Saturday, 15 August 2026

सिंहावलोकन या विहंगावलोकन ---

 "ॐ ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं, द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्|

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्| यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
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सिंहावलोकन या विहंगावलोकन कुछ भी कहिए, जब अतीत पर दृष्टि डालता हूँ तो एक प्रश्न उठता है कि क्या यह जीवन भी यों ही व्यर्थ चला गया है? कई जन्मों पूर्व एक संकल्प किया था, जिसके पश्चात कई जन्म निकल गए, पर वह संकल्प इस जन्म में भी पूर्ण नहीं हुआ| दोष स्वयं का ही है, किसी अन्य का नहीं; पूर्व जन्मों में कोई अच्छे कर्म नहीं किए थे, इसलिए यह जन्म लेना पड़ा, और यह भी व्यर्थ ही चला गया| कुछ भी सकारात्मक कार्य करने का साहस नहीं जुटा पाया| जब तक वह संकल्प पूर्ण नहीं होगा, फिर इसी धरा पर जन्म लेना पड़ेगा| अब तो भगवान स्वयं ही करुणावश मुझे माध्यम बना कर वह संकल्प पूर्ण करेंगे, जो मेरे वश की बात नहीं है|
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आत्मा नित्य मुक्त है, किसी भी तरह का मोक्ष या मुक्ति मुझे नहीं चाहिए| मुक्त तो पहले से ही हूँ, ये सारे बंधन अनेक जन्मों में स्वयं के द्वारा ही स्वयं पर थोपे हुए हैं, जिन से मुक्त होना अब स्वयं के वश की बात नहीं है| अब तो भगवान स्वयं ही करुणावश यह सारा कार्य करेंगे| मोक्ष की कामना एक बंधन से दूसरे बंधन में जाने की कामना है, जैसे लोहे की बेड़ियों के स्थान पर सोने-चाँदी की बेड़ियाँ पहिनना| स्वर्ग से अधिक घटिया स्थान इस सृष्टि में कोई अन्य नहीं है, वहाँ ईश्वर नहीं है, सिर्फ इंद्रिय भोग ही भोग हैं| पुण्य समाप्त होने पर धक्का मारकर बापस पृथ्वी पर फेंक दिया जाता है| वैसे ही जैसे आप किसी पहाड़ी पर किसी पाँच सितारा होटल में जायें, जब तक पैसा है, होटल वाले आपका स्वागत करेंगे, पैसा समाप्त होते ही बिना सामान के धक्का मार कर बाहर फेंक देंगे, जहाँ आप को कोई भिखारी भी नहीं पूछेगा|
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एक ही बात अच्छी हुई है कि पूर्व जन्म में जो मेरे गुरु थे, उनकी सत्ता सूक्ष्म जगत में है, जहाँ से वे सूक्ष्म देह में अब भी मेरा मार्गदर्शन और रक्षा कर रहे हैं| इस जन्म में भी वे ही गुरु और मार्गदर्शक व संरक्षक हैं| पूरी शाश्वतता में वे ही गुरु व मार्गदर्शक रहेंगे| उन्होने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा, क्योंकि वे मेरे सबसे बड़े हितैषी हैं| अब पूर्व जन्म की सभी स्मृतियों को भी भुला देना चाहता हूँ| किसी भी तरह की कोई कामना अब नहीं रही है|
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इस जन्म में मेरे जो आध्यात्मिक रूप से हितैषी मित्र थे, वे सब मेरे से नाराज चल रहे हैं क्योंकि मैं उनकी अपेक्षाओं और मापदण्डों पर कभी खरा नहीं उतर पाया| वे मुझे क्षमा करें| जो प्रारब्ध में लिखा होता है, वही होता है|
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हिमालय जितनी बड़ी-बड़ी अपनी सभी कमियों को और स्वयं को गुरु महाराज के चरण-कमलों में समर्पित कर रहा हूँ| वे परमात्मा के साथ एक हैं, उनमें और परमात्मा में कोई भेद नहीं है| अब से कभी किसी कामना का जन्म ही न हो|
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"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||"
कृपा शंकर
१५ अगस्त २०२०

महर्षि अरविन्द का उत्तरपाड़ा भाषण :---

