Tuesday, 14 July 2026

मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, और मेरे एकमात्र मित्र वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं। वे ही सब रूपों में आये, वे ही सर्वस्व यह सम्पूर्ण विश्व हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही गोविंद हैं, और वे ही यह "मैं" बने हुए हैं।

मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, और मेरे एकमात्र मित्र वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं। वे ही सब रूपों में आये, वे ही सर्वस्व यह सम्पूर्ण विश्व हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही गोविंद हैं, और वे ही यह "मैं" बने हुए हैं।

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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
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यह सम्पूर्ण विश्व (सृष्टि) भगवान विष्णु हैं। जिनका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है, उन्हें वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है।
"ॐ विश्वं विष्णु:" --- बस इतना ही पर्याप्त है पुरुषोत्तम के गहनतम ध्यान में जाने के लिए॥ जो विष्णु हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं॥
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मैं प्रत्यगात्मा उन्हीं से निःसृत और उन्हीं से उद्भूत/उद्भासित हूँ। मेरी नियति भी उन्हीं में विलीन होना है। इस संसार में मैं एक शाश्वत आत्मा हूँ, जिसका स्वधर्म परमात्मा से परमप्रेम और परमात्मा को पूर्ण समर्पण है। यही मेरी पहिचान है। मेरा धर्म सनातन है, जिस से यह सम्पूर्ण सृष्टि संचालित है। मैं अपना सम्पूर्ण अंतःकरण और अस्तित्व वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित करता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०२४
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जब भी समय मिले, अविच्छिन्न/अनन्य भाव से आप परमात्मा का ध्यान कीजिये, आप मुझे सदा अपने साथ ही पाओगे। मैं आपसे पृथक नहीं हूँ। परमात्मा में मैं आपके साथ एक हूँ। जब भी आप मुझे याद करोगे, मुझे वहीं अपने साथ पाओगे॥ ॐ ॐ ॐ !!

सब पीड़ाओं, दुःखों और कष्टों का स्वागत है; उनके आगमन से अब कोई परेशानी नहीं होती ---

 सब पीड़ाओं, दुःखों और कष्टों का स्वागत है; उनके आगमन से अब कोई परेशानी नहीं होती ---

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संत तुलसीदासजी ने लिखा है ---
"'कह हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई, जब तब सुमिरन भजन न होई।"
हनुमान जी महाराज भगवान श्रीराम को कहते हैं कि -- "हे प्रभु, जीवन में विपत्ति ही तब आती है, जब आपका भजन और सुमिरन नहीं होता है।"
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जिस दिन भगवान का भजन नहीं होता, उस दिन बड़ी भयंकर असह्य पीड़ा होती है, जो भगवान के भजन से ही दूर होती है। उस समय ऐसा लगता है जैसे मैं इस पृथ्वी पर एक पशु की तरह चरते हुए व्यर्थ ही यह जीवन नष्ट कर रहा हूँ। मेरे लिये तो इस संसार में सबसे बड़ा कष्ट ही भगवान का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान का नहीं होना है। अतः सब ओर से मन को हटाकर भगवान में ही लगाना पड़ेगा। स्वयं भगवान का भी यही निर्देश है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं ---
"सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६:२४॥"
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६:२५॥"
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
अर्थात् --
"संकल्प से उत्पन्न समस्त कामनाओं को नि:शेष रूप से परित्याग कर मन के द्वारा इन्द्रिय समुदाय को सब ओर से सम्यक् प्रकार वश में करके॥"
"शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥"
"यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे॥"
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समस्त कामनाओं से मुक्त हो कर धैर्ययुक्त बुद्धि से धीरे धीरे मन को सर्वव्यापी आत्मा में स्थित कर के अन्य किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे। यह योग की परम श्रेष्ठ विधि है। इस प्रकार योगाभ्यास के बल से योगी का मन आत्मा में ही शान्त हो जाता है। उपनिषदों की सहायता से इसे बहुत अच्छी तरह से समझाया जा सकता है। यह साधक की पात्रता पर निर्भर है कि वह कितना समझ सकता है। अतः किसी भी साधक को एक बार तो किन्हीं ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य से व्यक्तिगत मार्गदर्शन लेना ही पड़ेगा। "मूमुक्षुत्व और फलार्थित्व" -- दोनों साथ साथ नहीं चल सकते। जब मुमुक्षुत्व जागृत होता है तब शनैः शनैः कर्ताभाव और सब कामनाएँ नष्ट होने लगती हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०२४

Monday, 13 July 2026

कूटस्थ चैतन्य ..... (बहुत पुराना लेख)

