Thursday, 9 July 2026

विषय-वासना समाप्त हो, और वेदान्त-वासना दृढ़ हो ---

 विषय-वासना समाप्त हो, और वेदान्त-वासना दृढ़ हो ---

.
तुम्हारे से अन्य कोई नहीं है। जिधर भी देखता हूँ, उधर तुम ही तुम हो। यह "मैं" भी "तुम" हो। अब जीने और मरने में मेरी कोई वासना नहीं रही है, क्योंकि केवल तुम ही मेरे अवलम्बन हो।
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥" (गीता)
अर्थात् -- अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
.
अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम क्षेम है। अपने भक्तों के ये दोनों काम, भगवान स्वयं करते हैं। अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योगक्षेम सम्बन्धी चेष्टा नहीं करते, क्योंकि वे जीने और मरने में अपनी वासना नहीं रखते। केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रह जाते हैं। अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं।
.
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
९ जुलाई २०२२
.
विशेष :-- नीचे के चित्र को ध्यान से देखते रहें। भगवती राधा जी के भी दर्शन होंगे। जिस भी कलाकार ने यह चित्र बनाया है, उसे मैं प्रणाम करता हूँ।

सभी मनुष्यों का स्वधर्म एक ही है।

  इस पृथ्वी पर सभी मनुष्यों का स्वधर्म एक ही है ---

.
इस पूरी सृष्टि में सारी मनुष्यता का स्वधर्म एक ही है, और वह है -- निरंतर परमात्मा का स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन, ध्यान, और उन्हीं में रमण। इसके अतिरिक्त अन्य कोई स्वधर्म नहीं है। यही सनातन धर्म का सार है। इससे अतिरिक्त बाकी सब अधर्म है। निज जीवन में भगवान को हर समय हम व्यक्त करें। भगवान यहीं पर, इसी समय, सर्वदा, और सर्वत्र हैं।
गीता में भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् - जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
.
इस स्वधर्म का पालन इस संसार के महाभय से सदा हमारी रक्षा करेगा| भगवान का वचन है ---
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
अर्थात् इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है| इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है॥
.
इस स्वधर्म में मरना ही श्रेयस्कर है| भगवान कहते हैं ---
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३:३५॥"
अर्थात् सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥
.
रात्री को सोने से पूर्व परमात्मा का ध्यान कर के सोएँ, और प्रातःकाल उठते ही पुनश्च उनका ध्यान करें। पूरे दिन उन्हें अपनी स्मृति में रखें। साकार और निराकार -- सारे रूप उन्हीं के हैं। प्रयासपूर्वक अपनी चेतना को परासुषुम्ना (आज्ञाचक्र व सहस्त्रारचक्र के मध्य) में रखें। इसे अपनी साधना बनाएँ। जो उन्नत साधक हैं वे अपनी चेतना को ब्रह्मरंध्र से भी बाहर परमात्मा की अनंतता में रखें। अनंतता का बोध और और उसमें स्थिति होने पर आगे का मार्गदर्शन भगवान स्वयं करेंगे।
.
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
९ जुलाई २०२३

भवसागर क्या है? ---

 भवसागर क्या है? ---

.
भगवान से कभी भवसागर से पार उतारने की प्रार्थना किया करता था। फिर पाया कि हमारे मन की चंचलता ही भवसागर है। मन की चंचलता समाप्त होकर भगवान में स्थिर हो जाये, यही भवसागर को पार करना है।
.
भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं। वे स्वयं ही यह सम्पूर्ण सृष्टि हैं। सम्पूर्ण अस्तित्व वे स्वयं हैं। उनकी अवर्णनीय उपस्थिति का आभास परमप्रेम और आनंद के के रूप में होता है। वे सब तरह के नाम-रूपों से परे हैं, उन्हें सीमित नहीं किया जा सकता। सारे नाम और रूप उन्हीं के हैं। वे स्वयं ही यह मैं बन गए हैं।
.
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
९ जुलाई २०२३

Wednesday, 8 July 2026

क्या घर पर शिवलिंग की पूजा की जा सकती है?

