Tuesday, 3 February 2026

आज बसंतपंचमी और सरस्वती-पूजा है। मंगलमय शुभ कामनाएँ ..... .

 आज बसंतपंचमी और सरस्वती-पूजा है। मंगलमय शुभ कामनाएँ .....

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आज से बसंत ऋतू का प्रारम्भ हो गया है। पचास-साठ वर्ष पूर्व तक प्रत्येक हिन्दू मंदिर में आज के दिन खूब भजन कीर्तन होते थे, और ठाकुर जी को भोग लगाकर खूब गुलाल उड़ाई जाती थी। सभी हिन्दू आश्रमों और गुरुकुलों में अब भी आज के दिन समारोह मनाये जाते हैं। गुरुकुलों में गुरु जी के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। प्राचीन भारत में आज से विद्याध्ययन आरम्भ होता था, और माँ सरस्वती की आराधना होती थी।
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आज अधिक से अधिक मौन रखिये और भगवान का खूब ध्यान कीजिये। माँ सरस्वती के वाग्भव बीज मन्त्र "ॐ ऐं" का खूब मानसिक जप करें। वाग्भव बीज मन्त्र से माँ सरस्वती को नमन होता है, गुरु महाराज को भी नमन होता है, और अपने अपने पिताजी को भी नमन होता है। मेरी माताजी शरीर में नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृति को मैं भगवती भुवनेश्वरी के बीज मंत्र "ॐ ह्रीं" से नित्य नमन करता हूँ। इससे मुझे उनका आशीर्वाद उसी क्षण प्राप्त होता है। ऐसे ही मेरे पिताजी शरीर में नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृति को मैं नित्य "ॐ ऐं" मंत्र से नमन करता हूँ। इसी मंत्र से नित्य मानसिक रूप से गुरु-चरणों में भी नमन करता हूँ। इससे मुझे उन सब के आशीर्वाद की बहुत अधिक प्राप्ति उसी क्षण होती है।
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"या कुंदेंदु तुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता |
या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना ||
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता |
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ||
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमां आद्यां जगद्व्यापिनीं |
वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यान्धकारापहां ||
हस्ते स्फटिक मालीकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां |
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदां" ||
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०२६
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पुनश्च: --- आज के दिन से वीर बालक हकीकत राय की पुण्य स्मृति जुडी हुई है। विभाजन से पूर्व -- लाहौर और अन्य अनेक नगरों में वीर बालक हक़ीक़त राय की स्मृति में मेला भरता था और पतंगें उड़ाई जाती थीं। हकीकत राय का बलिदान हिन्दू धर्म के प्रति निष्ठा और धर्मरक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक बन गया है।
हकीकत राय (लगभग 1719-1734) पंजाब के सियालकोट के एक साहसी हिन्दू बालक थे, जिन्होंने अपने धर्म के अपमान का विरोध करने पर मृत्युदंड स्वीकार किया और बलात् इस्लाम कबूल करने से इनकार कर दिया, जिससे वे हिन्दू धर्म के लिए बलिदान देने वाले एक अमर बलिदानी के रूप में जाने जाते हैं। उनका बलिदान बसंत पंचमी के दिन हुआ था, और उनकी स्मृति में कई स्थानों पर मेले लगते हैं, जैसे बटाला में उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी की समाधि पर।
सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में जन्मे, हकीकत राय बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और संस्कृत व इतिहास का अध्ययन किया था। एक बार मदरसे में उनके मुस्लिम सहपाठियों ने उनके धर्म और देवी-देवताओं का अपमान किया, जिसका उन्होंने प्रतिकार किया, जिससे विवाद बढ़ा। मुल्लाओं ने उन्हें इस्लाम अपनाने का आदेश दिया, लेकिन वे अपने धर्म पर अडिग रहे. माता-पिता के समझाने पर भी वे नहीं माने और अंततः बसंत पंचमी के दिन उनका सिर कलम कर दिया गया।
तत्कालीन परंपरानुसार उनका विवाह बचपन में ही हो गया था। उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी ने भी पति के बलिदान के बाद सती होकर अपने प्राण त्याग दिए। उनकी समाधि पर भी मेला लगता है।
वीर बालक हक़ीक़त राय की समाधि विभाजन के बाद लाहौर में रह गयी, लेकिन भारत के कई स्थानों, जैसे दिल्ली के 'हकीकत नगर' और बटाला में उनकी याद में मेले आयोजित होते हैं। उनका बलिदान हिन्दू धर्म के प्रति निष्ठा और धर्मरक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक बन गया है।

