Tuesday, 18 August 2026

मनुष्य का स्वभाविक स्वधर्म है ..... "परम तत्व की खोज और उससे एकात्मता" ---

 मनुष्य का स्वभाविक स्वधर्म है ..... "परम तत्व की खोज और उससे एकात्मता"| इस स्वधर्म की रक्षा का अनवरत प्रयास ही मेरी दृष्टि में आध्यात्म है, अन्य कुछ भी नहीं| आध्यात्म कोई व्यक्तिगत मोक्ष, सांसारिक वैभव, इन्द्रीय सुख या अपने अहंकार की तृप्ति की कामना का प्रयास नहीं है| यह कोई दार्शनिक वाद विवाद या बौद्धिक उपलब्धी भी नहीं है| साथ साथ सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों का विनाश भी हमारा लौकिक धर्म है|

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भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का जीवन हमारे लिए आदर्श है| उन जैसे महापुरुषों के गुणों को स्वयं के जीवन में धारण करना, उन की शिक्षा और आचरण का पालन करना भी एक सच्ची आराधना है| भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने जन्म से ही धर्मरक्षार्थ, धर्मसंस्थापनार्थ, व धर्मसंवर्धन हेतु शौर्य संघर्ष व संगठन साधना का आदर्श रखा|
भगवान श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान अर्जुन को कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में दिया, इस प्रसंग के आध्यात्मिक सन्देश को समझें कि रणभूमि में उतरे बिना यानि साधना भूमि में उतरे बिना हम आध्यात्म को, स्वयं के ईश्वर तत्व को उसके यथार्थ स्वरुप में अनुभूत नहीं कर सकते|
भगवान श्रीराम ने भी धर्मरक्षार्थ अपने राज्य के वैभव का त्याग किया, और भारत में पैदल भ्रमण कर अत्यंन्त पिछड़ी और उपेक्षित जातियों को जिन्हें लोग तिरस्कार पूर्वक वानर और रीछ तक कह कर पुकारते थे, संगठित कर धर्मविरोधियों का संहार किया| लंका का राज्य स्वयं ना लेकर विभीषण को ही दिया| ऋषि मुनियों की रक्षार्थ ताड़का का वध भी किया|
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उपरोक्त दोनों ही महापुरुष हजारों वर्षों से हमारे प्रातःस्मरणीय आराध्य हैं|
स्वयं के भीतर के राम और कृष्ण तत्व से एकात्म ही आध्यात्म है, यही सच्ची साधना है, यही शिवत्व की प्राप्ति है| ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अगस्त २०१४

जाने कहाँ गये वो दिन

 जीवन में आमूलचूल परिवर्तन भी पीड़ा देता है। जो कुछ भी जीवन में मैंने देखा, वह सारा परिदृश्य ही बदल गया है। पुराने लोग ऊपर चले गए। बड़े बड़े शानदार भवन सूने होकर खंडहर होने लगे हैं। सारे शत्रु-मित्र पता नहीं कहाँ चले गए। बड़े-बड़े राजसी महल, बड़ी-बड़ी हवेलियाँ, अब सुनसान और खंडहर हो रही हैं। कभी ये भी बहुत शानदार थीं, और बड़े-बड़े शानदार लोग इनमें भी रहते थे। हमारी दो सौ वर्ष पुरानी पारिवारिक हवेली जो कभी बहुत शानदार थी, अब देखभाल के अभाव में खंडहर हो रही है, जिसे देखकर पीड़ा होती है। इतने विभाजन हो गए हैं कि मरम्मत करवाए तो भी कौन? हमारे पूर्वजों की छह-सात पीढ़ियाँ उसमें रही हैं। मेरा भी बचपन, किशोरावस्था और यौवन का कुछ भाग उसी में बीता है।

