Friday, 24 April 2026

= खेचरी मुद्रा =(भाग 1)

 == खेचरी मुद्रा ==

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(भाग 1)
ओ३म नमः शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे| शिवस्य हृदयं विष्णु: विष्णोश्च हृदयं शिव:||
ओ३म मुनीन्द्रगुह्यं परिपूर्णकामं कलानिधिं कल्मषनाश हेतुं |
परात्परं यत्परं पवित्रं नमामि शिवम् महतो महान्तम्||
नमामि शिवं महतो महान्तं| नमामि रामं महतो महान्तम्||
मैं पूर्व में अनेक आध्यात्मिक चर्चाएँ कर चुका हूँ| गुरु तत्व पर चर्चा के पश्चात अन्य किसी भी आध्यात्मिक विषय पर और चर्चा नहीं करूंगा| मेरे लिए उससे बड़ा कोई अन्य विषय नहीं है|
अब बापस साधनों की ओर लौटता हूँ|
हमारे महान पूर्वज भौतिक सूर्य की नहीं बल्कि स्थूल सूर्य की ओट में जो सूक्ष्म भर्गज्योति: है उसकी उपासना करते थे| उसी ज्योति के दर्शन ध्यान में कूटस्थ (आज्ञाचक्र और सहस्रार) में भी सर्वदा होते हैं|
इस लिए भी ध्यान साधना की जाती है|
ध्यान में सफलता के लिए हमें इन का होना आवश्यक है:-----
(1) भक्ति यानि परम प्रेम|
(2) परमात्मा को उपलब्ध होने की अभीप्सा|
(3) दुष्वृत्तियों का त्याग|
(4) शरणागति और समर्पण|
(5) आसन, मुद्रा और यौगिक क्रियाओं का ज्ञान|
(6) दृढ़ मनोबल और बलशाली स्वस्थ शरीर रुपी साधन|
खेचरी मुद्रा बहुत महत्वपूर्ण है जिसकी चर्चा हम क्रमशः करेंगे|
वेदों में 'खेचरी शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है|
वेदिक ऋषियों ने इस प्रक्रिया का नाम दिया -- 'विश्वमित्'|
'खेचरी' का अर्थ है --- ख = आकाश, चर = विचरण| अर्थात आकाश यानि प्रकाशवान या ज्योतिर्मय ब्रह्म तत्व में विचरण| जो बह्म तत्व में विचरण करता है वही साधक खेचरी सिद्ध है| परमात्मा के प्रति परम प्रेम और शरणागति हो तो साधक परमात्मा को स्वतः उपलब्ध हो जाता है पर प्रगाढ़ ध्यानावस्था में देखा गया है की साधक की जीभ स्वतः उलट जाती है और खेचरी व शाम्भवी मुद्रा अनायास ही लग जाती है| ध्यान साधना में तीब्र प्रगति के लिए खेचरी मुद्रा का ज्ञान अति आवश्यक है|
दत्तात्रेय संहिता और शिव संहिता में खेचरी मुद्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है|
तीन-चार दिनों में हम नित्य इसकी चर्चा और पूरी सरल विधि और महिमा का वर्णन करेंगे|
२४ अप्रेल २०१३
===== क्रमशः ======

परमात्मा एक प्रवाह है, उसे स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दो, कोई अवरोध मत खड़ा करो ---

"परमात्मा एक प्रवाह है, उसे स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दो| कोई अवरोध मत खड़ा करो| फिर पाएँगे कि वह प्रवाह हम स्वयं हैं|"

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प्रिय निजात्मगण, आप सब में हृदयस्थ प्रभु को नमन !
आप सब से एक प्रश्न है ..... क्या इस संसार में कुछ पाने योग्य है ?
आध्यात्मिक दृष्टी से सर्वप्रथम तो कुछ पाने की अवधारणा ही गलत है|
कुछ पाने की कामना ही माया का सबसे बड़ा अस्त्र है|
>>> या तो सब कुछ मिलता है या कुछ भी नहीं मिलता, यह एक आध्यात्मिक नियम है| यह कुछ पाने की अभिलाषा एक मृगतृष्णा है| किसी को कुछ नहीं मिलता| <<<
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सब कुछ परमात्मा का है और सब कुछ "वह" ही है| हमें स्वयं को ही समर्पित होना पड़ता है| जो परमात्मा को समर्पित हो गया उसको सब कुछ मिल गया| बाकि अन्य सब को निराशा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिलता|
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सब कुछ तो मिला हुआ ही है| पाने योग्य कुछ है तो "वह" ही है जिसे पाने के बाद कुछ भी प्राप्य नहीं है| "वह" मिलता नहीं है, उसमें स्वयं को समर्पित होना पड़ता है| कुछ करने से "वह" नहीं मिलता, कुछ होना पड़ता है| वह होने पर "वह" स्वयं ही कर्ता भी बन जाता है|
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हमें चाहिए बस सिर्फ एक प्रबल सतत अभीप्सा और परम प्रेम, अन्य कुछ भी नहीं|
>>> "परमात्मा एक प्रवाह है, उसे स्वयं के माध्यम से प्रवाहित होने दो| कोई अवरोध मत खड़ा करो| फिर पाएँगे कि वह प्रवाह हम स्वयं हैं|" <<<
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ॐ तत्सत् | शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
24 April 2016

