Friday, 6 November 2026

भगवान कहाँ नहीं हैं?

 गीता में भगवान कहते हैं ...

"बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च| सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्||१३:१६||"
अर्थात् (वह ब्रह्म) भूत मात्र के अन्तर्बाह्य स्थित है; वह चर है और अचर भी| सूक्ष्म होने से वह अविज्ञेय है; वह सुदूर और अत्यन्त समीपस्थ भी है||
.
सारे दृश्य, दृष्टि और दृष्टा वे ही हैं| अति सूक्ष्म होने के कारण वे आत्मरूप से ही ज्ञेय हैं| यदि परमात्मा का आभास नहीं होता तो यह हमारा अज्ञान है| सारे नाम, रूप और आकार वे ही हैं| हम जिस भी रूप में उनकी आराधना करते हैं, वे उसी रूप में अनुग्रह करते हैं|
भगवान कहते हैं ...
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्| मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः||४:११||"
अर्थात् जो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ; हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं||
.
सब कुछ भगवान वासुदेव ही हैं| वे कहते हैं ...
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते| वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
अर्थात् बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है||
.
उन सर्वव्यापी भगवान वासुदेव को मैं नमन करता हूँ ...
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च|
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते||११:३९||"
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व|
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः||११:४०||"
.
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ नवंबर २०२०

ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना पर तीन दिन पूर्व हुए जिहादी हमले के पीछे का एक ऐतिहासिक कारण यह भी हो सकता है ...

 ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना पर तीन दिन पूर्व हुए जिहादी हमले के पीछे का एक ऐतिहासिक कारण यह भी हो सकता है ...

.
अभी तीन दिन पहिले ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना पर एक जिहादी हमला हुआ था, जिस की पूरे विश्व में, विशेषकर यूरोप में बहुत बड़ी प्रतिक्रिया हुई थी| इस हमले के लिए उन्होने वियना को ही क्यों चुना? इस के पीछे एक ऐतिहासिक कारण है| लगभग साढ़े-तीन-सौ वर्ष पूर्व मई सन १६८३ ई. में वियना पर अधिकार के लिए यूरोप के ईसाईयों और उस्मानिया खिलाफत (Ottoman Empire) की मुसलमानी फौज के मध्य एक भयंकर निर्णायक धर्म-युद्ध हुआ था, जिसमें हैब्सबर्ग (वर्तमान ऑस्ट्रिया), जर्मनी और पोलैंड की सयुंक्त ईसाई सेनाओं ने उस्मानी खिलाफत (Ottoman Empire) की मुसलमानी फौज को बहुत बुरी तरह रोंद डाला था|
.
इस ईसाई सेना का नेतृत्व पोलैंड का राजा जॉन तृतीय कर रहा था| खिलाफ़त उस्मानिया की फौज का नेतृत्व उनका प्रधान वजीर कारा मुस्तफा पाशा कर रहा था| कारा मुस्तफा पाशा की फौज बहुत विशाल थी जिस में मिस्र के घुड़सवार योद्धा, बोस्निया के तोपची और क्रीमिया के दुर्धर्ष तातार योद्धाओं को मिलाकर दो लाख से अधिक लड़ाकू जिहादी सैनिक थे| वे हंगरी आदि देशों को रौंदते हुए आये और वियना को घेर लिया और वहाँ के सभी लोगों को इस्लाम कबूलने का हुक्म दिया|
.
वियना के राजा लियोपाल्ड ने इस्लामी फौज की मांग ठुकरा दी और किसी भी तरह उनको रोकते हुए पोलैंड और जर्मनी को भी युद्ध में शामिल कर लिया| पोलैंड की सेना बहुत शक्तिशाली थी जिस ने उस्मानिया खिलाफ़त की फौज को पूरी तरह हराकर उस से हारे हुए सारे ईसाई क्षेत्र बापस छीन लिए और तुर्की के खलीफ़ा को बड़ी शर्मनाक व अपमानजनक शर्तें मानने को बाध्य कर दिया|
.
खिलाफ़त उस्मानिया के मुस्तफा द्वितीय ने १६९५-१६९६ में जवाबी हमला किया पर ११ सितम्बर १६९७ को वह जेंता की लड़ाई में बुरी तरह हार गया|
यह युद्ध एक ऐसा मोड़ था जिस से यूरोप में ईसाईयत बच गई| यहीं से सल्तनत-ए-उस्मानिया की खिलाफ़त (खलीफ़ा का राज़्य) बहुत कमजोर हो गई और धीरे धीरे कमजोर होती ही चली गई| तीन दिन पूर्व हुए हमले ने लगभग साढ़े-तीन-सौ वर्ष पूर्व हुए उस ऐतिहासिक युद्ध की याद दिला दी|
कृपा शंकर
६ नवंबर २०२०