  (श्री अरविन्द द्वारा दिया हुआ यह भाषण .....एक सर्वश्रेष्ठ लेख है जो मैंने अपने पूरे जीवनकाल में पढ़ा है| प्रत्येक भारतीय को यह लेख अवश्य पढना चाहिये| इसे अधिकाधिक साझा (Share) करें| श्रीअरविन्द [१८७२--१९५०] का अलीपुर जेल से छूटने के पश्चात यह उद्बोधन उत्तरपाड़ा में "धर्म रक्षिणी सभा" के वार्षिक अधिवेशन में ३० मई १९०९ को हुआ था| इसमें उन्होंने अपने जेल-जीवन का आध्यात्मिक अनुभव सुनाया, और साथ ही देश को सच्ची राष्ट्रीयता का संदेश दिया| इसमें उन्होंने बताया है कि सच्चा हिंदू धर्म, सच्चा सनातन धर्म क्या है और आज के संसार को उसकी क्यों आवश्यकता है)|

महर्षि अरविन्द का उत्तरपाड़ा भाषण :---
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जब मुझे आपकी सभा के इस वार्षिक अधिवेशन में बोलने के लिये कहा गया, तो मैंने यही सोचा था कि आज के लिये जो विषय चुना गया है उसी पर, अर्थात् हिंदू धर्म पर कुछ कहूंगा। मैं नहीं जानता कि उस इच्छा को मैं पूरा कर सकूंगा या नहीं, क्योंकि जैसे ही मैं यहां आकर बैठा, मेरे मन में एक संदेश आया और यह संदेश आपको और सारे भारत राष्ट्र को सुनाना है। यह वाणी मुझे पहले-पहल जेल में सुनायी दी थी और उसे अपने देशवासियों को सुनाने के लिये मैं जेल से बाहर आया हूं।
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पिछली बार जब में यहां आया था उसे एक वर्ष से ऊपर हो चुका है। उस बार मैं अकेला न था, तब मेरे साथ ही बैठे थे राष्ट्रीयता के एक परम शक्तिमान् दूत। उन दिनों वे उस एकांतवास से लौटकर आये थे जहां उन्हें भगवान् ने इसलिये भेजा था कि वे अपनी कालकोठरी की शांति और निर्जनता में उस वाणी को सुन सकें जो उन्हें सुनानी थी। उस समय आप सैंकड़ों की संख्या में उन्हीं का स्वागत करने आये थे। आज वे हमसे बहुत दूर हैं, वे हमसे हजारों मील के फासले पर हैं। दूसरे लोग भी, जिन्हें मैं अपने साथ काम करते हुए पाता था, आज अनुपस्थित हैं। देश पर जो तूफान आया था उसने उन्हें दूर-दूर बिखेर दिया है। इस बार एक वर्ष का समय निर्जनवास में बिताकर आया हूं और अब बाहर आकर देखता हूं कि सब कुछ बदल गया है। जो सदा मेरे साथ बैठते थे, जो सदा मेरे काम में सहयोग दिया करते थे, आज बर्मा में कैद हैं, दूसरे उत्तर में नजरबंद होकर सड़ रहे हैं। जब मैं बाहर आया तो मैंने अपने चारों ओर देखा, जिनसे सलाह और प्रेरणा पाने का अभ्यास था उन्हें खोजा। वे मुझे नहीं मिले। इतना ही नहीं, जब मैं जेल गया था तो सारा देश वंदेमातरम् की ध्वनि से गूंज रहा था, वह एक राष्ट्र बनने की आशा से जीवंत था। यह उन करोड़ों मनुष्यों की आशा थी जो गिरी हुई दशा से अभी-अभी ऊपर उठे थे। जब मैं जेल से बाहर आया तो मैंने इस ध्वनि को सुनने की कोशिश की, किंतु इसके स्थान पर निस्तब्धता थी। देश में सन्नाटा था और लोग हक्के-बक्के से दिखायी दिये, क्योंकि जहां पहले हमारे सामने भविष्य की कल्पना से भरा ईश्वर का उज्ज्वल स्वर्ग था वहां हमारे सिर पर धूसर आकाश दिखायी दिया जिससे मानवीय वज्र और बिजली की वर्षा हो रही थी। किसी को यह न दिखायी देता था कि किस ओर चलना चाहिये, चारों ओर से यही प्रश्न उठ रहा था ''अब क्या करें? हम क्या कर सकते हैं? मुझे भी पता न था कि अब क्या किया जा सकता है। लेकिन एक बात मैं जानता था, ईश्वर की जिस महान् शक्ति ने उस ध्वनि को जगाया था, उस आशा का संचार किया था उसी शक्ति ने यह सन्नाटा भेजा है। जो ईश्वर उस कोलाहल और आंदोलन में थे, वे ही इस विश्राम और निस्तब्धता में भी हैं। ईश्वर ने इसे भेजा है ताकि राष्ट्र क्षणभर के लिये रुककर अपने अंदर खोजे और जाने कि उनकी इच्छा क्या है। इस निस्तब्धता से मैं निरुत्साहित नहीं हुआ हूं, क्योंकि कारागार में इस निस्तब्धता के साथ मेरा परिचय हो चुका है और मैं जानता हूं कि मैंने एक वर्ष की लंबी कैद के विश्राम और निस्तब्धता में ही यह पाठ पढ़ा है। जब विपिनचंद्र पाल जेल से बाहर आये तो