 कूटस्थ चैतन्य ..... (बहुत पुराना लेख)

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"कूटस्थ" शब्द का प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में किया है| "कूटस्थ" को अविनाशी 'परम अव्यक्त' भी कह सकते हैं| वह जो सर्वत्र है, जिसने सर्वस्व का निर्माण किया है, पर कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं है, वह "कूटस्थ" है| उसकी चेतना "कूटस्थ चैतन्य" है| एक लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर "कूटस्थ" का नहीं| योग साधक, ध्यान में दिखाई देने वाले सर्वव्यापक विराट अनंत ज्योतिर्मय ब्रह्म और अनाहत नाद को "कूटस्थ" कहते हैं| जब ज्योतिर्मय चेतना सर्वव्यापक हो जाती है वह "कूटस्थ चैतन्य" कहलाती है| "कूटस्थ चैतन्य" में हम सदा परमात्मा के साथ हैं|
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शिवनेत्र होकर (बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीपतम लाकर भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर) अजपा-जप करते हुए साथ साथ प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का चिंतन करते रहें| विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होगी| ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में रहें| यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता| एक लघुत्तम जीवाणु से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता| यही "कूटस्थ" है, और इसकी चेतना ही "कूटस्थ चैतन्य" है| यह योगमार्ग की उच्चतम साधनाओं/उपलब्धियों में से है|
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आज्ञाचक्र योगी का ह्रदय है, भौतिक देह वाला ह्रदय नहीं| आरम्भ में ज्योति के दर्शन आज्ञाचक्र से थोड़ा सा ऊपर होते हैं, वह स्थान कूटस्थ बिंदु है| आज्ञाचक्र का स्थान Medulla Oblongata यानि मेरुशीर्ष के ऊपर खोपड़ी के मध्य में पीछे की ओर है| यही जीवात्मा का निवास है|
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यदि प्रभु के प्रति परमप्रेम, श्रद्धा-विश्वास और निष्ठा होगी तब निश्चित रूप से मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा, सहायता भी मिलेगी और रक्षा भी होगी| आवश्यकता है एक गहनतम अभीप्सा और परमप्रेम की|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०१९

ब्रह्मचर्य ---

 ब्रह्मचर्य

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ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म यानि परमात्मा का सा आचरण, ब्र्ह्मचैतन्य में स्थिति, और हर उस कर्म से विमुखता जो ब्रह्म यानि परमात्मा से दूर करता है| यह योगदर्शन के पांच यमों में आता है और महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित पञ्च महाव्रतों में आता है जिन्हें पंचशील भी कहते हैं|
ब्रह्मचर्य का व्रत देवों को भी दुर्लभ है| ब्रह्मचर्य की महिमा को यदि मैं श्रुति, स्मृति, पुराणों व महाभारत से उद्धृत करूँ, या जैन साहित्य से उद्धृत करना आरम्भ करूँ तो इस लेख को कभी भी समाप्त नहीं कर पाऊँगा|
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प्राचीन काल में जब गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था, तब वीर, योद्धा, ज्ञानी व तपस्वी लोग होते थे, आज की तरह की घटिया मनुष्यता नहीं| जैसे दीपक का तेल-बत्ती के द्वारा ऊपर चढक़र प्रकाश के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का ओज सुषुम्रा नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान-दीप्ति में परिणित हो जाता है|
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इस विषय पर अधिक नहीं लिखना चाहता क्योंकि इस विषय पर बहुत अधिक साहित्य और मार्गदर्शन उपलब्ध है| अपने खान-पान में, संगति में, अध्ययन में और वातावरण के प्रति सजग रहें| ऐसे कोई विचार न आने दें जिनसे ब्रह्मचर्य भंग हो| जो आध्यात्मिक साधक हैं, उन्हें इस विषय पर पर्याप्त मार्गदर्शन उपलब्ध है| उन्हें ऐसे लेखों की आवश्यकता नहीं है|
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सभी को शुभ कामनाएँ !
१३ जुलाई २०१९

परमशिव

 परमशिव...

