मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, और मेरे एकमात्र मित्र वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं। वे ही सब रूपों में आये, वे ही सर्वस्व यह सम्पूर्ण विश्व हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही गोविंद हैं, और वे ही यह "मैं" बने हुए हैं।
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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
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यह सम्पूर्ण विश्व (सृष्टि) भगवान विष्णु हैं। जिनका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है, उन्हें वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है।
"ॐ विश्वं विष्णु:" --- बस इतना ही पर्याप्त है पुरुषोत्तम के गहनतम ध्यान में जाने के लिए॥ जो विष्णु हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं॥
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मैं प्रत्यगात्मा उन्हीं से निःसृत और उन्हीं से उद्भूत/उद्भासित हूँ। मेरी नियति भी उन्हीं में विलीन होना है। इस संसार में मैं एक शाश्वत आत्मा हूँ, जिसका स्वधर्म परमात्मा से परमप्रेम और परमात्मा को पूर्ण समर्पण है। यही मेरी पहिचान है। मेरा धर्म सनातन है, जिस से यह सम्पूर्ण सृष्टि संचालित है। मैं अपना सम्पूर्ण अंतःकरण और अस्तित्व वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित करता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०२४
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जब भी समय मिले, अविच्छिन्न/अनन्य भाव से आप परमात्मा का ध्यान कीजिये, आप मुझे सदा अपने साथ ही पाओगे। मैं आपसे पृथक नहीं हूँ। परमात्मा में मैं आपके साथ एक हूँ। जब भी आप मुझे याद करोगे, मुझे वहीं अपने साथ पाओगे॥ ॐ ॐ ॐ !!