Wednesday, 1 April 2026

भगवान ने ही मुझे पकड़ रखा है ---

लोग मुझसे पूछते हैं कि आपने भगवान को क्यों पकड़ रखा है? वास्तविकता यह है कि मैंने भगवान को नहीं पकड़ा, भगवान ने ही मुझे पकड़ रखा है। अब मैं असहाय हूँ। किसी को घने वन में कोई सिंह या व्याघ्र पकड़ ले तो वह मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता। जो करना है वह तो सिंह या व्याघ्र ही करेगा। भगवान की पकड़ से मैं बहुत अधिक आनंदित हूँ। उनकी पकड़ बनी रहे, और उसमें निरंतर वृद्धि हो। ॐ तत् सत् !!

कृपा शंकर
२८ मार्च २०२६

उन अनंतातीत पुराण-पुरुष परमात्मा को नमन ---

 उन अनंतातीत पुराण-पुरुष परमात्मा को नमन ---

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लगता है कि मैंने कभी किसी पूर्वजन्म में कोई पुण्यकार्य किया होगा, जिसका फल अब मिल रहा है। इस जन्म में यदि भूल से भी कुछ अच्छा काम किया है तो वह मुझे याद नहीं है। इस संसार के लिए एक अनुपयुक्त व्यक्ति (Misfit person) मात्र बन कर रह गया हूँ। कहीं भी जाऊँ, कुछ भी करूँ, मन अनायास ही पुराण-पुरुष परमात्मा के चरण-कमलों में स्वतः ही लिप्त हो जाता है। कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ता।
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अब जैसी उन पुराण-पुरुष परमात्मा की इच्छा, जो अनायास ही मुझे प्राप्त हो रहे हैं। अब इसमें आनंद भी आने लगा है। आध्यात्म का कोई भी रहस्य अपने आप में अब रहस्य नहीं रहा है। भगवान सहज रूप से स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं
(यहाँ सहज का अर्थ है— जिसने साथ-साथ जन्म लिया है)।
मैं उन पुराण-पुरुष की शरण में हूँ, जिनकी शरणागति से सभी श्रद्धालुओं ने कृतकृत्य होकर निज जीवन को कृतार्थ किया है। वे पुराण-पुरुष ही पुरुषोत्तम हैं, और वे ही परमशिव हैं। मैं एक अकिंचन निमित्त साक्षी-मात्र, उन्हें नमन करता हूँ। आचार्य शंकर ने अपने ग्रंथ "विवेक चूड़ामणि" के १३१ वें मंत्र में पुराण-पुरुष की वंदना की है --
"एषोऽन्तरात्मा पुरुषः पुराणो निरन्तराखण्ड-सुखानुभूति |
सदा एकरूपः प्रतिबोधमात्र येनइषिताः वाक्असवः चरन्ति ||" ॐ ॐ ॐ !!
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श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन ने पुराण-पुरुष की स्तुति इस प्रकार की है --
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥"
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मैं पुराण-पुरुष भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व अर्पित करता हूँ। ये मन बुद्धि चित्त अहंकार, कारण सूक्ष्म व भौतिक देह, अपनी तन्मात्राओं सहित सारी इंद्रियाँ, सारा धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, अच्छे-बुरे सारे कर्म और उनके फल, सब कुछ उन्हें अर्पित है। स्वयं को भी शरणागति द्वारा उन्हें समर्पित करता हूँ। वे मेरा समर्पण स्वीकार करे।
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"कस्तूरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु: करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावली,
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूड़ामणि:॥"
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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने,
प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥"
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च,
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
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"वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम्।
दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम्॥"
"वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात् ,
पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्।
पूर्णेंदु सुन्दर मुखादरविंदनेत्रात् ,
कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने॥"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
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कृपा शंकर
२९ मार्च २०२६

नास्तिक व आस्तिक कौन हैं? .

 (प्रश्न) : नास्तिक व आस्तिक कौन हैं?

