Monday, 20 July 2026

यह संसार - मनुष्य रूप में आजकल भूत-पिशाचों से भरा हुआ है। जिधर देखो उधर चारों ओर अनेक नर-पिशाच घूम रहे हैं। अब अंजनेय का आश्रय लिया है। क्योंकि ---

यह संसार - मनुष्य रूप में आजकल भूत-पिशाचों से भरा हुआ है। जिधर देखो उधर चारों ओर अनेक नर-पिशाच घूम रहे हैं। अब अंजनेय का आश्रय लिया है। क्योंकि ---
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"भूत-पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे।"
"नाशे रोग हरे सब पीरा, जो सुमिरत हनुमत बलबीरा।"
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और चाहिए ही क्या?
"अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता, अस वर दीन जानकी माता।
राम रसायन तुम्हारे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥"
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हनुमान का अर्थ है अपने मान का हनन करना, निरहंकारी अभिमानरहित होना। इसके लिए निर्मल मति होना आवश्यक है। राम भी उसी को मिलते हैं जिसके मन में कोई छल-छिद्र नहीं होता, और जिसका निर्मल मन होता है। मन निर्मल कैसे हो? ---
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"जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपा निरमल मति पावउँ॥"
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"जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करो गुरुदेव की नाई॥
इतने से ही मन तृप्त हो गया है। अब कोई आकांक्षा नहीं रही है।
जय हनुमान, जय सियाराम !! २० जुलाई २०२२

भारत की रक्षा स्वयं भगवान कर रहे हैं, अन्यथा भारत कभी का नष्ट हो गया होता ---

भारत की रक्षा स्वयं भगवान कर रहे हैं, अन्यथा भारत कभी का नष्ट हो गया होता। भारत पर जितने प्रहार हुये हैं, उसके दस-लाखवें भाग जितना भी प्रहार किसी अन्य देश या संस्कृति पर होता तो वह नष्ट हो गई होती। भारत की रक्षा आध्यात्म ने की है। जब तक भारत में दस भी ऐसे व्यक्ति हैं जो भगवान से जुड़े हुए हैं, भारत कभी नष्ट नहीं हो सकता।

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आजकल एक पाकिस्तानी जासूस महिला के समाचारों से मीडिया भरा पड़ा है। ऐसी पता नहीं कितने देशों की कितनी जासूस भारत में हैं। पता नहीं कितने देशों के स्त्री/पुरुष जासूस कितने देशों में जासूसी कर रहे हैं। जासूसों से प्राप्त सूचनाओं की सहायता से ही सारे युद्ध जीते जाते हैं।
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एक इज़राइली जासूस एली कोहेन तो सीरिया का राष्ट्रपति बनने वाला था। इसकी घोषणा भी हो गई थी। राष्ट्रपति बनने से पूर्व उसे वहाँ का रक्षामंत्री बनाया जाने वाला था। ऐन मौके पर ही वह पकड़ा गया और उसे दमिश्क के सबसे बड़े चौराहे पर सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई।
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इस तथाकथित पाकिस्तानी जासूस सीमा हैदर का भारतीय पति सचिन गलती से एक वकील के पास सलाह लेने चला गया कि उनका कोर्ट में रजिस्टर्ड विवाह कैसे हो सकता है। उस वकील ने पुलिस को सूचित कर दिया। अन्यथा उस पाकिस्तानी महिला जासूस को किसी का बाप भी नहीं पकड़ सकता था। एक अनुमान के अनुसार भारत में कम से कम भी दो-तीन करोड़ अवैध घुसपैठिए हैं।
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भारत के पता नहीं कितने राजनेता और पत्रकार दूसरे देशों के लिए जासूसी करते हैं। हम सदा सजग और सतर्क रहें, व अपना स्वधर्म नहीं छोड़ें।
ॐ तत्सत् !!
२० जुलाई २०२३