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यह शब्द "परमशिव" मुझे अत्यधिक प्रिय है, पता नहीं क्यों? परमात्मा के लिए मैं या तो गीता के "वासुदेव" (समान रूप से सर्वत्र व्याप्त) शब्द का प्रयोग करता हूँ, या तंत्र और शैवागमों के शब्द "परमशिव" का| तत्वरूप में दोनों एक ही हैं, केवल शाब्दिक अर्थ पृथक-पृथक हैं| परमशिव का शाब्दिक अर्थ होता है ..... परम कल्याणकारी| परमशिव एक अनुभूति है जो तब होती है जब हमारे प्राणों की गहनतम चेतना (जिसे तंत्र में कुण्डलिनी महाशक्ति कहते हैं) सहस्त्रार चक्र और ब्रह्मरंध्र का भी भेदन कर परमात्मा की अनंतता में और उससे भी परे विचरण कर बापस लौट आती है| परमात्मा की वह अनंतता ही "परमशिव" है, जिसका ध्यान परम कल्याणकारी है| यह मुझ बुद्धिहीन अकिंचन को गुरुकृपा से ही समझ में आया है| गुरु के उपदेश और आदेश से ध्यान भी उस अनंतता का ही होता है, जो "परमशिव" है|
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परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति पर ही हमें पूरा ध्यान देना चाहिए| शास्त्र हमें दिशा और प्रेरणा देते हैं पर अनुभूति तो उपासना में "परमशिव" की परमकृपा से ही होती है| उनकी परमकृपा होने पर सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है| "परमशिव" शब्द का प्रयोग तंत्रागमों में तो आचार्य शंकर ने "सौन्दर्य लहरी" ग्रंथ में, और शैवागमों में कश्मीर शैव दर्शन के आचार्य अभिनवगुप्त ने प्रत्यभिज्ञा दर्शन में किया है|
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स्वनामधन्य आचार्य शंकर अपने ग्रंथ "सौंदर्य लहरी" में लिखते हैं ...
"सुधा सिन्धोर्मध्ये सुरविटपवाटी परिवृते, मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणि गृहे|
शिवाकारे मञ्चे परमशिव पर्यङ्क निलयम्, भजन्ति त्वां धन्यां कतिचन चिदानन्द लहरीम्||"
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प्रख्यात वैदिक विद्वान श्री अरुण उपाध्याय के अनुसार अनाहत चक्र में कल्पवृक्ष के नीचे शिव रूपी मञ्च है| उसका पर्यङ्क परमशिव है| आकाश में सूर्य से पृथ्वी तक रुद्र, शनि कक्षा (१००० सूर्य व्यास तक सहस्राक्ष) तक शिव, उसके बाद १ लाख व्यास दूर तक शिवतर, सौर मण्डल की सीमा तक शिवतम है| आकाशगंगा में सदाशिव तथा उसके बाहर विश्व का स्रोत परमशिव है जिसने सृष्टि के लिये सङ्कल्प किया|
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एक शब्द "सदाशिव" है जिसका शाब्दिक अर्थ तो है सदा कल्याणकारी और नित्य मंगलमय| पर यह भी एक अनुभूति है जो विशुद्धि चक्र के भेदन के पश्चात होती है| ऐसे ही एक "रूद्र" शब्द है जिस में ‘रु’ का अर्थ है .... दुःख, तथा ‘द्र’ का अर्थ है .... द्रवित करना या हटाना| दुःख को हरने वाला रूद्र है| दुःख का भी शाब्दिक अर्थ है .... 'दुः' यानि दूरी, 'ख' यानि आकाश तत्व रूपी परमात्मा| परमात्मा से दूरी ही दुःख है और समीपता ही सुख है| रुद्र भी एक अनुभूति है जो ध्यान में गुरुकृपा से ही होती है|
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हमारे स्वनामधन्य महान आचार्यों को ध्यान में जो प्रत्यक्ष अनुभूतियाँ हुईं उनके आधार पर ही उन्होंने गहन दर्शन शास्त्रों की रचना की| हमारा जीवन अति अल्प है, पता नहीं कौन सी सांस अंतिम हो, अतः अपने हृदय के परमप्रेम को जागृत कर यथासंभव अधिक से अधिक समय परमात्मा के ध्यान में ही व्यतीत करना चाहिए| वे जो ज्ञान करा दें वह ही ठीक है, और जो न कराएँ वह भी ठीक है| उन परमात्मा को ही मैं 'परमशिव' के नाम से ही संबोधित करता हूँ ..... यही परमशिव शब्द का रहस्य है| उन परमशिव का भौतिक स्वरूप ही शिवलिंग है जिसमें सब का लीन यानि विलय हो जाता है, जिस में सब समाहित है|
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अंत में जगत्गुरु भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को नमन करता हूँ जिन से बड़ा गुरु कोई अन्य नहीं है| उन का कथन है ...
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते| वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
गुरु महाराज को नमन, जिनकी कृपा से मेरे जैसा अकिंचन बुद्धिहीन भी शास्त्रों की चर्चा करने लगता है| ॐ तत्सत्||
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२०

(प्रश्न १) भवसागर क्या है? (प्रश्न 2) भवसागर को कैसे पार करें? ---

 (प्रश्न १) भवसागर क्या है? (प्रश्न 2) भवसागर को कैसे पार करें? --- .

