Monday, 16 March 2026

जो लोग भ्रष्टाचार से अनाप-शनाप अथाह रुपया बनाते हैं, क्या वे उसे अपने जीवन काल में खर्च कर सकते हैं?

 जो लोग भ्रष्टाचार से अनाप-शनाप अथाह रुपया बनाते हैं, क्या वे उसे अपने जीवन काल में खर्च कर सकते हैं? इन्द्रीय भोगों की भी एक सीमा होती है, पेट भी एक सीमा से अधिक नहीं खा सकता, कपड़े भी कितने पहिनेंगे? वह धन हड़प कर दूसरे लोग ही खायेंगे|

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प्राचीन भारत में सिर्फ राक्षस लोग ही अधर्म से धन का संचय करते थे| चक्रवर्ती राजा भी प्रजा से वैसे ही कर वसूलते थे जैसे सूर्य समुद्र से जल सोखकर बापस पृथ्वी पर बादलों के द्वारा बरसा देता है| ऋषि अगस्त्य की एक कथा है जिसे ध्यान से पढ़िए|
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एक बार अगस्त्य मुनि कहीं चले जा रहे थे| उन्होंने एक जगह अपने पितरों को देखा, जो एक गड्ढे में नीचे मुँह किये लटक रहे थे| तब उन लटकते हुए पितरों से अगस्त्य जी ने पूछा ..... "आप लोग यहाँ किसलिये नीचे मुँह किये काँपते हुए से लटक रहे हैं"? यह सुनकर उन पितरों ने उत्तर दिया ..... "संतान परम्परा के लोप की सम्भावना के कारण हमारी यह दुर्दशा हो रही है"| अपने पितरों की यह दुर्दशा देखने के बाद अगस्त्य मुनि ने विवाह करने का निश्चय किया|
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उन्होंने अपने लिए सबसे उपयुक्त कन्या विदर्भ-नरेश की पुत्री लोपामुद्रा को समझा और उसका हाथ माँगने के लिए विदर्भ-नरेश के दरबार में पहुँच गए| राजा ने उनका खूब आदर सत्कार किया और आने का प्रयोजन पूछा| अगस्त्य मुनि ने कहा कि मैं आपकी पुत्री से विवाह करना चाहता हूँ| राजा ये बात सुनकर चिन्ता में डूब गए| उसी समय लोपामुद्रा राजा के पास आयी और बोली ..... "पिता जी, आप दुविधा में क्यों पड़ गये? मैं ॠषिवर से विवाह करने के लिए प्रस्तुत हूँ"| लोपामुद्रा और अगस्त्य मुनि का विवाह सम्पन्न हो गया| विवाह के पश्चात् अगस्त्य मुनि ने लोपामुद्रा से कहा कि ....."तुम्हारे ये राजकीय वस्त्र ऋषि-पत्नी को शोभा नहीं देते, इनका परित्याग कर दो"| लोपामुद्रा ने कहा ..... "जो आज्ञा, स्वामी! अब से मैं छाल, चर्म और वल्कल ही धारण करूँगी"| कुछ समय बाद लोपामुद्रा ने कहा ..... "स्वामी मेरी एक इच्छा है"| ऋषि बोले- "कहो, क्या इच्छा है तुम्हारी?" लोपामुद्रा ने कहा ...."हम ठहरे गृहस्थ! हमारे लिए धन से सम्पन्न होना कोई अपराध न होगा| प्रभु, मै उसी तरह रहना चाहती हूँ, जैसे अपने पिता के घर रहती थी"| ऋषि बोले ....."अच्छा तो मैं धन-प्राप्ति के लिए जाता हूँ| तुम यहीं मेरी प्रतीक्षा करना"| अगस्त्य चल पड़े| मैं राजा श्रुतर्वा के पास चलूँ| कहते हैं, वे अत्यन्त समृद्ध हैं|
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जब अगस्त्य राजा श्रुतर्वा के दरबार में पहुँचे तो महाराज श्रुतर्वा ने पूछा ..... "महात्मन, बताइये मैं आपकी क्या सेवा करूँ?" अगस्त्य बोले ..... "मैं तुमसे कुछ धन माँगने आया हूँ| तुम अपनी सामर्थ्य के अनुसार मुझे धन प्रदान करो"| राजा ने कहा ..... "मेरे पास देने को अतिरिक्त धन नहीं है| फिर भी जो है, उसमें से आप इच्छानुसार ले सकते हैं"| अगस्त्य ऋषि नीतिवान थे| अगर मैं इस राजा से कुछ लेता हूँ, तो दूसरों को उससे वंचित होना पड़ेगा| उन्होंने श्रुतर्वा से कहा ..... "मैं तुमसे कुछ नहीं ले सकता| आओ, हम राजा बृहदस्थ के पास चलें"| लेकिन राजा बृहदस्थ के पास भी देने लायक़ अतिरिक्त धन नहीं था| ऋषि अगस्त्य ने कहा ..... "शायद, राजा त्रसदस्यु मेरी कुछ सहायता कर सकें| आओ, हम सब उनके पास चलें"| लेकिन जब वे लोग राजा त्रसदस्यु के यहाँ पहुँचे तो राजा त्रसदस्यु भी उनको धन देने में असमर्थ रहे| तीनों राजा एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे| अन्त में उन्होंने समवेत स्वर में कहा ..... "यहाँ इल्वल नामक एक असुर रहता है, जिसके पास अथाह धन है| आइये, हम उसके पास चलें"|
