Saturday, 18 July 2026

'एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ---

 'एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ---

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कल मध्यरात्रि में लगभग १.३० बजे सोते हुए अचानक ही नींद में एक विचार आया कि इस पूरी सृष्टि में मैं अकेला हूँ, मेरे से अन्य कोई नहीं है, और न कभी होगा।
"एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति।" इस विचार से सोते हुए उठ गया। यह वेदवाक्य है, जिसका अभिप्राय है कि इस ब्रह्माण्ड मे एक ईश्वर ही है, अन्य कोई नहीं है। वही सब भूतों में है, वही सर्वत्र है, और जितने भी रूप दिखाई दे रहे हैं, सब में उसी की सत्ता है।
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इस नाम से नरेंद्र कोहली का लिखा हुआ एक उपन्यास भी है, जिसे मैंने नहीं पढ़ा है। मेरे ऊपर Jean-Paul Sartre नाम के पश्चिमी विचारक का भी कोई प्रभाव नहीं है, लेकिन उसकी उक्ति "hell is other people" यानि Other person is the hell बार बार दिमाग में आती रही। ध्यान में इसका अर्थ यही समझ में आया कि -- उपासना में एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी भी सत्ता का चिंतन "नर्क" है। मुझे लगा कि यह विचार मेरे अवचेतन मन से आया है। लेकिन गहराई में जाने से बोध हुआ कि मेरे लिए यह परमात्मा का एक संदेश है।
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मेरे जीवन की एक कुंठा है, जिससे मुझे भगवान ही मुक्त कर सकते हैं, और वे कर भी रहे है। मैं जीवन में विरक्त होना चाहता था, लेकिन इसके लिए कभी साहस नहीं जुटा पाया। इससे व्यक्तित्व कुंठित हो गया। लेकिन अब ईश्वर से अन्य कोई विचार मन में आता ही नहीं है, अतः वह कुंठा भी समाप्त हो रही है। इस संसार को ईश्वर की प्रकृति अपने नियमानुसार चला रही है। नियमों को न जानना हमारी भूल है। हमारा समर्पण सिर्फ परमात्मा के प्रति हो। गीता में भी भगवान यही कहते हैं --
"सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६:२४॥"
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६:२५॥"
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
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भगवान ही सर्वस्व है। वे सर्वदा सर्वत्र हैं। मेरा कोई पृथक अस्तित्व न रहे। मैं उनके साथ एक हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जुलाई २०२४

परमात्मा से प्रेम मेरा स्वभाव है, कोई आत्म-मुग्धता या अहंकार नहीं ---

 परमात्मा से प्रेम मेरा स्वभाव है, कोई आत्म-मुग्धता या अहंकार नहीं ---

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स्वभाववश मैं परमात्मा की महिमा का बखान करता रहता हूँ, जो अनंत है। मैं अपना जीवन परमात्मा में जी रहा हूँ, और परमात्मा ही मेरा यह जीवन जी रहे हैं। मैं जहाँ भी हूँ, वहीं परमात्मा हैं। मैं यह भौतिक शरीर नहीं, परमात्मा की अनंतता हूँ। पूर्व जन्मों के व इस जन्म के गुरु भी मुझ में ही समाहित हो गए हैं। अतः स्वयं भगवान ही यह जीवन जी रहे हैं। सभी का कल्याण हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जुलाई २०२४

जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है, ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदपाठ है ---

 जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है, ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदपाठ है ---

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मैं वही लिख रहा हूँ जो मुझे पूरी तरह ठीक से समझ में आ रहा है। किसी को कुछ भी समझाने की चेष्टा नहीं करूंगा। आज पुरुषोत्तम मास के पहले दिन भगवान से मैं उनकी "अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति" और "वैराग्य" माँग रहा हूँ। यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। और कुछ भी नहीं चाहिए।
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भगवान कहते हैं कि यह संसाररूप वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है। काल की अपेक्षा भी सूक्ष्म, सब का कारण, नित्य और महान् होने के कारण अव्यक्त मायाशक्तियुक्त "ब्रह्म" ही इसका मूल है। धर्म-अधर्म रूपी शाखाओं पर सुख-दुःख रूपी फूल इसमें लगे हुए हैं। इसके मूल को जो जान लेता है, वह वेद को जानने वाला है।
इसका अर्थ यही हुआ कि जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है। ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदाध्ययन यानि वेदपाठ है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जुलाई २०२३

