Thursday, 23 April 2026

जातिवाद वेद विरुद्ध है ---

 जातिवाद वेद विरुद्ध है

जातिगत एकता की बात ही वेदविरुद्ध है| जो वेदविरुद्ध है वह हमें कभी भी स्वीकार नहीं होना चाहिए| श्रुति भगवती ब्रह्म से एकत्व सिखाती है, वहाँ कोई जाति की बात नहीं है| एकस्तथा सर्व भूतान्तरात्मा, अर्थात सब प्राणियों में एक ही आत्मा छिपा हुआ है| प्रत्यगात्मा यानि ब्रह्म में एकत्व है| जातिगत एकता की बात करने वाले अज्ञान और माया के वशीभूत हैं|
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जो लोग जातिगत एकता की बातें करते हैं, मैं आध्यात्मिक रूप से उनका समर्थन नहीं करता हूँ| पर सामाजिक रूप से कभी कभी जातिगत एकता की बातें करना मेरी विवशता यानि मज़बूरी है क्योंकि भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में अनारक्षित जातियों के विरुद्ध राजनीतिक अन्याय बहुत अधिक है|
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"जाति हमारी ब्रह्म है, माता पिता हैं राम|
गृह हमारा शुन्य है, अनहद में विश्राम||"
हमारी जाति "अच्युत" है| अर्थात् जो भगवान की जाति है, वह ही हमारी जाति है| ब्रह्म ही सत्य है और संसार मिथ्या है| अतः ब्रह्म से एकत्व ही सच्चा एकत्व है, इन सांसारिक जातियों से नहीं|
कृपा शंकर
२३ अप्रेल २०१९

२४ अप्रेल को सभी श्री अरविन्द आश्रमों में एक उत्सव मनाया जाता है ---

 24अप्रेल को सभी श्री अरविन्द आश्रमों में एक उत्सव मनाया जाता है| वह है श्री माँ का अंतिम रूप से श्रीअरविन्द आश्रम पोंडिचेरी में स्थायी आगमन का दिन| सर्वप्रथम श्री माँ 1914 में आई थीं पर अंतिम व स्थाई रूप से 24 अप्रेल 1920 को आ कर पोंडिचेरी में बस गईं|

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24 नवम्बर 1926 को श्रीअरविन्द ने भगवान श्रीकृष्ण का पूर्ण साक्षात्कार किया और उसके पश्चात् श्री माँ को आश्रम का भार सौंप कर एकांत साधना में लीन हो गए| वर्ष में सिर्फ चार बार ही वे अपने शिष्यों को दर्शन देते थे| इन चार दिनों को श्री अरविन्द और श्री माँ एक कमरे में कुर्सी पर बैठ जाते और उनके शिष्य क्रमबद्ध होकर शांति से उनके सामने से पुष्प अर्पित करते हुए प्रणाम कर के निकल जाते|
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(1) 15 अगस्त 1872 को श्री अरविन्द का कोलकाता में जन्म हुआ और सात वर्ष की आयु में ही उनके माँ-बाप ने उन्हें लन्दन भेज दिया ताकि कोई भी भारतीय हिन्दू संस्कार उनमें न पड़े| उनके माँ-बाप ने उनको न तो अपनी मातृभाषा सिखाई और न कोई हिन्दू संस्कार दिए| वे चाहते थे कि उनका बालक पक्का अँगरेज़ बने|
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(2) 21 फरवरी 1878 को श्री माँ का पेरिस फ़्रांस में जन्म हुआ| उनके पिता तुर्क (Turk) मूल के थे और माँ मिश्र (Egypt) मूल कीं| उनका नाम रखा गया #मीरा अल्फासा| यह एक मुस्लिम नाम है|
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(3) 24 अप्रेल1920 को श्री माँ का पोंडिचेरी में अंतिम आगमन|
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(4) 24 नवम्बर 1926 सिद्धि दिवस|
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(* 'मीरा' मूल रूप से मध्य एशिया का एक सामान्य मुस्लिम नाम है| पूर्व सोवियत संघ के युक्रेन गणराज्य में मेरा घनिष्ठ परिचय मीरा नाम की एक अति विदूषी तातार मुस्लिम महिला से था| वह दस वर्ष तक चीन में राजनीतिक बन्दी भी रह चुकी थी| उसकी एक सम्बन्धी लडकी का नाम भी 'मीरा' था जिसे हिंदी भाषा और भारतीय नृत्य भी आते थे| कई वर्षों तक उसका मेरे साथ पत्राचार था|)
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इस लेख को लिखने का उद्देश्य 24 अप्रेल को श्री माँ को प्रणाम निवेदित करना है जिसने भारत और सनातन धर्म की महान सेवा की|
ॐ ॐ ॐ || २३ अप्रेल २०१६

