Monday, 13 July 2026

कूटस्थ चैतन्य ..... (बहुत पुराना लेख)

 कूटस्थ चैतन्य ..... (बहुत पुराना लेख)

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"कूटस्थ" शब्द का प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में किया है| "कूटस्थ" को अविनाशी 'परम अव्यक्त' भी कह सकते हैं| वह जो सर्वत्र है, जिसने सर्वस्व का निर्माण किया है, पर कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं है, वह "कूटस्थ" है| उसकी चेतना "कूटस्थ चैतन्य" है| एक लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर "कूटस्थ" का नहीं| योग साधक, ध्यान में दिखाई देने वाले सर्वव्यापक विराट अनंत ज्योतिर्मय ब्रह्म और अनाहत नाद को "कूटस्थ" कहते हैं| जब ज्योतिर्मय चेतना सर्वव्यापक हो जाती है वह "कूटस्थ चैतन्य" कहलाती है| "कूटस्थ चैतन्य" में हम सदा परमात्मा के साथ हैं|
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शिवनेत्र होकर (बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीपतम लाकर भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर) अजपा-जप करते हुए साथ साथ प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का चिंतन करते रहें| विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होगी| ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में रहें| यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता| एक लघुत्तम जीवाणु से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता| यही "कूटस्थ" है, और इसकी चेतना ही "कूटस्थ चैतन्य" है| यह योगमार्ग की उच्चतम साधनाओं/उपलब्धियों में से है|
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आज्ञाचक्र योगी का ह्रदय है, भौतिक देह वाला ह्रदय नहीं| आरम्भ में ज्योति के दर्शन आज्ञाचक्र से थोड़ा सा ऊपर होते हैं, वह स्थान कूटस्थ बिंदु है| आज्ञाचक्र का स्थान Medulla Oblongata यानि मेरुशीर्ष के ऊपर खोपड़ी के मध्य में पीछे की ओर है| यही जीवात्मा का निवास है|
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यदि प्रभु के प्रति परमप्रेम, श्रद्धा-विश्वास और निष्ठा होगी तब निश्चित रूप से मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा, सहायता भी मिलेगी और रक्षा भी होगी| आवश्यकता है एक गहनतम अभीप्सा और परमप्रेम की|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०१९

ब्रह्मचर्य ---

 ब्रह्मचर्य

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ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म यानि परमात्मा का सा आचरण, ब्र्ह्मचैतन्य में स्थिति, और हर उस कर्म से विमुखता जो ब्रह्म यानि परमात्मा से दूर करता है| यह योगदर्शन के पांच यमों में आता है और महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित पञ्च महाव्रतों में आता है जिन्हें पंचशील भी कहते हैं|
ब्रह्मचर्य का व्रत देवों को भी दुर्लभ है| ब्रह्मचर्य की महिमा को यदि मैं श्रुति, स्मृति, पुराणों व महाभारत से उद्धृत करूँ, या जैन साहित्य से उद्धृत करना आरम्भ करूँ तो इस लेख को कभी भी समाप्त नहीं कर पाऊँगा|
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प्राचीन काल में जब गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था, तब वीर, योद्धा, ज्ञानी व तपस्वी लोग होते थे, आज की तरह की घटिया मनुष्यता नहीं| जैसे दीपक का तेल-बत्ती के द्वारा ऊपर चढक़र प्रकाश के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का ओज सुषुम्रा नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान-दीप्ति में परिणित हो जाता है|
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इस विषय पर अधिक नहीं लिखना चाहता क्योंकि इस विषय पर बहुत अधिक साहित्य और मार्गदर्शन उपलब्ध है| अपने खान-पान में, संगति में, अध्ययन में और वातावरण के प्रति सजग रहें| ऐसे कोई विचार न आने दें जिनसे ब्रह्मचर्य भंग हो| जो आध्यात्मिक साधक हैं, उन्हें इस विषय पर पर्याप्त मार्गदर्शन उपलब्ध है| उन्हें ऐसे लेखों की आवश्यकता नहीं है|
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सभी को शुभ कामनाएँ !
१३ जुलाई २०१९

परमशिव

 परमशिव...