नाभी क्रिया

 श्री श्री लाहिड़ी महाशय नाभी क्रिया को अत्यंत महत्व देते थे।मनु संहिता में है; "धर्म के चार चरण हैं और,इसीलिए,सत्य के भी चार चरण हैं।"

लाहिड़ी महाशय ने इसे इस प्रकार समझाया;
धर्म चार चरणों में विभाजित है:
1 खेचरी मुद्रा
2 अनाहत ग्रन्थि का भेदन
3 मणिपुर ग्रन्थि का भेदन
4 मूलाधार ग्रन्थि का भेदन ।
ललिता सहस्त्रनाम में भी है;
मुलाधारैकनीलया ब्रम्हग्रन्थिविभेदिनी ।
मणिपुरान्तरूदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी ।।
आज्ञाचक्रान्तरलस्था रुद्रग्रंथिविभेदिनी ।
आदि शंकराचार्य जी ने भी सौंदर्य लहरी में उपरोक्त का दृष्टान्त दिया है।
स्पष्ट है कि ग्रन्थिविभेदन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ग्रंथि सुषुम्ना में प्राण प्रवाह को बाधित करती है।ये ग्रन्थियां इड़ा एवम् पिंगला के संगम बिंदु पर बनती हैं।
तीन प्रमुख नाड़ियों(इडा,पिंगला,सुषुम्ना) तथा चक्रों का वृहद वर्णन कालांतर में करेंगे। यहाँ हम नाभी क्रिया को समझेंगे जो हमारी क्रिया साधना का महत्वपूर्ण अंग है।मणिपुर चक्र पर प्राण और अपान वायु एक दूसरे को पार करते हैं,परिणाम स्वरूप ऊर्जा का उलझाव,गुत्थी या ग्रन्थि बन जाती है।मणिपुर ग्रन्थि को नाभी क्रिया से भेदना आवश्यक है जिससे कुण्डलिनी जागरण निर्बाध हो सके।
नाभी क्रिया की विधि-
1-अपने ध्यान आसन पर बैठें।बन्द आखों से भ्रूमध्य पर एकाग्र हों।श्वास-प्रश्वास को भूल जाएं।
2- अब प्रत्येक चक्र पर ॐ का जप करें,क्रमशः ऊपर जाना है;
मूलाधार,स्वाधिष्ठान,मणिपुर,अनाहत,विशुद्ध,बिंदु तथा अंत में भ्रूमध्य।
4-जब बिंदु से भ्रूमध्य की ओर जाएं तब धीरे धीरे सिर को नीचे झुकाएं;ठुड्डी को कण्ठ से स्पर्श करवाएं(सहज तथा बिना दबाव के)।
4-अब हांथों को जोड़ें;अंगुलियां एक दूसरे को जकड़े हुए तथा अंगूठे परस्पर मिले हुए।हथेलियाँ नीचे की ओर स्वतः हो जायेंगीं।
5-अब अंगूठों से नाभि पर हल्की हल्की ठोकर लगाएं।ठोकर देते समय अंगूठों को 1 या 1.5 इंच से अधिक दूर न ले जाएं।आपकी ठोकर भी मृदु हो तथा गति भी 1 सेकंड में 2 हो।गति सुविधानुसार कम या अधिक कर सकते हैं।ठोकरों की संख्या 50-100 हो।प्रत्येक ठोकर के साथ ॐ का मानसिक जप करें।ऐसा करने से समान वायु उदर के मध्य भाग में संग्रहित होती है।इस समय नाभि एवम् भ्रूमध्य आपस में जुड़े हैं,ऐसा भाव हो।
6-अब सर को धीरे धीरे ऊपर उठाते हुए सामान्य स्थिति में ले आएं।ऐसा करते समय एकाग्रता भ्रूमध्य से बिंदु होते हुए सीधे मणिपुर चक्र पर लाना है।
7-अब हाथों को खोल कर पीठ की ओर ले जाएं।पुनः हाथों को पूर्ववत बांध लें।
8-अब मणिपुर चक्र पर ॐ जप के साथहल्की हल्की ठोकर लगाएं।संख्या 25 से 75 हो।
9-जब यह पूर्ण हो तब हाथों को सामान्य करते हुए ध्यान मुद्रा में ले आएं।
10-अब भ्रूमध्य पर एक बार ॐ का जप करें फिर मेडुला पर तथा उतरते हुए 5,4,3,2,1,प्रत्येक चक्र पर एक बार ॐ का जप करें।
इस पूरी प्रक्रिया को 4 बार दोहराएं।
नावी क्रिया में ॐ की हल्की ठोकर तथा श्वास का कोई सम्बन्ध नही है।
साथ ही ठोकरों की संख्या तथा आगे-पीछे संख्या का अनुपात भी निश्चित नही है।आप इस अनुपात को बराबर भी रख सकते हैं।ठोकर की गति भी आप अपनी सुविधानुसार तेज या धीमी कर सकते हैं।
कुछ उन्नत साधक हाथों का प्रयोग ही नही करते तथा पूरी नाभी क्रिया मानसिक रूप से ही करते हैं।धीरे धीरे साधक को ज्ञात हो जाता है कि उसके लिए क्या उचित होगा।
बिंदु 6 पर जब आप सर को सामान्य स्थिति में लाएं तो कुछ और पीछे जाएं जैसे की छत की ओर देखने का प्रयास है।ऐसा करने से नाभी चक्र की स्पष्ट अनुभूति होगी। 18 अक्तूबर 2015