Sunday, 2 August 2026

सुख, शांति और सुरक्षा किसी राजनीतिक या मज़हबी विचारधारा में नहीं, सिर्फ अपने निजी जीवन में ईश्वर की उपासना में है --

 सुख, शांति और सुरक्षा किसी राजनीतिक या मज़हबी विचारधारा में नहीं, सिर्फ अपने निजी जीवन में ईश्वर की उपासना में है ---

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हमारे इस पृथ्वी ग्रह पर सत्-तत्व का अभाव है, इसलिए इस पृथ्वी पर पूरे विश्व में कहीं भी सुख-शांति और सुरक्षा नहीं है। सुख-शांति और सुरक्षा यदि कहीं है तो वह कुछ लोगों या समूहों के मन और चेतना में ही है। पृथ्वी के दोनों गोलार्धों के प्रायः सभी देश मेरे दिमाग में है लेकिन सभी अशांत हैं। दूर के ढ़ोल सुहावने लगते हैं, लेकिन पास जाने पर वे कर्ण-कटु हो जाते हैं।
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ईसाईयत, इस्लाम और मार्क्सवाद -- इन तीन विचारों ने इस युग में विश्व को सबसे अधिक प्रभावित किया है। इन तीनों का यही कहना है कि यदि पूरा विश्व हमारे खेमे में आ जाये तो सुख-शांति स्थापित हो जाएगी। लेकिन शांति तो दूर की बात है, इन तीनों विचारों ने विश्व में सबसे अधिक अत्याचार किए, और अपने उन देशों में भी कोई प्रेममय जीवन और सुख-शांति स्थापित नहीं कर पाये जहां इनकी जनसंख्या शत-प्रतिशत थी।
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मार्क्सवाद तो प्रायः बिखर गया है, ईसाईयत बिखर रही है, सिर्फ इस्लाम ही इस समय अपनी उच्च-जन्म-दर (higher fertility rate) और आक्रामकता (aggressiveness) के कारण पूरे विश्व में फैल रहा है। लेकिन सुख-शांति तो किसी भी इस्लामी देश में नहीं है। लोग यूरोप को बहुत समृद्ध और सुखी समझते हैं, इसलिए अब इस लेख का समापन मैं यूरोप से ही करूंगा।
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इस्लाम इस समय यूरोप में सबसे अधिक तेजी से बढ़ता हुआ मज़हब है। जर्मनी, फ्रांस और बेल्जियम में इनकी जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। यूरोप में इस्लाम का आगमन -- ८ वीं - १० वीं शताब्दी में उत्तरी अफ्रीका की "मूर" नामक एक मुस्लिम जनजाति के माध्यम से दक्षिणी यूरोप में हुआ था। तत्पश्चात तुर्की की उस्मानिया-सल्तनत (Ottoman Empire) के विजय अभियानों के साथ पूरे बाल्कन क्षेत्र में इस्लाम फैल गया। यूरोप में सबसे अधिक मुसलमान मुख्यतः तुर्की, और फिर मगरिब के ट्यूनीशिया, अल्जीरिया और मोरक्को से आए। बाद में पाकिस्तान और अफगानिस्तान से बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम को मानने वाले आकर यूरोप में बसे। सीरिया से भी लाखों मुस्लिम शरणार्थी आए और पूरे पश्चिमी यूरोप में उन्हें शरण दे दी गई। पेरिस में बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम जनसंख्या है। इंग्लैंड में पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े बड़े चर्च बिके हैं और मस्जिदों में बदल दिये गए हैं। मुस्लिम जनसंख्या वहाँ बहुत तेजी से बढ़ रही है।
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अब मैं इस लेख को समाप्त करने से पूर्व यूरोप के दो छोटे-छोटे देशों -- कोसोवो और सर्बिया की चर्चा करूंगा। कोसोवो में मुसलमानों की जनसंख्या ९८ प्रतिशत है, और सर्बिया में ५१ प्रतिशत है। इनके एक पड़ोसी देश अल्बानिया में ६० प्रतिशत मुसलमान हैं। मुझे कोसोवो और सर्बिया की याद इसलिए आई क्योंकि इन दोनों देशों में भयंकर तनाव है और युद्ध से पूर्व की सी स्थिति है।
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यूरोप में उपरोक्त देशों (अल्बानिया, बोस्निया-हर्ज़ेगोविना, व कोसोवो) के अलावा यूरोप में ही उत्तरी मैसिडोनिया, व मोंटेनेग्रो के कुछ भागों और उत्तरी काकेशस और वोल्गा क्षेत्र में कुछ रूसी क्षेत्रों में अधिकांश जनसंख्या मुस्लिम है। यूरोप में तुर्की और अजरबैजान भी पूरे मुस्लिम देश हैं। इन सभी देशों व क्षेत्रों में कहीं भी सुख-शांति नहीं है।
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इस आलेख में अति संक्षेप में ही मैंने अपने विचार प्रस्तुत किये हैं। विस्तार-भय से अधिक नहीं लिख रहा हूँ, और लिखूंगा भी नहीं क्योंकि मेरे पास इतना समय नहीं है।
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जीवन का सार ईश्वर की खोज में है, किसी मज़हबी या राजनीतिक विचारधारा में नहीं। भारत को सबसे अधिक खतरा उपरोक्त विचारधाराओं से ही है। जीवन में सब तरह से शक्तिशाली बनो। अपनी सभी कमियों को दूर करो। दैवीय शक्तियों की सहायता की हमें आवश्यकता पड़ेगी। यह मत भूलो कि जीवन का लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है। ईश्वर का निरंतर अनुस्मरण, चिंतन, मनन, श्रवण, और निदिध्यासन ही हमें जीवन में सुख, शांति और सुरक्षा प्रदान करेगा।
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आप सब महान आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ अगस्त २०२२