हमारे यहाँ महाजनों की तो बहुत बड़ी बड़ी शानदार हवेलियाँ हैं, जो खाली और सुनसान पड़ी हैं। उनके मोहल्ले खाली और वीरान हो गए हैं। कई हवेलियाँ तो बिक भी गई हैं, जिन्हें तोड़कर लोगों ने बाजार बना दिये हैं। पुराने लोग भी अब दिखाई नहीं देते। जो युवा पीढ़ी दिखाई देती है, उनमें वह प्रेम नहीं है।
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मेरे पिताजी ने हमारे नगर में सबसे पहिला रेडियो खरीदा था जो बैटरी से चलता था। प्रति सप्ताह बिनाका गीतमाला सुनने के लिए और वर्ष में एक बार बजट सुनने के लिए हमारी बैठक लोगों से भर जाती थी। सन १९६२ की लड़ाई के समय समाचार सुनने के लिए रात भर लोगों की भीड़ उन सब मकानों के चक्कर लगाती थी जिनके पास रेडियो थे। सबसे पहिले ग्रामोफोन और हर घंटे बज कर समय बताने दीवार घड़ी भी हमारे नगर में सबसे पहिले पिताजी ने ही खरीदी थी।
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हमारे नगर में गिन्नी नाम का एक दर्जी था जो खानदानी लोगों के ही कपड़े सिलता था, हर किसी के नहीं। हमारे पिताजी की शेरवानी, चूड़ीदार पायजामा, और कुर्ता आदि सारे वस्त्र वह ही सिलता था। जब वह दर्जी मर गया उसके बाद हमारे पिताजी ने किसी दूसरे दर्जी से कपड़े सिलवाये ही नहीं। पूरे जीवन भर उन्होने खादी ही पहिनी।
ऐसे ही एक रहमान धोबी था जो सिर्फ खानदानी लोगों के ही कपड़े धोता था, हर किसी के नहीं। हमारे पिताजी ने जीवन भर उसी से कपड़े धुलवाये। जब रहमान धोबी मर गया तो पिताजी ने किसी दूसरे धोबी से कपड़े धुलवाये ही नहीं। घर पर ही कपड़े धो लेते थे।
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हमारे पिताजी के पास दो लाइसेन्सी बारह बोर की बंदूकें और एक लाइसेन्सी रिवॉल्वर और दो तलवारें थीं। ऊंट और घोड़े की बहुत अच्छी सवारी करते थे। ब्राह्मण होकर भी उन्हें हर तरह के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग आता था। हम बच्चे थे तभी उन्होने अपने सारे हथियार आधिकारिक तरीके से बेच दिये थे, हमारे लिए कुछ भी नहीं छोड़ा।
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर कुएं से अपने हाथ से खींच कर जल भरते, उस से स्नान करते, और दो घंटे शिवपूजा करते। शिवपूजा उनके जीवन का अभिन्न अंग थी।
उस समय लगभग सारे ब्राह्मणों का जीवन बड़ा संघर्ष और कष्टमय था। हँसते हँसते उन्होने सारे कष्ट सहन किए। उन्होने भी समय का परिवर्तन देखा और उसकी पीड़ा सदैव उनके मानस में रही।
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समय का यानि जमाने का पीड़ादायक परिवर्तन मैं भी देख रहा हूँ। एक अदृश्य शक्ति बार बार मुझे कह रही है कि सब कुछ बदल जाएगा, लेकिन परमात्मा शाश्वत और अपरिवर्तनीय है। मुझे सुख-शांति और सुरक्षा भगवान के ध्यान में ही मिलती है। इस भौतिक जीवन का शेष भाग भी भगवान के ध्यान में ही व्यतीत हो जाये तो ठीक है।
हर हर महादेव॥ जय सियाराम॥
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अगस्त २०२३

अफीम के उत्पादन और उपयोग पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण है जो और भी अधिक कठोर होना चाहिए।

 अफीम के उत्पादन और उपयोग पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण है जो और भी अधिक कठोर होना चाहिए। दर्दनाशक और अवसाद-मुक्ति की दवाइयों के निर्माण के लिए अफीम की आवश्यकता पड़ती है, जिसके उत्पादन के लिए किसानों को सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता है। बिना लाइसेंस के अफीम उगाना एक अपराध है जिसमें जमानत भी नहीं होती।