वह एक संदेश लेकर आये थे और वह प्रेरणा से मिला हुआ संदेश था। उन्होंने यहां जो वक्तृता दी थी वह मुझे याद है। उस वक्तृता का मर्म और अभिप्राय उतना राजनीतिक नहीं था जितना धार्मिक था। उन्होंने उस समय जेल के अंदर मिली हुई अनुभूति की, हम सबके अंदर जो भगवान् हैं, राष्ट्र के अंदर जो परमेश्वर हैं उनकी बात की थी। अपने बाद के व्याख्यानों में भी उन्होंने कहा था कि इस आंदोलन में जो शक्ति काम कर रही है वह सामान्य शक्ति की अपेक्षा महान् है और इसका हेतु भी साधारण हेतु से कहीं बढ़ कर है। आज मैं भी आपसे फिर मिल रहा हूं, मैं भी जेल से बाहर आया हूं और इस बार भी आप ही, इस उत्तरपाड़ा के निवासी ही, मेरा सबसे पहले स्वागत कर रहे हैं। किसी राजनीतिक सभा में नहीं, बल्कि उस समिति की सभा में जिसका उद्देश्य है धर्म की रक्षा। जो संदेश विपिनचंद्र पाल ने बक्सर जेल में पाया था, वही भगवान् ने मुझे अलीपुर में दिया। वह ज्ञान भगवान् नेे मुझे बारह महीने के कारावास में दिन-प्रतिदिन दिया और आदेश दिया है कि अब जब मैं जेल से बाहर आ गया हूं तो आपसे उसकी बात करूं ।
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मैं जानता था कि मैं जेल से बाहर निकल आऊंगा। यह वर्षभर की नजरबंदी केवल एक वर्ष के एकांतवास और प्रशिक्षण के लिये थी। भला किसी के लिये यह कैसे संभव होता कि वह मुझे जेल में उतने दिनों से अधिक रोक रखता जितने दिन भगवान् का हेतु सिद्ध करने के लिये आवश्यक थे? भगवान् ने कहने के लिये एक संदेश दिया है और करने के लिये एक काम। मैं यह जानता था कि जब तक यह संदेश सुना नहीं दिया जाता तब तक कोई मानव शक्ति मुझे चुप नहीं कर सकती, जब तक वह काम नहीं हो जाता तब तक कोई मानव शक्ति भगवान् के यंत्र को रोक नहीं सकती, फिर वह यंत्र चाहे कितना ही दुर्बल, कितना ही कमजोर क्यों न हो। अब जब कि मैं बाहर आ गया हूं, इन चंद मिनटों में ही मुझे एक ऐसी वाणी सुझायी गयी है जिसे व्यक्त करने कीे मेरी कोई इच्छा न थी। मेरे मन में जो कु छ था उसे भगवान् ने निकालकर फेंक दिया है और मैं जो कुछ बोल रहा हूं वह एक प्रेरणा के वश होकर, बाध्य होकर बोल रहा हूं।
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जब मुझे गिरफ्तार करके जल्दी-जल्दी लालबाजार की हवालात में पहुंचाया गया तो मेरी श्रद्धा क्षणभर के लिये डिग गयी थी, क्योंकि उस समय मैं भगवान् की इच्छा के मर्म को नहीं जान पाया था। इसलिये मैं क्षणभर के लिये विचलित हो गया और अपने हृदय में भगवान् को पुकारकर कहने लगा, ''यह क्या हुआ? मेरा यह विश्वास था कि मुझे अपने देशवासियों के लिये कोई विशेष काम करना है और जब तक वह काम पूरा नहीं हो जाता तबतक तुम मेरी रक्षा करोगे। तब फिर मैं यहां क्यों हूं और वह भी इस प्रकार के अभियोग में? एक दिन बीता, दो दिन बीते, तीन दिन बीत गये, तब मेरे अंदर से एक आवाज आयी, ''ठहरो और देखो कि क्या होता है। तब मैं शांत हो गया और प्रतीक्षा करने लगा। मैं लाल बाजार थाने से अलीपुर जेल में ले जाया गया और वहां मुझे एक महीने के लिये मनुष्यों से दूर एक निर्जन कालकोठरी में रखा गया। वहां मैं अपने अंदर विद्यमान भगवान् की वाणी सुनने के लिये, यह जानने के लिये कि वे मुझसे क्या कहना चाहते हैं और यह सीखने के लिये कि मुझे क्या करना होगा, रात-दिन प्रतीक्षा करने लगा।