जैसी भी आपकी श्रद्धा और विश्वास है, वैसे ही परमात्मा का निरंतर स्मरण करते रहें

 जैसी भी आपकी श्रद्धा और विश्वास है, वैसे ही परमात्मा का निरंतर स्मरण करते रहें

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ॐ नमः शिवाय विष्णु रूपाय, शिव रूपाय विष्णवे।
शिवस्य हृदयं विष्णुं, विष्णोश्च हृदयं शिवः॥ (स्कन्दपुराण)
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मैं विष्णुरूप शिव को, और शिवरूप विष्णु को नमन करता हूँ। शिव के हृदय में विष्णु हैं, और विष्णु के हृदय में शिव हैं। (जैसे शिव हैं वैसे ही विष्णु हैं, तथा जैसे विष्णु हैं वैसे ही शिव हैं। तत्व रूप में शिव और विष्णु में तनिक भी अंतर नहीं है।)
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जैसी भी आपकी श्रद्धा और विश्वास है वैसे ही परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन, और ध्यान कीजिये। परमात्मा के अनंत ज्योतिर्मय रूप का निरंतर स्मरण और उसमें स्वयं की पृथकता के बोध का समर्पण -- परमात्मा का ध्यान है। कौन क्या कहता है, इसकी परवाह न करते हुए, निरंतर परमात्मा के प्रियतम रूप का स्मरण करते रहें। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
*अर्थात् - हे पार्थ ! जो अनन्य चित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्य युक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
*भावार्थ - परमात्मा से अन्य कुछ भी नहीं है। जिस का चित्त निरंतर परमात्मा की चेतना में रहता है, उस नित्य समाधिस्थ को भगवान अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं।
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पूरी गीता का ही क्रमशः नित्य स्वाध्याय करें। सारा मार्गदर्शन प्राप्त हो जाएगा। सिर्फ परमात्मा पर ही निर्भर रहें। उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है। कूटस्थ सूर्यमण्डल में अनन्यगामी चित्त द्वारा पुरुषोत्तम का ध्यान करें। सब कुछ इसी जीवन में प्राप्त हो जाएगा, यानि आप स्वयं इसी जीवन काल में परमात्मा को उपलब्ध हो जाएँगे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जुलाई २०२४

यथार्थ में शिव ही गुरु हैं। गुरु-पूर्णिमा पर गुरु-परंपरा और शिव रूप में गुरु को नमन ---

 यथार्थ में शिव ही गुरु हैं। गुरु-पूर्णिमा पर गुरु-परंपरा और शिव रूप में गुरु को नमन

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ॐ गं गणपतये नमः॥ श्रीगुरवे नमः॥ श्रीपरमगुरवे नमः॥ श्रीपरात्परगुरवे नमः॥
श्रीपरमेष्ठिगुरवे नमः॥ श्रीपरमात्मने नमः॥"
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्।
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥"
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"ॐ ऐं गुरवे नमः॥" (गुरु ॐ)
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गुरु महाराज की प्रतीकात्मक "चरण पादुका" (खड़ाऊँ) की विधि-विधान से पूजा करें, और ध्यान करने के पश्चात समष्टि के कल्याण की प्रार्थना करें।
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"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥" (गीता)
"वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥११:३९॥" (गीता)
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥" (गीता)
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जब तक संतुष्टि न मिले, तब तक भगवान का खूब ध्यान करें। उन्हें अपनी स्मृति में हर समय रखें। जब भी समय मिले भगवान का स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करें। गीता में भगवान कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
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"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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हर घर में नित्य शिवपूजा और गीतापाठ अवश्य होना चाहिए। भगवान शिव देवाधिदेव हैं। उनकी पूजा से सभी देवी-देवताओं की पूजा हो जाती है।
श्रीमद्भगवद्गीता में सभी शास्त्रों का सार है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जुलाई २०२४

