भगवान की उपासना ---
योगोदय (Yogodaya)
स्वयं के आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति ही इस ब्लॉग का एकमात्र उद्देश्य है |
Tuesday, 28 July 2026
भगवान की उपासना ---
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भगवान की "उपासना" पूर्ण भक्तिपूर्वक "जपयोग" से आरंभ करनी चाहिए। "जप" करते-करते "निदिध्यासन" अपने आप होने लगता है। "निदिध्यासन" करते-करते "ध्यान" भी अपने आप ही लग जाता है। "ध्यान" के लिए अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता। सीधे ही जब "ध्यान" करने का प्रयास करते हैं, तब "विक्षेप" आये बिना नहीं रहता। माया के दो ही अस्त्र हैं -- "आवरण" और "विक्षेप", जिनसे वह संसार को भटकाती है। आवरण है "अज्ञान", और विक्षेप है "भटकाव"।
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एक सामान्य साधक के हृदय में जब भगवान के प्रति "परमप्रेम" (भक्ति) जागृत हो, तब उसे भगवान के भौतिक या मानसिक साकार विग्रह के समक्ष खूब नाम "जप" करना चाहिए। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है --
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥१०::२५॥"
अर्थात् -- " मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ। मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ॥"
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नाम "जप" करते-करते "निदिध्यासन" होने लगता है, जो "उपासना" का सबसे अधिक प्रभावशाली अंग है जिसके बिना "भक्ति" क्षीण होने लगती है। जब एक बर्तन से दूसरे बर्तन में तेल डालते हैं, तब तेल की धार खंडित नहीं होती। उसी तेल की धार की तरह अखंड अविछिन्न रूप से भगवान के स्मरण, चिंतन, मनन और श्रवण को "निदिध्यासन" कहते हैं।
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"भक्ति" शब्द का एकमात्र अर्थ -- "भगवान से परम प्रेम" है। कोई दूसरा अर्थ नहीं है। भक्ति में कोई शर्त या माँग नहीं होती, सिर्फ समर्पण होता है। भगवान एक अनुभूति है, जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। विष्णु-पुराण में ही एक स्थान पर "भगवान" को परिभाषित किया गया है, जिसकी व्याख्या अनेक स्वनामधान्य महान आचार्यों ने की है। जब भगवान से प्रेम होता है, तब सारे सिद्धांत गौण हो जाते हैं। भगवान सब सिद्धांतों से ऊपर हैं, और किसी भी सिद्धांत के बंधन में नहीं हैं। परमात्मा को पाने का मार्ग बताकर उनकी अनुभूति करा देना सद्गुरु का काम है। शिष्य को भी शिष्यत्व की पात्रता विकसित करनी पड़ती है, अन्यथा सद्गुरु भी कोई सहायता नहीं कर सकता।
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भगवान के समीप बैठना, उनकी "उपासना" है। स्वयं की पृथकता के बोध को भूलकर सिर्फ परमात्मा की चेतना में स्थिति "ध्यान" है। गीता में बताई हुई समत्व में स्थिति का नाम "समाधि" है। भगवान से जब परमप्रेम होता है, तब सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते है, कहीं कोई अंधकार नहीं रहता, सारे दीप अपने आप जल जाते हैं। सारा "ज्ञान" भी स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, और सारे गुण भी पीछे-पीछे चलने लगते हैं।
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हो सकता है कि आध्यात्मिक साधना पर यह मेरा अंतिम लेख हो। अब मेरे इस शरीर-महाराज की क्षमता बहुत कम हो गई है, और निरंतर कम होती जा रही है। इससे अधिक लिखना अब संभव नहीं होगा। इस शरीर महाराज को धन्यवाद देता हूँ, कि इस जीवन की लोकयात्रा में इसने मेरा बहुत अच्छा साथ दिया है। इस संसार में मेरा परिचय इस शरीर-महाराज के रूप में ही है। जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं एक नित्य-मुक्त-शाश्वत् आत्मा हूँ, जिसका एकमात्र शाश्वत संबंध सिर्फ परमात्मा से है।
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इस छल-कपट और झूठ से भरे संसार में रहने की अब और जरा सी भी रुचि नहीं रही है। इससे अधिक लिखना अब संभव नहीं होगा। मैं अकेला हूँ, कोई सहायक साथी भी नहीं है; और स्वयं साक्षात् परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी का कोई सहारा/आश्रय नहीं है। भगवान की परम कृपा है कि वे हर समय मेरे साथ रहते हैं, एक क्षण के लिए भी साथ नहीं छोड़ते। उन्हें भी मुझसे प्रेम हो गया है।
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आप सभी महान आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२८ जुलाई २०२२
भगवान के बिना भी हमारा काम चल रहा है। हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है? .