जो उपासना परमप्रेम (भक्ति) जागृत कर, परमात्मा का बोध और परमात्मा में स्थिति कराती है, वही उपासना सार्थक है, अन्य सब भटकाव हैं।

 जो उपासना परमप्रेम (भक्ति) जागृत कर, परमात्मा का बोध और परमात्मा में स्थिति कराती है, वही उपासना सार्थक है, अन्य सब भटकाव हैं।

हमारे हृदय में और दृष्टिपथ में परमात्मा नहीं है तो हम गलत मार्ग पर अग्रसर हैं। हर क्षण परमात्मा हमारे साथ हों, कभी भी उनसे दूरी न हो।
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दूसरों को दुःख और पीड़ा देने के विचार यदि हमारे मन में हैं तो अनजाने में हम स्वयं के लिए ही दुःख और पीड़ाओं के बीज बो रहे हैं। ये बीज ही वृक्ष बनकर हमारे संचित कर्मों में जुड़ जायेंगे जिनका फल भुगतने के लिए हम बाध्य होंगे।
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शाश्वत सनातन सत्य यह है कि भारत एक आध्यात्मिक सत्यनिष्ठ धर्मावलम्बी हिन्दू राष्ट्र है। हम सब निःस्वार्थ, निर्भीक, पवित्र और ईश्वरीय चेतना से युक्त हों। देवासुर संग्राम हर युग में सदा होते रहे हैं। निश्चित रूप से भारत विजयी होगा।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२ अगस्त २०२२
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पुनश्च :-- यहाँ उपासना का अर्थ है --- आराधना, प्रार्थना, अर्चना, कीर्तन, पूजन, वंदन, भजन, बंदगी, इबादत, आदि।