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(उत्तर) : जो वेदों को अपौरुषेय नहीं मानते, वे नास्तिक हैं। जो वेदों को अपौरुषेय मानते हैं, वे आस्तिक हैं।
भारत के नास्तिक मतों में प्रमुख हैं -- जैन , बौद्ध, व चार्वाक मत।
आज यहाँ चार्वाक मत की ही चर्चा कर रहा हूँ, अन्य नास्तिक मतों की बाद में किसी दिन करूँगा। वर्तमान में चार्वाक मत संगठित मत नहीं है, लेकिन चार्वाक मतानुयायी छद्म रूप से भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में भरे पड़े हैं। भारत में तो उनकी संख्या बहुत अधिक है।
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जीवन में दुख से बचकर अधिकतम इंद्रिय सुख पाने को ही बुद्धिमानी मानना— चार्वाक मत है। यह दर्शन 'भोगवाद' और 'सुखवाद' पर जोर देता है और मृत्यु के बाद जीवन को नहीं मानता। चार्वाक मत केवल प्रत्यक्ष प्रमाण (जो आँखों से दिखे) को स्वीकार करता है। यह आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग-नर्क और वेदों को पूरी तरह नकारता है। इसका मुख्य सिद्धांत "यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्" (जब तक जीओ तब तक सुख से जीओ, उधार लेकर भी घी पीओ) है। किसी भी युक्ति से दूसरों का पैसा हड़पो और खूब मौज-मस्ती करो। दूसरों का पैसा कभी वापस मत करो। ये लोग यदि किसी भगवान को मानते भी हैं तो उसी को मानते हैं, जो उनकी चोरी में सहायक हो। ऐसे लोग भारत में कदम-कदम पर हैं, जो दूसरों को ठगने का अवसर ढूंढते रहते हैं। चार्वाक का नाम उन्होंने कभी सुना नहीं होगा, लेकिन वे कार्य सारा उसी के मतानुसार करते हैं। ये वामपंथी भी चार्वाक से कम नहीं हैं।
कृपा शंकर
३० मार्च २०२६

ईश्वर के मार्ग पर हम भटकते क्यों हैं ?

 ईश्वर के मार्ग पर हम भटकते क्यों हैं ?

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कुछ देर पूर्व ही मन में एक प्रश्न उठा कि हम भटकते क्यों हैं? तभी निम्न पंक्तियाँ लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई, जिन्हें लिख रहा हूँ। आध्यात्मिक साधना में भटकाव का एकमात्र कारण -- हमारा राग-द्वेष और अहंकार है। अन्य कोई कारण नहीं है। भगवान ने इसका निदान "वीतरागता" बतलाया है। राग, द्वेष और अहंकार से मुक्ति ही वीतरागता है। हमारी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित रहे तो हम स्थितप्रज्ञ कहलाते हैं। वहाँ कोई भटकाव नहीं है। लेकिन एक वीतराग व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ हो सकता है। वीतराग व्यक्ति ही महत् तत्व से जुड़कर महात्मा कहलाता है। वीतरागता ही महात्मा होने का लक्षण है।
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गुरुकृपा से हम कूटस्थ में ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करते हुए अजपा-जप, और पूर्ण या अर्धखेचरी मुद्रा में ओंकार का श्रवण व जप करते है। यह साधना हमें वीतरागता की ओर अग्रसर करती है। अंततः भगवान की अनुकंपा ही हमें सिद्धि प्रदान करती है। मुख्य बात भगवान की कृपा है। हमें भगवान की परम कृपा कैसे प्राप्त हो? यही हमारे विचार का विषय हो।
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हमारे वश में एक ही बात है, और वह है— भगवान से परम प्रेम। भक्ति-सूत्रों का छठा सूत्र कहता है -- "यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति।" यहाँ आत्माराम का अर्थ है आत्मा में रमण। जो आत्माराम है वह बाहरी विषयों की खोज छोड़ देता है, व अपने भीतर ही आत्मा के परमानंद में निरंतर संतुष्ट और लीन रहता है। यह आत्मा में रमण यानि आत्माराम होना भी एक बहुत बड़ी साधना है जो हमें वीतराग बनाती है।
कठोपनिषद में भी इस विषय पर कुछ उपदेश हैं जो हमें -- ''ज्ञानवान, सचेतनमना तथा सदा शुचिमान् होकर परम पद को प्राप्त करने को कहते हैं।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
३० मार्च २०२६