क्या घर पर शिवलिंग की पूजा की जा सकती है?
.
मनीषियों से सादर प्रार्थना है कि शास्त्रों के प्रमाण सहित उत्तर दें| विशेष प्रार्थना है कि बिना शास्त्रीय प्रमाण के कोई उत्तर न दें| धन्यवाद| ॐ नमः शिवाय !!
पुनश्च: :---
हमारे घर पर एक वाणलिंग (नर्मदा के धावड़ी कुंड से प्राप्त) है जो किसी सत्संगी मित्र ने भेंट में दिया था| उस पर दोनों ओर शिव जी ने जैसे कंधे पर जनेऊ पहिन रखी हो, उस तरह के गहरे सफ़ेद शक्ति के चिह्न विपरीत दिशाओं में हैं जिन्हें तांत्रिक लोग योनि का प्रतीक कहते हैं| उस शिवलिंग की लंबाई लगभग दो-ढाई इंच है| उस की हमारे घर पर नित्य पूजा होती है|
.
एक बार गुजरात में नर्मदा नदी में स्नान करते समय भगवान शिव का ध्यान कर के डुबकी लगाई तो अपने आप ही हाथ में तीन छोटे-छोटे एक ही आकार के शिवलिंग आ गये| उनमें से एक गहरे काले रंग का, एक सफ़ेद रंग का, और एक हल्के लाल रंग का है| उन्हें भगवान शिव का प्रसाद मान कर पूजा कक्ष में वाण लिंग के पास में ही रखा है| एक बार तो ऐसे लगा मानो वे भगवती महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती हैं| जो भी हैं वे भगवान शिव के प्रसाद हैं| उन के बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते|
.
ध्यान में भी कई बार विभिन्न चक्रों पर शिवलिंग के दर्शन होते हैं| यह शरीर भी एक घर ही है| क्या सूक्ष्म देह में शिवलिंगों के दर्शन वर्जित है?
.
पुनश्च :--- ओंकारेश्वर के पास में एक स्थान है जिसे धावड़ी कुंड कहते हैं| वह कभी बाणासुर नाम के परम शिवभक्त राक्षस का यज्ञकुंड था| कालांतर में उस यज्ञकुंड में से नर्मदा नदी बहने लगी| भगवान शिव के वरदान से धावड़ी कुंड से प्राप्त शिवलिंग बाणलिंग कहलाते हैं और सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं| अब तो वहाँ एक बांध बन गया है जिस से वह कुंड डूब गया है| पर गर्मियों में जब पानी कम होता है, तब वहाँ जाकर माँ नर्मदा से प्रार्थना करने पर साधक के अनुकूल शिवलिंग स्वतः ही वरदान के रूप में हाथ में आ जाता है|
पुनश्च :--- बाणलिंग की यही पहिचान है कि जितनी बार चावल से तौलोगे, हर बार परिमाण अलग-अलग होगा| ८ जुलाई २०२०

हमारा "मौन" भगवान की अभिव्यक्ति है ---

 हमारा "मौन" भगवान की अभिव्यक्ति है, इसलिए अधिक से अधिक समय मौन व्रत का पालन करें क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय के अड़तीसवें श्लोक में भगवान कहते हैं -- "मौनं चैवास्मि गुह्यानां" अर्थात् "गुप्त रखने योग्य भावों में मैं मौन हूँ"।

.
प्राणायाम में स्वाभाविक रूप से कुंभक की अवधि बढ़नी चाहिए। साँसों का सन्धिकाल कुम्भक है। जबतक कोई गति है, तब तक ध्वनि है। गति नहीं, ध्वनि नहीं। कुम्भक में साँसों की गति नहीं है। कुम्भक ही मौन की अभिव्यक्ति है।
.
कुंभक काल में मानसिक रूप से ओंकार का जप करें। ॐ ॐ ॐ !!
८ जुलाई २०२१