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इल्वल महाधूर्त राक्षस था| उसका एक भाई भी था, जिसका नाम वातापि था| वे दोनों ही ब्राह्मणों से घृणा करते थे और ब्राह्मणों की हत्या का उन्होंने संकल्प ले रखा था| वह मायावी अपने भाई वातापि को माया से बकरा बना देता था| वातापि भी इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ था| अत: वह क्षणभर में बकरा बन जाता था| फिर इल्वल उस बकरे का मांस धोखे से किसी ब्राह्मण को खिला देता, और अपने भाई वातापी को जब पुकारता तो वातापी उस ब्राह्मण का पेट फाड़कर बाहर निकल आता और वह ब्राह्मण मर जाता|
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जब अगस्त्य तीनों राजाओं के साथ इल्वल के साम्राज्य में पहुँचे, वह उनके स्वागत के लिए तैयार बैठा था| उनके वहाँ पहुँचते ही उसने कहा ..... "आइये, आप सबका स्वागत है| मैंने आपके लिए विशेष भोजन तैयार करवाया है"| तीनों राजाओं को आशंका हुई तो उन्होंने ऋषि को बताया| ऋषि ने कहा ..... "चिन्ता मत करो| मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा"| अगस्त्य ने भोजन शुरू किया| सचमुच ऐसा स्वादिष्ट भोजन पहली बार खाने को मिला|
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जब ऋषि अगस्त्य ने अन्तिम कौर ग्रहण किया तो इल्वल ने वातापि को आवाज़ दी| वातापि बाहर आओ| पर वातापी बाहर नहीं आया| इल्वल क्रोध से पागल हो उठा| अगस्त्य बोले ..... "अब वह कैसे बाहर आ सकता है? मैं तो उसे योगबल से खाकर पचा भी गया"| इल्वल ने अपनी हार स्वीकार कर ली| उसने अगस्त्य से कहा ..... "आपका किस उद्देश्य से आना हुआ? मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ"? अगस्त्य बोले ..... "हमें पता है कि तुम बड़े धनवान हो| इन राजाओं को और मुझे धन चाहिए| औरों को वंचित किए बिना जो भी दे सकते हो हमें दे दो"| इल्वल पल-भर को चुप रहा| फिर उसने कहा कि ..... "मैं हर एक राजा को दस-दस हज़ार गायें और उतनी ही मुहरें दूँगा और अगस्त्य ऋषि को बीस हज़ार गायें और उतनी ही मुहरें दूँगा| इसके अलावा मैं उनकी सेवा में अपना सोने का रथ और घोड़े भी अर्पित कर दूँगा| आप ये सारी वस्तुएँ स्वीकार करें"|
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इल्वल के घोड़े धरती पर वायु-वेग से दौड़ते थे| वे लोग पल-भर में ही ऋषि अगस्त्य के आश्रम पहुँच गये| अब राजाओं ने ऋषि अगस्त्य से जाने की आज्ञा माँगी और ऋषि ने उन्हें जाने की आज्ञा दे दी| उन लोगों के जाने के बाद ऋषि अगस्त्य लोपामुद्रा के पास गये और कहा कि ..... "लोपामुद्रा, जो तुम चाहती थीं वह मैं ले आया| अब हम तुम्हारी इच्छानुसार जीवन बिताएँगे|" कई वर्षों बाद लोपामुद्रा ने एक पुत्र को जन्म दिया| इस प्रकार ऋषि अगस्त्य ने अपने पितरों को दिया हुआ वचन पूरा किया|
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यह कथा बताती है कि प्राचीन भारत में जो राक्षस लोग होते थे वे ही अधर्म से धन संचय करते थे| बड़े बड़े राजा भी अधर्म से कुछ भी धन संचय नहीं करते थे|
१७ मार्च २०१८

