Tuesday, 9 June 2026

ब्राह्मण समाज में जागृति और एकता कैसे हो? ---

ब्राह्मण समाज में जागृति और एकता कैसे हो?

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किसी भी पौधे की जड़ों में जल न देकर उसकी पत्तियों में ही जल दिया जाये तो वह पौधा कभी भी वृक्ष नहीं बनेगा। ब्राह्मण समाज की जड़ें धर्म में बहुत गहरी जमी हुई हैं, उन जड़ों की उपेक्षा कर के वर्तमान में ब्राह्मण समाज के लगभग सारे नेता पत्तियों में ही पानी दे रहे हैं।
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ब्राह्मण एकता के नाम पर आजकल -- ब्राह्मण अधिकारियों और राजनेताओं का सार्वजनिक सम्मान किया जाता है। इससे वे अधिकारी और नेता तो अपने अहंकार को तृप्त कर के चले जाते हैं, और समाज के नेताओं के अपने मतलब हेतु अधिकारियों व नेताओं से मधुर संबंध बन जाते हैं। लेकिन इस से समाज को कुछ नहीं मिलता है।
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कभी कभी अच्छे नंबर लाने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित कर दिया जाता है। ठीक है प्रोत्साहन देना चाहिए, लेकिन उन विद्यार्थियों को भी समाज के प्रति कुछ कर्तव्य बोध होना चाहिए, अन्यथा समाज को कोई लाभ नहीं है।
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ब्राह्मण समाज की सबसे बड़ी समस्या है -- नवयुवक/नवयुवतियों में धर्मशिक्षा का अभाव। आज की पीढ़ी को अपने धर्म की शिक्षाओं का ज्ञान नहीं है। इसके लिए छुट्टियों में प्रशिक्षण वर्ग चलाये जाने चाहियें।
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(१) संस्कृत भाषा की शिक्षा बच्चों को दी जाये। बच्चों को संस्कृत का इतना ज्ञान तो हो कि वे "श्री सूक्त" और "पुरुष सूक्त" का शुद्ध उच्चारण सहित पाठ कर सकें, और इसका अर्थ भी समझा सकें।
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(२) सभी युवा किशोरों का सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार करवा कर, उन्हें वैदिक प्राणायाम, और गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाये। गायत्री जप का महत्व भी बताया जाये और विधि-विधान से संध्या कर्म भी सिखाया जाये।
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(३) भगवान से परमप्रेम (भक्ति) प्रत्येक ब्राह्मण को होना चाहिए। भगवान की भक्ति ही ब्राह्मण का मुख्य गुण है। युवकों, युवतियों व सभी जिज्ञासुओं को कोई न कोई साधना/उपासना अवश्य करनी चाहिए।
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स्वनामधान्य भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) भगवती श्रीविद्या के उपासक थे। श्रीविद्या साधना पर ही उनका ग्रंथ "सौन्दर्य लहरी" बहुत प्रसिद्ध है। इस साधना का क्रम होता है। दस महाविद्याओं में से एक किसी की भी साधना से समाज की मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक, आध्यात्मिक -- सब तरह की दरिद्रता दूर होगी।
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जिनकी भगवान विष्णु के अवतारों में श्रद्धा है उन्हें, भगवान श्रीराम या श्रीकृष्ण की उपासना करनी चाहिए।
जिनकी श्रद्धा शिव में है उन्हें परमशिव का ध्यान करना चाहिए।
जिनकी श्रद्धा हनुमान जी में है, उन्हें हनुमान जी की उपासना करनी चाहिए।
गीता का नित्य नियमित पाठ अर्थ समझते हुए करना चाहिए।
कुल मिलाकर बात यह है कि भगवान से परमप्रेम प्रत्येक ब्राह्मण को होना चाहिए। यही एक ब्राह्मण का सबसे बड़ा गुण है। ब्राह्मण समाज समय समय पर आपस में मिलता जुलता रहेगा तो प्रेम भी बना रहेगा।
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ब्राह्मणों ने अपना धर्म छोड़ दिया इसीलिए पूरे हिन्दू जाति की दुर्दशा हो रही है। ब्राह्मण अपने धर्म पर दृढ़ रहेंगे तो पूरे हिन्दू समाज का उत्थान होगा।
सभी को सप्रेम सादर नमन!!
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
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कृपा शंकर
८ जून २०२२

भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं ---

 भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं। धर्म-निरपेक्षता का अर्थ है -- अधर्म-सापेक्षता। भारत की अस्मिता "सनातन-धर्म" है। भारत कोई भूमि का टुकड़ा मात्र नहीं, एक जीवंत सूक्ष्म सत्ता है। वास्तव में सनातन धर्म ही भारत है, और भारत ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म का उत्थान ही भारत का उत्थान है, और सनातन धर्म का पतन ही भारत का पतन है। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है।

रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ ही भारत के प्राण हैं। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में जो आश्वासन दिया है, उसी पर आस्था और श्रद्धा-विश्वास के कारण हम जीवित हैं। अन्यथा अब तक जीवित रहने का अन्य कोई कारण नहीं है।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४:७॥"
"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥४:८॥"
"जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥४:९॥"
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४:११॥"
९ जून २०२५

Saturday, 6 June 2026

शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक

आज ही के दिन ६ जून १६७४ को रायगढ़ में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था जो भारतीय इतिहास की एक गौरवशाली गाथा है| महान विजयनगर साम्राज्य के बाद पहली बार भारत में स्वराज्य की स्थापना हुई| शिवाजी का राज्याभिषेक काशी के वेद-पुराण-उपनिषदों के ज्ञाता पंडित गंगाधर भट्ट द्वारा किया गया| पंडित गंगाधर भट्ट ने शिवाजी की वंशावली के विस्तृत अध्ययन के बाद यह सिद्ध किया के उनका भोंसले वंश मूलतः मेवाड़ के वीरश्रेष्ठ सिसोदिया राजवंश की ही एक शाखा है| शिवाजी मूल रूप से सिसोदिया राजपूत थे| उन के पूर्वज मेवाड़ से महाराष्ट्र जाकर बस गए थे| (नेपाल का राजवंश भी सिसोदिया राजपूत ही है). गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक, क्षत्रिय कुलगौरव, राजाधिराज, योगीराज श्री श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की जय !

Thursday, 4 June 2026

"परम प्रेम" और "समर्पण" का स्वभाव हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है .....

"परम प्रेम" और "समर्पण" का स्वभाव हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है .....

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परमात्मा से पूर्ण प्रेम करो, "अनाहत नाद" या "ज्योति" के रूप में, या अपने अन्य किसी प्रियतम के रूप में साकार या निराकार, पर प्रेम करो| गीता में भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का सार ही भक्ति और समर्पण है ....
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः|९:३४||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||
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अपने भौतिक व्यक्तित्व का मोह हमें हिंसक बनाता है| भिन्नता से भेद की उत्पत्ति होती है, और भेद से भय और हिंसा उत्पन्न होती है| भयभीत प्राणी दूसरों को भी भयभीत करता है और हिंसक बन जाता है| व्यक्तित्व की दासता और मोह हमें हिंसक बना देता है| इस व्यक्तित्व की दासता से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है ..... "परमात्मा से परम-प्रेम और समर्पण"|
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परमात्मा से "पूर्ण प्रेम" और "समर्पण" हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है| जब हम परमात्मा को "प्रेम" और "समर्पण" करते हैं तब वही "प्रेम" और "समर्पण" अनंत गुणा होकर हमें ही बापस मिलता है| जब हम उन के "शिवत्व" में विलीन हो जाते हैं, वह "शिवत्व" भी हमारे में विलीन हो जाता है| तब हम "जीव" नहीं, स्वयं साक्षात शिव बन जाते हैं| जहाँ कोई क्रिया-प्रतिक्रिया, मिलना-बिछुड़ना, अपेक्षा व मांग नहीं, जो बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा से भी परे है, वह असीमता, अनंतता व सम्पूर्णता हम स्वयं हैं| हमारा पृथक अस्तित्व उस परम प्रेम और परम सत्य को व्यक्त करने के लिए है| भक्ति और समर्पण द्वारा हम जीव से शिव बनें|
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ॐ तत्सत् ! शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ अप्रेल २०१९

सेक्युलरिज्म (धर्म निरपेक्षता) का जन्म कैसे हुआ ? .....