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इस एकांतवास में मुझे सबसे पहली अनुभूति हुई, पहली शिक्षा मिली। उस समय मुझे याद आया कि गिरफ्तारी से एक महीना या उससे भी कुछ अधिक पहले मुझे यह आदेश मिला था कि मैं अपने सारे कर्म छोड़कर एकांत में चला जाऊं और अपने अंदर खोज करूं ताकि भगवान् के साथ अधिक संपर्क में आ सकूं । मैं दुर्बल था और उस आदेश को स्वीकार न कर सका। मुझे अपना कार्य बहुत प्रिय था और हृदय में इस बात का अभिमान था कि यदि मैं न रहूं तो इस काम को धक्का पहुंचेगा, इतना ही नहीं शायद असफल और बंद भी हो जायेगा, इसलिये मुझे काम नहीं छोडऩा चाहिये। लेकिन मुझे ऐसा बोध हुआ कि वे मुझसे फिर बोले और उन्होंने कहा कि, ''जिन बंधनों को तोडऩे की शक्ति तुममें नहीं थी उन्हें तुम्हारे लिये मैंने तोड़ दिया है क्योंकि मेरी यह इच्छा नहीं है और न थी ही कि वे कार्य जारी रहें। तुम्हारे करने के लिये मैंने दूसरा काम चुना है और उसी के लिये मैं तुम्हें यहां लाया हूं ताकि मैं तुम्हें वह बात सिखा दूं जिसे तुम स्वयं नहीं सीख सके और तुम्हें अपने काम के लिये तैयार कर लूं। इसके बाद भगवान् ने मेरे हाथों में गीता रख दी। मेरे अंदर उनकी शक्ति प्रवेश कर गयी और मैं गीता की साधना करने में समर्थ हुआ। मुझे केवल बुद्धि द्वारा ही नहीं, बल्कि अनुभूति द्वारा यह जानना पड़ा कि श्री कृष्ण की अर्जुन से क्या मांग थी और वे उन लोगों से क्या मांगते हैं जो उनका कार्य करने की इच्छा रखते हैं, अर्थात् घृणा और कामना-वासना से मुक्त होना होगा, फल की इच्छा न रखकर भगवान् के लिये कर्म करना होगा, अपनी इच्छा का त्याग करना होगा और निश्चेष्ट तथा सच्चा यंत्र बनकर भगवान् के हाथों में रहना होगा, ऊंच और नीच, मित्र और शत्रु, सफलता और विफलता के प्रति समदृष्टि रखनी होगी और यह सब होते हुए भी उनके कार्य में कोई अवहेलना न आने पाये।
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मैंने यह जाना कि हिंदू धर्म का मतलब क्या है। बहुधा हम हिंदू धर्म, सनातन धर्म की बातें करते हैं, किंतु वास्तव में हममें से कम ही लोग यह जानते हैं कि यह धर्म क्या है। दूसरे धर्म मुख्य रूप से विश्वास, व्रत, दीक्षा और मान्यता को महत्त्व देते हैं, किंतु सनातन धर्म तो स्वयं जीवन है, यह इतनी विश्वास करने की चीज नहीं है जितनी जीवन में उतारने की चीज है। यही वह धर्म है जिसका लालन-पालन मानव-जाति के कल्याण के लिये प्राचीन काल से इस प्रायद्वीप के एकांतवास में होता आ रहा है। यही धर्म देने के लिये भारत उठ रहा है। भारतवर्ष, दूसरे देशों की तरह, अपने लिये ही या मजबूत होकर दूसरों को कुचलने के लिये नहीं उठ रहा। वह उठ रहा है सारे संसार पर वह सनातन ज्योति डालने के लिये जो उसे सौंपी गयी है। भारत का जीवन सदा ही मानव-जाति के लिये रहा है, उसे अपने लिये नहीं बल्कि मानव जाति के लिये महान् होना है।
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अत: भगवान् ने मुझे दूसरी वस्तु दिखायी-उन्होंने मुझे हिंदू धर्म के मूल सत्य का साक्षात्कार करा दिया। उन्होंने मेरे जेलरों के दिल को मेरी ओर मोड़ दिया, उन्होंने जेल के प्रधान अंग्रेज अधिकारी से कहा कि ''ये कालकोठरी में बहुत कष्ट पा रहे हैं, इन्हें कम-से-कम सुबह-शाम आध-आध घंटा कोठरी के बाहर टहलने की आज्ञा दे दी जाये। यह आज्ञा मिल गयी और जब मैं टहल रहा था तो भगवान् की शक्ति ने फिर मेरे अंदर प्रवेश किया। मैंने उस जेल की ओर दृष्टि डाली तो ऊंची दीवारों के अंदर बंद नहीं हूं, मुझे घेरे हुए थे वासुदेव। मैं अपनी कालकोठरी के सामने के पेड़ की शाखाओं के नीचे टहल रखा था, परंतु वहां पेड़ न था, मुझे प्रतीत हुआ कि वह वासुदेव हैं, मैंने देखा कि स्वयं श्री कृष्ण खड़े हैं और मेरे ऊपर अपनी छाया किये हुए हैं।