Friday, 17 July 2026

स्वयं के साथ मौन का अवलोकन कीजिये, यह सबसे बड़ी साधना है ---

स्वयं के साथ मौन का अवलोकन कीजिये, यह सबसे बड़ी साधना है ---
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सारे शब्द सीमित हैं। मौन -- शाश्वत सत्य और विस्तार है। असत्य के लाखों शब्द हैं, लेकिन मौन का एक ही शब्द है। इसलिए शोर के झंझावात से बाहर निकल कर मौन का अवलोकन कीजिये। सूर्य, चन्द्र, आकाश और यह धरा सब मौन है। सारा ज्ञान, और सारे प्रश्नों के उत्तर मौन हैं। सारी शक्ति, सारी भक्ति, ध्यान, विरक्ति, प्रेम, करुणा, और सारे तत्व -- मौन हैं।
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इसलिए मौन रहते हुए हर आती-जाती सांस का अवलोकन कीजिये, और हर सांस के साथ यह भाव करें कि --- यह सारी सृष्टि, सारा विश्व और सारा अनंत विस्तार "मैं" हूँ, यह नश्वर देह नहीं।
उस मौन में से एक प्रणव की ध्वनि निःसृत हो रही है। उस ध्वनि को सुनते हुये उसका मानसिक जप भी करते रहें, और उसी में अपने स्वयं का विलय कर दें। वह मौन की ध्वनि और उस का अनंत विस्तार ही परमात्मा है। उस के साथ स्वयं को एक कर लीजिये। हम धन्य हो जाएँगे, हमारा जन्म सार्थक हो जाएगा। यह सबसे बड़ी सेवा और साधना है जो हम कर सकते हैं।
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ जुलाई २०२३

Wednesday, 15 July 2026

परमात्मा की अनंतता हमारी भी अनंतता है (हम स्वयं वह अनंतता है) --- .