भगवान के बिना भी हमारा काम चल रहा है। हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है?
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उपरोक्त विषय पर मैं आप के विचार जानना चाहता हूँ। विश्व के घोर नास्तिक मार्क्सवादियों के विचार मैंने पढ़े हैं।
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भारत में कुछ वर्ष पहिले तक हिन्दी भाषा में "सरिता" नामक एक पाक्षिक पत्रिका निकलती थी जिसके सम्पादकीय और मुख्य लेख सनातन हिन्दू धर्म के घोर विरोध में लिखे जाते थे। उस पत्रिका को खोलते ही मुख्य लेख वेदों की निंदा, रामचरितमानस की निंदा, और सारे सनातनी हिन्दू रीति-रिवाजों की निंदा से भरे होते थे। कुछ रोचक कहानियाँ, और अन्य रोचक सामग्री भी होती थी। आश्चर्य की बात यह है की उस पत्रिका के पाठक भी सब हिन्दू ही होते थे। उस पत्रिका ने हिन्दू धर्म की बहुत अधिक हानि की। बहुत बड़ी संख्या में असंख्य हिन्दू उसे पढ़कर नास्तिक और धर्मद्रोही हो गए थे।
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जब मार्क्सवाद अपने चरम शिखर पर था, उस काल में और उसके बाद में भी मैंने कई मार्क्सवादी देशों का भ्रमण किया है, जहाँ ईश्वर की आराधना की सजा मृत्युदंड थी। वहाँ के लोगों का खोखला जीवन भी देखा है। अनेक मुस्लिम और ईसाई देशों का भ्रमण भी मैंने किया है और उनका खोखला जीवन भी देखा है।
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इन सब अनुभवों के पश्चात मेरे निजी व्यक्तिगत जीवन का केन्द्रबिन्दु तो भगवान हो गए हैं। सोशियल मीडिया पर मैं भगवान के बारे में कुछ लिख देता हूँ, और बहुत सीमित संख्या में बहुत कम ऐसे मित्र हैं जिन से आध्यात्मिक विषयों पर कुछ चर्चा हो जाती है। लेकिन भारत में ही आम आदमी से भगवान की चर्चा करना बड़ा खतरनाक है। किसी से भगवान की बात कर लो तो वह व्यक्ति बड़ा आक्रामक हो जाता है, और खाने को आता है।
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कहने को तो भारत एक धर्म-प्रधान देश है लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से ऐसा कुछ नहीं है। वर्तमान शिक्षा पद्धति के कारण ईसाई मूल्यों का प्रभाव बहुत अधिक है। भगवान के साथ व्यापार अधिक है और भक्ति बहुत कम है। धन्य हैं अनेक हिन्दू धर्म-प्रचारक जो हर तरह के असहयोग के पश्चात भी अपने धर्म पर अडिग हैं।
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कृपया अपने विचार बताने की कृपा करें की हमें भगवान की क्या व क्यों आवश्यकता है? क्या भगवान के बिना हमारा काम नहीं चल सकता?