अनन्य-योग" और "अव्यभिचारिणी-भक्ति" से ही परमात्मा की प्राप्ति (भगवत्-प्राप्ति) हो सकती है ---

 "अनन्य-योग" और "अव्यभिचारिणी-भक्ति" से ही परमात्मा की प्राप्ति (भगवत्-प्राप्ति) हो सकती है। अन्य कोई मार्ग नहीं है। हम कोई भी साधना करें, ईश्वर-लाभ केवल "अनन्य-योग" और "अव्यभिचारिणी-भक्ति" से ही होगा ---

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"भगवान की प्राप्ति अनन्य-योग से ही हो सकती है" -- यह गीता में भगवान श्रीकृष्ण का कथन है। इस अति महत्वपूर्ण विषय पर कुछ लिखने की जिज्ञासा हुई, अतः यह प्रस्तुति है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कम से कम चार बार "अनन्य-योग" पर प्रकाश डाला है। वे कहते हैं --
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥८:२२॥"
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् --
"हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥८:१४॥"
"हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है॥८:२२॥"
"अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥९:२२॥"
"अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥१३:११॥"
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नारायण ! परम पुरुष परमात्मा से मैं पृथक नहीं हूँ, इस प्रकार परमात्मा से अपने को एक जान कर जो परमप्रेम व्यक्त किया जाता है वही अनन्य योग है। परमात्मा को जब तक हम स्वयं से भिन्न समझते हैं, तब तक कामनाओं का जन्म होता ही रहता है। लेकिन जब हम परमात्मा को अपने स्वरूप में जानते हैं, तब परमात्मा से जो प्रेम होता है, वह अनन्य परमप्रेम है। परमात्मा अन्य नहीं है, परमात्मा को अपना स्वरूप जान कर जब भक्ति अर्थात् परमप्रेम किया जाता है तब वह अनन्य योग है। अनन्य योग के अभाव को यानि भगवान से अन्य किसी भी चीज की कामना को भगवान ने व्यभिचार की संज्ञा दी है। भगवान बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं। वे हमारा शत-प्रतिशत प्रेम मांगते हैं। उनको ९९.९९% प्रतिशत भी नहीं चलता। वे १००% ही मांगते हैं। हमें ईश्वर-लाभ की पूर्ण अभीप्सा हो, व किसी भी तरह की कोई कामना न हो।
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महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान श्रीकृष्ण ने महाराजा युधिष्ठिर को तंडि ऋषि कृत "शिवसहस्त्रनाम" का उपदेश दिया है, जो भगवान श्रीकृष्ण को उपमन्यु ऋषि से प्राप्त हुआ था। उसके १६६वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने महाराजा युधिष्ठिर को भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उपद्श दिया है --
"एतद् देवेषु दुष्प्रापं मनुष्येषु न लभ्यते।
निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिर्व्यभिचारिणी॥"
(यहाँ "निर्विघ्ना" और "निश्चला" शब्दों का भी प्रयोग हुआ है)
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इस लेख का यदि विस्तार किया जाये तो इसका कोई अंत नहीं है। कम से कम शब्दों में परम सत्य को यहाँ व्यक्त किया गया है। यह अभ्यास, अनुभव और भगवान की परमकृपा का विषय है, बुद्धि का नहीं। मेरा जीवन धन्य हुआ जो हरिः कृपा से यह बात मुझे बहुत गहराई से समझ में आयी।
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ॐ ऐं श्रीगुरवे नमः॥ ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२६

श्रीमद्भगवद्गीता का सार जो मुझे अपनी अति अल्प और सीमित बुद्धि से समझ में आया है -- .

