भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। हम अपनी आध्यात्मिक साधना परमात्मा को पूरी तरह समर्पित करने के लिए ही करते हैं। इससे धर्म और राष्ट्र की रक्षा स्वतः ही होती है। यह हमारा सर्वोपरी कर्तव्य और स्वधर्म है।
योगोदय (Yogodaya)
स्वयं के आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति ही इस ब्लॉग का एकमात्र उद्देश्य है |
Tuesday, 17 February 2026
भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। हम अपनी आध्यात्मिक साधना परमात्मा को पूरी तरह समर्पित करने के लिए ही करते हैं। इससे धर्म और राष्ट्र की रक्षा स्वतः ही होती है। यह हमारा सर्वोपरी कर्तव्य और स्वधर्म है। .
अजपा जप, हंसयोग, हँसवती ऋक ---
(जिनकी आस्था हो वे ही मेरे लेखों को पढ़ें, अन्य सब इन्हें गल्प मानकर इन की उपेक्षा कर दें, व अपने अमूल्य समय को नष्ट न करें)
हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य का अंधकार टिक ही न सके --
हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य का अंधकार टिक ही न सके --
यह "मनुवाद" क्या है ? ---
यह "मनुवाद" क्या है ? --- एक समय था जब साम्यवादी (मार्क्सवादी) लोग किसी को गाली देते तो उसको "प्रतिक्रियावादी", "पूंजीवादी", "फासिस्ट" और "बुर्जुआ" आदि शब्दों से विभूषित करते| ये उनकी बड़ी से बड़ी गालियाँ थीं| किसी की प्रशंसा करते तो उसको "प्रगतिवादी"और 'मानवतावादी" कहते|
ध्यान साधना से साधक को शांति, संतुष्टि और आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं ---
ध्यान साधना से साधक को शांति, संतुष्टि और आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं| किस तरह के रंग और ध्वनियाँ सुनती हैं इसका बर्णन यौगिक साहित्य में भरा पड़ा है| ये सब आनंददायक होते हैं| साधना में विक्षेप उन्ही साधकों को होता है जिनमें वासनात्मक विचार होते हैं| मेरा तो यह मानना है कि ध्यान उसी को करना चाहिए जिसमें ईश्वर के प्रति प्रेम भरा पडा हो और जो ईश्वर को समर्पित होना चाहते हैं| वासनात्मक विचारों से भरा ध्यान साधक निश्चित रूप से आसुरी शक्तियों का उपकरण बन जाता है| इसीलिए पतंजलि ने यम-नियमों पर इतना जोर दिया है| गुरु गोरखनाथ तो अपने शिष्यों के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की पात्रता अनिवार्य रखते थे| स्वामी विवेकानंद ने भी ध्यान साधना से पूर्व ब्रह्मचर्य को अनिवार्य बताया है| सभी ध्यान साधकों के लिए एक अचूक प्रयोग बता रहा हूँ| पूर्ण प्रभुप्रेम के साथ इसे करने से निश्चित रूप से शीघ्रातिशीघ्र लाभ होगा| शौचादि से निवृत होकर सूर्यनमस्कार और महामुद्रा का अभ्यास कर पंद्रह से बीस बार अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें| फिर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर एक ऊनी कम्बल पर पद्मासन या सिद्धासन या वज्रासन में बैठ जाएँ| गुरु और परमात्मा को नमन कर कुछ देर अजपा-जप का अभ्यास करें इससे मन शांत हो जायेगा| फिर श्वास-प्रश्वास के साथ निम्न बीज मन्त्रों का जाप प्रत्येक चक्र पर करें ----- मूलाधार पर -- "लं", स्वाधिष्ठान -- "वं", मणिपुर -- "रं", अनाहत -- "यं", विशुद्धि -- "हं", आज्ञा -- "ॐ"| जितनी देर तक कर सकें करें| अंत में आज्ञाचक्र पर ही "ॐ" के साथ रुक जाएँ| श्वास-प्रश्वास सामान्य चलने दें| तीन बार योनिमुद्रा का अभ्यास करें| योनिमुद्रा (ज्योतिमुद्रा) करते समय ओम के जाप के साथ आज्ञाचक्र पर तीब्रतम प्रहार करें| फिर जितना कर सकते हैं उतनी देर तक ॐ की ध्वनी को सुनते हुए ध्यान करें| ध्यान के पश्चत कुछ देर तक अपने आसन पर बैठे रहें| तुरंत न उठें| फिर गुरु और परमात्मा को नमन करते हुए सर्वस्व की मंगलकामना के साथ प्रार्थना करते हुए ही अपना आसन छोड़ें| यदि पूर्णप्रेम के साथ उपरोक्त साधना की जाये तो आमूलचूल आपका व्यक्तित्व सकारात्मक रूप से बदलना आरम्भ हो जाएगा| आपके भाव और विचार भी पवित्र हो जायेंगे| भगवन श्री कृष्ण सब गुरुओं के गुरु हैं| उनकी शरण लेने पर आपका कुछ भी अनिष्ट नहीं होगा| जय श्री कृष्ण ! ॐ तत्सत|
कृपा शंकर
Monday, 16 February 2026
हमारा सारा कार्य भगवान की चेतना में हो, हम निरंतर उन की चेतना में रहें ---
हमारा सारा कार्य भगवान की चेतना में हो, हम निरंतर उन की चेतना में रहें ---