Thursday, 19 February 2026

ॐ तत् सत् ....

 ॐ तत् सत् ....

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भगवान से प्रार्थना करते हुए मैं आशा करता हूँ कि जिस विषय पर लिखने की मुझे अन्तःप्रेरणा मिली है, उसे व्यक्त कर पाऊँगा| यह मेरी एक अनुभूति है कि आत्म-तत्व, परमात्म-तत्व और गुरु-तत्व ... सब एक ही हैं, एक विशिष्ट स्तर पर इनमें कोई भेद नहीं है| आरम्भ में ये सब पृथक पृथक लगते हैं, पर जैसे जैसे ध्यान साधना की गहराई बढ़ती जाती है, इनमें कोई भेद नहीं रहता| सामान्य चेतना में मेरे गुरु मुझसे पृथक हैं. पर ध्यान की गहराई में वे मेरे साथ एक हैं| ऐसे ही सामान्य चेतना में भगवान मुझसे अलग हैं, पर ध्यान की गहराई में वे मेरे साथ एक हैं| कहीं पर भी कोई भेद नहीं रहता|
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अपनी बात को आधार देने के लिए मैं गीता का सहारा लेना चाहता हूँ| गीता में परमात्मा को "ॐ तत् सत्" इन तीन नामों से निर्देशित किया गया है|
"तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः| ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा||१७:२३||
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्| यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्||८:१३||"
"तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः| प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌||१७:२४||"
तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः| दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः||१७:२५||
सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते| प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते||१७:२६||
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते| कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते||१७:२७||
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌| असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह||१७:२८||
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"ॐ" "तत्" और "सत्" एक ही हैं पर इनकी अभिव्यक्ति पृथक पृथक है| हिन्दुओं के "ॐ तत् सत्" की नकल कर के ही ईसाईयत में "Father" "Son" and the "Holy Ghost" शब्दों का प्रयोग किया गया है| ये तीनों एक हैं पर इनकी भी अभिव्यक्ति अलग अलग हैं|
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संभवतः मैं अपने भावों को व्यक्त करने में कुछ कुछ अल्प मात्रा में सफल रहा हूँ| परमात्मा स्वयं ही विभिन्न आत्माओं के रूप में लीला करते हैं| स्वयं ही अपनी लीला में अज्ञान में गिरते हैं, और स्वयं ही गुरु रूप में स्वयं को ही मुक्त करने आते है, और स्वयं ही मुक्त होते हैं| गुरु भी वे ही हैं और शिष्य भी वे ही हैं| उनके अतिरिक्त अन्य किसी का कोई अस्तित्व नहीं है|
और भी स्पष्ट शब्दों में "आत्मा नित्यमुक्त है, सारे बंधन एक भ्रम हैं|"
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ फरवरी २०१९

Tuesday, 17 February 2026

भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। हम अपनी आध्यात्मिक साधना परमात्मा को पूरी तरह समर्पित करने के लिए ही करते हैं। इससे धर्म और राष्ट्र की रक्षा स्वतः ही होती है। यह हमारा सर्वोपरी कर्तव्य और स्वधर्म है। .

 भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। हम अपनी आध्यात्मिक साधना परमात्मा को पूरी तरह समर्पित करने के लिए ही करते हैं। इससे धर्म और राष्ट्र की रक्षा स्वतः ही होती है। यह हमारा सर्वोपरी कर्तव्य और स्वधर्म है।

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अनेक महान आत्माएँ भारत में जन्म लेना चाहती हैं, लेकिन उन्हें सही माता-पिता नहीं मिलते, जिनके यहाँ वे गर्भस्थ हो सकें। युवाओं को इस योग्य होना पड़ेगा कि वे महान आत्माओं को जन्म दे सकें। अनेक महान आत्माएँ भारत में जन्म लेंगी और भारत का उद्धार करेंगी। उसके लिए यह सर्वोपरि आवश्यक है कि हमारा जीवन परमात्मा को पूर्णतः समर्पित हो। इस विषय पर मैं पहले भी अनेक बार लिख चुका हूँ। इसी क्षण से हम परमात्मा के साथ एक हों।
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परमात्मा हैं, इसी समय, हर समय, यहीं पर और सर्वत्र हैं। हम निःस्पृह, वीतराग व स्थितप्रज्ञ होकर ब्राह्मी-स्थिति में निरंतर बने रहें। हम उनके साथ एक हैं। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ फरवरी २०२५