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यह शब्द "परमशिव" मुझे अत्यधिक प्रिय है, पता नहीं क्यों? परमात्मा के लिए मैं या तो गीता के "वासुदेव" (समान रूप से सर्वत्र व्याप्त) शब्द का प्रयोग करता हूँ, या तंत्र और शैवागमों के शब्द "परमशिव" का| तत्वरूप में दोनों एक ही हैं, केवल शाब्दिक अर्थ पृथक-पृथक हैं| परमशिव का शाब्दिक अर्थ होता है ..... परम कल्याणकारी| परमशिव एक अनुभूति है जो तब होती है जब हमारे प्राणों की गहनतम चेतना (जिसे तंत्र में कुण्डलिनी महाशक्ति कहते हैं) सहस्त्रार चक्र और ब्रह्मरंध्र का भी भेदन कर परमात्मा की अनंतता में और उससे भी परे विचरण कर बापस लौट आती है| परमात्मा की वह अनंतता ही "परमशिव" है, जिसका ध्यान परम कल्याणकारी है| यह मुझ बुद्धिहीन अकिंचन को गुरुकृपा से ही समझ में आया है| गुरु के उपदेश और आदेश से ध्यान भी उस अनंतता का ही होता है, जो "परमशिव" है|
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परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति पर ही हमें पूरा ध्यान देना चाहिए| शास्त्र हमें दिशा और प्रेरणा देते हैं पर अनुभूति तो उपासना में "परमशिव" की परमकृपा से ही होती है| उनकी परमकृपा होने पर सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है| "परमशिव" शब्द का प्रयोग तंत्रागमों में तो आचार्य शंकर ने "सौन्दर्य लहरी" ग्रंथ में, और शैवागमों में कश्मीर शैव दर्शन के आचार्य अभिनवगुप्त ने प्रत्यभिज्ञा दर्शन में किया है|
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स्वनामधन्य आचार्य शंकर अपने ग्रंथ "सौंदर्य लहरी" में लिखते हैं ...
"सुधा सिन्धोर्मध्ये सुरविटपवाटी परिवृते, मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणि गृहे|
शिवाकारे मञ्चे परमशिव पर्यङ्क निलयम्, भजन्ति त्वां धन्यां कतिचन चिदानन्द लहरीम्||"
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प्रख्यात वैदिक विद्वान श्री अरुण उपाध्याय के अनुसार अनाहत चक्र में कल्पवृक्ष के नीचे शिव रूपी मञ्च है| उसका पर्यङ्क परमशिव है| आकाश में सूर्य से पृथ्वी तक रुद्र, शनि कक्षा (१००० सूर्य व्यास तक सहस्राक्ष) तक शिव, उसके बाद १ लाख व्यास दूर तक शिवतर, सौर मण्डल की सीमा तक शिवतम है| आकाशगंगा में सदाशिव तथा उसके बाहर विश्व का स्रोत परमशिव है जिसने सृष्टि के लिये सङ्कल्प किया|
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एक शब्द "सदाशिव" है जिसका शाब्दिक अर्थ तो है सदा कल्याणकारी और नित्य मंगलमय| पर यह भी एक अनुभूति है जो विशुद्धि चक्र के भेदन के पश्चात होती है| ऐसे ही एक "रूद्र" शब्द है जिस में ‘रु’ का अर्थ है .... दुःख, तथा ‘द्र’ का अर्थ है .... द्रवित करना या हटाना| दुःख को हरने वाला रूद्र है| दुःख का भी शाब्दिक अर्थ है .... 'दुः' यानि दूरी, 'ख' यानि आकाश तत्व रूपी परमात्मा| परमात्मा से दूरी ही दुःख है और समीपता ही सुख है| रुद्र भी एक अनुभूति है जो ध्यान में गुरुकृपा से ही होती है|
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हमारे स्वनामधन्य महान आचार्यों को ध्यान में जो प्रत्यक्ष अनुभूतियाँ हुईं उनके आधार पर ही उन्होंने गहन दर्शन शास्त्रों की रचना की| हमारा जीवन अति अल्प है, पता नहीं कौन सी सांस अंतिम हो, अतः अपने हृदय के परमप्रेम को जागृत कर यथासंभव अधिक से अधिक समय परमात्मा के ध्यान में ही व्यतीत करना चाहिए| वे जो ज्ञान करा दें वह ही ठीक है, और जो न कराएँ वह भी ठीक है| उन परमात्मा को ही मैं 'परमशिव' के नाम से ही संबोधित करता हूँ ..... यही परमशिव शब्द का रहस्य है| उन परमशिव का भौतिक स्वरूप ही शिवलिंग है जिसमें सब का लीन यानि विलय हो जाता है, जिस में सब समाहित है|
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अंत में जगत्गुरु भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को नमन करता हूँ जिन से बड़ा गुरु कोई अन्य नहीं है| उन का कथन है ...
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते| वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
गुरु महाराज को नमन, जिनकी कृपा से मेरे जैसा अकिंचन बुद्धिहीन भी शास्त्रों की चर्चा करने लगता है| ॐ तत्सत्||
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२०