धन्यवाद और मंगलमय शुभ कामनाएँ।
२८ जुलाई २०२३
"कोई भी कामना हमारी अभिलाषा का विषय न हो" >>>
जब मैं स्वयं के व्यक्तित्व का अवलोकन करता हूँ तब स्वयं में अपूर्णता ही अपूर्णता पाता हूँ। पूर्णता सिर्फ परमात्मा में है। उस पूर्णता को पाने के लिए ही हमें परमात्मा की आवश्यकता है। अपूर्णता बड़ी दुःखदायी है। इसे दूर करने का जो उपाय भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के छठे अध्याय में बताया है वह देखने में तो बड़ा कठिन है, लेकिन उसका कोई विकल्प नहीं है। भगवान हमें सब कामनाओं से निःस्पृह होकर अपने ही स्वरूप में स्थित होने को कहते हैं --
"यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥६:१८॥"
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हमें बाह्य चिन्तन को छोड़कर केवल आत्मा में ही स्थित रहने का आदेश भगवान देते हैं। आत्मा में स्थित होने की पात्रता तभी आती है जब हम सब भोगों की लालसा से निःस्पृह यानि निष्काम हों। तृष्णाओं के नष्ट होने पर ही चित्त निष्काम होकर आत्मा में स्थिर होता है। फिर कोई विक्षेप नहीं आता। भगवान "सर्वकामेभ्यो निःस्पृहः" होने को कहते हैं, अर्थात् कोई भी कामना हमारी अभिलाषा का विषय न हो।
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भगवान आगे कहते हैं --
"यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥६:१९॥"
इसका भावार्थ होगा कि जैसे वायुरहित स्थान में रखे हुये दीपक की लौ विचलित नहीं होती, वैसी ही हमारे चित्त की गति हो।
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हे प्रभु, आपकी जय हो। मैं कभी तत्व से विचलित न होऊँ, सदा निरंतर आप में स्थित रहूँ, और विषय-वासनाओं का चिंतन भूल से भी न हो।
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"नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये,
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा |
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे,
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ||"
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
२८ जुलाई २०२३
Monday, 27 July 2026
स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ ---
स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ ---
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चारों ओर छाये हुए असत्य के अति घने भयावह अंधकार को दूर करने का एक ही उपाय है -- "स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ।" किसी अन्य से कोई अपेक्षा मत करो, कोई दूसरा नहीं आयेगा। जिन सत्यनिष्ठ व्यक्तियों के हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम, श्रद्धा, और विश्वास है, उनका मार्ग-दर्शन, और उनकी रक्षा - किसी न किसी माध्यम से भगवान स्वयं करते हैं। भगवान ने वचन दिया है --
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥"
(वाल्मीकि रामायण ६/१८/३३).
अर्थात जो एक बार भी शरणमें आकर 'मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कहकर मेरे से रक्षा की याचना करता है, उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ -- यह मेरा व्रत है। जब भगवान ने स्वयं इतना बड़ा आश्वासन दिया है, तब भय किस बात का? हम स्वयं राममय बनें।
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भगवान तो स्वयं ही हमारे हृदय में बिराजना चाहते हैं, अतः उनसे कुछ मांगना क्या उनका अपमान नहीं है? उनसे दूरी तो हमने ही बना रखी है। क्यों न हम उन्हें स्वयं में प्रवाहित होने दें? रात्री को सोने से पूर्व भगवान का गहनतम ध्यान कर के ही सोयें, वह भी इस तरह सोयें जैसे माता की गोद में निश्चिन्त होकर एक शिशु सो रहा है। प्रातः वैसे ही उठें जैसे एक शिशु अपनी माँ की गोद से उठ रहा है। उठते ही एक गहरा प्राणायाम कर के कुछ समय के लिए फिर से भगवान का ध्यान करें। दिवस का प्रारम्भ सदा भगवान के ध्यान से होना चाहिए। दिन में जब भी समय मिले, भगवान का फिर ध्यान करें। उनकी स्मृति निरंतर बनी रहे। यह शरीर चाहे नष्ट होकर छूट जाए, पर परमात्मा की स्मृति कभी न छूटे। भगवान सदा हमारे साथ हैं, और हर समय हमारी रक्षा कर रहे हैं।
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जीवन और मृत्यु से परे हम सदा भगवान के साथ एक हैं, और एक ही रहेंगे। हम यह भौतिक देह नहीं, उन की अनंतता और परम प्रेम हैं। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२१
श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश सामने वाले की पात्रता देखकर ही देने चाहियें, हर किसी को नहीं ---