उपासना ---

भगवान स्वयं ही यह सारी ज्योतिर्मय सृष्टि बन गए हैं। उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है। उनकी प्रकृति अपने नियमानुसार इस सृष्टि का संचालन कर रही है। हमारा सुषुम्ना-पथ सदा ज्योतिर्मय रहे।

मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र के मध्य प्राणायाम करते-करते देवभाव प्राप्त होता है, और हम चाहें तो सब प्रकार की सिद्धियाँ भी मिल सकती हैं। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गीता में बताई हुई ब्राह्मी-स्थिति में निरंतर रहने की साधना करें। भौतिक देह की चेतना शनैः शनैः कम होने लगेगी। सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान को प्रतिक्रियारहित सहन करना एक महान तपस्या है। करोड़ों तीर्थों में स्नान करने का जो फल है, ऊर्ध्वस्थ कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम के निरंतर ध्यान और दर्शन से वही फल प्राप्त होता है।
कूटस्थ चक्र ही भगवती श्री का पादपद्म, और सभी देवताओं का आश्रय स्थल है। उसमें स्थिति ही आनंद और मोक्ष है। भगवती श्री साक्षात रूप से वहीं बिराजमान हैं। मन को बलात् बार बार सच्चिदानंद ब्रह्म में लगाये रखना हमारा परम कर्तव्य है। मन और इन्द्रियों की एकाग्रता परम तप है, समदृष्टि ही ब्रह्म्दृष्टि है। कूटस्थ गुरु-रूप-ब्रह्म को पूर्ण समर्पण व नमन ! सम्पूर्ण अस्तित्व उन्हीं की अभिव्यक्ति है, कहीं भी "मैं" और "मेरा" नहीं।
सदा शिवभाव में स्थित रहें। सारी सृष्टि ही शिवमय है।
शिवोहं शिवोहं। अहं ब्रह्मास्मि। ॐ ॐ ॐ !! १ मार्च २०२६

जहां तक आध्यात्मिक साधनाओं का प्रश्न है, मुझे किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है।

 जहां तक आध्यात्मिक साधनाओं का प्रश्न है, मुझे किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है। जितनी मेरी यह सीमित और अल्प बुद्धि समझ सकती है, वहाँ तक पूरी संतुष्टि है। कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग-साधना है। परमशिव और कुंडलिनी दोनों की ही पर्याप्त निजानुभूतियाँ हैं, किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है। परमात्मा से पूरा मार्गदर्शन प्राप्त हैं। अतः इस विषय पर किसी भी तरह की चर्चाओं का समापन कर रहा हूँ। फेसबुक पर ईश्वर प्रेरणा से आध्यात्मिक विषयों पर साढ़े चार हजार (4500) से अधिक पोस्ट यानि लेख लिख चुका हूँ। अब और लिखने की आवश्यकता नहीं है। जब तक इस शरीर में प्राण-प्रवाह है तब तक चेतना परमशिव में ही रहेगी। जो परमशिव हैं, वे ही गीता के पुरुषोत्तम हैं, और वे ही वेदान्त के ब्रह्म है। मेरा संपर्क बहुत ही सीमित साधकों से रहेगा। आप सब में परमात्मा को नमन।

