इस राष्ट्र में धर्म रूपी बैल पर बैठकर भगवान भोलेनाथ ही विचरण करेंगे, भगवान श्रीराम के कोदंड धनुष की ही टंकार सर्वत्र सुनेगी, और नवचेतना को जागृत करने हेतु भगवान श्रीकृष्ण की ही बांसुरी सदा बजेगी। हमारे हृदय के एकमात्र राजा भगवान श्रीराम हैं। उन्होंने ही सदा हमारी हृदय-भूमि पर राज्य किया है, और सदा वे ही हमारेे राजा रहेंगे। हमारे हृदय की एकमात्र महारानी भगवती सीता जी हैं। वे ही हमारी गति हैं। अन्य किसी का राज्य हमें स्वीकार्य नहीं है।
योगोदय (Yogodaya)
स्वयं के आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति ही इस ब्लॉग का एकमात्र उद्देश्य है |
Sunday, 5 July 2026
इस राष्ट्र में धर्म रूपी बैल पर बैठकर भगवान भोलेनाथ ही विचरण करेंगे ---
परमात्मा के साथ एकत्व का बोध और द्वैत की निवृत्ति ---
परमात्मा के साथ एकत्व का बोध और द्वैत की निवृत्ति
अच्छा-बुरा जैसा भी मैं हूँ, स्वयं को परमात्मा के श्रीचरणों में अर्पित करता हूँ ---
अच्छा-बुरा जैसा भी मैं हूँ, स्वयं को परमात्मा के श्रीचरणों में अर्पित करता हूँ। हिमालय जितनी बड़ी-बड़ी लाखों कमियाँ मुझ में हैं, मैं उन्हें दूर करने में असमर्थ हूँ। परमात्मा से प्रेम मेरा स्वभाव है, अन्यथा मैं अवगुणों की खान हूँ। भगवान का यह संदेश मुझे प्रेरित कर रहा है --
मेरे इस जीवन का एक ही उद्देश्य था और है, वह है — परमात्मा को पूर्ण समर्पण।
मेरे इस जीवन का एक ही उद्देश्य था और है, वह है — परमात्मा को पूर्ण समर्पण। अन्य कोई उद्देश्य नहीं है। मैं कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं करता, जो वास्तविकता है, वह ही है। यह इस जीवन का संध्याकाल है। इस शरीर की आयु ८० वर्ष पूर्ण होने वाली है। परमात्मा से प्रेम मेरा जन्मजात स्वभाव है। मेरे पास किसी भी तरह की कोई शिकायत, आलोचना व निंदा का विषय नहीं है। निजानुभूतियों से परमात्मा की अवधारणा स्पष्ट है। अनेक उपलब्धियां हैं, जिनके बारे में चर्चा करने का निषेध है।
मेरे जैसे लोग समाज में सामान्यतः अनुपयुक्त (Misfit) माने जाते हैं ---
मेरे जैसे लोग समाज में सामान्यतः अनुपयुक्त (Misfit) माने जाते हैं। लेकिन मैं इसे नहीं मानता। फेसबुक ने मुझे स्वयं को व्यक्त करने का अवसर दिया था, जिसका लाभ मैं पिछले १५ वर्षों से ले रहा हूँ। मेरे हृदय में एक तड़प थी कि मैं परमात्मा से परमप्रेम यानि भक्ति के विचारों और भावों को खुल कर बिना किसी रोकटोक के प्रस्तुत करूँ। फेसबुक ने मुझे वह अवसर दिया जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ।
सुख के स्वप्न और मधुर कल्पनायें भी हमें बंधनों में बांधती हैं ---
सुख के स्वप्न और मधुर कल्पनायें भी हमें बंधनों में बांधते हैं। कामनाएं, वासनाएं, और संसार के साथ स्वीकार किये हुए सारे संबंध ही बंधन हैं; इनका त्याग ही मुक्ति है। वास्तव में हमारा एकमात्र संबंध परमात्मा से है।
अहंकार से मुक्त कोई व्यक्ति ईश्वर की चेतना में यदि इस सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश भी कर दे तो उसे कोई पाप नहीं लगता ---
यदि पृथ्वी पर पूरा सतोगुण व्याप्त हो जाये तो पृथ्वी उसी क्षण नष्ट हो जायेगी। ऐसे ही यदि इस पृथ्वी पर पूरा तमोगुण आ जाये तो भी पृथ्वी तत्क्षण नष्ट हो जाएगी। तीनों गुणों में परिवर्तनशील आनुपातिक संतुलन आवश्यक है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में हमें निःस्त्रेगुण्य होने को कहते हैं --