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श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश सामने वाले की पात्रता देखकर ही देने चाहियें, हर किसी को नहीं। जिनमें सतोगुण प्रधान है, उन्हें ही भक्तियोग और ज्ञानयोग की बातें समझ में आयेंगी। जिन में रजोगुण प्रधान है, वे सिर्फ कर्मयोग को ही समझ पायेंगे। जिन में तमोगुण प्रधान है, वे कभी भी किसी भी परिस्थिति में गीता को नहीं समझ पायेंगे। उनके लिए यह "जैसे को तैसा" करने से अधिक कुछ भी नहीं है।
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ऐसे ही आध्यात्म में प्रवेश सिर्फ उन्हीं का हो सकता है जिनमें सतोगुण प्रधान है। जिनमें रजोगुण प्रधान है वे जप-तप तो कर सकते हैं, लेकिन ध्यान-साधना उन्हें सिद्ध नहीं होगी। जिनमें तमोगुण प्रधान है वे बाहरी पूजा-पाठ ही कर सकते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं।
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ब्रह्मज्ञान/ वेदान्त का विषय तो सिर्फ अति उच्च स्तर के विरक्त संत-महात्माओं और साधकों के लिए ही है, सामान्य व्यक्ति के लिए नहीं। कुछ लोग अपवाद हो सकते हैं।
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ऐसे ही भक्ति (भगवान से परमप्रेम) की बातें तो सभी करते हैं, लेकिन दो लाख में से कोई एक व्यक्ति ही भक्त होता है। भक्ति के नाम पर जो कुछ भी होता है, वह भगवान की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि उनके माध्यम से उनके ऐश्वर्य (सामान) की प्राप्ति के लिए होता है। भगवान तो एक साधन हैं जिनके माध्यम से सांसारिक उपलब्धियाँ/वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं। उसी को लोग भक्ति बोलते हैं। भक्त की पात्रता क्या होती हैं, इसे हमारे धर्मग्रन्थों में बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है, लेकिन कोई समझना नहीं चाहता। याचक (भिखारी) बनना कोई भक्ति नहीं है। गीता में इसे व्यभिचार बताकर, अव्यभिचारिणी अनन्य भक्ति की बात कही गई है।
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सभी भगवान के भक्त बनें, सभी में उसकी पात्रता हो, इसी मंगल कामना के साथ भगवान श्रीहरिः को नमन॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२२
इंग्लैंड के बारे में मेरी एक भविष्यवाणी
२७ जुलाई २०२२
कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है ---
कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है ---
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सभी पर परमात्मा की यह परम कृपा और आशीर्वाद हो। प्रातःकाल उठते ही सभी प्राणी निज चेतना को परमात्मा में स्वतः ही लीन पायें। परमात्मा ही हमारा स्वभाव बन जाये। लघुशंकादि से निवृत्त होकर तुरंत परमात्मा के ध्यान में बैठ जायें --- कमर सीधी, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, दृष्टिपथ भ्रूमध्य में, और चेतना कूटस्थ में। जीवन में हर चीज प्रतीक्षा कर सकती है, लेकिन परमात्मा की खोज अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती।
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हमारे नेत्र शिवनेत्र हों, हमारी देह शिवदेह हो, हमारे भाव शिवभाव हों, हमारी चेतना शिवचेतना हो। हम स्वयं परमशिव हो जायें। मेरी कूटस्थ चेतना अब इस शरीर में न होकर सर्वव्यापी है। सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि, सारा विश्व ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप में मेरा शरीर है। मैं यह नश्वर देह नहीं, परमशिव हूँ। मैं साँस ले रहा हूँ तो सारी सृष्टि साँस ले रही है; मैं साँस छोड़ रहा हूँ तो सारी सृष्टि साँस छोड़ रही है। सृष्टि का हर प्राणी मेरे इस विराट स्वरूप का भाग है। सारी सृष्टि मेरे माध्यम से परमात्मा की उपासना कर रही है।
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कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर सभी चक्रों को भेदती हुई परमशिव में विलीन हो गई है। परमात्मा स्वयं अपने नाद का श्रवण कर रहे हैं। सारा अस्तित्व परमशिव है। परमशिव से अतिरिक्त कुछ भी अन्य नहीं है। सभी जीवों का कल्याण हो रहा है, सभी को आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। इस परमशिवभाव में मैं निरंतर हर समय स्थित रहूँ। परमात्मा से पृथक मेरा कोई अस्तित्व न हो।
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२३
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