Friday, 31 July 2026

भगवती के सौन्दर्य और वैभव की दिव्यता के समक्ष मैं मौन निःशब्द हूँ ---

 भगवती के सौन्दर्य और वैभव की दिव्यता के समक्ष मैं मौन निःशब्द हूँ।

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वेदान्त की अधिष्ठात्री भगवती छिन्नमस्ता का आज अनायास ही आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। उन्होंने कामदेव व उनकी पत्नी रति को अपने पैरों में पटक रखा है, और उन पर खड़ी हैं। यह कामवासना पर विजय का संदेश है। उन्होने अपने स्वयं के सिर को काट रखा है, यह अहंकार पर विजय का संदेश है। उनके धड़ से रक्त की तीन धाराएँ निकल रही हैं। मध्यम धारा जो सुषुम्ना की प्रतीक है, का पान वे स्वयं कर रही हैं। बाईं ओर डाकिनी शक्ति है जो अत्यधिक भयंकर, विकराल और महाबलशाली है। भगवती के दाहिने ओर वर्णिनी शक्ति है जो है तो महाबलशाली, लेकिन विकराल नहीं है। माँ की साधना का अधिकारी वही है जिसने कामवासना और अहंकार पर विजय प्राप्त कर ली है। माँ की साधना साधक को सर्व सिद्धियाँ प्रदान करती हैं।
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जिनकी देह से समस्त सृष्टि प्रकाशित है, पता नहीं उनका नाम "काली" क्यों रख दिया? सृष्टि की रचना के पीछे जो आद्यशक्ति है, जो स्वयं अदृश्य रहकर अपने लीला विलास से समस्त सृष्टि का संचालन करती हैं, समस्त अस्तित्व जो कभी था, है, और आगे भी होगा वह शक्ति माँ महाकाली ही है। सृष्टि, स्थिति और संहार उन की एक अभिव्यक्ति मात्र है। यह संहार नकारात्मक नहीं है। यह वैसे ही है जैसे एक बीज स्वयं अपना अस्तित्व खोकर एक वृक्ष को जन्म देता है। सृष्टि में कुछ भी नष्ट नहीं होता, मात्र रूपांतरित होता है। यह रूपांतरण ही माँ का विवेक, सौन्दर्य और करुणा है। माँ प्रेम और करुणामयी है। माँ के वास्तविक सौन्दर्य को तो गहन ध्यान में तुरीय चेतना में ही अनुभूत किया जा सकता है। उनकी साधना जिस साकार विग्रह रूप में की जाती है, वह प्रतीकात्मक है ---
"माँ के विग्रह में चार हाथ है। अपने दो दायें हाथों में से एक से माँ सृष्टि का निर्माण कर रही है, और एक से अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही है। माँ के दो बाएँ हाथों में से एक में कटार है, और एक में कटा हुआ नरमुंड है जो संहार और स्थिति के प्रतीक हैं। ये प्रकृति के द्वंद्व और द्वैत का बोध कराते हैं। माँ के गले में पचास नरमुंडों कि माला है जो वर्णमाला के पचास अक्षर हैं। यह उनके ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं। माँ के लहराते हुए काले बाल माया के प्रतीक हैं। माँ के विग्रह में उनकी देह का रंग काला है, क्योंकि यह प्रकाशहीन प्रकाश और अन्धकारविहीन अन्धकार का प्रतीक हैं, जो उनका स्वाभाविक काला रंग है। किसी भी रंग का ना होना काला होना है जिसमें कोई विविधता नहीं है। माँ की दिगंबरता दशों दिशाओं और अनंतता की प्रतीक है। उनकी कमर में मनुष्य के हाथ बंधे हुए हैं वे मनुष्य की अंतहीन वासनाओं और अंतहीन जन्मों के प्रतीक हैं। माँ के तीन आँखें हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि यानि भूत भविष्य और वर्तमान की प्रतीक हैं। माँ के स्तन समस्त सृष्टि का पालन करते हैं। उनकी लाल जिह्वा रजोगुण की प्रतीक है जो सफ़ेद दाँतों यानि सतोगुण से नियंत्रित हैं। उनकी लीला में एक पैर भगवान शिव के वक्षस्थल को छू रहा है जो दिखाता है कि माँ अपने प्रकृति रूप में स्वतंत्र है पर शिव यानि पुरुष को छूते ही नियंत्रित हो जाती है। माँ का रूप डरावना है क्योंकि वह किसी भी बुराई से समझौता नहीं करती, पर उसकी हँसी करुणा की प्रतीक है।"
माँ, मुझे आत्म-विस्मृति रूपी मृत्यु में मत जाने दो। मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए।
कृपा शंकर
१ अगस्त २०२३