ॐ तत् सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ मार्च २०२६

जहां तक मेरी बुद्धि काम करती है, शिव का ध्यान ही श्रीहरिः का ध्यान है ---

 जहां तक मेरी बुद्धि काम करती है, शिव का ध्यान ही श्रीहरिः का ध्यान है ---

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हरिः शरणम्, हरि: शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्॥
हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व ही शिव है। शिव से परे अन्य कुछ भी नहीं है। शिव है ईश्वर की अनंतता, जो हम स्वयं हैं। हम स्वयं सम्पूर्ण अस्तित्व हैं, यह नश्वर देह नहीं। हमारे से परे अन्य कुछ भी नहीं है। 'शिव' ही ध्यान का विषय है। 'शिव' ही ईश्वर का श्रीहरिः रूप है, जिससे अधिक आनंददायक अन्य कुछ भी नहीं है। जहां तक मैं समझता हूँ -- श्री शब्द का संधि-विच्छेद होता है -- श+र+ई। यहाँ श शब्द श्वास-प्रश्वास है, र अग्नि बीज है, और ई शक्ति बीज है। श्वास-प्रश्वास की अग्नि रूपी शक्ति "श्री" है।
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'हं' विशुद्धिचक्र का बीजमंत्र है। यह शिव यानी सम्पूर्ण अस्तित्व यानी आकाश (अंतरिक्ष की अनंतता) तत्व पर ध्यान के लिए प्रयुक्त होता है। 'स:' आध्यात्मिक सूर्य का बीज मंत्र है (भौतिक सूर्य का नहीं)। यह सकारात्मक ऊर्जा और एकाग्रता को बढ़ाता है। इस हंस: शब्द का जप हम हर सांस के साथ करते हैं। इसे हंस: गायत्री, अजपा-जप, हंस:योग, व हंसवतीऋक आदि नामों से पुकारते हैं। ईश्वर के साक्षात्कार के पश्चात यह "हंसः" मंत्र ही "सोहं" हो जाता है। "ओम्" (ॐ) उस परमात्मा का वाचक है।
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प्रातःकाल उठते ही, और रात्रि को सोने से पूर्व एक ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर के पद्मासन या सिद्धासन में खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा लगाकर बैठ जाएँ। अर्धखेचरी मुद्रा को तो कोई भी कर सकता है, खेचरी के लिए दीर्घ अभ्यास करना पड़ता है। मेरुदण्ड किसी भी परिस्थिति में उन्नत और ठुड्डी भूमि के समानान्तर हो, अन्यथा कुछ भी अनुभूत नहीं होगा और नींद आ जाएगी।
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जिन्हें ज्योति के दर्शन नहीं होते वे भ्रूमध्य में एक ज्योति की कल्पना करें। उसका विस्तार सारे ब्रह्मांड में कर दें। वह ज्योति सारी सृष्टि में, और सारी सृष्टि उस ज्योति में है। अब हम उस ज्योति का ध्यान करें। हम यह नश्वर देह नहीं, वह असीम अनंत ज्योतिर्मय ब्रह्म हैं। वह ज्योतिर्मय ब्रह्म ही शिव हैं। वे ही हमारा अपना स्वरूप है। जब सांस भीतर जाती है, तब "हंsssssssssss" का मानसिक जप करें। जब सांस बाहर जाती है, तब "सःsssssssss" का मानसिक जप करें। जब साँसे रुक जाएँ, यानी कुंभक लग जाए, तब उस अनंतता के साथ एकाकार होकर प्रणव का मानसिक जप करें। इसका कितनी भी देर तक अभ्यास कीजिए, समय की कोई सीमा नहीं है। हंस: का अङ्ग्रेज़ी में अर्थ होता है -- I am He. यह विशुद्ध वेदान्त/योग की साधना है।
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इसके पश्चात का यह अगला चरण है --
बिलकुल एकांत में किसी भी तरह के कोलाहल से दूर ध्यानमुद्रा में ध्यान के आसन पर बैठ जाइए। मेरुदण्ड उन्नत, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, पूर्ण या अर्धखेचरी मुद्रा। हो सके तो किसी न किसी विधि से कान बंद कर लीजिये। नहीं हो सके तो कोई बात नहीं। जो सबसे तीब्र ध्वनि सुनती है, उसके साथ श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय में बताई हुई विधि से मूर्धा में और अनंतता से भी परे प्रणव मंत्र का मानसिक जप कीजिये। साथ में अन्य किसी भी मंत्र को न लगाएँ, केवल प्रणव मंत्र। मंत्र के साथ स्वयं को एकाकार कीजिये, और अपनी चेतना को सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त कर दीजिये। शिवभाव में स्थित होकर शिव की अनंतता का ध्यान करें।
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यम-नियमों का पालन और सद् आचरण अनिवार्य है, अन्यथा लाभ के स्थान पर बहुत अधिक हानि होगी जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। किसी भी तरह की कामना यानि आकांक्षा न हो। यम नियमों का पालन नहीं कर सकते, या किसी भी तरह का कोई संशय है, तो ये साधनाएं न करें।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ मार्च २०२६