आज श्रमण परंपरा (जैन मत) के २४ वें व अंतिम तीर्थंकर महावीर की जयंती है ---

आज श्रमण परंपरा (जैन मत) के २४ वें व अंतिम तीर्थंकर महावीर की जयंती है। तीर्थंकर का अर्थ है जो स्वयं तप के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त करते है और संसार-सागर से पार लगाने वाले तीर्थ की रचना करते हैं। तीर्थंकर वह व्यक्ति है जिसने पूरी तरह से क्रोध, अभिमान, छल, इच्छा, आदि पर विजय प्राप्त की है। इस अवसर पर सभी श्रद्धालुओं का अभिनंदन।

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जैन मत का लक्ष्य है— "वीतरागता"। स्यात् इसी कारण मेरा आकर्षण महावीर स्वामी की शिक्षाओं के प्रति है। यह लेख लंबा न हो इसलिए "स्यादवाद" जिसे अनेकांतवाद, सप्तभङ्गी का सिद्धान्त, और "सापेक्षतावाद" भी कहते हैं की चर्चा इस लेख में नहीं कर रहा। इसी तरह "कैवल्य" शब्द पर भी चर्चा नहीं करूंगा। इस लेख में मैं बिना किसी पूर्वाग्रह के कम से कम शब्दों में श्रमण-परंपरा और ब्राह्मण-परंपरा में भेद, आस्तिकता, व नास्तिकता पर अपने विचार लिखूंगा।
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सभी जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। सुख सबको प्रिय है, और दुःख अप्रिय। इसलिए हम जैसा व्यवहार दूसरों से स्वयं के प्रति चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार दूसरों के प्रति भी करें। किसी भी प्राणी को मारना, काटना या प्रताड़ित करना अमानवीय क्रूरता है। हम जीयें और दूसरों को भी जीने दें -- यह महावीर की शिक्षाओं का सार है।
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महावीर का जन्म वैशाली के क्षत्रिय गणतंत्र राज्य कुण्डलपुर में हुआ था। तीस वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज-वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये। १२ वर्षो की कठिन तपस्या के बाद उन्हें केवल्यज्ञान प्राप्त हुआ। यह श्रमण परम्परा ही कालान्तर में जैन धर्म कहलाई। जैन का अर्थ होता है जितेन्द्रिय, यानि जिस ने मन आदि इन्द्रियों को जीत लिया है।
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श्रमण परम्परा के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे जिनके पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष है। ऋषभदेव का उल्लेख वेदों में भी है और भागवत में भी। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को उच्चतम नैतिक गुण बताया। उनके पंचशील के सिद्धांत -- अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य हैं। योग-दर्शन में ये ही 'यम' कहलाते हैं। उन्होंने अनेकांतवाद व स्यादवाद जैसे अद्भुत सिद्धांत दिए। हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें स्वयं को पसंद है। यह महावीर का "जीओ और जीने दो" का सिद्धांत है।
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श्रमण परम्परा और ब्राह्मण परम्परा दोनों ही अति प्राचीन काल से चली आ रही हैं। इनमें अंतर यह है कि श्रमण परम्परा नास्तिक है जो वेदों को अपौरुषेय नहीं मानती। ब्राह्मण परम्परा आस्तिक है जो वेदों को अपौरुषेय मानती है। लेकिन इन दोनों में एक समानता भी है। ये दोनों परम्पराएँ आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म और कर्मफलों के सिद्धांत को मानती हैं।
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ब्राह्मण परम्परा में ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को ही मोक्ष का आधार मानता है और वेदवाक्य को ही ब्रह्म-वाक्य मानता है।
श्रमण परम्परा में श्रमण वह है जो निज श्रम द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को मानता है और जिसके लिए जीवन में ईश्वर की नहीं बल्कि श्रम की आवश्यकता है। श्रमण परम्परा ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानती।
श्रमण परम्परा का आधार -- श्रमण, समन, शमन -- इन तीन शब्दों पर है। 'श्रमण' शब्द 'श्रमः' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'परिश्रम करना'। श्रमण शब्द का उल्लेख वृहदारण्यक उपनिषद् में 'श्रमणोऽश्रमणस' के रूप में हुआ है। यह शब्द इस बात को प्रकट करता है कि व्यक्ति अपना विकास अपने ही परिश्रम द्वारा कर सकता है। सुख–दुःख, उत्थान-पतन सभी के लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। 'समन' का अर्थ है, समताभाव, अर्थात् सभी को आत्मवत् समझना, सभी के प्रति समभाव रखना। जो बात अपने को बुरी लगती है, वह दूसरे के लिए भी बुरी है। ‘शमन' का अर्थ है अपनी वृत्तियों को शान्त रखना, उनका निरोध करना। जो व्यक्ति अपनी वृत्तियों को संयमित रखता है वह महाश्रमण है। इस प्रकार श्रमण परम्परा का मूल आधार श्रम, सम, शम इन तीन तत्त्वों पर आश्रित है।
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अंग्रेज़ इतिहासकारों के अनुसार तीर्थंकर महावीर का जन्म ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व हुआ था, लेकिन आधुनिक भारतीय गणनाओं के अनुसार बुद्ध का जन्म ईसा से १८०० वर्ष पूर्व हुआ था, और तीर्थंकर महावीर उनसे आयु में ३० वर्ष बड़े थे। अंग्रेज़ इतिहासकारों ने भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए द्वेष व दुर्भावनावश भारत का गलत इतिहास लिखा है।
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कुछ अस्वस्थ होने के कारण यह लेख आज प्रातः पोस्ट नहीं कर पाया, इसलिए शाम को पोस्ट कर रहा हूँ। सभी को नमन !! ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३१ मार्च २०२६