परमात्मा की अनंतता हमारी भी अनंतता है (हम स्वयं वह अनंतता है) ---

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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम् ,
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम् |
एकं नित्यं विमलं अचलं सर्वधी साक्षिभूतम् ,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गगुरुं तं नमामि ||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लङ्घयते गिरिं | यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ||"
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जिस तरह आकाश में विचरण करते हुए पक्षियों का कोई पदचिह्न या सुनिश्चित पथ नहीं होता, वे जहाँ पर भी हैं वहीँ से अपने लक्ष्य की ओर निकल पड़ते हैं वैसे ही भगवान के भक्त जहाँ पर भी हैं, वहीँ से अपने लक्ष्य परमात्मा की ओर चल पड़ते हैं| उनकी कोई शर्त नहीं होती| उन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन स्वयं परमात्मा से ही प्राप्त होता है| उनका समर्पण सिर्फ और सिर्फ परमात्मा के प्रति ही होता है| उन्हें आवश्यकता है सिर्फ प्रभु के प्रति अहैतुकी परम प्रेम, गहन अभीप्सा और समर्पण भाव की जो उन्हें प्रभु की अनंतता में प्रवेश करा ही देता है| जब प्रभु के प्रति परम प्रेम होगा तो यम-नियमादी सारे गुण स्वतः ही अपने आप खिंचे चले आते हैं|
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अपनी साधना से पूर्व अपने गुरु और गुरु परम्परा को प्रणाम करें| मेरुदंड उन्नत रहे यानि सीधे बैठें, शिवनेत्र होकर भ्रूमध्य में एक प्रकाश की कल्पना करें और उस प्रकाश को सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फैला दें| चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है, कहीं भी अन्धकार नहीं है| जीभ को भी ऊपर की ओर पीछे मोड़ कर तालू से सटा दें| बिलकुल तनाव मुक्त हो जाएँ| अब यह भाव करें की वह समस्त सर्वव्यापी प्रकाश आप स्वयं ही हैं| सृष्टि में दूर से दूर भी जो प्रकाश है वह भी आप हैं| कुछ नक्षत्र ऐसे भी हैं जिनका प्रकाश करोड़ों वर्ष पूर्व चला था, जिसे पृथ्वी पर पहुँचने में अभी लाखों वर्ष और लग जायेंगे, वह प्रकाश भी आप ही हैं| दृष्टि बिना तनाव के भ्रूमध्य में ही रहे| बीच में एक-दो बार देह को देख लें और दृढ़ता से यह संकल्प करें कि आप यह देह नहीं हैं| आप परमात्मा की अनंतता हैं, और वह अनंत आकाश ही आपका घर है| सारी सृष्टि आपके अस्तित्व में समाहित है और आप सारी सृष्टि में व्याप्त हैं|
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हर सांस के साथ यह भाव करें कि आप वह सर्वव्यापी प्रकाश हैं| वह प्रकाश ही प्रभु का प्रेम है| आप स्वयं ही वह प्रेम हैं| जब सांस अन्दर जाए तो मानसिक रूप से दीर्घ "सोSSSSS" और सांस बाहर आये तब दीर्घ "हं....." का मानसिक रूप से जप करें| इससे विपरीत भी कर सकते हैं| यह अजपा-जप कहलाता है| जब भी समय मिले और जब भी दोनों नासिकाओं से सांस चल रही हो, इसका अभ्यास करें| यह भाव सदा रखने का अभ्यास करते रहें कि आप वह अनंत आकाश हैं और यथासंभव खूब अजपा-जप का अभ्यास करें|
{अगर नाक में कोई समस्या हो जैसे DNS या Allergy की तो उसका उपचार किसी अच्छे ENT सर्जन से करवा लें| हठयोग में भी नाक से सम्बंधित अनेक क्रियाएँ हैं जो नासिका मार्ग का शोधन करती हैं|}
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गुरुरूप ब्रह्म की परम कृपा से जिनकी कुण्डलिनी जागृत है, वे मेरुदंडस्थ सुषुम्ना नाड़ी में गुरु प्रदत्त बीजमंत्रों के साथ घनीभूत प्राणऊर्जा का मूलाधार से आज्ञाचक्र के मध्य अपनी गुरु परम्परानुसार सचेतन विचरण करें| आज्ञाचक्र योगियों का ह्रदय है| अपनी चेतना को प्रयासपूर्वक सदा आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य उत्तरा-सुषुम्ना में रखने का अभ्यास करें| वहीँ कूटस्थ में ध्यान करें| जब भ्रूमध्य में कूटस्थ ज्योति के दर्शन होने लगें तब शनेः शनेः उसे भी सहस्त्रार में अपनी चेतना के साथ ले जाएँ| आपकी चेतना आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में ही रहनी चाहिए| जब नाद की ध्वनी सुने उसे भी सहस्त्रार में ले जाइए| गुरुकृपा से जिनकी उत्तरा सुषुम्ना का द्वार खुल गया है वे उत्तरा सुषुम्ना में व इस से ऊपर ही ध्यान करें|