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मैंने अपनी कालकोठरी के सींखचों की ओर देखा, उस जाली की ओर देखा जो दरवाजे का काम कर रही थी, वहाँ भी वासुदेव दिखायी दिये। स्वयं नारायण संतरी बनकर पहरा दे रहे थे। जब मैं उन मोटे कंबलों पर लेटा जो मुझे पलंग की जगह मिले थे तो मैंने यह अनुभव किया कि मेरे सखा और प्रेमी श्री कृष्ण मुझे अपनी बाहुओं में लिये हुए हैं। मुझे उन्होंने जो गहरी दृष्टि दी थी उसका यह पहला प्रयोग था। मैंने जेल के कैदियों-चोरों, हत्यारों और बदमाशों को देखा और मुझे वासुदेव दिखायी पड़े, उन अंधेरे में पड़ी आत्माओं और बुरी तरह काम में लाये गये शरीरों में मुझे नारायण मिले। उन चोरों और डाकुओं में बहुत से ऐसे थे जिन्होंने अपनी सहानुभूति और दया के द्वारा मुझे लज्जित कर दिया, इस विपरीत परिस्थिति में मानवता विजयी हुई थी। इनमें से एक आदमी को मैंने विशेष रूप से देखा जो मुझे एक संत मालूम हुआ। वह हमारे देश का एक किसान था जो लिखना-पढऩा नहीं जानता था, जिसे डकैती के अभियोग में दस वर्ष का कठोर दंड मिला था। यह उनमें से एक व्यक्ति था जिन्हें हम वर्ग के मिथ्याभिमान में आकर 'छोटो लोक' (नीच) कहा करते हैं। फिर एक बार भगवान् मुझसे बोले, उन्होंने कहा 'अपना कुछ थोड़ा-सा काम करने के लिये मैंने तुम्हें जिनके बीच भेजा है उन लोगों को देखो। जिस जाति को मैं ऊपर उठा रहा हूँ उसका स्वरूप यही है और इसी कारण मैं उसे ऊपर उठा रहा हूँ।
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जब छोटी अदालत में मुकदमा शुरू हुआ और हम लोग मजिस्ट्रेट के सामने खड़े किये गये तो वहाँ भी मेरी अंतदृष्टि मेरे साथ थी। भगवान् ने मुझसे कहा, 'जब तुम जेल में डाले गये थे तो क्या तुम्हारे हृदय हताश नहीं हुआ था, क्या तुमने मुझे पुकारकर यह नहीं कहा था, कहाँ, तुम्हारी रक्षा कहां है? लो, अब मजिस्ट्रेट की ओर देखो, सरकारी वकील की ओर देखो। मैंने देखा कि अदालत की कुर्सी पर मजिस्ट्रेट नहीं, स्वयं वासुदेव नारायण बैठ थे। अब मैंने सरकारी वकील की ओर देखा पर वहां कोई सरकारी वकील नहीं दिखायी दिया, वहाँ तो श्री कृष्ण बैठे थे, मेरे सखा, मेरे प्रेमी वहाँ बैठे मुस्करा रहे थे। उन्होंने कहा, 'अब डरते हो? मैं सभी मनुष्यों में विद्यमान हूँ और उनके सभी कर्मों और शब्दों पर राज करता हूँ। मेरा संरक्षण अब भी तुम्हारे साथ है और तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारे विरुद्ध जो यह मुकदमा चलाया गया है उसे मेरे हाथों में सौंप दो। यह तुम्हारे लिये नहीं है। मैं तुम्हें यहाँ मुकदमें के लिये नहीं बल्कि किसी और काम के लिये लाया हूँ। यह तो मेरे काम का साधनमात्र है, इससे अधिक कुछ नहीं। इसके बाद जब सेशन जज की अदालत में विचार आरंभ हुआ तो मैं अपने वकील के लिये ऐसी बहुत-सी हिदायतें लिखने लगा कि गवाही में मेरे विरुद्ध कही गयी बातों में से कौन-सी बातें गलत हैं और किन-किन पर गवाहों से जिरह की जा सकती है। तब एक ऐसी घटना घटी जिसकी मैं आशा नहीं करता था। मेरे मुकदमें की पैरवी के लिये जो प्रबंध किया गया था वह एकाएक बदल गया और मेरी सफाई के लिये एक दूसरे ही वकील खड़े हुए। वे अप्रत्याशित रूप से आ गये- वे मेरे एक मित्र थे, किन्तु मैं नहीं जानता था कि वे आयेंगे। आप सभी ने उनका नाम सुना है, जिन्होंने मन से सभी विचार निकाल बाहर किये और इस मुकदमें के सिवा सारी वकालत बंद कर दी, जिन्होंने महीनों लगातार आधी-आधी रात तक जगकर मुझे बचाने के लिये अपना स्वास्थ्य बिगाड़ लिया- वे हैं श्री चित्तरंजन दास। जब मैंने उन्हें देखा तो मुझे संतोष हुआ, फिर भी मैं समझता था कि हिदायत लिखना जरूरी है। इसके बाद यह विचार हटा दिया गया और मेरे अंदर से आवाज आयी, 'यही आदमी है जो तुम्हारे पैरों के चारों ओर फैले जाल से तुम्हें बाहर निकालेगा। तुम इन कागजों को अलग धर दो। इन्हें तुम हिदायतें नहीं दोगे, मैं दूंगा। उस समय से इस मुकदमें के संबंध में मैंने अपनी ओर से अपने वकील से एक शब्द भी नहीं कहा, कोई हिदायत नहीं दी और यदि कभी मुझसे कोई सवाल पूछा गया तो मैंने सदा यही देखा कि मेरे उत्तर से मुकदमें को कोई मदद नहीं मिली। मैंने मुकदमा उन्हें सौंप दिया और उन्होंने पूरी तरह उसे अपने हाथों में ले लिया, और उसका परिणाम आप जानते ही हैं। मैं सदा यह जानता था कि मेरे संबंध में भगवान् की क्या इच्छा है, क्योंकि मुझे बार-बार यह वाणी सुनायी पड़ती थी, मेरे अंदर से सदा यह आवाज आया करती थी, 'मैं रास्ता दिखा रहा हूँ, इसलिये डरो मत।