आत्मा में स्थित कैसे हों ?

 आत्मा में स्थित कैसे हों ? ---

.
गीता में भगवान श्रीकृष्ण, और उपनिषदों के ऋषि बार बार हमें आत्मा में स्थित होने का उपदेश देते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण हमें निस्त्रैगुण्य, निर्द्वंद्व, नित्यसत्वस्थ, निर्योगक्षेम, और आत्मवान होने का उपदेश देते हैं --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥२:४५॥"
.
अभी प्रश्न यह है कि हम आत्मवान कैसे ​बनें, यानि आत्मा में स्थित कैसे हों?
इसका स्पष्ट उत्तर देना चाहूँगा कि यह एक गुरु द्वारा सिखाई जाने वाली विद्या है। सिर्फ पुस्तक में पढ़कर आप किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँच सकते। आत्मा में स्थित होकर ही आध्यात्म में प्रवेश हो सकता है। कुछ प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान आदि की क्रियाएँ हैं जो हमें आत्मा में स्थित कर सकती हैं। वे सीखने के लिए एक सिद्ध ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय सदगुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है।
इनका थोड़ा-बहुत अभ्यास भी महाभय से हमारी रक्षा करता है --
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
.
पुनश्च: -----
भगवान श्रीकृष्ण के अमृत वचन जिन्होंने सदा मार्गदर्शन किया ---
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥६:२९॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् --
यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे।।
योगयुक्त अन्त:करण वाला और सर्वत्र समदर्शी योगी आत्मा को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा में देखता है।।
जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता।।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
०७ नवंबर २०२४

Tuesday, 3 November 2026

वर्तमान युग में हमारे कर्मफल तभी तक प्रभावी हैं जब तक हमारे में अहंकार और लोभ हैं ---

 वर्तमान युग में हमारे कर्मफल तभी तक प्रभावी हैं जब तक हमारे में अहंकार और लोभ हैं। इनसे मुक्त होते ही हम जीवनमुक्त हो जाते हैं। आध्यात्मिक साधना के लिए यह युग सर्वाधिक प्रभावी है।