संसार में जीवन की सारी समस्याओं का निदान ---

 संसार में जीवन की सारी समस्याओं का निदान ---

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हम संसार में जन्म लेते हैं, तब से भौतिक मृत्यु तक समस्याएँ ही समस्याएँ हमारे समक्ष रहती हैं। जीवन का कोई भी ऐसा पक्ष नहीं है जिसमें समस्याएँ न हों। अपनी किशोरावस्था में मैं समझता था कि मनुष्य की भौतिक दरिद्रता ही जीवन की सबसे बड़ी समस्या है। बाद में युवावस्था में अनुभव किया कि आध्यात्मिक दरिद्रता ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। भौतिक जीवन की इस वृद्धावस्था में मैं यह बात निज जीवन के पूर्ण अनुभव से कहता हूँ कि आध्यात्मिक दरिद्रता ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। उस से बड़ी कोई अन्य समस्या नहीं है।
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इसका कोई सार्वजनिक व सार्वभौमिक निदान नहीं है। हर व्यक्ति को अपना उत्तर स्वयं पाना होता है। पूर्ण निष्ठा से भगवान से प्रार्थना करेंगे तो इस प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलेगा कि हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग कौन सा है। एक ही मार्ग सबके लिए नहीं हो सकता। हम अपनी पूर्ण निष्ठा से भगवान से मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करें, भगवान से उत्तर अवश्य प्राप्त होगा।
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मेरा निजी व्यक्तिगत मत तो यह है कि हर परिवार में शिवपूजा और गीता पाठ नित्य होना चाहिए। यह उपाय सब के लिए नहीं हो सकता। महात्माओं के मुख से सुना है कि अपनी अपनी कुलदेवी की नित्य आराधना करनी चाहिए। भगवान के अपने अपने इष्ट रूप की नित्य नियमित आराधना और मार्ग-दर्शन की प्रार्थना करें। ३१ जुलाई २०२३

सबसे बड़ी सेवा का कार्य कौनसा, क्या व क्यों है, जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं?

 प्रश्न : --- सबसे बड़ी सेवा का कार्य कौनसा, क्या व क्यों है, जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं?

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उत्तर : --- सबसे बड़ी सेवा का कार्य जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं, वह है -- भगवान का ध्यान, ------ क्योंकि इस से हमारे माध्यम से भगवान के प्रकाश यानि सतोगुण की वृद्धि होती है, और तमोगुण का ह्रास होता है।
हमारा उद्गम भगवान से हुआ है, और हमारा लक्ष्य भी भगवान की प्राप्ति है। यह सृष्टि का चक्र है। समाज की सब बुराइयों का कारण हमारे जीवन में तमोगुण की प्रधानता है। भगवान का नित्य नियमित ध्यान ही हमारे जीवन में तमोगुण का ह्रास कर सकता है, सतोगुण में वृद्धि करता है, और अंततः हमें त्रिगुणातीत बनाकर भगवान की प्राप्ति कराता है, जिसे हम आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) कहते हैं।
इस विषय पर श्रीमद्भगवद्गीता में बहुत स्पष्ट और सरल मार्गदर्शन है। सारे निगमागम ग्रंथ भी यही कहते हैं।
इसमें आवश्यकता है भगवान के प्रति परमप्रेम (भक्ति) जागृत करने की, जिसके बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। जब परमप्रेम जागृत हो जाये, तब भगवान का निरंतर स्मरण, नामजप और निदिध्यासन करें। उसके पश्चात ध्यान अपने आप ही होने लगता है। भगवान निश्चित रूप से सब भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं, कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं है। भटकाव तभी आता है जब हमारे मन में छल-कपट होता है। भगवान कहते हैं --
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥"
और --
"सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥"
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भगवान ने हम सब को विवेक दिया है, उस विवेक से हम इतना सब तो समझ ही सकते हैं। मैं अपनी बात के समर्थन में उपनिषदों, गीता, व अन्य ग्रन्थों से चाहे जितने संदर्भ दे सकता हूँ, लेकिन उनकी आवश्यकता नहीं है।
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन॥
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ अगस्त २०२२

Wednesday, 29 July 2026

जातिवाद समाप्त हो सकता है यदि सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख प्रतिबंधित हो जाए ---

 जातिवाद समाप्त हो सकता है यदि सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख प्रतिबंधित हो जाए .....