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पंजाब एक अत्यधिक संवेदनशील प्रांत है, जहाँ पाकिस्तान से चोरी-छिपे बहुत बड़ी मात्रा में अफीम की तस्करी होती है। खालिस्तानी आंदोलन के लिए सारा धन अफीम की तस्करी से आता है। पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर की सारी समस्याओं का एकमात्र कारण अफीम का अवैध उत्पादन और तस्करी है। वहाँ चर्च के संरक्षण में बाहर से आकर बसी हुई जनजातियाँ अफीम का उत्पादन व तस्करी करती हैं, और स्थानीय लोग जब विरोध करते हैं तब उनकी हत्या होने लगती हैं। सारे समाचार माध्यम यानि प्रेस और स्थानीय प्रशासन बिका हुआ है। वर्तमान भारत सरकार की अत्यधिक सख्ती यानि कठोरता के कारण ही स्थिति नियंत्रण में हैं, अन्यथा वह सारा क्षेत्र ही जल उठे। आतंकवादियों को सारा धन नशीले पदार्थों की तस्करी से आता है।
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दक्षिणपूर्व एशिया के इन तीन देशों -- सिंगापूर, मलयेशिया और इंडोनेशिया में यदि किसी के पास जरा सी भी अफीम पाई जाती है, तो उसकी सजा तुरंत मृत्युदंड है। उसकी कोई सुनवाई नहीं होती। जापान, चीन (होङ्ग्कोंग सहित) अमेरिका और लगभग सारे यूरोप में इसकी सजा उम्रकैद यानि आजीवन-कारावास है।
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इतनी कठोरता के बावजूद भी पूरी दुनियाँ में अफीम की तस्करी होती है, क्योंकि इसमें बहुत अधिक धन लगा हुआ है। सारे नशीले ड्रग अफीम से ही बनते हैं। अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की सरकार भी अफीम की तस्करी को नहीं रोक सकी है। अमेरिका ने अफगानिस्तान पर आक्रमण और अधिकार किया उसके मुख्य कारणों में से एक था इस क्षेत्र को अफीम के उत्पादन से मुक्त करना। विश्व में सबसे अधिक अफीम अफगानिस्तान में उगाई जाती है। वहाँ की अर्थव्यवस्था ही अफीम की तस्करी से चलती है। लेकिन अमेरिका के सैनिक ही जब नशा करने लगे तब अमेरिका को वहाँ से भागना पड़ा।
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इसका एक ही इलाज है कि स्वयं बच कर रहो, और अपने परिवार के बच्चों को बचाकर रखो। किसी भी तरह का नशा चाहे वह शराब का ही क्यों न हो, छोड़ दें। अपने बच्चों के सामने भूल कर भी नशा न करें। जो लोग नशा करते हैं, उनसे दूर रहें। अपने घर में तो ऐसे किसी नशा करने वाले व्यक्ति को घुसने ही न दें। और हम कुछ भी नहीं कर सकते।
१९ अगस्त २०२५

दान-पुण्य से उत्तम गति तो प्राप्त होती है, पर जन्म-मरण से छुटकारा नहीं मिलता। परमात्मा को पूर्ण समर्पण ही सबसे बड़ी साधना है।

 दान-पुण्य से उत्तम गति तो प्राप्त होती है, पर जन्म-मरण से छुटकारा नहीं मिलता। परमात्मा को पूर्ण समर्पण ही सबसे बड़ी साधना है। गीता में भगवान कहते हैं --

"तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥६:४६॥"
अर्थात् - "क्योंकि योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, और (केवल शास्त्र के) ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, तथा कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो॥"
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पीछे मुड़कर न देखें, दृष्टि सदा सामने ही रहे, व चलते रहें। रुको मत। मन लगे या न लगे, अपना साधन न छोड़ें। दिन में तीन-चार घंटे तो भजन (नामजप, ध्यान प्राणायाम आदि) करना ही है। कोई बहाने न बनाएँ। मन नहीं लगे तो भी बैठे रहो, पर साधन छूटना नहीं चाहिए। बाधाएँ तो बहुत आयेंगी। असुर और देवता भी नहीं चाहते कि किसी साधक की साधना सफल हो। वे भी मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करते रहते हैं। इस मार्ग में सिर्फ सद्गुरु की कृपा ही काम आती है। गुरु चूंकि परमात्मा के साथ एक है, और उनसे बड़ा हितकारी अन्य कोई नहीं है, अतः उन्हीं की कृपा साधक की रक्षा करती है।
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सूक्ष्म प्राणायाम द्वारा पाप नष्ट होते हैं, जिनकी विधि सिद्ध गुरु ही बता सकता है। गुरु सेवा का अर्थ होता है -- "गुरु-प्रदत्त साधना का अनवरत नियमित अभ्यास।" परमात्मा के किस रूप का ध्यान करना है, वह भी गुरु ही बताता है।
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२१

विश्व की स्थिति बड़ी विचित्र है।

 विश्व की स्थिति बड़ी विचित्र है। यहाँ मैं अपनी आंतरिक अनुभूतियाँ ही लिख रहा हूँ जो विश्व की वर्तमान घटनाओं का मेरा विश्लेषण है। कोई आवश्यक नहीं है कि इससे कोई सहमत ही हो। मैं जो लिख रहा हूँ, किसी की भावनाओं को आहत किए बिना मेरा अभिव्यक्ति का अधिकार है।