.
राग-द्वेष और अहंकार से मुक्ति हमारी आध्यात्मिक यात्रा में सबसे पहला मापदंड यानि मील का पत्थर है। राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही महात्मा कहलाने का अधिकारी है, क्योंकि इस स्थिति में वह महत् तत्व से जुड़ जाता है।
.
हमारे कमजोर क्षणों में भगवान न केवल हमारी रक्षा करते हैं, बल्कि हमें नई ऊर्जा भी प्रदान करते हैं। भगवान ने हमें पुरुषार्थ और तप करने की शक्ति दी है, उसका उपयोग करें। कूटस्थ में परमब्रह्म का ध्यान सबसे बड़ा सकारात्मक कर्म और सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।
.
एक बार अपने दुर्बल क्षणों में मैंने भगवान से अपनी रक्षा की प्रार्थना पूर्ण मनोयोग से की। अप्रत्याशित रूप से मैंने अनुभूत किया कि स्वयं हनुमान जी वीरमुद्रा में मेरे पीछे खड़े हैं, और मेरी रक्षा कर रहे हैं। सारी दुर्बलताऐं तिरोहित हो गयीं। इस का परिणाम यह हुआ कि सुषुम्नानाड़ी अपनी ब्राह्मी उपनाड़ी सहित चैतन्य हो गई, और मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र तक प्राण-प्रवाह निर्बाध रूप से होने लगे। ऐसे ही एक दिन सहस्त्रारचक्र से ऊपर का आवरण भी हट गया। सूक्ष्म जगत इतना अधिक विराट है कि उस के बारे में कुछ भी लिखना यहाँ उचित नहीं होगा। केवल एक बात जो मैं सत्यनिष्ठा से जानना चाहता था, वह अवगत हो गई, और उस दिशा में मार्गदर्शन भी मिलने लगा। अन्य कुछ जानने की इच्छा न तो है और न ही होगी।
.
ऊर्ध्वमूल कूटस्थ में परमब्रह्म का ध्यान ही मेरी एकमात्र साधना है और वही रहेगी। वे परमब्रह्म ही परमशिव हैं, और वे ही पुरुषोत्तम हैं। यह जीवन उन्हें समर्पित है, और कुछ भी नहीं चाहिए। पूरा मार्गदर्शन मुझे प्राप्त है, अतः कोई संशय नहीं है।
.
इस संसार में अनेक विसंगतियाँ हैं। भगवान उनसे बचाकर रखें। इतना अधिक छल, कपट, असत्य, लोभ और कुटिलता है कि भगवान ही इनसे रक्षा कर सकते हैं। अन्यथा इनसे बचना मनुष्य के वश की बात नहीं है। भगवान इन सब बुराइयों से बचाकर रखें और अपने सन्मार्ग पर अग्रसर करते रहें। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
३ नवंबर २०२६

Sunday, 1 November 2026

(१) दूसरों से सम्मान की अपेक्षा सबसे बड़ा धोखा है, इससे बचकर रहो। (२) अंतगति सो मति सो गति।

 (१) दूसरों से सम्मान की अपेक्षा सबसे बड़ा धोखा है, इससे बचकर रहो।

(२) अंतगति सो मति सो गति।
.
अपनी पढ़ाई-लिखाई, धन-संपत्ति और पद का अभिमान, यहाँ तक कि पुण्य का अभिमान भी पतन का सबसे बड़ा कारण है। गीता में भगवान कहते हैं ---
"अमानित्वम् अदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥१३:७॥"
"इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥१३:८॥"
"असक्तिरनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ||१३:९॥"
.
यमराज को सामने देखकर बड़े-बड़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। कहते हैं कि यमराज के भैंसे के गले की घंटी की कर्कश ध्वनि सुनकर पूरे जीवन की तस्वीर सामने आ जाती है। इतने में यमराज प्राण हर लेते हैं। इसलिए ईश्वर का स्मरण हर समय रखो। ये पंक्तियाँ पढ़कर (यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो) कृपा कर के गीता के आठवें अध्याय "अक्षरब्रह्म योग" का स्वाध्याय आज से ही कीजिये, बार बार करते रहिए जब तक याद न हो जाये।
.
नर्क अनेक हैं और अनेक तरह के हैं। स्वर्ग की कामना भी एक नर्क ही है। ईश्वर की कृपा से एक नर्क की यात्रा मैंने भी की है, इससे स्वर्ग जाने की कामना का कभी जन्म ही नहीं हुआ। इन से परे केवल परमब्रह्म परमात्मा की ही सोचिये।
ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
१ नवंबर २०२६