अजपा जप, हंसयोग, हँसवती ऋक ---

 (जिनकी आस्था हो वे ही मेरे लेखों को पढ़ें, अन्य सब इन्हें गल्प मानकर इन की उपेक्षा कर दें, व अपने अमूल्य समय को नष्ट न करें)

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अजपा-जप :--- यह ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान है। वेदों में इसका नाम हंसवती ऋक है, योग-शास्त्रों में यह हंसयोग है, और सामान्य बोलचाल की भाषा में अजपा-जप कहलाता है। हंस नाम परमात्मा का है। कम से कम शब्दों का प्रयोग यहाँ इस लेख में मैं कर रहा हूँ।
प्रातःकाल उठते ही लघुशंकादि से निवृत होकर, रात्रि में शयन से पूर्व, और दिन में जब भी समय मिले, ध्यान के आसन पर सीधे बैठ जाएँ, मेरूदण्ड उन्नत, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, दृष्टिपथ भ्रूमध्य में से अनंत की ओर, व मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रखें। भ्रूमध्य में उन्नत साधकों को एक ब्रह्मज्योति यानि ज्योतिर्मय ब्रह्म के दर्शन होंगे। जिन्हें ज्योति के दर्शन नहीं होते, वे आभास करें कि वहाँ एक परम उज्ज्वल श्वेत ज्योति है। उस ज्योति का विस्तार सारे ब्रह्मांड में कर दें। सारी सृष्टि उस ज्योति में समाहित है, और वह ज्योति सारी सृष्टि में है। वह शाश्वत ज्योति आप स्वयं हैं, यह नश्वर भौतिक देह नहीं।
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अपनी सर्वव्यापकता का ध्यान कीजिये। आप यह शरीर नहीं, वह परम ज्योति हैं। सारा ब्रह्मांड आपके साथ सांसें ले रहा है। जब सांस अंदर जाती है तब मानसिक रूप से सो SSSSSSS का जाप कीजिये। जाव सांस बाहर जाती है तब हं SSSSS का जाप कीजिये।
यह जप आप नहीं, सारी सृष्टि और स्वयं परमात्मा कर रहे हैं। इस साधना का विस्तार ही शिवयोग और विहंगमयोग है। यह साधना ही विस्तृत होकर नादानुसंधान बन जाती है। क्रियायोग में प्रवेश से पूर्व भी इसका अभ्यास अनिवार्य है, नहीं तो कुछ भी समझ में नहीं आयेगा। पुनश्च: कहता हूँ कि "हंस" नाम परमात्मा का है।
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यह लेख केवल परिचयात्मक है। इस अजपा-जप साधना का अभ्यास अन्य कुछ साधनाओं के साथ समर्पित भाव से मैं तो सन १९७९ ई. से कर रहा हूँ। इसका वर्णन अनेक ग्रन्थों में है जिनका स्वाध्याय मैंने किया है। , लेकिन सबसे अधिक स्पष्ट "तपोभूमि नर्मदा" नामक पुस्तक के पांचवें खंड के मध्य में है। वहाँ इसे अति विस्तार से समझाया गया है। गूगल पर ढूँढने से यह पुस्तक मिल जाएगी। यह खंड मैंने गत वर्ष ही पढ़ा था। फिर भी किसी अनुभवी ब्रहमनिष्ठ आचार्य से मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त करें। यह साधना ब्रह्मांड के द्वार साधक के लिए खोल देती है। इस लेख में जो लिखा है वह केवल परिचय मात्र है।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ फरवरी २०२५
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पुनश्च: -- कुछ गुरु-परम्पराओं में हंसबीज "सोहं" के स्थान पर "हंसः" का प्रयोग होता है। दोनों का फल एक ही है। अङ्ग्रेज़ी में इसका अनुवाद होगा -- "I am He"। यह साधना आध्यात्म में प्रवेश करवाती है, और सभी उन्नत साधनाओं का आधार है। कम से कम शब्दों में जो लिखा जा सकता है वह मैंने यहाँ लिखा है। इससे अधिक जानने के लिए ग्रन्थों का स्वाध्याय करना होगा, या किसी ब्रह्मनिष्ठ महात्मा से उपदेश लेने होंगे। ॐ तत्सत् !!

हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य का अंधकार टिक ही न सके --

  हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य का अंधकार टिक ही न सके --

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भगवान भुवन भास्कर जब अपने पथ पर अग्रसर होते हैं तब मार्ग में कहीं भी कैसे भी तिमिर का कोई अवशेष मात्र भी नहीं मिलता| हम भी ब्रह्मतेज से युक्त होकर इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे मार्ग में हमारे समक्ष भी कहीं कोई अन्धकार और असत्य की शक्ति टिक ही न सके| हमारे जीवन का केंद्र बिंदु परमात्मा बने, और परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हम में हो|
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जिन के हृदय में इन्द्रीय सुखों की कामना भरी पडी है वे आध्यात्म के क्षेत्र में न आयें, उन्हें लाभ की बजाय हानि ही होगी| साधना में विक्षेप ही सब से बड़ी बाधा है| विक्षेप उन्हीं को होता है जिनके विचार वासनात्मक होते हैं| जिनके हृदय में वासनात्मक विचार भरे पड़े हैं उन्हें किसी भी तरह की ध्यान साधना नहीं करनी चाहिए अन्यथा लाभ की बजाय हानि ही होगी| वासनात्मक विचारों से भरा ध्यान साधक निश्चित रूप से आसुरी शक्तियों का उपकरण बन जाता है| इसीलिए पतंजलि ने यम-नियमों पर इतना जोर दिया है| गुरु गोरखनाथ तो अपने शिष्यों के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की पात्रता अनिवार्य रखते थे| स्वामी विवेकानंद ने भी ध्यान साधना से पूर्व ब्रह्मचर्य को अनिवार्य बताया है| जिन लोगों का मन वासनाओं से भरा पडा है वे बाहर ही रहें, उन्हें भीतर आने की आवश्यकता नहीं है|
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ॐ तत् सत्॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१८ फरवरी २०१७

यह "मनुवाद" क्या है ? ---

 यह "मनुवाद" क्या है ? --- एक समय था जब साम्यवादी (मार्क्सवादी) लोग किसी को गाली देते तो उसको "प्रतिक्रियावादी", "पूंजीवादी", "फासिस्ट" और "बुर्जुआ" आदि शब्दों से विभूषित करते| ये उनकी बड़ी से बड़ी गालियाँ थीं| किसी की प्रशंसा करते तो उसको "प्रगतिवादी"और 'मानवतावादी" कहते|

