जो लोग भ्रष्टाचार से अनाप-शनाप अथाह रुपया बनाते हैं, क्या वे उसे अपने जीवन काल में खर्च कर सकते हैं? इन्द्रीय भोगों की भी एक सीमा होती है, पेट भी एक सीमा से अधिक नहीं खा सकता, कपड़े भी कितने पहिनेंगे? वह धन हड़प कर दूसरे लोग ही खायेंगे|
योगोदय (Yogodaya)
स्वयं के आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति ही इस ब्लॉग का एकमात्र उद्देश्य है |
Monday, 16 March 2026
जो लोग भ्रष्टाचार से अनाप-शनाप अथाह रुपया बनाते हैं, क्या वे उसे अपने जीवन काल में खर्च कर सकते हैं?
उपासना ---
भगवान स्वयं ही यह सारी ज्योतिर्मय सृष्टि बन गए हैं। उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है। उनकी प्रकृति अपने नियमानुसार इस सृष्टि का संचालन कर रही है। हमारा सुषुम्ना-पथ सदा ज्योतिर्मय रहे।
जहां तक आध्यात्मिक साधनाओं का प्रश्न है, मुझे किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है।
जहां तक आध्यात्मिक साधनाओं का प्रश्न है, मुझे किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है। जितनी मेरी यह सीमित और अल्प बुद्धि समझ सकती है, वहाँ तक पूरी संतुष्टि है। कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग-साधना है। परमशिव और कुंडलिनी दोनों की ही पर्याप्त निजानुभूतियाँ हैं, किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है। परमात्मा से पूरा मार्गदर्शन प्राप्त हैं। अतः इस विषय पर किसी भी तरह की चर्चाओं का समापन कर रहा हूँ। फेसबुक पर ईश्वर प्रेरणा से आध्यात्मिक विषयों पर साढ़े चार हजार (4500) से अधिक पोस्ट यानि लेख लिख चुका हूँ। अब और लिखने की आवश्यकता नहीं है। जब तक इस शरीर में प्राण-प्रवाह है तब तक चेतना परमशिव में ही रहेगी। जो परमशिव हैं, वे ही गीता के पुरुषोत्तम हैं, और वे ही वेदान्त के ब्रह्म है। मेरा संपर्क बहुत ही सीमित साधकों से रहेगा। आप सब में परमात्मा को नमन।
जहां तक मेरी बुद्धि काम करती है, शिव का ध्यान ही श्रीहरिः का ध्यान है ---
जहां तक मेरी बुद्धि काम करती है, शिव का ध्यान ही श्रीहरिः का ध्यान है ---
तस्माद्योगी भवार्जुन --- .
तस्माद्योगी भवार्जुन ---
परमात्मा के जिस भी रूप का ध्यान हम करते हैं, वही हम स्वयं बन जाते हैं।
परमात्मा के जिस भी रूप का ध्यान हम करते हैं, वही हम स्वयं बन जाते हैं।
सर्वव्यापी सर्वस्व आत्मा का नित्य नियमित ध्यान हमें परमब्रह्म परमात्मा में स्थित कर देता है --[-
सर्वव्यापी सर्वस्व आत्मा का नित्य नियमित ध्यान हमें परमब्रह्म परमात्मा में स्थित कर देता है। तब हम पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म से भी क्रमशः ऊपर उठ जाते हैं। ये पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म भी अंततः एक बंधन हैं। इनसे मुक्त तो हमें होना ही होगा।