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'मैं तुम्हें जिस काम के लिये जेल में लाया हूँ अपने उस काम की ओर मुड़ो और जब तुम जेल से बाहर निकलो तो यह याद रखना-कभी डरना मत, कभी हिचकिचाना मत। याद रखो, यह सब मैं कर रहा हूँ, तुम या और कोई नहीं। अत: चाहे जितने बादल घिरें, चाहे जितने खतरे और दु:ख-कष्ट आयें, कठिनाइयाँ हों, चाहे जितनी असंभवताएं आयें, कुछ भी असंभव नहीं है, कुछ भी कठिन नहीं है। मैं इस देश और इसके उत्थान में हूँ, मैं वासुदेव हूँ, मैं नारायण हूँ। जो कुछ मेरी इच्छा होगी वही होगा, दूसरों की इच्छा से नहीं। मैं जिस चीज को लाना चाहता हूँ उसे कोई मानव-शक्ति नहीं रोक सकती।
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इस बीच वे मुझे उस एकांत कालकोठरी से बाहर ले आये और मुझे उन लोगों के साथ रख दिया जिन पर मेरे साथ ही अभियोग चल रहा था। आज आपने मेरे आत्म-त्याग और देशप्रेम के बारे में बहुत कुछ कहा है। मैं जब से जेल से निकला हूँ तब से इसी प्रकार की बातें सुनता आ रहा हूँ, किन्तु ऐसी बातें सुनने से मुझे लज्जा आती है, मेरे अंदर एक तरह की वेदना होती है। क्योंकि मैं अपनी दुर्बलता जानता हूँ, मैं अपने दोष और त्रुटियों का शिकार हूँ। मैं इन बातों के बारे में पहले भी अंधा न था और जब मेरे एकांतवास में, ये सब-की-सब मेरे विरुद्ध खड़ी हो गयीं तो मैंने इनका पूरी तरह अनुभव किया। तब मुझे मालूम हुआ कि मनुष्य के नाते मैं दुर्बलताओं का एक ढेर हूँ, एक दोषभरा अपूर्ण यंत्र हूँ, मुझमें ताकत तभी आती है जब कोई उच्चतर शक्ति मेरे अंदर आ जाये। अब मैं उन युवकों के बीच में आया और मैंने देखा कि उनमें से बहुतों में एक प्रचण्ड साहस और अपने को मिटा देने की शक्ति है और उनकी तुलना में मैं कुछ भी नहीं हूँ। इनमें से एक-दो ऐसे थे जो केवल बल और चरित्र में ही मुझसे बढ़कर नहीं थे- ऐसे तो बहुत थे- बल्कि मैं जिस बुद्धि की योग्यता का अभिमान रखता था, उसमें भी बढ़े हुए थे। भगवान् ने मुझसे फिर कहा, 'यही वह युवक-दल, वह नवीन और बलवान जाति है जो मेरे आदेश से ऊपर उठ रही है। ये तुमसे अधिक बड़े हैं। तुम्हें भय किस बात का है? यदि तुम इस काम से हट जाओ या सो जाओ तो भी काम पूरा होगा। कल तुम इस काम से हटा दिये जाओ तो ये युवक तुम्हारे काम को उठा लेंगे और उसे इतने प्रभावशाली ढंग से करेंगे जैसे तुमने भी नहीं किया। तुम्हें इस देश को एक वाणी सुनाने के लिये मुझसे कुछ बल मिला है, यह वाणी इस जाति को ऊपर उठाने में सहायता देगी। यह वह दूसरी बात थी जो भगवान् ने मुझसे कही।
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इसके बाद अचानक कुछ हुआ और क्षणभर में मुझे एक कालकोठरी के एकांतवास में पहुँचा दिया गया। इस एकांतवास में मेरे अंदर क्या हुआ यह कहने की प्रेरणा नहीं हो रही, बस इतना काफी है कि वहाँ दिन-प्रतिदिन भगवान् ने अपने चमत्कार दिखाये और मुझे हिन्दू धर्म के वास्तविक सत्य का साक्षात्कार कराया। पहले मेरे अंदर अनेक प्रकार के संदेह थे। मेरा लालन-पालन इंग्लैण्ड में विदेशी भावों और सर्वथा विदेशी वातावरण में हुआ था। एक समय मैं हिन्दू धर्म की बहुत-सी बातों को मात्र कल्पना समझता था, यह समझता था कि इसमें बहुत कुछ केवल स्वप्न, भ्रम या माया है। परन्तु अब दिन-प्रतिदिन मैंने हिन्दू धर्म के सत्य को, अपने मन में, अपने प्राण में और अपने शरीर में अनुभव किया। वे मेरे लिये जीवित अनुभव हो गये और मेरे सामने ऐसी सब बातें प्रकट होने लगीं जिनके बारे में भौतिक विज्ञान कोई व्याख्या नहीं दे सकता। जब मैं पहले-पहल भगवान् के पास गया तो पूरी तरह भक्ति-भाव के साथ नहीं गया था, पूरी तरह ज्ञानी के भाव से भी नहीं गया था। बहुत दिन हुए, स्वदेशी-आंदोलन शुरू होने से पहले और मेरे सार्वजनिक काम में घुसने से कुछ वर्ष पहले बड़ौदा में मैं उनकी ओर बढ़ा था।