फिर समय आया जब कोंग्रेसी लोग किसी को गाली देते तो उसको "साम्प्रदायिक" कहते| किसी की प्रशंसा में उनका सबसे बड़ा शब्द था ... "धर्मनिरपेक्ष"|
भारतीय जनसंघ (वर्तमान भाजपा) वाले जब साम्यवादियों को गाली देते तो "पंचमांगी" कहते, जो उनकी बड़ी से बड़ी गाली थी|
फिर एक शब्द चला ..... "समाजवादी" जिसको कभी कोई परिभाषित नहीं कर पाया| जहाँ तक मुझे याद है इस शब्द को लोकप्रिय डा.राममनोहर लोहिया ने किया था, फिर श्रीमती इंदिरा गाँधी को भी यह अत्यंत प्रिय था, जिन्होंने संविधान संशोधित कर भारत को समाजवादी धर्मनिरपेक्ष देश घोषित कर दिया| आजकल समाजवादी बोलते ही श्री मुलायम सिंह यादव की छवि सामने आती है| फिर और भी कई वाद चले जैसे "राष्ट्रवाद", "बहुजन समाजवाद" आदि|
पर आजकल एक नई गाली और एक नया वाद चला है और वह है ..... "मनुवाद"|
आजकल चाहे "बहुजन समाजवादी" हों या कांग्रेसी हों, किसी की भी बुराई करते हैं तो उसे "मनुवादी" कहते हैं|
मैं मनुस्मृति को पिछले पचास वर्षों से पढ़ता आया हूँ| उस पर लिखे अनेक विद्वानों के भाष्य भी पढ़े हैं| मनुस्मृति भारत में हज़ारों वर्षों तक एक संविधान की तरह रही है| मुझे तो उसमें कहीं कोई बुराई नहीं दिखी| वह तो सृष्टि के आदि से है| हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए अंग्रेजों ने उसमें कई बातें प्रक्षिप्त कर दी थीं| पर उन प्रक्षिप्त अंशों को निकाला जा रहा है| मनु महाराज तो एक क्षत्रिय राजा थे जिन्होंने एक नई सर्वमान्य व्यवस्था दी जो हज़ारों वर्षों से हैं| उसमें कहीं भी कोई जातिवाद या भेदभाव वाली बात नहीं है|
पता नहीं आजकल के इन तथाकथित राजनयिकों को मनुस्मृति का अध्ययन किये बिना ही उसमें क्या "जातिवाद" या "सम्प्रदायवाद" दिखाई दे रहा है जो किसी की निंदा करने के लिए "जातिवादी" "साम्प्रदायिक" और "मनुवादी" कहते हैं|
मंचस्थ विद्वतजनों से निवेदन है कि "मनुवाद" का अर्थ बताने की कृपा करें|
सादर धन्यवाद|
जय श्रीराम जय श्रीराम जय श्रीराम!
१८ फरवरी २०१६

ध्यान साधना से साधक को शांति, संतुष्टि और आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं ---

ध्यान साधना से साधक को शांति, संतुष्टि और आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं| किस तरह के रंग और ध्वनियाँ सुनती हैं इसका बर्णन यौगिक साहित्य में भरा पड़ा है| ये सब आनंददायक होते हैं| साधना में विक्षेप उन्ही साधकों को होता है जिनमें वासनात्मक विचार होते हैं| मेरा तो यह मानना है कि ध्यान उसी को करना चाहिए जिसमें ईश्वर के प्रति प्रेम भरा पडा हो और जो ईश्वर को समर्पित होना चाहते हैं| वासनात्मक विचारों से भरा ध्यान साधक निश्चित रूप से आसुरी शक्तियों का उपकरण बन जाता है| इसीलिए पतंजलि ने यम-नियमों पर इतना जोर दिया है| गुरु गोरखनाथ तो अपने शिष्यों के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की पात्रता अनिवार्य रखते थे| स्वामी विवेकानंद ने भी ध्यान साधना से पूर्व ब्रह्मचर्य को अनिवार्य बताया है| सभी ध्यान साधकों के लिए एक अचूक प्रयोग बता रहा हूँ| पूर्ण प्रभुप्रेम के साथ इसे करने से निश्चित रूप से शीघ्रातिशीघ्र लाभ होगा| शौचादि से निवृत होकर सूर्यनमस्कार और महामुद्रा का अभ्यास कर पंद्रह से बीस बार अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें| फिर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर एक ऊनी कम्बल पर पद्मासन या सिद्धासन या वज्रासन में बैठ जाएँ| गुरु और परमात्मा को नमन कर कुछ देर अजपा-जप का अभ्यास करें इससे मन शांत हो जायेगा| फिर श्वास-प्रश्वास के साथ निम्न बीज मन्त्रों का जाप प्रत्येक चक्र पर करें ----- मूलाधार पर -- "लं", स्वाधिष्ठान -- "वं", मणिपुर -- "रं", अनाहत -- "यं", विशुद्धि -- "हं", आज्ञा -- "ॐ"| जितनी देर तक कर सकें करें| अंत में आज्ञाचक्र पर ही "ॐ" के साथ रुक जाएँ| श्वास-प्रश्वास सामान्य चलने दें| तीन बार योनिमुद्रा का अभ्यास करें| योनिमुद्रा (ज्योतिमुद्रा) करते समय ओम के जाप के साथ आज्ञाचक्र पर तीब्रतम प्रहार करें| फिर जितना कर सकते हैं उतनी देर तक ॐ की ध्वनी को सुनते हुए ध्यान करें| ध्यान के पश्चत कुछ देर तक अपने आसन पर बैठे रहें| तुरंत न उठें| फिर गुरु और परमात्मा को नमन करते हुए सर्वस्व की मंगलकामना के साथ प्रार्थना करते हुए ही अपना आसन छोड़ें| यदि पूर्णप्रेम के साथ उपरोक्त साधना की जाये तो आमूलचूल आपका व्यक्तित्व सकारात्मक रूप से बदलना आरम्भ हो जाएगा| आपके भाव और विचार भी पवित्र हो जायेंगे| भगवन श्री कृष्ण सब गुरुओं के गुरु हैं| उनकी शरण लेने पर आपका कुछ भी अनिष्ट नहीं होगा| जय श्री कृष्ण ! ॐ तत्सत|