हमारी हर सांस एक पुनर्जन्म है ---

 हमारी हर सांस एक पुनर्जन्म है ---

.
दो साँसों के मध्य का संधिक्षण वास्तविक संध्याकाल है, जिसमें की गयी साधना सर्वोत्तम होती है। हर सांस पर परमात्मा का स्मरण रहे, क्योंकि हर सांस तो परमात्मा स्वयं ही ले रहे हैं, न कि हम। प्राणायाम में स्वाभाविक रूप से कुंभक की अवधि बढ़नी चाहिए। साँसों का सन्धिकाल कुम्भक है। जब तक कोई गति है, तब तक ध्वनि है। गति नहीं, ध्वनि नहीं। कुम्भक में साँसों की गति नहीं है। कुम्भक ही मौन की अभिव्यक्ति है। हमारा मौन भगवान की अभिव्यक्ति है, इसलिए अधिक से अधिक समय मौन व्रत का पालन करना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥१०:३८॥"
अर्थात् - "मैं दमन करने वालों का दण्ड हूँ, और विजयेच्छुओं की नीति हूँ; मैं गुह्यों में मौन हूँ और ज्ञानवानों का ज्ञान हूँ।"
"मौनं चैवास्मि गुह्यानां" अर्थात् "गुप्त रखने योग्य भावों में मैं मौन हूँ"।
"हं" (प्रकृति) और "सः" (पुरुष) दोनों में कोई भेद नहीं है। प्रणवाक्षर परमात्मा का वाचक है। कोई अन्य नहीं है, सम्पूर्ण अस्तित्व उनकी ही अभिव्यक्ति है।
.
भारत में जन्म लेकर भी जिसने परमात्मा की उपासना नहीं की, वह बहुत ही अभागा और इस पृथ्वी पर भार है। परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति भारत में ही हुई है। भारत में जन्म लेना एक सौभाग्य की बात है।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ जुलाई २०२२
.
पुनश्च :-- यह विषय समझने में कठिन है क्योंकि यह एक गुरुमुखी विद्या है जो शिष्य को सामने बैठाकर गुरु द्वारा समझाई जाती है। जो साधक नित्य उपासना करते हैं, वे इसे तुरंत समझ जाएँगे। इससे अधिक सरल भाषा नहीं हो सकती। यह सरलतम भाषा है।

सिर्फ शास्त्रों के स्वाध्याय, और संत-महात्माओं के प्रवचन आदि सुनने मात्र से ही भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती ---

 सिर्फ शास्त्रों के स्वाध्याय, और संत-महात्माओं के प्रवचन आदि सुनने मात्र से ही भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती ---

.
जो कुछ भी हम स्वाध्याय करते हैं, उसका चिंतन, मनन और निदिध्यासन भी अति आवश्यक है। इससे भी आगे भगवान की उपासना यानि ध्यान-साधना बहुत अधिक आवश्यक है। ध्यान साधना के लिए भी एक स्वस्थ शरीर, और हठयोग की कुछ क्रियाओं जैसे -- आसन, प्राणायाम, महामुद्रा, त्रिबंध, खेचरी या नभोमुद्रा, कुंडलिनी-जागरण, चक्रभेद, नादश्रवण, योनिमुद्रा, आदि का अभ्यास, ब्रह्मचर्य, और सबसे अधिक महत्वपूर्ण -- किसी ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य सदगुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है। ये हरिःकृपा से ही प्राप्त होते हैं।
.
जिनका सतोगुण प्रधान है, वे ही ज्ञान और भक्ति की बातें समझ सकते हैं। जिनका रजोगुण प्रधान है वे सिर्फ कर्मयोग को ही समझ सकते हैं। जिनका तमोगुण प्रधान है, वे बाहरी सकाम पूजा-पाठ आदि से अधिक कुछ भी नहीं समझ सकते। गीता में भगवान श्रीकृष्ण तो हमें त्रिगुणातीत होने का आदेश देते हैं --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित, और आत्मवान् बनो॥
.
आज के युग में जटिलताएँ इतनी प्रबल हैं कि हमें निज विवेक के प्रकाश में यह विचार करना पड़ता है कि जिन परिस्थितियों में हम हैं, उनमें सर्वश्रेष्ठ हम क्या कर सकते हैं। आज की परिस्थितियों में मेरे विचार से --
(१) भगवान का गहनतम स्मरण हम हर समय निरंतर करें।
(२) मेरा व्यक्तिगत मत है कि द्विकाल संध्या, शिवपूजा और गीतापाठ हर घर में नित्य होना चाहिए।
(३) अपनी अपनी गुरु-परंपरानुसार पूरी सत्यनिष्ठा से साधना करें।
.
जो हो सकता है वह भी, और जो नहीं हो सकता वह भी, भगवान को समर्पित कर दें। इस युग में इतना ही बहुत है। सबसे अधिक महत्वपूर्ण है -- भगवान को अपना सर्वस्व समर्पण।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
८ जुलाई २०२३