 सन १८५१ ई.में इंग्लैंड के राजा हेनरी आठवें को अपनी पत्नी को तलाक देना था जिसके लिए पॉप की अनुमति आवश्यक थी| पॉप ने वह अनुमति नहीं दी| इसलिए पॉप के आदेश को ठुकराने के लिए इंग्लेंड में धर्मनिरपेक्षता यानि सेकुलरिज्म का सिद्धांत बनाया गया जिसके अंतर्गत इंग्लैंड का राजा पॉप के आदेश को मानने केलिए बाध्य नहीं था| सेकुलर का मतलब है चर्च के आदेश को नहीं मानने वाला| हम आज उन्हीं अंग्रेजों की नक़ल कर के सेकुलर बन रहे हैं|

"यथा ब्रज गोपिकानाम्" ----

 "यथा ब्रज गोपिकानाम्" ----

कभी कभी ईश्वर से विछोह भी अच्छा है क्योंकि उसमें मिलने का आनंद समाया होता है| मिलने में वियोग की पीड़ा भी होती है|
वह स्थिति सब से अच्छी है जहाँ ना कोई मिलना है और ना कोई विछुड़ना| क्योंकि की जो मिलता और विछुड़ता है वह तो आप स्वयं ही हो| आपसे पृथक कुछ है ही नहीं|
कभी जब आप एक अति उत्तुंग पर्वत के शिखर से नीचे की गहराई में झांकते हो तो वह डरावनी गहराई भी आपमें झाँकती है| ऐसे ही जब आप नीचे से अति उच्च पर्वत को घूरते हो तो वह पर्वत भी आपको घूरता है| जिसकी आँखों में आप देखते हो वे आँखें भी आपको देखती हैं| जिससे भी आप प्रेम या घृणा करते हो उससे वैसी ही प्रतिक्रिया कई गुणा होकर आपको ही प्राप्त होती है|
वैसे ही जब आप प्रभु को प्रेम करते हो तो वह प्रेम अनंत गुणा होकर आपको ही प्राप्त होता है| वह प्रेम आप स्वयं ही हो| प्रभु में आप समर्पण करते हो तो प्रभु भी आपमें समर्पण करते हैं| जब आप उनके शिवत्व में विलीन हो जाते हो तो आप में भी वह शिवत्व विलीन हो जाता है और आप स्वयं साक्षात् शिव बन जाते हो| जहाँ ना कोई क्रिया-प्रतिक्रिया है, ना कोई मिलना-बिछुड़ना, जहाँ कोई अपेक्षा या माँग नहीं है, जो बैखरी मध्यमा पश्यन्ति और परा से भी परे है, वह असीमता, अनंतता व सम्पूर्णता आप स्वयं ही हो|
आपका पृथक अस्तित्व उस परम प्रेम और परम सत्य को व्यक्त करने के लिए ही है|
ॐ शिव | शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
झुंझुनू(राजस्थान)
03 जून 2014

Wednesday, 3 June 2026

मैं जड़-चेतन और यह सारी सृष्टि हूँ। केवल मैं हूँ। ---

मैं जड़-चेतन और यह सारी सृष्टि हूँ। केवल मैं हूँ। मैं ही परमब्रह्म परमशिव और विष्णु हूँ। मुझसे अन्य कोई या कुछ भी नहीं है।

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सृष्टिकर्ता परमात्मा से जुड़ कर ही इस सृष्टि की सबसे बड़ी सेवा हम कर सकते हैं। स्वयं में उनको निरंतर व्यक्त करें। कमर को सदा सीधी रखते हुए खेचरी/अर्ध-खेचरी/शांभवी मुद्रा में बैठें, और भ्रूमध्य की ओर अपने नेत्रों के गोलकों को स्थिर कर कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें।
जब भी समय मिले तब गीता के १५वें अध्याय "पुरुषोत्तम योग" का स्वाध्याय करें और उसके आरंभ के ऊर्ध्वमूल वाले श्लोकों को समझते हुए तदानुसार ऊर्ध्वमूल में ही ध्यान करते हुए अपनी चेतना का अनंत में विस्तार करें।
मैं पूर्ण सत्यनिष्ठा से यह कह रहा हूँ कि गीता के स्वाध्याय से मेरे सारे संशय दूर हुए हैं, और अनेक रहस्य अनावृत हुए हैं। ज्ञान, भक्ति और कर्म -- इन तीनों विषयों को भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत अच्छी तरह समझाया है।
हमारा निवास आनंद-सिंधु के मध्य हैं, अब कभी प्यासे नहीं रहेंगे।
हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जून २०२२