Wednesday, 14 October 2026

शक्ति का स्थूल और सूक्ष्म रूप ---

 शक्ति का स्थूल और सूक्ष्म रूप ---

.
बचपन से ही धार्मिकता के संस्कार तो पूर्व जन्म से ही थे। किशोरावस्था से ही ईश्वर की उपासना अकिंचन-भाव से होती थी। कालांतर में यह अकिंचन भाव ही सर्वस्व-भाव बन गया। जीवन की युवावस्था के आरंभ में अंधकार का एक काल आया। युवावास्था के आरंभ में ही मैंने जीवन में अनेक विसंगतियाँ, अभाव और अन्याय देखे थे, जिनका परिणाम यह हुआ कि मैं मार्क्सवाद के घने अंधकार से घिर कर नास्तिक हो गया। यह जीवन का एक अंधकारमय काल था।
.
मेरे साथ सूक्ष्म जगत के संपर्क की अनेक ऐसी अलौकिक असामान्य दिव्य घटनाएँ घटित हुईं हैं जिन पर कोई भी विश्वास नहीं करेगा। अतः उनकी चर्चा मैं नहीं करूंगा। लगता है पूर्व जन्म में कुछ अच्छे कर्म किए थे, जिनके फल मिलने आरंभ हो गये। पूर्व जन्म की कुछ स्मृतियाँ जागृत हुईं। सूक्ष्म जगत में पूर्व जन्म के जो गुरु थे उनकी भी कृपा हुई। उनकी कृपा से ही जीवन का अंधकार दूर होना आरंभ हो गया। आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल, और पुनर्जन्म के सत्य का बोध भी अपने अनुभवों से हुआ।
.
आध्यात्म के इस मार्ग पर जब पदार्पण किया तब साधना का आरंभ मैंने गुरु के आदेशानुसार "अजपा-जप" से किया। फिर उनके आदेशानुसार ही ज्योतिर्मय-ब्रह्म का ध्यान आरंभ किया। यह करते करते गुरु-कृपा से एक तीसरी चीज और जुड़ गई, वह था प्रणव मंत्र का श्रवण। जो बाद में बिना प्रयास के स्वतः ही होने लगा। ये तीनों चीजें आपस में जुड़कर एक हो गईं। निराशा के भी अनेक क्षण आए लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। एक दिन ध्यान करते करते गुरु कृपा से कूटस्थ में ब्रह्म-ज्योति के दर्शन हुए। धीरे-धीरे वह ब्रह्म-ज्योति भी साधना का भाग हो गई। गुरु के आदेशानुसार फिर हठयोग की कुछ मुद्राओं, आसनों, व प्राणायामों आदि का अभ्यास किया। खेचरी मुद्रा मुझे सिद्ध नहीं हुई। तब अर्ध-खेचरी से ही काम चलाने लगा। सन १९८१ के दिसंबर माह में मुझे सूक्ष्म जगत से ही क्रियायोग की दीक्षा प्राप्त हुई। विधिवत दीक्षा सन १९८५ में ली।
.
गीता में भगवान कहते हैं --
"त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः॥४:२०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष, कर्मफलासक्ति को त्यागकर, नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता है॥
"निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥४:२१॥"
अर्थात् -- जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है, जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है, ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है॥
"यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥४:२२॥"
अर्थात् -- यदृच्छया (अपने आप) जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही सन्तुष्ट रहने वाला, द्वन्द्वों से अतीत तथा मत्सर से रहित, सिद्धि व असिद्धि में समभाव वाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बंधता है॥
.
मेरा अनुभव कहता है कि एक साधक को सर्वप्रथम ईश्वर की शक्ति के स्थूल रूप की साधना द्वारा अनुभूति प्राप्त करनी चाहिए। ईश्वर की शक्ति का स्थूल रूप -- श्वास-प्रश्वास है। हर सांस के साथ ईश्वर का स्मरण हो। उस समय चेतना कूटस्थ में हो। यह साधना अजपा-जप या हंस-गायत्री द्वारा सम्पन्न होती है।
तत्पश्चात् -- शक्ति के सूक्ष्म रूप का ध्यान होता है जो प्राण-तत्व पर होता है। प्राण-तत्व का घनीभूत रूप ही कुंडलिनी महाशक्ति है। इस विषय की सार्वजनिक चर्चा का निषेध है क्योंकि इस साधना में यम-नियमों का पालन अनिवार्य है। बिना यम नियमों के पालन के प्राण-तत्व की सूक्ष्म साधना से मस्तिष्क के विकार हो सकते हैं, जो इस जन्म में ठीक नहीं होते। उन्हें ठीक करने के लिए नया जन्म ही लेना पड़ता है।