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गुरुकृपा से ब्रह्मरंध्र में ओंकार का ध्यान करते करते सर्वव्यापकता और भगवान शिव की अनुभूतियाँ होंगी| वहाँ जो ध्वनी सुनती है उसे सुनते रहो और ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का मानसिक जाप करते रहो| उस ध्वनि की लय से एकाकार हो जाओ|
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जब गुरुकृपा से विस्तार की अनुभूतियाँ होने लगें तब अभ्यास करते करते एक दिन गुरु का स्मरण कर सहस्त्रार से भी ऊपर उठ जाओ और अनंत आकाश में लाखों करोड़ों कोसों ऊपर चले जाओ| फिर लाखों करोड़ों कोसों दूर तक दायें और बाएं हर ओर दशों दिशाओं में फ़ैल जाओ| और धारणा करो कि यह अनंतता आप स्वयं हो| सारी सृष्टि आप में है और आप समस्त सृष्टि में हो| इस अनंतता की सीमा कहीं भी नहीं है पर केंद्र सर्वत्र है, और वह केंद्र स्वयं आप हो| यह गगन मंडल ही आपका घर है और आप स्वयं यह गगन मंडल हैं|
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कभी कभी अजपा-जाप करो, पर अधिकतः शिवस्वरूप ओंकार का ही ध्यान करो| शिव स्वरुप में अपनी स्वयं की आहुति दे दो यानि अपना सर्वस्व उन्हें समर्पित कर दें| अपना कुछ भी न हो, कोइ पृथकता न हो| यह भाव रखो की आप तो हो ही नहीं, सिर्फ भगवान शिव हैं, वे ही साधना कर रहे हैं| इस शिवभाव में दृढ़ता से रहो| साधक साध्य और साधन सब भगवान शिव हैं|
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जब गगन मंडल से मन भर जाए तब बापस अपने ह्रदय यानि आज्ञाचक्र में आ जाओ, और कभी भी बापस अपने घर उस गगन मंडल में चले जाओ| निरंतर शिवरूप गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का मानसिक जप करते रहो| भगवान शिव और सारे गुरु आपकी सदा रक्षा और मार्गदर्शन करेंगे|
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जाति, वर्ण, कुल, आदि की चेतना से ऊपर उठो| जैसे विवाह के बाद एक विवाहिता स्त्री की जाति, वर्ण और गौत्र अपने पति का हो जाता है, वैसे ही आपकी जाति, वर्ण और गौत्र वो ही है जो परमात्मा का है| आप परमात्मा के हैं और परमात्मा आपके हैं जो सदा आपके साथ हैं|
ॐ ॐ ॐ |
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लगभग चालीस वर्ष पूर्व गणेशपुरी के स्वामी मुक्तानंद जी की पुस्तक 'चित्तशक्तिविलास' पढी थी जिसमें उन्होंने अपने स्वयं के परलोकगमन आदि के अनुभव लिखे थे, एक नीले नक्षत्र के दर्शन के बारे में भी लिखा था| नीले और श्वेत नक्षत्रों के दर्शन के बारे में अनेक योगियों ने भी लिखा है| स्वामी राम ने भी अनेक दिव्य अनुभव लिखें हैं| एक श्री 'M' ने भी अनेक दिव्य अनुभवों को लिखा है| परमहंस योगानंद ने भी अनेक दिव्य अनुभवों और चमत्कारों के बारे में लिखा है|
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इस बारे में मेरा यह निवेदन है कि हमें अपनी चेतना में इस तरह के अनुभवों की अपेक्षा ही नहीं करनी चाहिए क्योंकि हमारा लक्ष्य परमात्मा है, ये अनुभव नहीं| अपने अनुभव अपने गुरु या गुरुपरंपरा के किसी उन्नत संत के अतिरिक्त अन्य किसी से भी साझा नहीं करने चाहियें|
वैसे सभी उन्नत साधकों को अनेक चमत्कार और दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं पर उनकी परवाह नहीं करनी चाहिए| नीले और सफ़ेद सूक्ष्म लोकों के प्रकाश और पंचकोणीय श्वेत नक्षत्र के दर्शन सभी उन्नत साधकों को होते हैं| ये एक तरह के मील के पत्थर हैं और कुछ नहीं| अपनी चेतना को इनसे भी परे सिर्फ परमात्मा में ले जाना है|
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कहीं भी मत देखो, कुछ भी मत देखो, सिर्फ अपना लक्ष्य परमात्मा सदा दृष्टिपथ में रहे| गुरुकृपा ही केवलं| ॐ गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ||
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ॐ नमः शिवाय | शिवोहं शिवोहं शिवोहं अयमात्मा ब्रह्म | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
१९ दिसंबर २०१५
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Tuesday, 14 July 2026

मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, और मेरे एकमात्र मित्र वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं। वे ही सब रूपों में आये, वे ही सर्वस्व यह सम्पूर्ण विश्व हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही गोविंद हैं, और वे ही यह "मैं" बने हुए हैं।

मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, और मेरे एकमात्र मित्र वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं। वे ही सब रूपों में आये, वे ही सर्वस्व यह सम्पूर्ण विश्व हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही गोविंद हैं, और वे ही यह "मैं" बने हुए हैं।

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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
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यह सम्पूर्ण विश्व (सृष्टि) भगवान विष्णु हैं। जिनका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है, उन्हें वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है।
"ॐ विश्वं विष्णु:" --- बस इतना ही पर्याप्त है पुरुषोत्तम के गहनतम ध्यान में जाने के लिए॥ जो विष्णु हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं॥
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मैं प्रत्यगात्मा उन्हीं से निःसृत और उन्हीं से उद्भूत/उद्भासित हूँ। मेरी नियति भी उन्हीं में विलीन होना है। इस संसार में मैं एक शाश्वत आत्मा हूँ, जिसका स्वधर्म परमात्मा से परमप्रेम और परमात्मा को पूर्ण समर्पण है। यही मेरी पहिचान है। मेरा धर्म सनातन है, जिस से यह सम्पूर्ण सृष्टि संचालित है। मैं अपना सम्पूर्ण अंतःकरण और अस्तित्व वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित करता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०२४
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जब भी समय मिले, अविच्छिन्न/अनन्य भाव से आप परमात्मा का ध्यान कीजिये, आप मुझे सदा अपने साथ ही पाओगे। मैं आपसे पृथक नहीं हूँ। परमात्मा में मैं आपके साथ एक हूँ। जब भी आप मुझे याद करोगे, मुझे वहीं अपने साथ पाओगे॥ ॐ ॐ ॐ !!

सब पीड़ाओं, दुःखों और कष्टों का स्वागत है; उनके आगमन से अब कोई परेशानी नहीं होती ---

 सब पीड़ाओं, दुःखों और कष्टों का स्वागत है; उनके आगमन से अब कोई परेशानी नहीं होती ---

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संत तुलसीदासजी ने लिखा है ---
"'कह हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई, जब तब सुमिरन भजन न होई।"
हनुमान जी महाराज भगवान श्रीराम को कहते हैं कि -- "हे प्रभु, जीवन में विपत्ति ही तब आती है, जब आपका भजन और सुमिरन नहीं होता है।"
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जिस दिन भगवान का भजन नहीं होता, उस दिन बड़ी भयंकर असह्य पीड़ा होती है, जो भगवान के भजन से ही दूर होती है। उस समय ऐसा लगता है जैसे मैं इस पृथ्वी पर एक पशु की तरह चरते हुए व्यर्थ ही यह जीवन नष्ट कर रहा हूँ। मेरे लिये तो इस संसार में सबसे बड़ा कष्ट ही भगवान का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान का नहीं होना है। अतः सब ओर से मन को हटाकर भगवान में ही लगाना पड़ेगा। स्वयं भगवान का भी यही निर्देश है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं ---
"सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६:२४॥"
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६:२५॥"
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
अर्थात् --
"संकल्प से उत्पन्न समस्त कामनाओं को नि:शेष रूप से परित्याग कर मन के द्वारा इन्द्रिय समुदाय को सब ओर से सम्यक् प्रकार वश में करके॥"
"शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥"
"यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे॥"
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समस्त कामनाओं से मुक्त हो कर धैर्ययुक्त बुद्धि से धीरे धीरे मन को सर्वव्यापी आत्मा में स्थित कर के अन्य किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे। यह योग की परम श्रेष्ठ विधि है। इस प्रकार योगाभ्यास के बल से योगी का मन आत्मा में ही शान्त हो जाता है। उपनिषदों की सहायता से इसे बहुत अच्छी तरह से समझाया जा सकता है। यह साधक की पात्रता पर निर्भर है कि वह कितना समझ सकता है। अतः किसी भी साधक को एक बार तो किन्हीं ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य से व्यक्तिगत मार्गदर्शन लेना ही पड़ेगा। "मूमुक्षुत्व और फलार्थित्व" -- दोनों साथ साथ नहीं चल सकते। जब मुमुक्षुत्व जागृत होता है तब शनैः शनैः कर्ताभाव और सब कामनाएँ नष्ट होने लगती हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०२४