कृपा शंकर

१८ फरवरी २०१३

Monday, 16 February 2026

हमारा सारा कार्य भगवान की चेतना में हो, हम निरंतर उन की चेतना में रहें ---

 हमारा सारा कार्य भगवान की चेतना में हो, हम निरंतर उन की चेतना में रहें ---

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कर्ता भाव से मुक्त होकर, यदि मैं इस सम्पूर्ण सृष्टि को भी नष्ट कर दूँ, तो भी किसी भी प्रकार के पाप का मैं भागी नहीं हो सकता। भगवान कहते हैं --
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥"
अर्थात् - जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है॥
He who has no pride, and whose intellect is unalloyed by attachment, even though he kill these people, yet he does not kill them, and his act does not bind him.
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पुरुषोत्तम भगवान विष्णु या शिव का ध्यान करते करते जिस ज्योतिर्मय सूर्यमण्डल का आभास होता है उसे निरंतर अपनी चेतना में रखें। वह परमज्योति ही हमारा कवच है जिसने हमें हर समय घेर रखा है। उसकी उपस्थिति भगवान की उपस्थिति है, जो हर समय हमारे साथ हैं। उसे कभी न भूलें और जब भी अवसर मिले उसमें से निःसृत हो रही प्रणव की ध्वनि को सुनते रहें।
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सहस्त्रारचक्र से ऊपर अनंताकाश से भी परे एक सूर्यमंडल है जो ध्यान में दृष्टिगोचर होता है। हर समय उसे अपनी चेतना में रखें। अभ्यास करते करते वह प्रत्यक्ष हो जाएगा। सारी सृष्टि भगवान के आधीन है, वे सब नियमों से ऊपर हैं, यानि सारे नियमों के नियंता वे ही हैं। वे भूतकाल को भविष्यकाल, और भविष्यकाल को भूतकाल में भी बदल सकते हैं। हमें भी हर समय भक्ति यानि परमप्रेमपूर्वक भगवान को ही समर्पित होकर रहना चाहिए।
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संसार में हम भगवान को व्यक्त करते हैं, अतः उनके अतिरिक्त किसी अन्य के आधीन नहीं हैं। भगवान को ही समर्पित होकर रहें व उन्हें अपने माध्यम से सारा कार्य करने दें। किसी भी तरह की आकांक्षा यानि कामना का जन्म न हो। क्योंकि कामना ही कर्म-बंधन है। हर समय उनका स्मरण रखें, यह भगवान का ही आदेश है --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।
Therefore meditate always on Me, and fight; if thy mind and thy reason be fixed on Me, to Me shalt thou surely come.
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जिधर भी हमारी दृष्टि जाए उधर भगवान ही दृष्टिगत हों । भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् - जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता।।
He who sees Me in everything and everything in Me, him shall I never forsake, nor shall he lose Me.
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और कुछ भी लिखने में असमर्थ हूँ। समस्त सृष्टि में व्यक्त हो रहे परमात्मा को नमन !!
ॐ तत्सत् !!
१७ फरवरी २०२३