तस्माद्योगी भवार्जुन --- .

 तस्माद्योगी भवार्जुन ---

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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को योगी होने का आदेश देते हैं --
"तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥६:४६॥"
अर्थात् -- " क्योंकि योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है और (केवल शास्त्र के) ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है तथा कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो॥"
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योगमार्ग की साधना वही कर सकता है जिसके हृदय में परम भक्ति, और परमात्मा को समर्पित होने की अभीप्सा हो। अन्यथा कोई भी सफल नहीं हो सकता। योगमार्ग की साधनाओं का आरंभ -- "हंस:योग" से होता है, और इसकी पूर्णता "पुरुषोत्तम-योग" से होती है। पुरुषोत्तम-योग को तो बिना हरिःकृपा के कोई समझ भी नहीं सकता, क्योंकि यह बुद्धि का नहीं आध्यात्मिक अनुभूतियों का विषय है। जो क्रिया-योग की साधना करते हैं, वे अपनी साधना में उन्नत होकर पुरुषोत्तम-योग को स्वतः ही समझ लेते हैं।
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कल ५ मार्च २०२६ को मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी जिसका शीर्षक था -- "जहां तक मेरी बुद्धि काम करती है, शिव का ध्यान ही श्रीहरिः का ध्यान है"। उपरोक्त शीर्षक के अंतर्गत मैंने हंस:योग के बारे में अपनी क्षमतानुसार सब कुछ लिखा था। जो नहीं लिखा गया, वह मेरी क्षमता से परे था। जिन श्रद्धालुओं की रुचि हो वे उस पोस्ट का अवलोकन कर सकते हैं।
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हठयोग एक अलग विषय है। जिनकी रुचि हठयोग में है वे निम्न तीन प्रामाणिक ग्रन्थों का स्वाध्याय कर लें -- "घेरण्ड संहिता", "हठयोग प्रदीपिका", और "शिव-संहिता"। ये तीनों प्रामाणिक ग्रंथ हैं। इनको आधार बनाकर सैंकड़ों लेखकों ने हजारों पुस्तकें लिखी हैं। हठयोग और तंत्रयोग दोनों ही नाथ संप्रदाय की देन हैं। हठयोग और तंत्रविद्या दोनों ही लुप्त हो गये थे, कालांतर में नाथ संप्रदाय के योगियों ने उन्हें ढूंढ़ निकाला। इसके लिए उनकी परंपरा को नमन करता हूँ।
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और भी कई बातें हैं जिन्हें लिखा नहीं जा सकता। इस समय और कुछ लिखने की क्षमता भी मुझ में नहीं है, अतः इस लेख का यहीं समापन कर रहा हूँ।
हरिः ॐ तत् सत्॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ स्वस्ति॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
६ मार्च २०२६