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चीन से युद्ध करने के लिए अमेरिका इस समय बहुत अधिक व्याकुल है। उसके साथ साथ ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान और लगभग पूरा पश्चिमी यूरोप प्रतीक्षारत है। अपने वर्चस्व के विस्तार के लिए अमेरिका हृदय से चाहता है कि रूस, चीन और भारत का सर्वनाश हो। इन को नष्ट कर के ही अमेरिका विश्व पर राज्य कर सकता है।
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रूस का सर्वनाश करने के,लिए रूस को यूक्रेन से लड़ा दिया गया है। और अन्य रूस के पड़ोसियों को भी रूस से लड़ाने की योजनाएँ बन रही हैं। रूस से सीधे लड़ने की अमेरिका की हिम्मत नहीं है इसलिए रूस को पड़ोसियों से लड़ाया जा रहा है। चीन को मौका मिलते ही अमेरिका नष्ट कर देगा। वह कभी नहीं चाहेगा कि चीन एक महाशक्तिशाली देश बने। अमेरिका को पता है कि चीन को यदि अभी नष्ट नहीं किया गया तो चीन इतना शक्तिशाली हो जाएगा कि वह अमेरिका को ही नष्ट कर देगा। भारत से मित्रता इस समय अमेरिका कर रहा है क्योंकि चीन के विरुद्ध वह भारत का सहयोग चाहता है।
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चीन को नष्ट करने के बाद अमेरिका का अगला लक्ष्य भारत होगा ---
अमेरिकी साम्राज्यवाद के विस्तार में भारत का हिन्दुत्व सबसे बड़ा बाधक है।
लेकिन इसकी नौबत आएगी ही नहीं। चीन और रूस से युद्ध में अमेरिका स्वयं भी नष्ट हो सकता है। भारत एक महाशक्ति बनाकर उभरेगा।
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अधिक विस्तार से मैं और नहीं लिखना नहीं चाहता। आप अपने निज विवेक से सोच लीजिये कि क्या होगा। मैंने जो भी लिखा है वह एक कटु सत्य है।
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जय श्रीकृष्ण !! भारत की रक्षा भगवान करेंगे। भगवान ही दुष्टों का नाश कर सज्जनों की रक्षा करेंगे। वह समय शीघ्र आ रहा है।
"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥"
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२२

कर्ता कौन है? ---

 सारी सृष्टि, सारे सूर्य-चन्द्र, ग्रह-नक्षत्र, सब एक नियम से चल रहे हैं। पृथ्वी नियमित रूप से अपने सूर्य की परिक्रमा कर रही है। अग्नि की लपट ऊपर की ओर, व जल की गति नीचे की ओर है। वायु अपनी ही चाल से चलती है। इस देह में रक्त का संचार हो रहा है, बाल और नाखून अपने आप बढ़ रहे हैं, भूख-प्यास व सर्दी-गर्मी लग रही है, शरीर की सारी क्रियाएँ अपने आप हो रही हैं। अपने आप ही अनेक तरह की वासनाओं का जन्म होता है। जीवन में सुख-दुःख की अनुभूतियाँ होती हैं। तरह तरह की स्पृहाओं/आकांक्षाओं व प्रेम और अभीप्सा का जन्म होता है। नित्य इतने लोगों का जन्म और मृत्यु होती है। इन सब का कर्ता कौन है? मैं कौन हूँ? कभी इन पर भी विचार करो, जीवन धन्य होगा।