भगवान की अनन्य पराभक्ति हमारा स्वभाव हो, और सभी के हृदयों में जागृत हो ---

भगवान के और हमारे मध्य एक परम प्रेममयी सत्ता अवश्य है, जिसे हम जगन्माता या भगवती कहते हैं। इस विषय पर मैंने अपनी अति सीमित व अति अल्प बौद्धिक क्षमतानुसार बहुत अधिक चिंतन-मनन किया है।
सिद्धान्त रूप से इस विषय पर मेरे कुछ संशय थे। मेरे एक परम विद्वान तपस्वी सन्यासी मित्र ने मुझे अपने सिद्ध गुरु महाराज से परिचय करवा कर उनसे अनेक सत्संग करवाये, और यह सुनिश्चित किया कि मेरे सारे संशय दूर हों।
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अब कोई संशय नहीं है, लेकिन अनेक जन्मों से जमा हुआ मैल, इतनी आसानी से नहीं छूटता। अपने पूर्व जन्मों के व इस जन्म में जमा हुए मैल से छुटकारा पाना इतना आसान नहीं है। फिर भी एक ईश्वरीय शक्ति सहायता कर रही है, जिन्हें हम जगन्माता कहते हैं। वे भगवती अपने किसी भी सौम्य या उग्र रूप में स्वयं को व्यक्त कर सकती हैं। मेरे लिए उनके सारे रूप सौम्य ही हैं, उनके किसी भी रूप में कोई उग्रता नहीं है।
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सिर्फ राजयोग ही पर्याप्त नहीं है, साधना में सफलता के लिए हठयोग और तंत्र का ज्ञान भी आवश्यक है। भूख और नींद पर विजय पाना भी एक चुनौती है। पर्याप्त शारीरिक व मानसिक क्षमता, संकल्प शक्ति, लगन, और पराभक्ति का होना भी आवश्यक है। बिना भक्ति के तो एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते।
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भगवान की अनन्य पराभक्ति हमारा स्वभाव हो, और सभी के हृदयों में जागृत हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
१ अप्रेल २०२४