परमात्मा के जिस भी रूप का ध्यान हम करते हैं, वही हम स्वयं बन जाते हैं।

  परमात्मा के जिस भी रूप का ध्यान हम करते हैं, वही हम स्वयं बन जाते हैं।

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निरंतर परमात्मा की चेतना में रहें। उन्हें एक क्षण के लिए भी न भूलें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही उनका स्मरण आरंभ कर दें।
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
"यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥८:६॥"
अर्थात् -- हे कौन्तेय ! (यह जीव) अन्तकाल में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदैव उस भाव के चिन्तन के फलस्वरूप उसी भाव को ही प्राप्त होता है।।
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥" (गीता)
अर्थात् — इसलिए तू सब समय में मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा।
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥"
अर्थात् -- सब (इन्द्रियों के) द्वारों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित हुआ॥
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
अर्थात् -- जो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है॥
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
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गुरु तत्व, आत्म-तत्व, और परमात्मा एक हैं। इनमें कोई भेद नहीं है। हम स्वयं को परमात्मा से पृथक मानते हैं, तो पृथक हैं, एक मानते हैं तो एक हैं। वास्तव में स्वयं में, गुरु में और परमात्मा में कोई भेद नहीं होता। हम परमात्मा के जिस भी रूप का ध्यान करते हैं, वही बन जाते हैं।
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गीता के पंद्रहवें अध्याय का प्रथम श्लोक ही यदि समझ में या जाए तो सारी दुविधा दूर हो जाती है --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
अर्थात् -- श्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है॥
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावक:।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
अर्थात् -- उसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है।।
श्रुति भगवती भी कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥" (मुंडक व कठोपनिषद)
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यह संसार रूपी वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है। काल की अपेक्षा भी सूक्ष्म, सबका कारण, नित्य और महान् होने के कारण अव्यक्त माया-शक्ति युक्त ब्रह्म सबसे ऊँचा कहा जाता है। वही इसका मूल है। भगवान की कृपा से ही यह समझा जा सकता है।
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हारिये न हिम्मत, बिसारिए न हरिःनाम। जितना भी सामर्थ्य है, उसी के अनुसार लगे रहो। चाहे संसार छूट जाए, लेकिन भगवान न छूटें। अभी से आरंभ कर अंत समय तक भगवान की चेतना में लगे रहो।
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कीटक नाम का एक साधारण सा कीड़ा भँवरे से डर कर कमल के फूल में छिप जाता है। भँवरे का ध्यान करते करते वह स्वयं भी भँवरा बन जाता है। वैसे ही हम भी निरंतर परमशिव का ध्यान करते करते स्वयं परमशिव बन सकते हैं। भगवान के लिये एक बेचैनी, तड़प और घनीभूत प्यास बनाए रखें।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
११ मार्च २०२६

सर्वव्यापी सर्वस्व आत्मा का नित्य नियमित ध्यान हमें परमब्रह्म परमात्मा में स्थित कर देता है --[-

 सर्वव्यापी सर्वस्व आत्मा का नित्य नियमित ध्यान हमें परमब्रह्म परमात्मा में स्थित कर देता है। तब हम पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म से भी क्रमशः ऊपर उठ जाते हैं। ये पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म भी अंततः एक बंधन हैं। इनसे मुक्त तो हमें होना ही होगा।

मूलाधार से सहस्त्रार तक व उससे भी ऊपर प्रवाहित हो रहा प्राण-प्रवाह -- कुंडलिनी महाशक्ति है। अंततः ध्यान भी ऊर्ध्वमूलस्थ परमशिव का ही होता है। एक दिन हम पायेंगे कि जिसे हम ढूंढ रहे थे वे तो हम स्वयं हैं। सारा मार्गदर्शन गुरु रूप में शिव ही करते हैं। वे ही दक्षिणामूर्ति हैं और वे ही वासुदेव श्रीकृष्ण हैं। सभी को मंगलमय शुभकामनाएँ और नमन॥
कृपा शंकर
१२ मार्च २०२६