(प्रश्न १) भवसागर क्या है? (प्रश्न 2) भवसागर को कैसे पार करें? ---

 (प्रश्न १) भवसागर क्या है? (प्रश्न 2) भवसागर को कैसे पार करें? --- .

(उत्तर १) भवसागर क्या है? :-- भव-सागर को इस उदाहरण से समझ सकते हैं -- हम खाते क्यों हैं? -- कमाने के लिए, और कमाते क्यों हैं? -- खाने के लिए। यह चक्र कभी समाप्त नहीं होता। यही भवसागर का एक छोटा सा रूप है। इस संसार से सुख की आशा ही हमें इस भवसागर में फँसाए रखती है, जो कभी किसी को नहीं मिलता। यह एक मृगतृष्णा है। हमारी कामनाएँ और वासनाएँ ही इस तृष्णा रूपी भवसागर का निर्माण करती हैं।
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कामनाओं ओर वासनाओं से मुक्त होना ही भवसागर को पार करना है। और भी स्पष्ट शब्दों में संसार की निःसारता को समझ कर, विषय-वासनाओं को त्याग कर परमात्मा के प्रेम में मग्न हो जाना ही -- भवसागर को पार करना है।
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(उत्तर २) भवसागर को कैसे पार करें? :-- श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में संत तुलसीदास जी ने भवसागर को पार करने की जो विधि भगवान श्रीराम के मुख से कहलवाई है, वह समझने में सबसे अधिक सरल है --
चौपाई :--
"नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।"
दोहा/सोरठा :--
"जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥"
इसका सार यह कि यह मनुष्य शरीर इस भवसागर को पार करने के लिए भगवान द्वारा दी हुई एक नौका है। सन्मुख वायु -- भगवान का अनुग्रह है। इस नौका के कर्णधार सदगुरु हैं। जो इस नौका को पाकर भी भवसागर को न तरे, उस से बड़ा अभागा अन्य कोई नहीं है।
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भवसागर पार करने का एक पंक्ति का सूत्र -- "सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो"।
गुरु तो स्वयं भगवान हैं, उन्हें कर्ता बनाओ, और सन्मुख मरुत यानि सामने जो ये सांसें चल रही हैं, उनसे निरंतर अजपा-जप करो। अजपा-जप क्या है? --
"सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आत्म अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥"
भावार्थ - 'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखंड (तैलधारावत कभी न टूटने वाली) वृत्ति है, वही (उस ज्ञानदीपक की) परम प्रचंड दीपशिखा (लौ) है। (इस प्रकार) जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है,॥
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सार की बात -- अपने परमात्व-तत्व में स्थिति ही भवसागर को पार करना है। यदि मेरी बात समझ में नहीं आई है तो किसी उच्च कोटि के संत-महात्मा के समक्ष बैठकर बड़ी विनम्रता से उनसे ज्ञान प्राप्त करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२१