भारत से नक्सलवाद का अंत ---

 भारत से नक्सलवाद का अंत ---

कल ३१ मार्च २०२६ को देश की संसद में माननीय गृहमंत्री श्री अमित शाह ने देश से नक्सलवाद समाप्त होने की घोषणा की थी। यह एक ऐतिहासिक घोषणा थी जो भारत के इतिहास में अमर रहेगी। नक्सलवादी आन्दोलन का विचार कानू सान्याल नाम के एक व्यक्ति के दिमाग की उपज था। उसको इस आंदोलन से इतनी ग्लानि हुई कि २३ मार्च २०१० को उसने आत्महत्या कर ली। इससे पूर्व उसका सहयोगी चारु मजूमदार सन १९७२ में हृदय रोग से मर गया था। यह एक रहस्य है कि कानू सान्याल इतना विद्रोही कैसे हो गया। निजी जीवन में वह एक गरीब ब्राह्मण और साधु व्यक्ति था जिसका जन्म एक सात्विक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उसका जीवन बड़ा सात्विक, और दिनचर्या बड़ी सुव्यवस्थित थी। भगवान ने उसे बहुत अच्छा स्वास्थ्य दिया था। सन १९६२ में वह बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री को काला झंडा दिखा रहा था कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जहाँ उसकी भेट चारु मजुमदार से हुई। चारु मजूमदार एक कायस्थ परिवार से था जो जो तेलंगाना के किसान आन्दोलन से जुड़ा हुआ था और जेल में बंदी था। जेल में ही दोनों मित्र बने, और जेल से छूटकर सन १९६७ में दोनों ने बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक गाँव से तत्कालीन व्यवस्था के विरुद्ध एक घोर मार्क्सवादी आन्दोलन आरम्भ किया जो नक्सलवाद कहलाया। इस आन्दोलन में छोटे-मोटे तो अनेक नेता थे पर इनको दो प्रभावशाली कर्मठ नेता मिल गये -- एक तो था नागभूषण पटनायक, और दूसरा था टी.रणदिवे। इन्होंने आंध्र प्रदेश में श्रीकाकुलम के जंगलों से इस आन्दोलन का विस्तार किया।
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यह आन्दोलन पथभ्रष्ट हो गया जिससे कानु सान्याल और चारु मजूमदार में मतभेद हो गए और दोनों अलग अलग हो गए। चारु मजुमदार की मृत्यु सन १९७२ में हृदय रोग से हो गयी, और कानु सान्याल को इस आन्दोलन का सूत्रपात करने से इतनी अधिक मानसिक ग्लानि और पश्चाताप हुआ कि २३ मार्च २०१० को उसने आत्महत्या कर ली। उस समय के जितने भी नक्सलवादी थे, उनमें से लगभग आधे तो पुलिस की गोली से मारे गये थे, और बचे हुए आधों ने सरकार से माफी मांग ली और देश की मुख्यधारा में लौट आये।
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वर्तमान नक्सलवादियों का मूल नक्सलवाद से कोई संबंध नहीं है। मूल नक्सलवाद और नक्सलवादियों का अब कोई अस्तित्व नहीं है। वर्तमान नक्सलवादी और उनके समर्थक "ठग", "डाकू" और "तस्कर" के अलावा कुछ भी नहीं हैं, जिन्हें सिर्फ बंदूक की भाषा ही समझ में आती है। भारत सरकार ने उनका सही इलाज कर दिया। वे कोई भटके हुए नौजवान नहीं, अपितु कुटिल राष्ट्रद्रोही तस्कर हैं, जिनको बिकी हुई प्रेस, वामपंथियों और राष्ट्र्विरोधियों का समर्थन प्राप्त है।
वन्दे मातरं। भारत माता की जय।
कृपा शंकर
१ अप्रेल २०२६