ही है ऐसे निश्चय वाला है एवं जो अधर्मादि दोषों से रहित है उस योगी को निरतिशय उत्तम सुख प्राप्त होता है।
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भगवान आगे कहते हैं --
"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥६:२९॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् - योगयुक्त अन्त:करण वाला और सर्वत्र समदर्शी योगी आत्मा को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा में देखता है॥
जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
He who experiences the unity of life sees his own Self in all beings, and all beings in his own Self, and looks on everything with an impartial eye;
He who sees Me in everything and everything in Me, him shall I never forsake, nor shall he lose Me.
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भगवान ही मेरे एकमात्र हितैषी और एकमात्र धन हैं। मुझ गरीब ब्राह्मण के पास अन्य कुछ भी नहीं है। जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब आपको दे रहा हूँ। मुझे किसी से कुछ भी नहीं चाहिये, क्योंकि भगवान सदा मेरे साथ हैं। मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि उन्होंने अनायास ही मुझे प्रदान की है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ मार्च २०२३