मेरी एक अदम्य वासना ---

 मेरी एक अदम्य वासना ---

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यदि चेतन/अवचेतन मन में कोई अति गहन अदम्य वासना हो तो उसे व्यक्त करने में कोई बुराई नहीं है। हो सकता है कि व्यक्त करने से उस वासना का वेग कम हो जाए, चाहे वह विषय-वासना हो या वेदान्त-वासना। वासना और अभीप्सा में अंतर इतना ही है कि वासना का जन्म मन में होता है और अभीप्सा का जन्म आत्मा में। लेकिन जब कोई वासना मन के साथ-साथ आत्मा में भी हो तब वह अदम्य हो जाती है।
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इस छल-कपट और असत्य से भरे विश्व में अब और अधिक जीने की इच्छा नहीं रही है। वासना यही है कि जब यह शरीर शांत हो, उस समय निर्विकल्प समाधि की अवस्था हो, और कहीं भी किसी भी लोक में पुनर्जन्म हो तो एक जीवन-मुक्त के रूप में हो जिसमें जन्म से ही ज्ञान, भक्ति व वैराग्य की पूर्णता हो। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी वासना नहीं है।
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किसी को उलाहना भी नहीं दे सकते और, शिकायत भी नहीं कर सकते, क्योंकि सारा विश्व तो विष्णु ही है। भगवान विष्णु ही स्वयं को ही इस विश्व के रूप में व्यक्त कर रहे हैं। सारी वासनाएं और अभीप्सा व अभीष्ट भी वे ही हैं। उनसे प्रेम तो है, लेकिन कोई अपेक्षा नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२२
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मेरे लिए गुरु-रूप परमात्मा की उपासना का उद्देश्य ---