सारा देश इस समय खनन माफियाओं के चंगुल में है ---

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सारा देश इस समय खनन माफियाओं के चंगुल में है

ॐ श्री गुरवे नमः|

आज मैं साधन क्रमों पर चर्चा करने वाला था पर उसके स्थान पर अपनी ही व्यथा व्यक्त करने जा रहा हूँ| अपने सामने इतना अन्याय देख रहा हूँ कि इस समाज से विरक्ति हो गयी है| इच्छा यही हो रही है कि विरक्त होकर सांसारिक चेतना से ऊपर उठ जाऊं और स्थाई रूप से एकांतवास करूं व इस समाज और इसकी चेतना से पृथक ही रहूँ|
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सारा देश इस समय खनन माफियाओं के चंगुल में है| हर जिले में पटवारी से जिलाधीश तक, और सिपाही से पुलिस अधीक्षक तक, और सारे मंत्रीगण खनन माफियाओं के बंधुआ मजदूर है| देश की बहुमूल्य खनिज संपदा की लूट हो रही है| और जो भी इन माफियाओं के मार्ग में आता है उसका अंत कर दिया जाता है|
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स्वतन्त्रता संग्राम में हमारे क्षेत्र में स्वतंत्रता सेनानियों के शिरोमणि थे --- पचेरी ग्राम के पं.ताड़केश्वर शर्मा| अंगरेज़ सरकार ने उनके पूरे परिवार को सगे सम्बन्धियों, महिलाओं और बच्चों सहित जेल में डाल रखा था| उनका घर, खेत और सारी सम्पति जब्त कर ली थी| तथाकथित आज़ादी के बाद उनके परिवार के जीवित बचे छ: सदस्यों को राष्ट्रपति ने सम्मानित भी किया था|
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उनके पौत्र पं.प्रदीप शर्मा पर्यावरण प्रेमी होने के कारण और परोपकार हेतु खनिज माफियों के विरुद्ध संघर्षरत थे| दो माह पूर्व उनके परिवार के अनुसार पुलिस की मिलीभगत से चुनौती देकर भोजन करते समय घर से बाहर बुलाकर उनकी ह्त्या कर दी गयी और लाश को एक-डेढ़ फुट गहरे नाले में फेंक दिया गया| उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर आसपास के गाँवों से हजारों लोग एकत्र हो गए व जिले के कई प्रतिष्ठित लोग भी आ गए तब प्रशासन ने पूर्ण आश्वासन दिया था कि मामले की निष्पक्ष जांच होगी| उनके शरीर पर और गले पर चोट के निशान भी थे|
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अब सरकार यह सिद्ध करने पर अड़ी हुई है कि पं.प्रदीप शर्मा ने पानी में डूब कर आत्म-हत्या की है| सरकारी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट में भी दम घुटने से मौत दिखाई गई है और शरीर पर चोटों के निशान नहीं होना बताया है| उनके गाँव पचेरी में अभी तक आन्दोलन चल रहा है| सारे गाँव के लोग पाबन्द किए गए हैं| आस पास के गाँवों में पूर्ण बंद रहा है और प्रशासन ने जन आन्दोलन को कुचलने की पूर्ण चेष्टा की है| पं.प्रदीप शर्मा के घर का ताला तोड़कर उनका चलभाष और अन्य साक्ष्य चोरी किये गए| जाँच के नाम पर सारे साक्ष्यों को मिटाया गया है| क्या इतने जीवट का व्यक्ति जो खनन माफियाओं के विरुद्ध संघर्ष कर रहा था एक फुट गहरे पानी में डूब कर आत्म-ह्त्या करेगा?
क्या कोई एक फुट गहरे पानी में डूब कर आत्म-हत्या कर सकता है?
दो महीने बीत जाने पर भी किसी नामजद को गिरफ्तार नहीं किया गया है| CBI से जाँच की मांग नहीं मानी जा रही है| यदि CBI से जाँच हो तो पूरी सरकार बेनकाब हो जायेगी| पर सीबीआई भी तो सरकार से ही आदेश लेगी|
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कल जिला मुख्यालय पर एक बहुत बड़ा धरना दिया गया जिसमे अनेक पूर्व वरिष्ठ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी, प्रसिद्ध डॉक्टर, प्रबुद्धजन, शिक्षाविद और मातृशक्ति थी| सबने इस घटना की निंदा की| ज्ञापन लेने के लिए कोई अधिकारी उपलब्ध नहीं था| अब उस महान स्वतंत्रता सेनानी के परवार के सदस्यों ने निर्णय लिया है की वे अपने सम्मान लौटा देंगे और आमरण अनशन करेंगे|
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जब एक प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी का परिवार इन खनन माफियाओं से सुरक्षित नहीं है तो एक सामान्य जन का क्या हाल होगा?
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और भी अनेक बातें हैं जो पीड़ित करती हैं| इसमें दोष बुरे लोगों का नहीं है| दोष तो हमारा ही है हम निर्बल और संवेदन हीन बन गए हैं|
दुनिया को खतरा बुरे लोगों की ताकत से नहीं है बल्कि अच्छों की दुर्बलता के कारण है|
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वर्त्तमान में Democracy (लोकतंत्र) समाप्त होकर Plutocracy (धनी व कुटिल लोगों का राज्यतंत्र) रह गयी है| वर्त्तमान लोकतंत्रीय व्यवस्था काले विषधर उगल रही है और हम उन्हें दूध पिला रहे हैं| आज की राजनीति आत्मा पर लात मार रही है और हम वफादारी के साथ अपनी दुम हिला रहे हैं|
हम सत्य को कहने से डर रहे हैं|
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अधिक से अधिक 50 या 60 प्रतिशत मतदान होता है फिर ये मत अनेक प्रत्याशियों में बँट जाते हैं| मात्र 20-25 मत प्राप्त करने वाला व्यक्ति जनप्रतिनिधी बन जाता है|
वोट बेंक की राजनीति, जातिवाद, साम्प्रदायिकता की भावना भड़का कर, पैसे शराब आदि बाँट कर 15 से 20 प्रतिशत वोट प्राप्त कर लेने वाले की जीत पक्की है| सारे माफिया इसी तरीके से सत्ता में आते हैं|
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हमारे मन में लाचारी का भाव की मैं अकेला क्या कर सकता हूँ, मेरी कौन सुनेगा आदि के कारण ही यह democracy बदल कर plutocracy हो गई है| मैं सभी पाठकों से निवेदन करता हूँ की हम सब यह संकल्प करें की अगले चुनावों में शत-प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को प्राप्त करें| समाज के जिस पात्र भाई बहिन का नाम मतदाता सूचि में नहीं है वे अपना नाम जुड़ायें| मतदान वाले दिन सूर्य उदय होते ही एक धार्मिक कर्तव्य मानकर मतदान देने पहुँच जाएँ| अन्यथा यही अन्याय और माफिया राज्य सहने के लिए तैयार रहें| सोचें, विचारें और सक्रियता से आगे बढ़ें अन्यथा पांचाली के चीर हरण में जो चुप रहेंगे उन्हें भावी पीढी कभी क्षमा नहीं करेगी|
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शुभ कामनाएँ| जय जननी जय भारत|
२३ अप्रेल २०१३

सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम हैं ---

 सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम हैं ---

सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम हैं ---
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१ पांच अंगो ( दो हाथ, २ पैर, मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करें !
२. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है !
३. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है !
४. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए !
५. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है !
६ . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है !
७. शैय्या पर, हाथ पर रख कर, टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए !
८. मल मूत्र का वेग होने पर, कलह के माहौल में, अधिक शोर में, पीपल, वट वृक्ष के नीचे, भोजन नहीं करना चाहिए!
९ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए !
१०. खाने से पूर्व अन्न देवता, अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के, उनका धन्यवाद देते हुए, तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए !
११. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से, मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर (गाय, कुत्ता, और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये !
१२. इर्षा, भय, क्रोध, लोभ, रोग, दीन भाव, द्वेष भाव, के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है !
१३. आधा खाया हुआ फल, मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए !
१४. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए !
१५. भोजन के समय मौन रहे!
१६. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए !
१७. रात्री में भरपेट न खाए !
१८. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए !
१९. सबसे पहले मीठा, फिर नमकीन, अंत में कडुवा खाना चाहिए !
२०. सबसे पहले रस दार, बीच में गरिस्थ, अंत में द्रव्य पदार्थ ग्रहण करे !
२१. थोडा खाने वाले को --आरोग्य, आयु, बल,सुख, सुन्दर संतान और सौंदर्य प्राप्त होता है !
२२. जिसने ढिंढोरा पीट कर खिलाया हो वहाँ कभी न खायें !
२३. कुत्ते का छुवा, रजस्वला स्त्री का परोसा, श्राद्ध का निकाला, बासी, मुँह से फूँक मरकर ठंडा किया, बाल गिरा हुवा भोजन, अनादर युक्त, अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करें !

