Monday, 27 July 2026

स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ ---

 स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ ---

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चारों ओर छाये हुए असत्य के अति घने भयावह अंधकार को दूर करने का एक ही उपाय है -- "स्वयं ही अग्नि बनकर प्रज्ज्वलित हो जाओ।" किसी अन्य से कोई अपेक्षा मत करो, कोई दूसरा नहीं आयेगा। जिन सत्यनिष्ठ व्यक्तियों के हृदय में परमात्मा के प्रति प्रेम, श्रद्धा, और विश्वास है, उनका मार्ग-दर्शन, और उनकी रक्षा - किसी न किसी माध्यम से भगवान स्वयं करते हैं। भगवान ने वचन दिया है --
"सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥"
(वाल्मीकि रामायण ६/१८/३३).
अर्थात जो एक बार भी शरणमें आकर 'मैं तुम्हारा हूँ' ऐसा कहकर मेरे से रक्षा की याचना करता है, उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय कर देता हूँ -- यह मेरा व्रत है। जब भगवान ने स्वयं इतना बड़ा आश्वासन दिया है, तब भय किस बात का? हम स्वयं राममय बनें।
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भगवान तो स्वयं ही हमारे हृदय में बिराजना चाहते हैं, अतः उनसे कुछ मांगना क्या उनका अपमान नहीं है? उनसे दूरी तो हमने ही बना रखी है। क्यों न हम उन्हें स्वयं में प्रवाहित होने दें? रात्री को सोने से पूर्व भगवान का गहनतम ध्यान कर के ही सोयें, वह भी इस तरह सोयें जैसे माता की गोद में निश्चिन्त होकर एक शिशु सो रहा है। प्रातः वैसे ही उठें जैसे एक शिशु अपनी माँ की गोद से उठ रहा है। उठते ही एक गहरा प्राणायाम कर के कुछ समय के लिए फिर से भगवान का ध्यान करें। दिवस का प्रारम्भ सदा भगवान के ध्यान से होना चाहिए। दिन में जब भी समय मिले, भगवान का फिर ध्यान करें। उनकी स्मृति निरंतर बनी रहे। यह शरीर चाहे नष्ट होकर छूट जाए, पर परमात्मा की स्मृति कभी न छूटे। भगवान सदा हमारे साथ हैं, और हर समय हमारी रक्षा कर रहे हैं।
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जीवन और मृत्यु से परे हम सदा भगवान के साथ एक हैं, और एक ही रहेंगे। हम यह भौतिक देह नहीं, उन की अनंतता और परम प्रेम हैं। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२१

श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश सामने वाले की पात्रता देखकर ही देने चाहियें, हर किसी को नहीं ---

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श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश सामने वाले की पात्रता देखकर ही देने चाहियें, हर किसी को नहीं। जिनमें सतोगुण प्रधान है, उन्हें ही भक्तियोग और ज्ञानयोग की बातें समझ में आयेंगी। जिन में रजोगुण प्रधान है, वे सिर्फ कर्मयोग को ही समझ पायेंगे। जिन में तमोगुण प्रधान है, वे कभी भी किसी भी परिस्थिति में गीता को नहीं समझ पायेंगे। उनके लिए यह "जैसे को तैसा" करने से अधिक कुछ भी नहीं है।
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ऐसे ही आध्यात्म में प्रवेश सिर्फ उन्हीं का हो सकता है जिनमें सतोगुण प्रधान है। जिनमें रजोगुण प्रधान है वे जप-तप तो कर सकते हैं, लेकिन ध्यान-साधना उन्हें सिद्ध नहीं होगी। जिनमें तमोगुण प्रधान है वे बाहरी पूजा-पाठ ही कर सकते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं।
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ब्रह्मज्ञान/ वेदान्त का विषय तो सिर्फ अति उच्च स्तर के विरक्त संत-महात्माओं और साधकों के लिए ही है, सामान्य व्यक्ति के लिए नहीं। कुछ लोग अपवाद हो सकते हैं।
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ऐसे ही भक्ति (भगवान से परमप्रेम) की बातें तो सभी करते हैं, लेकिन दो लाख में से कोई एक व्यक्ति ही भक्त होता है। भक्ति के नाम पर जो कुछ भी होता है, वह भगवान की प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि उनके माध्यम से उनके ऐश्वर्य (सामान) की प्राप्ति के लिए होता है। भगवान तो एक साधन हैं जिनके माध्यम से सांसारिक उपलब्धियाँ/वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं। उसी को लोग भक्ति बोलते हैं। भक्त की पात्रता क्या होती हैं, इसे हमारे धर्मग्रन्थों में बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है, लेकिन कोई समझना नहीं चाहता। याचक (भिखारी) बनना कोई भक्ति नहीं है। गीता में इसे व्यभिचार बताकर, अव्यभिचारिणी अनन्य भक्ति की बात कही गई है।
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सभी भगवान के भक्त बनें, सभी में उसकी पात्रता हो, इसी मंगल कामना के साथ भगवान श्रीहरिः को नमन॥ ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२२