 मेरे लिए गुरु-रूप परमात्मा की उपासना का उद्देश्य ---

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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं,
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि ||" (गुरुगीता, स्कंदपुराण)
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मुझे लोक-परंपरानुसार गुरु पूजा करने में कठिनाई होती है, इसलिए अपना एकांत ही मुझे प्रिय है, कोई समूह नहीं। मेरे द्वारा प्रतीकात्मक रूप से गुरु-पादुकाओं की ही पूजा हो सकती है, उनके देह की नहीं। गुरु कोई देह नहीं थे, वे तो तत्व थे। अतः उनके देह रूपी चित्र की पूजा मुझसे नहीं होती। उनके चित्र या मूर्ति को श्रद्धा-सुमन ही अर्पित कर सकता हूँ, पूजा तो उनकी पादुकाओं (खड़ाऊ) की ही कर सकता हूँ, अन्यथा नहीं। इसीलिए मेरी किसी समूह से बनती नहीं है।
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मैं गुरु और ईश्वर में कोई भेद नहीं करता। साधनाकाल के आरंभ में भी यही भाव रहता था कि मैं तो निमित्त मात्र हूँ, सारी साधना गुरु महाराज ही कर रहे हैं। फिर गुरु महाराज से भी कोई भेद नहीं रहा। अब तो यह भाव रहता है कि सारी साधना स्वयं परमात्मा ही कर रहे हैं, मैं तो एक निमित्त मात्र हूँ। गुरु और परमात्मा एक हैं, उनमें कोई भेद नहीं है।
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ध्यान की गहनता में -- मुझमें, गुरु में, और परमात्मा में भी कोई भेद नहीं रहता। न तो मैं कहीं पर होता हूँ, न गुरु रहते हैं, सिर्फ परमात्मा ही रहते हैं। परमात्मा अपनी उपासना स्वयं ही करते हैं। परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी का भी अस्तित्व नहीं रहता है।
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ध्यान के समय उत्तरा-सुषुम्ना (आज्ञाचक्र व सहस्त्रार के मध्य) में एक विराट श्वेत ज्योति के दर्शन होते थे, वही मेरे लिए उपास्य होती थी। फिर उसका स्थान बदलने लगा। वह ज्योति इस शरीर से बाहर निकल कर अनंत की विराटता के साथ एक हो गई, तो निज चेतना भी उस विराटता के साथ एक होने लगी। अब तो वह अनंत विराटता ही मेरा शरीर बन गई है। परमात्मा तो उससे भी परे परमज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में आभासित होते हैं। उन ज्योतिर्मय ब्रह्म के साथ एकत्व ही उपासना का उद्देश्य रह गया है। अन्य कोई उद्देश्य नहीं है। उनका आकर्षण बड़ा प्रबल है।
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एक बार यह जानने की इच्छा हुई कि जब मैं हूँ ही नहीं तो यहाँ कौन है? आगे जो अनुभव हुआ वह तो निषेधात्मक कारणों से नहीं बता सकता, लेकिन यह स्पष्ट हो गया कि एकमात्र अस्तित्व भगवान वासुदेव का है --
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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गुरुगीता के अनुसार सद्गुरु कौन है --
"सर्वसन्देहसन्दोहनिर्मूलनविचक्षणः।
जन्ममृत्युभयघ्नो यः स गुरुः परमो मतः" (गुरुगीता श्लोक संख्या १७०)
अर्थात् - सर्व प्रकार के सन्देहों का जड़ से नाश करने में जो चतुर हैं, जन्म, मृत्यु तथा भय का जो विनाश करते हैं वे परमगुरु (सदगुरु) कहलाते हैं।
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पुनश्च मैं भगवान वासुदेव को नमन करता हूँ जो गुरु रूप में आए और मुझ अकिंचन का उद्धार किया। आध्यात्मिक दृष्टि से एकमात्र अस्तित्व उन्हीं का है। उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है, मैं भी नहीं --
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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"बंदऊं गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥१॥
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥२॥
श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियं होती॥
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के॥
सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहं जो जेहि खानिक॥
बंदउं गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥" (रामचरितमानस)
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ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२२

हम किसका व कैसे ध्यान करें?

  हम किसका व कैसे ध्यान करें?