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उन दिनों जब मैं भगवान् की ओर बढ़ा तो मुझे उनपर जीवंत श्रद्धा न थी। उस समय मेरे अंदर अज्ञेयवादी था, नास्तिक था, संदेहवादी था और मुझे पूरी तरह विश्वास न था कि भगवान् हैं भी। मैं उनकी उपस्थिति का अनुभव नहीं करता था। फिर भी कोई चीज थी जिसने मुझे वेद के सत्य की ओर, गीता के सत्य की ओर, हिन्दूधर्म के सत्य की ओर आकर्षित किया। मुझे लगा कि इस योग में कहीं पर कोई महाशक्तिशाली सत्य अवश्य है, वेदांत पर आधारित इस धर्म में कोई परम बलशाली सत्य अवश्य है। इसलिये जब मैं योग की ओर मुड़ा और योगाभ्यास करके यह जानने का संकल्प किया कि मेरी बात सच्ची है या नहीं तो मैंने उसे इस भाव और इस प्रार्थना से शुरू किया। मैंने कहा, 'हे भगवान्, यदि तुम हो तो तुम मेरे हृदय की बात जानते हो। तुम जानते हो कि मैं मुक्ति नहीं मांगता, मैं ऐसी कोई चीज नहीं मांगता जो दूसरे मांगा करते हैं। मैं केवल इस जाति को ऊपर उठाने की शक्ति मांगता हूँ, मैं केवल यह मांगता हूँ कि मुझे इस देश के लोगों के लिये, जिनसे मैं प्यार करता हूँ, जीने और कर्म करने की आज्ञा मिले और यह प्रार्थना करता हूँ कि मैं अपना जीवन उनके लिये लगा सकूं। मैंने योगसिद्धि पाने के लिये बहुत दिनों तक प्रयास किया और अंत में किसी हद तक मुझे मिली भी, पर जिस बात के लिये मेरी बहुत अधिक इच्छा थी उसके संबंध में मुझे संतोष नहीं हुआ। तब उस जेल के, उस कालकोठरी के एकांतवास में मैंने उसके लिये फिर से प्रार्थना की। मैंने कहा, 'मुझे अपना आदेश दो, मैं नहीं जानता कि कौन-सा काम करूं और कैसे करूं। मुझे एक संदेश दो।
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इस योगयुक्त अवस्था में मुझे दो संदेश मिले। पहला यह था, 'मैंने तुम्हें एक काम सौंपा है और वह है इस जाति के उत्थान में सहायता देना। शीघ्र ही वह समय आयेगा जब तुम्हें जेल के बाहर जाना होगा, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि इस बार तुम्हें सजा हो या तुम अपना समय, औरों की तरह अपने देश के लिये कष्ट सहते हुए बिताओ। मैंने तुम्हें काम के लिये बुलाया है और यही वह आदेश है जो तुमने मांगा था। मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि जाओ और काम करो। दूसरा संदेश आया, वह इस प्रकार था, 'इस एक वर्ष के एकांतवास में तुम्हें कुछ दिखाया गया है, वह चीज दिखायी गयी है जिसके बारे में तुम्हें संदेह था, वह है हिन्दुधर्म का सत्य। इसी धर्म को मैं संसार के सामने उठा रहा हूँ, यही वह धर्म है जिसे मैंने ऋषि-मुनियों और अवतारों के द्वारा विकसित किया और पूर्ण बनाया है और अब यह धर्म अन्य जातियों में मेरा काम करने के लिये बढ़ रहा है। मैं अपनी वाणी का प्रसार करने के लिये इस जाति को उठा रहा हूँ। यही वह सनातन धर्म है जिसे तुम पहले सचमुच नहीं जानते थे, किन्तु जिसे अब मैंने तुम्हारे सामने प्रकट कर दिया है। तुम्हारे अंदर जो नास्तिकता थी, जो संदेह था उनका उत्तर दे दिया गया है, क्योंकि मैंने अंदर और बाहर स्थूल और सूक्ष्म, सभी प्रमाण दे दिये हैं और उनसे तुम्हें संतोष हो गया है। जब तुम बाहर निकलो तो सदा अपनी जाति को यही वाणी सुनाना कि वे सनातन धर्म के लिये उठ रहे हैं, वे अपने लिये नहीं बल्कि संसार के लिये उठ रहे हैं। मैं