इंग्लैंड के बारे में मेरी एक भविष्यवाणी

 

✔️ इंग्लैंड के बारे में मेरा यह मानना है कि एक दिन ऐसा भी आयेगा जिस दिन पश्चिमी एशिया और उत्तरी-पश्चिमी अफ्रीका से आये जन-समूहों द्वारा प्रायः अधिकांश अंग्रेज पुरुषों को मार दिया जाएगा, उनकी मेम साहबों का अपहरण कर लिया जाएगा, और पूरे ब्रिटेन पर काले लोग ही राज करेंगे। बची-खुची अंग्रेज़ जाति काले लोगों की गुलाम होगी।
✔️ यह कोई ज्योतिषीय भविष्यवाणी नहीं है। यह दृश्य मुझे कई बार आंतरिक रूप से दिखाई दिया है। यूरोप ने, विशेषकर ब्रिटेन ने दुनियाँ में जो अत्याचार किए हैं, उसका फल तो उन्हें मिलेगा ही।
२७ जुलाई २०२२

कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है ---

 कुछ भी मुझ से पृथक नहीं है ---

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सभी पर परमात्मा की यह परम कृपा और आशीर्वाद हो। प्रातःकाल उठते ही सभी प्राणी निज चेतना को परमात्मा में स्वतः ही लीन पायें। परमात्मा ही हमारा स्वभाव बन जाये। लघुशंकादि से निवृत्त होकर तुरंत परमात्मा के ध्यान में बैठ जायें --- कमर सीधी, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, दृष्टिपथ भ्रूमध्य में, और चेतना कूटस्थ में। जीवन में हर चीज प्रतीक्षा कर सकती है, लेकिन परमात्मा की खोज अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती।
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हमारे नेत्र शिवनेत्र हों, हमारी देह शिवदेह हो, हमारे भाव शिवभाव हों, हमारी चेतना शिवचेतना हो। हम स्वयं परमशिव हो जायें। मेरी कूटस्थ चेतना अब इस शरीर में न होकर सर्वव्यापी है। सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि, सारा विश्व ज्योतिर्मय ब्रह्मरूप में मेरा शरीर है। मैं यह नश्वर देह नहीं, परमशिव हूँ। मैं साँस ले रहा हूँ तो सारी सृष्टि साँस ले रही है; मैं साँस छोड़ रहा हूँ तो सारी सृष्टि साँस छोड़ रही है। सृष्टि का हर प्राणी मेरे इस विराट स्वरूप का भाग है। सारी सृष्टि मेरे माध्यम से परमात्मा की उपासना कर रही है।
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कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होकर सभी चक्रों को भेदती हुई परमशिव में विलीन हो गई है। परमात्मा स्वयं अपने नाद का श्रवण कर रहे हैं। सारा अस्तित्व परमशिव है। परमशिव से अतिरिक्त कुछ भी अन्य नहीं है। सभी जीवों का कल्याण हो रहा है, सभी को आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। इस परमशिवभाव में मैं निरंतर हर समय स्थित रहूँ। परमात्मा से पृथक मेरा कोई अस्तित्व न हो।
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२३