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(उत्तर) : हमें ऐसे ही व्यक्तियों के साथ सत्संग करना चाहिए जो दिन में २४ घंटे, सप्ताह में सातों दिन, निरंतर भगवान की चेतना में रहते हों। भारत के योगी परंपरागत रूप से भगवान शिव या भगवान विष्णु की अनंतता का ध्यान करते है। तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है, दोनों एक हैं। इनकी सिर्फ अभिव्यक्तियाँ ही पृथक पृथक हैं, जैसे एक सिक्के के दो पहलू होते हैं।
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ध्यान साधना से पूर्व हठयोग के कुछ व्यायाम कर लें, जो अनेक योगियों ने बताए हैं। परमहंस योगानन्द द्वारा सिखाये गए ऊर्जादायी व्यायाम मेरे लिए तो सर्वश्रेष्ठ हैं। "शिव संहिता" में सिखाई गई "महामुद्रा", और "घेरण्ड-संहिता" में सिखाये गए "त्रिबंध" और "पश्चिमोत्तानासन" ध्यान साधना में बहुत अधिक सहायक हैं। पश्चिमोत्तानासन के नियमित अभ्यास से कमर लचीली रहती है, और मरते दम तक कभी झुकती नहीं है। पश्चिमोत्तानासन के सही अभ्यास से ही महामुद्रा सिद्ध होती है। महामुद्रा का अभ्यास दिन में दो बार सायं-प्रातः किया जाता है। जब भी आलस्य आ रहा हो तब कभी भी कर सकते हैं। इस से आलस्य दूर होता है, और साधना में बड़ी सहायक है। नाक से सांस चलती रहे, नाक बंद न हो, इसके लिए हठयोग में नेति आदि की दो-तीन क्रियाएँ सिखाई गयी हैं। योगियों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है --"खेचरी मुद्रा"। पद्मासन में खेचरी मुद्रा लगाकर भ्रूमध्य में ध्यान करने को "शांभवी मुद्रा" कहते हैं। ध्यान साधना के लिए शांभवी मुद्रा ही सर्वश्रेष्ठ है। यह भगवान शिव की मुद्रा है, भगवान शिव इसी में ध्यान करते हैं। खेचरी सिद्ध करने के लिए योगिराज श्रीश्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ने तालव्य-क्रिया बताई है लेकिन उसका अभ्यास युवावस्था के आरंभ से ही करना पड़ता है। प्रोढ़ावस्था में वह सिद्ध नहीं होती। प्रोढ़ लोगों के लिए या उनके लिए जो खेचरी नहीं कर सकते हैं, वे अपना ध्यान नभो-मुद्रा में करें। जीभ को ऊपर की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखने को नभो-मुद्रा कहते हैं। इसका भी अभ्यास करना पड़ता है। ध्यान के लिए पद्मासन या सिद्धासन में बैठें। यदि इनमें नहीं बैठ सकते तो सुखासन में बैठें। सुखासन में भी नहीं बैठ सकते तो बिना हत्थे की एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठ जाएँ, लेकिन कुर्सी के नीचे एक कंबल बिछा लें। कमर हर परिस्थिति में सीधी रहे, इसके लिए नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लें। जिनकी कमर झुक गई है उनको इस जन्म में सिद्धि नहीं मिल सकती, उन्हें दुबारा जन्म लेना पड़ेगा। पहले योगी अपनी साधना स्वाभाविक रूप से मरे हुए हिरण या बाघ की खाल पर बैठ कर करते थे। लेकिन आजकल हिरण या बाघ की खाल को घर में रखना भी कानूनी अपराध है। इसमें गिरफ्तारी भी हो सकती है।
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ध्यान के लिए हठयोग के अनुलोम-विलोम के साथ साथ उज्जायी प्राणायाम का अभ्यास होना बहुत आवश्यक है। उज्जायी का महत्व अभी समझ में नहीं आयेगा, लेकिन कुछ समय के बाद पता चलेगा कि यह कितना महत्वपूर्ण है।
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ध्यान साधना का आरंभ कूटस्थ में ध्यान करते हुए अजपा-जप से होता है। यह एक वैदिक साधना है जिसे हंसःयोग और हंसवतिऋक भी कहते हैं। आठ खंडों की "तपोभूमि नर्मदा" नामक पुस्तक के पांचवे खंड में इसके बारे में वेदों और उपनिषदों के प्रमाण देकर बहुत विस्तार से बताया गया है।
गुरु-प्रदत्त बीजमंत्र का श्रवण करते करते उसी में स्वयं का विलय हो जाता है। ध्यान की गहराई में स्वयं का कोई पृथक बोध नहीं रहता। हम उपास्य के साथ एक हो जाते हैं। ध्यान अपने उपास्य का ही किया जाता है।
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भगवान की जब भी कृपा होगी वे किसी श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु के रूप में हमारे पास आ जाते हैं। उस समय हमें पता चल जाता है। सदगुरु का एकमात्र कार्य अपने शिष्य को ईश्वर की प्राप्ति करना होता है। अन्य बातों में कोई रुचि उनकी नहीं होती। किसी भी साधक में यदि सत्यनिष्ठा, श्रद्धा और विश्वास है तो ईश्वर प्राप्ति से उसे कोई नहीं रोक सकता।
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२३