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देश और समाज की एकता व सामाजिक सद्भाव के लिए सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख अत्यधिक कठोरता से प्रतिबंधित होना चाहिएा जातिवाद देश पर कलंक, और धर्म-विरुद्ध है| हिंदुओं के लिए जातिवाद वेद-विरुद्ध है, इसलिए त्याज्य है|
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जातिवाद का आरंभ उस काल में हुआ था जब भारत पर स्थल मार्ग से अरब, फारस और मध्य एशिया के विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण आरंभ हुए, और जल मार्ग से पूर्तगालियों के| उस से पूर्व कोई जातिवाद नहीं था| उस समय यह अपनी रक्षा के लिए बनाई गई अस्थायी व्यवस्था थी जो दुर्भाग्य से कालांतर में स्थायी हो गई|
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भारत के वर्तमान संविधान में सैंकड़ों जातियों का उल्लेख है और संविधान ही जातियों के आधार पर आरक्षण देकर जातिवाद को बढ़ावा देता है| किसी भी हिन्दू धर्म-ग्रंथ में जातियों का उल्लेख नहीं है| भारत में गुण और कर्मों के आधार पर वर्ण-व्यवस्था मात्र थी जो स्वाभाविक है|
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गीता में भगवान कहते हैं .....
"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः|
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्||४:१३||"
अर्थात .... गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है| यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो||.
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मूल मनुस्मृति में कहीं भी जातिप्रथा का उल्लेख नहीं है| जो लोग मनुस्मृति को गालियाँ देते हैं, यह उनकी विकृत और कुटिल मानसिकता है| मनुस्मृति वेदों पर आधारित है जहाँ सिर्फ वर्णों का ही गुण-कर्मों के आधार पर उल्लेख है| मनुस्मृति में कहीं पर भी किसी जाति का उल्लेख नहीं है|
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विदेशी आक्रान्ताओं ने विशेषकर अंग्रेजों ने अपने वेतनभोगी मेक्समूलर जैसे पादरियों से हिंदुओं के धर्मग्रंथों को प्रक्षिप्त और विकृत करवाया, शूद्रों पर अत्याचारों की झूठी कथाएँ लिखवाईं और मूल धर्म-ग्रंथों को नष्ट करने का पूरा प्रयास किया| भगवान की कृपा से ब्राह्मणों ने उन्हें रट रट कर याद कर लिया, इसलिए धर्म-ग्रंथ बच गए, अन्यथा सारे धर्म-ग्रंथ लुप्त हो जाते|
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ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२०

क्या कोई ऐसा पुरुष है जो सभी गुणों में श्रेष्ठ हो ?

 क्या कोई ऐसा पुरुष है जो सभी गुणों में श्रेष्ठ हो ?

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ऐसा पुरुष तो देवताओं में भी नहीं मिलेगा जिसमें सारे गुण हों, और कोई अवगुण न हो। एकमात्र ऐसे पुरुष जिन्होंने कभी इस पृथ्वी पर भ्रमण किया है, तो वे भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण ही थे। उनसे श्रेष्ठ कोई दूसरा पुरुष कभी नहीं हुआ। वे ही हमारे एकमात्र आदर्श हो सकते हैं। हम उन्हीं का ध्यान करें, और अपने निज जीवन में अवतरित कर उन्हें व्यक्त करें।
आज के भारत में नराधम राक्षसों ने अधर्म और अनाचार फैला रखा है। हमें आवश्यकता है एक नई व्यवस्था के लिए ब्रह्मतेजोमय भगवन वेदव्यास जैसे व्यक्तित्व की, भगवन राम जैसे शासक की, और देवर्षि नारद जैसे मार्ग दर्शकों की। भगवान भारतभूमि का कल्याण करें। हृदय की यह एक बहुत घनी पीड़ा थी, जो आज व्यक्त हो गई। और लिखने को कुछ नहीं है। भगवान हमारे जीवन में हों, और हर क्षण उनकी अभिव्यक्ति हो।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३० जुलाई २०२२
पुनश्च: -- साथ तो दूर की बात है, जिन के हृदय में भगवान नहीं है, और जिन के हृदय में छल-कपट भरा पड़ा है, ऐसे लोगों का दर्शन होना भी मैं अपना बहुत बड़ा दुर्भाग्य मानता हूँ। अब तो मन में भगवान के सिवाय अन्य कोई विचार आता ही नहीं है।