स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त करें ---

 स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त करें ---

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यह बात मैं अपने प्रत्यक्ष अनुभव से लिख रहा हूँ कि इस समय परमात्मा की एक विशेष कृपा हम सभी मनुष्यों पर है। हमारा लोभ और अहंकार हमें इसकी अनुभूति नहीं होने देता। जब तक हम स्वयं को अपने लोभ और अहंकार से मुक्त नहीं करते, तब तक उनकी कृपा की अनुभूति हमें नहीं हो सकती।
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हम भगवान से अपने लोभ और अहंकार की पूर्ति के लिए ही ही प्रार्थना करते हैं। ऐसी प्रार्थना हमें और भी अधिक बंधनों में बांधती है। भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिए हमें अपनी चेतना में वीतराग होना पड़ेगा। राग-द्वेष और अहंकार से मुक्ति को वीतरागता कहते हैं। परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति के लिए हमें स्थितप्रज्ञ होना होगा। हमारी प्रज्ञा परमात्मा में निरंतर स्थित हो, इसे स्थितप्रज्ञता कहते हैं।
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परमात्मा की गहन और दीर्घ ध्यान-साधना --- सूक्ष्म जगत में प्रवेश का पासपोर्ट है। यह भौतिक जगत तो बहुत छोटा है। सूक्ष्म जगत बहुत अधिक विराट है। हमारी सर्वप्रथम आवश्यकता परमात्मा के प्रति एक अहैतुकी परमप्रेम (भक्ति) की जागृति है, फिर आगे के द्वार खुलते हैं। हम रुपया-पैसा और भोग-विलास की सामग्री प्राप्त करने की ही प्रार्थना भगवान से करते हैं, और दूसरों को ठगते हैं, --- यह हमारा लोभ है जो नर्क का मुख्य द्वार है। दूसरों को ठगने के लिए हम भगवान को अपना सहभागी (Partner) बनाने के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं, लेकिन हमें यह पता नहीं होता कि हम उनसे स्वयं को नर्क में डालने की ही प्रार्थना कर रहे हैं।
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नित्य सायं और प्रातः, यदि हो सके तो हर समय प्रेमपूर्वक भगवान का स्मरण करें, उन्हें अपनी चेतना में निरंतर रखें, और उन्हें अपने जीवन की हरेक क्रिया का कर्ता बनायें। उनकी कृपा निश्चित रूप से होगी। आप सब जन्मजात महान आत्माओं को नमन !!
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२४

Sunday, 26 July 2026

स्वयं भगवान का आदेश है, जिसे हम कभी भी नहीं भूलें ---

 स्वयं भगवान का आदेश है, जिसे हम कभी भी नहीं भूलें ---

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"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥९:२७॥"
यानि -- हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो॥
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हमारे जीवन की सारी विषमताओं का कारण हमारा लोभ और अहंकार हैं। हम चाहे कितना भी जप-तप व पूजा-पाठ कर लें, लेकिन बिना वीतराग और स्थितप्रज्ञ हुए, कोई भी परमात्मा को उपलब्ध नहीं हो सकता। आध्यात्मिक मार्ग पर वीतरागता हमारी पहली उपलब्धि है, तत्पश्चात स्थितप्रज्ञता। यह कोई मनोरंजन का विषय नहीं है। हम यहाँ परमात्मा का चिंतन कर रहे हैं।
ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ।।
कृपा शंकर
27 जुलाई 2025

Saturday, 25 July 2026

मुक्त-चयन (Free Choice) और नियति (Destiny) ...

 मुक्त-चयन (Free Choice) और नियति (Destiny) ...

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निम्न पंक्तियाँ मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूँ| यह आवश्यक नहीं है कि ये सत्य ही हों| मेरा आंकलन भी गलत हो सकता है|
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सनातन हिन्दू धर्म में पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष) को मानव जीवन का उद्देश्य या लक्ष्य बताया गया है| माता-पिता, आचार्यों और शास्त्रों के उपदेशानुसार आचरण भी पुरुषार्थ है|
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लेकिन इस जीवन का मेरा अनुभव यह कहता है कि जीवन में हमारे साथ वही होता है जो हमारी नियति में है| हमारे पास कोई विकल्प नहीं होता| हमारी महत्वाकांक्षायें कभी पूरी नहीं होतीं| होता वही है जैसी परिस्थितियाँ हमारे चारों ओर होती हैं, और जैसी हमारी समझ और मस्तिष्क यानि दिमाग की क्षमता होती है| जितनी अधिक आकांक्षाएँ हमारे में होती हैं, उतनी ही अधिक हमारे जीवन में कुंठायें होती हैं| पुरुषार्थ भी तभी होता है जब वह हमारे भाग्य यानि नियति में लिखा हो, अन्यथा नहीं|
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हमारे पास एक ही स्वतंत्र चयन (free choice) है कि हम परमात्मा को प्रेम करें या नहीं| अन्य सब तरह के पुरुषार्थ की बात एक आदर्श लुभावनी मीठी-मीठी अव्यवहारिक कल्पना मात्र ही है| हम अपने कर्मफलों को भोगने के लिए ही आते हैं| बहुत ही कम विकल्प/अवसर, और उनका उपयोग करने की क्षमता हमें जीवन में मिलती हैं| होता वही है जैसी सृष्टिकर्ता की इच्छा होती है|
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आप सब महान आत्माओं को नमन !! आप के विचार आमंत्रित हैं|
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०२०