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मेरी साधनाजन्य अनुभूति तो यही है कि एकमात्र कर्ता -- प्राण-तत्व के रूप में भगवती महाकाली है, जो सारे कर्मों की कर्ता है और उनका फल श्रीकृष्ण (परमशिव) को अर्पित कर रही हैं। लोकयात्रा हेतु मिले इस देह रूपी वाहन में वे कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में ब्रह्मनाड़ी में विचरण करते हुए स्वयं सारी साधना कर रही हैं और उसका फल परमशिव को अर्पित कर रही हैं।
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प्रश्न उठता है कि 'मैं' कौन हूँ? जिसका उत्तर अभी तो यही मिल रहा कि 'मैं' परमशिव की अनंत विराटता हूँ, जिसका एक अंश इस समय तो इस देह के माध्यम से व्यक्त हो रहा है। जिस दिन मुझ में विचरण कर रही भगवती स्वयं को परमशिव को समर्पित कर देगी, उस दिन मैं भी परमशिव के साथ एक हो जाऊंगा। यह उनका अनुग्रह और जीवन की पूर्णता होगी। कहीं कोई पृथकता का अवशेष नहीं रहेगा।
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जो गुरु रूप में, माता-पिता, व सभी संबंधियों के रूप में आईं, वे स्वयं भगवती ही थीं। वे ही इस जन्म से पूर्व मेरे साथ थीं, और वे ही मृत्यु के पश्चात भी मेरे साथ ही रहेंगी। उनका साथ शाश्वत है। जीवन के सारे अच्छे-बुरे अनुभवों की प्रदाता भी वे ही हैं। अंतिम बात यह कह रहा हूँ कि वे स्वयं ही मेरे और परमशिव परमात्मा के मध्य की कड़ी हैं। परमात्मा से मेरा संबंध उन्हीं के माध्यम से है। उनकी कृपा ही मुझे परमात्मा के साथ एक करेगी। और कुछ भी इस समय कहने के लिए नहीं है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२२

सनातन धर्म अभी भी जीवित क्यों है? ---

 सनातन धर्म अभी भी जीवित क्यों है? ---

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हरेक मनुष्य की चेतना में एक शाश्वत जिज्ञासा है -- सत्य को जानने की। सत्य ही परमात्मा है। दूसरे शब्दों में परमात्मा ही एक मात्र सत्य है जिसे जाने बिना मनुष्य को जीवन में संतुष्टि और तृप्ति नहीं मिलती। इस शाश्वत जिज्ञासा ने ही सनातन धर्म को जीवित रखा है। जब तक मनुष्य की चेतना में सत्य को जानने की जिज्ञासा है, तब तक सनातन धर्म अमर है, और जीवित रहेगा। सनातन धर्म तब तक रहेगा जब तक यह सृष्टि है।
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पुनर्जन्म, कर्मफल, आत्मा की शाश्वतता, और ईश्वर के अवतार -- ये सनातन धर्म के आधार हैं, जो कभी भी इस सृष्टि में समाप्त नहीं किए जा सकते, क्योंकि यह सृष्टि इन्हीं पर आधारित है।
देखिये क्या विडम्बना है!! ईसाईयायत, इस्लाम और मार्क्सवाद -- तीनों ही आपस में एक-दूसरे के शत्रु हैं, ये सदा ही आपस में लड़ते आए हैं, लेकिन हिन्दुत्व के विरोध में तीनों मिलकर एक हो जाते हैं।
सत्य को अस्थायी रूप से छिपाया तो जा सकता है, कभी नष्ट किया जा सकता।
असत्य का अंधकार कितना भी प्रबल हो, लेकिन प्रकाश के समक्ष टिक नहीं सकता।
इस समय तमोगुण की प्रधानता के कारण असत्य और अंधकार की शक्तियाँ हावी हैं। इसका निदान यही है कि हम अपने निजी जीवन में परमात्मा के प्रकाश को प्रकट करें। अन्य कोई उपाय नहीं है।
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पुनश्च: --- वर्तमान में "हिंसा" शब्द का अर्थ गलत लगाया गया है। महाभारत में विभिन्न संदर्भों में पचास से अधिक बार -- "अहिंसा परमो धर्म:" कहा गया है। यदि आप महाभारत का ठीक से स्वाध्याय करेंगे तो पायेंगे कि हिंसा का जन्म मनुष्य के लोभ और अहंकार से ही होता है। दूसरे शब्दों में लोभ और अहंकार से मुक्ति ही अहिंसा है।
"हिन्दू" शब्द का अर्थ जो मुझे समझ में आया है, वह यह है कि जो भी व्यक्ति हिंसा से दूर है, वह हिन्दू है। हिंसा -- यानि लोभ और अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही हिन्दू कहलाने का अधिकारी है।
दुर्भाग्य से इस समय ऐसा लग रहा है कि ईसाईयत से हिन्दुत्व हार रहा है। लेकिन ऐसा हो नहीं सकता। ईसायत के दो ही आधार हैं -- मूल पाप की अवधारणा, और पुनरोत्थान। ये दोनों ही अवधारणाएँ काल्पनिक और अवैज्ञानिक हैं, व लोभ और भय पर आधारित हैं। इनमें कोई सत्य नहीं है। सारी अवैज्ञानिक और असत्य अवधारणाएँ एक दिन समाप्त हो जाएंगी।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ अगस्त २०२३