 श्रीमद्भगवद्गीता का सार जो मुझे अपनी अति अल्प और सीमित बुद्धि से समझ में आया है --

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मैं बात वही कह रहा हूँ जो मुझे समझ में आयी है, किसी की नकल नहीं कर रहा। विद्वान मनीषी संतजन कहते हैं कि वेद-उपनिषदों का सार श्रीमद्भगवद्गीता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने केवल तीन विषयों -- ज्ञान, भक्ति और कर्म -- पर ही चर्चा की है। उपरोक्त तीन विषयों की चर्चा में ही उन्होंने पूरे सनातन धर्म को लपेट लिया है। जिन में सतोगुण की प्रधानता है वे ही ज्ञान और भक्ति को समझ सकते हैं, जिनमें रजोगुण की प्रधानता है वे कर्म को समझ सकते हैं। जिनमें तमोगुण प्रधान है, वे गीता को नहीं समझ सकते। उनका आध्यात्म में प्रवेश नहीं हो सकता। उनके लिए सामान्य पूजा-पाठ ही उचित है।
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वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण की परम कृपा से जो भी ज्ञान, भक्ति और कर्म मुझे समझ में आये हैं, उन्हें मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ। वे हैं --
(१) पुरुषोत्तम योग, (२) अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति, और (३) उपासना।
पुरुषोत्तम योग को सामान्य बुद्धि से नहीं समझ सकते। यह भगवान की प्रत्यक्ष विशेष कृपा से ही समझा जा सकता है। अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति को समझा जा सकता है। परमात्मा को पाने की अनवरत अभीप्सा और उपासना (साधना) ही मेरी दृष्टि में कर्मयोग हैं। अनन्य भक्ति को निम्न श्लोकों से समझ सकते हैं --
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥८:२२॥"
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् --
"हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥८:१४॥"
"हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है॥८:२२॥"
"अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥९:२२॥"
"अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥१३:११॥"
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गीता का सर्वोच्च सार -- शरणागति द्वारा समर्पण है। यह भी उनकी विशेष कृपा से ही समझा जा सकता है। किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय महात्मा से ही मार्गदर्शन लें। अन्यथा गुरु रूप में दक्षिणामूर्ति भगवान शिव, और जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण हैं। इन दोनों रूपों में अंतर इतना ही है कि भगवान दक्षिणामूर्ति शिव पूर्णतः मौन हैं। वे मुंह से कुछ भी नहीं बोलते, उनके समक्ष ध्यानस्थ होते ही ज्ञान अपने आप प्राप्त हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण मौन भी हैं और बोलते भी हैं। लेकिन ज्ञान की प्राप्ति उनकी परम कृपा से ही होती है। हम उनकी परम कृपा के पात्र बनें।
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जनवरी २०२६

समर्पण ---

समर्पण ---
पिछले चौदह वर्षों से भक्ति, योग, वेदान्त और ब्रह्मज्ञान पर अपनी क्षमतानुसार यथासंभव निःस्वार्थ भाव से खूब लेख (चार हजार से अधिक) सोशियल मीडिया पर लिखे हैं। अब और कुछ भी लिखने की क्षमता नहीं रही है। अवशिष्ट जीवन ईश्वर की उपासना को समर्पित है। ईश्वर की चेतना में ही अंत समय तक रहूँगा।
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मै केवल उन्हीं से मिलता हूँ जो इसी जीवन में परमात्मा को उपलब्ध होना चाहते हैं, जिनके हृदय में कूट कूट कर भगवान की भक्ति भरी पड़ी है, और जो नित्य नियमित उपासना करते हैं। अन्य किसी से भी मिलने की इच्छा नहीं है।
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मैं योगमार्ग का साधक हूँ। कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग है। कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में जगन्माता मुझे निमित्त बनाकर परमशिव की उपासना स्वयं करती हैं। गीता में जो पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं। अवशिष्ट जीवन परमशिव/पुरुषोत्तम को समर्पित हैं।
ॐ तत् सत् । ॐ ऐं श्रीगुरवे नमः !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ जनवरी २०२६

किसी भी तरह का वर्ग-संघर्ष, विशेषकर जातिगत वर्ग-संघर्ष, समाज और राष्ट्र के लिए बहुत अधिक घातक है ---

 किसी भी तरह का वर्ग-संघर्ष, विशेषकर जातिगत वर्ग-संघर्ष, समाज और राष्ट्र के लिए बहुत अधिक घातक है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि जो लोग "सामाजिक समरसता" की बातें करते थे, वे ही अब "सामाजिक विषमता" उत्पन्न कर रहे हैं। दूसरों का सिर काट कर कोई बड़ा नहीं बन सकता। आरक्षण के नाम पर दूसरों (अनारक्षित वर्ग) का सिर काटा जा रहा है।