(उत्तर १) भवसागर क्या है? :-- भव-सागर को इस उदाहरण से समझ सकते हैं -- हम खाते क्यों हैं? -- कमाने के लिए, और कमाते क्यों हैं? -- खाने के लिए। यह चक्र कभी समाप्त नहीं होता। यही भवसागर का एक छोटा सा रूप है। इस संसार से सुख की आशा ही हमें इस भवसागर में फँसाए रखती है, जो कभी किसी को नहीं मिलता। यह एक मृगतृष्णा है। हमारी कामनाएँ और वासनाएँ ही इस तृष्णा रूपी भवसागर का निर्माण करती हैं।
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कामनाओं ओर वासनाओं से मुक्त होना ही भवसागर को पार करना है। और भी स्पष्ट शब्दों में संसार की निःसारता को समझ कर, विषय-वासनाओं को त्याग कर परमात्मा के प्रेम में मग्न हो जाना ही -- भवसागर को पार करना है।
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(उत्तर २) भवसागर को कैसे पार करें? :-- श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में संत तुलसीदास जी ने भवसागर को पार करने की जो विधि भगवान श्रीराम के मुख से कहलवाई है, वह समझने में सबसे अधिक सरल है --
चौपाई :--
"नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।"
दोहा/सोरठा :--
"जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥"
इसका सार यह कि यह मनुष्य शरीर इस भवसागर को पार करने के लिए भगवान द्वारा दी हुई एक नौका है। सन्मुख वायु -- भगवान का अनुग्रह है। इस नौका के कर्णधार सदगुरु हैं। जो इस नौका को पाकर भी भवसागर को न तरे, उस से बड़ा अभागा अन्य कोई नहीं है।
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भवसागर पार करने का एक पंक्ति का सूत्र -- "सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो"।
गुरु तो स्वयं भगवान हैं, उन्हें कर्ता बनाओ, और सन्मुख मरुत यानि सामने जो ये सांसें चल रही हैं, उनसे निरंतर अजपा-जप करो। अजपा-जप क्या है? --
"सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आत्म अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥"
भावार्थ - 'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखंड (तैलधारावत कभी न टूटने वाली) वृत्ति है, वही (उस ज्ञानदीपक की) परम प्रचंड दीपशिखा (लौ) है। (इस प्रकार) जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है,॥
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सार की बात -- अपने परमात्व-तत्व में स्थिति ही भवसागर को पार करना है। यदि मेरी बात समझ में नहीं आई है तो किसी उच्च कोटि के संत-महात्मा के समक्ष बैठकर बड़ी विनम्रता से उनसे ज्ञान प्राप्त करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२१

मेरी एक अदम्य वासना ---

 मेरी एक अदम्य वासना ---

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यदि चेतन/अवचेतन मन में कोई अति गहन अदम्य वासना हो तो उसे व्यक्त करने में कोई बुराई नहीं है। हो सकता है कि व्यक्त करने से उस वासना का वेग कम हो जाए, चाहे वह विषय-वासना हो या वेदान्त-वासना। वासना और अभीप्सा में अंतर इतना ही है कि वासना का जन्म मन में होता है और अभीप्सा का जन्म आत्मा में। लेकिन जब कोई वासना मन के साथ-साथ आत्मा में भी हो तब वह अदम्य हो जाती है।
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इस छल-कपट और असत्य से भरे विश्व में अब और अधिक जीने की इच्छा नहीं रही है। वासना यही है कि जब यह शरीर शांत हो, उस समय निर्विकल्प समाधि की अवस्था हो, और कहीं भी किसी भी लोक में पुनर्जन्म हो तो एक जीवन-मुक्त के रूप में हो जिसमें जन्म से ही ज्ञान, भक्ति व वैराग्य की पूर्णता हो। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी वासना नहीं है।
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किसी को उलाहना भी नहीं दे सकते और, शिकायत भी नहीं कर सकते, क्योंकि सारा विश्व तो विष्णु ही है। भगवान विष्णु ही स्वयं को ही इस विश्व के रूप में व्यक्त कर रहे हैं। सारी वासनाएं और अभीप्सा व अभीष्ट भी वे ही हैं। उनसे प्रेम तो है, लेकिन कोई अपेक्षा नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२२
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