गीता के इस विषय पर गीता का एक कूट श्लोक है --
"अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥४:२९॥"
अर्थात् -- अन्य (योगीजन) अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, तथा प्राण में अपान की आहुति देते हैं, प्राण और अपान की गति को रोककर, वे प्राणायाम के ही समलक्ष्य समझने वाले होते हैं॥
गीता में इस विषय पर और भी संकेत हैं ---
"स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥५:२७॥"
अर्थात् -- बाह्य विषयों को बाहर ही रखकर नेत्रों की दृष्टि को भृकुटि के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके॥"
"यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥५:२८॥"
अर्थात् -- जिस पुरुष की इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि संयत हैं, ऐसा मोक्ष परायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित है, वह सदा मुक्त ही है॥
.
उपरोक्त साधनाओं में सिद्ध गुरु का मार्ग दर्शन अनिवार्य है। श्रुति भगवती कहती है कि गुरु वही हो सकता है जो श्रौत्रीय हो यानि जिसे श्रुतियों का ज्ञान हो, और जो ब्रह्मनिष्ठ हो ---
"परीक्ष्य लोकान्‌ कर्मचितान्‌ ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन |
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्‌ समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्‌ ||"
(मुण्डक. १:२:१२)
अतः किसी ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय गुरु से ही मार्गदर्शन प्राप्त करें।
ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
१४ अक्तूबर २०२६
.
पुनश्च: -- शक्ति का स्थूल रूप शरीर में - श्वास है। शक्ति का सूक्ष्म रूप शरीर में - प्राण है। श्वास का ज्ञान किये बिना प्राण का बोध नहीं किया जा सकता। श्वासों की उपासना करके ही धीरे धीरे शाश्वत परमप्राण (महाप्राण) की अनुभूति होती है।
साधना का परम लक्ष्य है कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन। जो श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम हैं, तंत्र में वे ही परमशिव हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों एक हैं। जो शिव हैं वे ही विष्णु हैं, और जो विष्णु हैं वे ही शिव हैं।
"ॐ शिवाय विष्णु रूपाय शिव रूपाय विष्णवे ।
शिवस्य हृदयं विष्णुं विष्णोश्च हृदयं शिवः ॥
यथा शिवमयो विष्णुरेवं विष्णुमयः शिवः ।
यथान्तरं न पश्यामि तथा मे स्वस्तिरायुषि ॥
यथाऽन्तरं न भेदाः स्युः शिवराघवयोस्तथा ॥"

Tuesday, 13 October 2026

जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ ---

 जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ ---

.
दोष हमारी डुबकी में है, महासागर में नहीं| जब हमें महासागर में मोती ही ढूँढने हैं तो वे समुद्र तट की रेत में लात मारने से नहीं मिलेंगे| उसके लिए समुद्र की गहराई में डुबकी लगानी होगी| जो गहरे पानी में उतरेंगे उन्हें ही मोती मिलेंगे, न कि ऊपरी सतह पर तैरने वालों को| यदि मोती नहीं मिलते हैं तो इसमें सागर का क्या दोष है? दोष तो डुबकी में है|
.
परमात्मा को उपलब्ध होने के लिए भी स्वयं को गहराई में उतरना होगा| कोई दूसरा हमारे लिए यह कार्य नहीं कर सकता| किसी के पीछे पीछे भागने से कुछ नहीं होने वाला| मात्र प्रवचन सुनने, मात्र ग्रंथों का अध्ययन करने या ऊँची ऊँची दार्शनिक बातों से कुछ नहीं होगा| आहुती स्वयं की ही देनी होगी|
.
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१३ अक्टूबर २०१६