स्वामी असीमानंद जी एक त्यागी तपस्वी सन्यासी हैं जिनके प्रयासों से गुजरात व महाराष्ट्र के वनवासी क्षेत्रों में ईसाईयों द्वारा किये जा रहे धर्मांतरण का धंधा प्रायः बंद हो गया था| उन्होंने वनवासी क्षेत्रों के हिन्दुओं में स्वाभिमान जगाया और उन में एक चेतना जागृत की कि वे माता शबरी के वंशज हैं जिनकी कुटिया में स्वयं भगवान श्रीराम आये थे| उन्होंने गुजरात के डांग क्षेत्र में शबरी कुम्भ का वार्षिक आयोजन आरम्भ किया| उनका यह कार्य तत्कालीन केंद्र सरकार से सहन नहीं हुआ जो भारत से हिंदुत्व को ही समाप्त करना चाहती थी| तत्कालीन भारत सरकार हिन्दू साधू-संतों को आतंकवादी घोषित कर के उन्हें बदनाम करना चाहती थी, इसलिए भगवा आतंकवाद शब्द रचित किया गया और स्वामी असीमानंद जी, साध्वी प्रज्ञा जैसे अनेक संतों को बंदी बना लिया गया| उन पर अनेक झूठे आरोप लगाए गए, उन्हें बड़ी भयंकर अमानवीय यातनाएँ दी गयी| बारह वर्षों तक उनके विरुद्ध मीडिया ट्रायल चलाया गया और बहुत अधिक दुष्प्रचार किया गया| बारह-तेरह वर्षों तक की अमानवीय यातना सहने के बाद वे अब दोषमुक्त हुए हैं| यह सत्य सनातन धर्म की जय है| धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो| क्या उनके खराब हुए समय को लौटाया जा सकता है? जिन लोगों ने उनके विरुद्ध षडयंत्र रचा और जिन लोगों ने उन्हें यातनाएं दीं, क्या उन्हें कभी दण्डित किया जाएगा?
योगोदय (Yogodaya)
स्वयं के आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति ही इस ब्लॉग का एकमात्र उद्देश्य है |
Friday, 20 March 2026
जीवन में 'धर्म' तभी साकार हो सकता है जब हमारे हृदय में परमात्मा हो ---
जीवन में 'धर्म' तभी साकार हो सकता है जब हमारे हृदय में परमात्मा हो।
Wednesday, 18 March 2026
मोहनदास करमचंद गाँधी की पुण्यतिथि ---
मोहनदास करमचंद गाँधी की पुण्यतिथि पर मैं गांधी को और पुणे व पुणे के आसपास के उन छः हज़ार से अधिक निर्दोष ब्राह्मणों को श्रद्धांजलि देता हूँ, जिनकी हत्या गाँधीवध की प्रतिक्रया स्वरुप अगले तीन दिनों में कर दी गयी थीं। पुणे की गलियों में चारपाई डालकर सो रहे निर्दोष ब्राह्मणों पर किरोसिन तेल डालकर उन्हें जीवित जला दिया गया। पुणे में ब्राह्मणों को घरों से निकाल निकाल कर सड़कों पर घसीट घसीट कर उनकी सामूहिक हत्याएँ की गईं। उस घटना की कोई जाँच नहीं हुई और घटना को दबा दिया गया। उन ब्राह्मणों का दोष इतना ही था कि नाथूराम गोड़से एक ब्राह्मण थे, और वह भी पुणे के।
राष्ट्र की वर्तमान दशा में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं? हमारी जाति और धर्म क्या है?
राष्ट्र की वर्तमान दशा में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं? हमारी जाति और धर्म क्या है?
(१) समाज में "वर्ग-संघर्ष" नहीं, "वर्ग-सहयोग", "सामाजिक-समरसता" और "देशभक्ति" की भावना प्रबलतम होनी चाहिये। (२) भारत में जनतंत्र के स्थान पर राजतन्त्र की स्थापना हो सकती है।
(१) समाज में "वर्ग-संघर्ष" नहीं, "वर्ग-सहयोग", "सामाजिक-समरसता" और "देशभक्ति" की भावना प्रबलतम होनी चाहिये।
परमात्मा में निरंतर रमण करते हुए हम परमात्मा में ही स्थित हों ---
परमात्मा में निरंतर रमण करते हुए हम परमात्मा में ही स्थित हों ---
"निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन्" ---
उपासना में हम कर्ताभाव से मुक्त होकर एक साक्षीमात्र बनें। साधना तो जगन्माता स्वयं करती हैं और सारे कर्मफल परमशिव को अर्पित करती हैं। एकमात्र कर्ता वे स्वयं हैं। हम तो एक निमित्त मात्र हैं। दूसरे शब्दों में महाकाली सारी साधना स्वयं करते हुए सारे कर्मफल श्रीकृष्ण को अर्पित करती हैं।