कुंडलिनी जागरण, कूटस्थ चैतन्य और ब्राह्मी-स्थिति ---

 कुंडलिनी-जागरण, कूटस्थ-चैतन्य और ब्राह्मी-स्थिति ---

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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने लगभग तीन बार "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग किया है। यह बड़ा ही पवित्र शब्द है, मेरे विचार से इसका एकमात्र अर्थ जो सरलतम भाषा में हो सकता है, वह है --"अविनाशी आत्म चैतन्य"। इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं है। गीता के दूसरे अध्याय के अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने "ब्राह्मी-स्थिति" की चर्चा की है। इस "ब्राह्मी-स्थिति" और "कूटस्थ-चैतन्य" का अर्थ एक ही है। ये दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं, इनमें कोई भेद नहीं है। बौद्धिक रूप से "अविनाशी आत्म-चैतन्य" को समझना असंभव है। इसे केवल परमात्मा की परम कृपा द्वारा ही समझा जा सकता है। यानि जिस पर परमात्मा की कृपा हो, वही इसे समझ सकता है।
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मैं ईश्वर की प्रेरणा से ही निम्न पंक्तियाँ लिख पा रहा हूँ। बिना उनकी कृपा के एक शब्द भी नहीं लिख सकता। उनकी कृपा से ही श्रीमद्भगवद्गीता के "पुरुषोत्तम-योग" को समझ पाया हूँ, जिसे बिना उनकी कृपा के कोई नहीं समझ सकता। यह गीता का सार है जो गीता के पंद्रहवें अध्याय के आरंभिक चार मंत्रों में समाहित है। श्रीमद्भगवद्गीता मेरा प्राण है, उसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। यहाँ मैं गीता पर चर्चा कर रहा हूँ, यह भगवान के परमप्रेम की ही अभिव्यक्ति है। व्यक्तिगत रूप से मैं इसकी चर्चा भविष्य में किसी से भी कभी भी नहीं करूंगा। यह मेरा व्यक्तिगत विषय है।
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यहाँ मैं कुंडलिनी जागरण के ऊपर लिख रहा हूँ। इस विषय पर बहुत अधिक झूठ परोसा गया है। कुंडलिनी-जागरण कोई जादू-मंत्र नहीं है। यह हमारे सूक्ष्म देह के मेरुदण्ड में होने वाली एक अनुभूति है जो ईश्वर की परमकृपा से सभी भक्तों को होती है। उनके भक्त इसकी चर्चा नहीं करते। कुंडलिनी-जागरण का एकमात्र लाभ यह है कि इससे हमारे सारे बौद्धिक संशय दूर हो जाते हैं। परमात्मा की अवधारणा अधिक अच्छी तरह समझ में आ सकती है। इससे होने वाली हानि यही है कि इस में यदि ब्रह्मचर्य का पालन न किया जाये, यानि आचार-विचार में शुद्धि न हो तो मस्तिष्क की एक स्थायी गंभीर विकृति उत्पन्न हो सकती है जिसे इस जन्म में दूर नहीं किया जा सकता। एक दूसरा ही जन्म उसके लिए लेना पड़ता है। जिनकी आस्था ईश्वर में नहीं है, वे इस विषय से दूर रहें। यह उनका विषय नहीं है। नहीं तो आप पागल हो जाएँगे।
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ॐ नमः शिवाय !! मैं शिव, विष्णु और उनके अवतारों में पूर्ण आस्था रखता हूँ। शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों ही परमब्रह्म परमात्मा की दो पृथक पृथक अभिव्यक्तियाँ हैं। आप सब का जीवन कृतकृत्य और कृतार्थ हो।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अप्रेल २०२६