Saturday, 18 July 2026

'एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ---

 'एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ---

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कल मध्यरात्रि में लगभग १.३० बजे सोते हुए अचानक ही नींद में एक विचार आया कि इस पूरी सृष्टि में मैं अकेला हूँ, मेरे से अन्य कोई नहीं है, और न कभी होगा।
"एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति।" इस विचार से सोते हुए उठ गया। यह वेदवाक्य है, जिसका अभिप्राय है कि इस ब्रह्माण्ड मे एक ईश्वर ही है, अन्य कोई नहीं है। वही सब भूतों में है, वही सर्वत्र है, और जितने भी रूप दिखाई दे रहे हैं, सब में उसी की सत्ता है।
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इस नाम से नरेंद्र कोहली का लिखा हुआ एक उपन्यास भी है, जिसे मैंने नहीं पढ़ा है। मेरे ऊपर Jean-Paul Sartre नाम के पश्चिमी विचारक का भी कोई प्रभाव नहीं है, लेकिन उसकी उक्ति "hell is other people" यानि Other person is the hell बार बार दिमाग में आती रही। ध्यान में इसका अर्थ यही समझ में आया कि -- उपासना में एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी भी सत्ता का चिंतन "नर्क" है। मुझे लगा कि यह विचार मेरे अवचेतन मन से आया है। लेकिन गहराई में जाने से बोध हुआ कि मेरे लिए यह परमात्मा का एक संदेश है।
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मेरे जीवन की एक कुंठा है, जिससे मुझे भगवान ही मुक्त कर सकते हैं, और वे कर भी रहे है। मैं जीवन में विरक्त होना चाहता था, लेकिन इसके लिए कभी साहस नहीं जुटा पाया। इससे व्यक्तित्व कुंठित हो गया। लेकिन अब ईश्वर से अन्य कोई विचार मन में आता ही नहीं है, अतः वह कुंठा भी समाप्त हो रही है। इस संसार को ईश्वर की प्रकृति अपने नियमानुसार चला रही है। नियमों को न जानना हमारी भूल है। हमारा समर्पण सिर्फ परमात्मा के प्रति हो। गीता में भी भगवान यही कहते हैं --
"सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६:२४॥"
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६:२५॥"
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
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भगवान ही सर्वस्व है। वे सर्वदा सर्वत्र हैं। मेरा कोई पृथक अस्तित्व न रहे। मैं उनके साथ एक हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जुलाई २०२४

परमात्मा से प्रेम मेरा स्वभाव है, कोई आत्म-मुग्धता या अहंकार नहीं ---

 परमात्मा से प्रेम मेरा स्वभाव है, कोई आत्म-मुग्धता या अहंकार नहीं ---

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स्वभाववश मैं परमात्मा की महिमा का बखान करता रहता हूँ, जो अनंत है। मैं अपना जीवन परमात्मा में जी रहा हूँ, और परमात्मा ही मेरा यह जीवन जी रहे हैं। मैं जहाँ भी हूँ, वहीं परमात्मा हैं। मैं यह भौतिक शरीर नहीं, परमात्मा की अनंतता हूँ। पूर्व जन्मों के व इस जन्म के गुरु भी मुझ में ही समाहित हो गए हैं। अतः स्वयं भगवान ही यह जीवन जी रहे हैं। सभी का कल्याण हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जुलाई २०२४

जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है, ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदपाठ है ---

 जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है, ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदपाठ है ---

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मैं वही लिख रहा हूँ जो मुझे पूरी तरह ठीक से समझ में आ रहा है। किसी को कुछ भी समझाने की चेष्टा नहीं करूंगा। आज पुरुषोत्तम मास के पहले दिन भगवान से मैं उनकी "अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति" और "वैराग्य" माँग रहा हूँ। यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। और कुछ भी नहीं चाहिए।
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भगवान कहते हैं कि यह संसाररूप वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है। काल की अपेक्षा भी सूक्ष्म, सब का कारण, नित्य और महान् होने के कारण अव्यक्त मायाशक्तियुक्त "ब्रह्म" ही इसका मूल है। धर्म-अधर्म रूपी शाखाओं पर सुख-दुःख रूपी फूल इसमें लगे हुए हैं। इसके मूल को जो जान लेता है, वह वेद को जानने वाला है।
इसका अर्थ यही हुआ कि जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है। ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदाध्ययन यानि वेदपाठ है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जुलाई २०२३