देश में समान नागरिक संहिता तुरंत प्रभाव से लागू हो, और किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव किसी से भी न हो।
पुनश्च: --- आज चाहे कितना भी असत्य और अन्धकार छाया हो, भारतवर्ष निकट भविष्य में निश्चित रूप से एक महान आध्यात्मिक राष्ट्र होगा, और अपने परम वैभव को प्राप्त करेगा। मुझे कोई संदेह नहीं है। आसुरी और पैशाचिक शक्तियाँ कितनी भी प्रबल हों, वे निश्चित रूप से पराभूत होंगी। ॐ ॐ ॐ !!
२५ जनवरी २०२६

भारत में क्षत्रिय राजाओं का राज्य फिर से स्थापित होगा --- .

 भारत में क्षत्रिय राजाओं का राज्य फिर से स्थापित होगा ---

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वर्तमान व्यवस्था स्थायी नहीं है। धर्म की पुनः स्थापना का समय आ गया है। धर्म की पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा। क्षत्रिय राजाओं का राज्य भी पुनः स्थापित होगा। क्षत्रिय राजाओं के लिये राज्याभिषेक के समय सनातन धर्मरक्षा की प्रतिज्ञा लेना अनिवार्य था। पुरोहित उन्हें धर्मरक्षा का संकल्प और प्रतिज्ञा कराता था। वेदों और आगम शास्त्रों में इसे राजा का सर्वोच्च कर्तव्य बताया गया है। जो क्षति से त्राण करता है वह क्षत्रिय है। क्षत्रियों का क्षात्रधर्म -- भूमि और प्रजा की रक्षा, न्याय की स्थापना, और व्यवस्था बनाये रखना था। राजा अपने राज्य में सनातन धर्म, संस्कृति, मंदिरों और ऋषियों की रक्षा करने का प्रण लेते थे। साथ साथ युद्ध में अचल रहने की प्रतिज्ञा भी लेते थे। सरल शब्दों में, क्षत्रिय राजाओं के लिए धर्म की रक्षा उनका परम कर्तव्य था।
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धर्म की स्थापना का युग आरंभ हो गया है। समय के साथ शीघ्र ही वर्णाश्रम धर्म की पुनर्स्थापना होगी। कोई चाहे या न चाहे भारत में क्षत्रिय राजाओं का राज्य पुनर्स्थापित होगा। यह कब और कैसे होगा? इस बारे में कुछ कह नहीं सकता, लेकिन निश्चित रूप से होगा।
ॐ तत् सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ जनवरी २०२६

आप से मैं केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना ही कर सकता हूँ ---

आप से मैं केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना ही कर सकता हूँ। यह भी आपसे एक विनम्र प्रार्थना ही है। अपनी पूरी चेतना से निवेदन कर रहा हूँ कि अगले चार से छह महिने तक आत्म-संयम बना कर ईश्वर को हर समय अपनी स्मृति में रखें। भटकें नहीं। स्वधर्म पर दृढ़ रहें। जो होगा वह अच्छा ही होगा। आपका कल्याण होगा।

"अहं इन्द्रो न पराजिग्ये" ऋग्वेद (१०.४८.५) का एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र है, जिसका अर्थ है- "मैं इन्द्र (विजेता) हूँ, कभी पराजित नहीं होता"।
गुरु महाराज और ईश्वर हमारे साथ हैं। ॐ तत् सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
२६ जनवरी २०२६
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पुनश्च: --- मुझे एक तपस्वी संत ने अपने सत्संग में यह बात बताई ---
प्रातः अपनी नींद से इस भाव से उठिए जैसे आपके इष्ट देवता सो कर उठे हैं। उनको सो कर उठने के लिए नमन कीजिये। आप स्वयं नहीं उठे हैं, आपके इष्ट देवता सो कर उठे हैं।
फिर बिस्तर पर ही लेटे लेटे, या बैठे-बैठे, मन ही मन, या बोलकर उनका कीर्तन करें। पूरे दिन उनकी याद बनी रहेगी।
रात्रि को सोने से पूर्व भी यही भाव रखो कि अपने इष्ट देवता को आप सुला रहे हैं। सोने से पूर्व भी कुछ देर कीर्तन कर के ही सोएँ।