अज़ान के बोल ---

इस लेख का उद्देश्य निष्पक्ष दृष्टि से बिना किसी पूर्वाग्रह के सभी की जानकारी को बढ़ाना ही है| हम नित्य दिन में पाँच बार ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से मस्जिदों से बोली जा रही अज़ान की आवाज़ सुनते हैं| अज़ान की बांग हुई है इसका अर्थ है अब नमाज़ पढ़ी ही जाएगी| यह श्रद्धावानों को नमाज़ का समय होने की व नमाज पढ़ने की याद दिलाने के लिए होती है| इस लेख को मैं जन साधारण की जानकारी के लिए शेयर कर रहा हूँ| इसके अर्थों को मन ही मन अवश्य समझें|
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इस समय मेरी आयु 72 वर्ष की है| जीवन में भगवान ने मुझे विश्व के ग्यारह मुस्लिम देशों .... मोरक्को, सऊदी अरब, मिश्र, तुर्की, मलयेशिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, यमन और ईरान जाने का अवसर दिया है| उपरोक्त ग्यारह देशों में जहाँ तक मुझे याद है, मैनें ध्वनि-विस्तारक यंत्रों से कहीं पर भी अज़ान की आवाज नहीं सुनी|
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जब मैं 20 वर्ष का था तब तक भारत की किसी भी मस्जिद पर ध्वनि-विस्तारक यंत्र नहीं लगे थे| सन 1970 के दशक के आरंभ में पूरे भारत में हर मस्जिद पर बड़े-बड़े ध्वनि-विस्तारक यंत्र लग गए और full volume से उनका मुंह दूसरों के मोहल्लों की ओर कर के ही बजाया जाता है| क्या यह एक मनोवैज्ञानिक आक्रमण नहीं है? हर हिन्दू को इसके अर्थ का पता होना चाहिए| यदि पता होगा तभी तो वे कोई प्रतिक्रिया करेंगे|
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रमज़ान का मुक़द्दस महिना भी कल या परसों से शुरू हो जाएगा| यह चाँद दिखाई देने पर निर्भर है| सभी श्रद्धालुओं को इस की शुभ कामनाएँ|
ॐ नमः शिवाय !!
23 April 2020

अज़ान इस्लाम में नमाज़(Pray) के लिए बुलाने के लिए ऊँचे स्वर में जो शब्द कहे जाते हैं, उन्हें कहते हैं ।

कुछ इस तरह के बोल हैं अज़ान में: यह अरबी ज़ुबान के बोल हैं:-

1)अल्लाहु अकबर (चार बार) Allahu Akbar Allahu Akbar (twice)
2) अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह (दो बार ) Ashahadu an la ilaha illa Allah (twice)
3)अशहदु अन्ना मुहमदन रसूल्लुल्लाह (दो बार) Ashahadu ana Muhamadan Rasoollullah (twice)
4)हैया ‘अल-सलाह (दो बार) Haya ‘ala asalah (twice)
5)हैया ‘अलल फ़लाह (दो बार) Haya ‘ala al falah (twice)
6)अल्लाहु अकबर (दो बार) Allahu Akbar Allahu Akbar (once)
7)ला इलाहा इल्लल्लाह (एक बार) La ilaha ila Allah (once)
तो ये थे अरबी ज़ुबान के बोल अब मैं इसके मायने(Meaning) बताता हूँ;-

अल्लाहु अकबर” का अर्थ होता है “अल्लाह महान है

अशहदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ होता है “मैं गवाही देता हूँ; कोई उपास्य नहीं सिवाय अल्लाह के”

“अशहदु अन्ना मुहमदन रसूल्लुल्लाह” का अर्थ होता है “मैं गवाही देता हूँ; मुहम्मद (saw) अल्लाह के रसूल (दूत) हैं“

हैया ‘अल-सलाह” का अर्थ होता है “आओ नमाज़ की तरफ़“

हैया ‘अलल फ़लाह” का अर्थ होता है “आओ सफ़लता की ओर“

“ला इलाहा इल्लल्लाह” का अर्थ होता है “कोई उपास्य नहीं सिवाय अल्लाह के“



उम्मीद करता हूँ आप सबको इसके मायने मालूम चल गए होंगे और अज़ान का सन्देश भी…