उन्हें संसार की सेवा के लिये स्वतंत्रता दे रहा हूँ। अतएव जब यह कहा जाता है कि भारतवर्ष ऊपर उठेगा तो उसका अर्थ होता है सनातन धर्म ऊपर उठेगा| जब कहा जाता है कि भारतवर्ष महान् होगा तो उसका अर्थ होता है सनातन धर्म महान् होगा। जब कहा जाता है कि भारतवर्ष बढ़ेगा और फैलेगा तो इसका अर्थ होता है सनातन धर्म बढ़ेगा और संसार पर छा जायेगा। धर्म के लिये और धर्म के द्वारा ही भारत का अस्तित्व है। धर्म की महिमा बढ़ाने का अर्थ है देश की महिमा बढ़ाना। मैंने तुम्हें दिखा दिया है कि मैं सब जगह हूँ, सभी मनुष्यों और सभी वस्तुओं में, हूँ, मैं इस आंदोलन में हूँ और केवल उन्हीं के अंदर कार्य नहीं कर रहा जो देश के लिये मेहनत कर रहे हैं बल्कि उनके अंदर भी जो उनका विरोध करते और मार्ग में रोड़े अटकाते हैं। मैं प्रत्येक व्यक्ति के अंदर काम कर रहा हूँ और मनुष्य चाहे जो कुछ सोचें या करें, पर वे मेरे हेतु की सहायता करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकते। वे भी मेरा ही काम कर रहे हैं, वे मेरे शत्रु नहीं बल्कि मेरे यंत्र हैं। तुम यह जाने बिना भी कि तुम किस ओर जा रहे हो, अपनी सारी क्रियाओं के द्वारा आगे बढ़ रहे हो। तुम करना चाहते हो कुछ और पर कर बैठते हो कुछ और। तुम एक परिणाम को लक्ष्य बनाते हो और तुम्हारे प्रयास ऐसे हो जाते हैं जो उससे भिन्न या उल्टे परिणाम लाते हैं। शक्ति का आविर्भाव हुआ है और उसने लोगों में प्रवेश किया है। मैं एक जमाने से इस उत्थान की तैयारी करता आ रहा हूँ और अब वह समय आ गया है अब मैं ही इसे पूर्णता की ओर ले जाऊंगा।
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यही वह वाणी है जो मुझे आपको सुनानी है। आपकी सभा का नाम है 'धर्मरक्षिणी सभाÓ। अस्तु, धर्म का संरक्षण, दुनिया के सामने हिन्दुधर्म का संरक्षण और उत्थान- यही कार्य हमारे सामने है। परन्तु हिन्दुधर्म क्या है? वह धर्म क्या है जिसे हम सनातन धर्म कहते हैं? वह हिन्दुधर्म इसी नाते है कि हिन्दुजाति ने इसको रखा है, क्योंकि समुद्र और हिमालय से घिरे हुए इस प्रायद्वीप के एकांतवास में यह फला-फूला है, क्योंकि इस पवित्र और प्राचीन भूमि पर इसकी युगों तक रक्षा करने का भार आर्यजाति को सौंपा गया था। परन्तु यह धर्म किसी एक देश की सीमा से घिरा नहीं है, यह संसार के किसी सीमित भाग के साथ विशेष रूप से और सदा के लिये बंधा नहीं है। जिसे हम हिन्दूधर्म कहते हैं वह वास्तव में सनातन धर्म है, क्योंकि यही वह विश्वव्यापी धर्म है जो दूसरे सभी धर्मों का आलिंगन करता है। यदि कोई धर्म विश्वव्यापी न हो तो वह सनातन भी नहीं हो सकता। कोई संकुचित धर्म, सांप्रदायिक धर्म, अनुदार धर्म कुछ काल और किसी मर्यादित हेतु के लिये ही रह सकता है। यही एक ऐसा धर्म है जो अपने अंदर सायंस के आविष्कारों और दर्शनशास्त्र के चिंतनों का पूर्वाभास देकर और उन्हें अपने अंदर मिलाकर जड़वाद पर विजय प्राप्त कर सकता है। यही एक धर्म है जो मानवजाति के दिल में यह बात बैठा देता है कि भगवान् हमारे निकट हैं, यह उन सभी साधनों को अपने अंदर ले लेता है जिनके द्वारा मनुष्य भगवान् के पास पहुँच सकते हैं। यही एक ऐसा धर्म है जो प्रत्येक क्षण, सभी धर्मों के माने हुए इस सत्य पर जोर देता है कि भगवान् हर आदमी और हर चीज में हैं तथा हम उन्हीं में चलते-फिरते हैं और उन्हीं में हम निवास करते हैं। यही एक ऐसा धर्म है जो इस सत्य को केवल समझने और उसपर विश्वास करने में ही हमारा सहायक नहीं होता बल्कि अपनी सत्ता के अंग-अलंग में इसका अनुभव करने में भी हमारी मदद करता है। यही एक धर्म है जो संसार को दिखा देता है कि संसार क्या है- वासुदेव की लीला। यही एक ऐसा धर्म है जो हमें यह बताता है कि इस लीला में हम अपनी भूमिका अच्छी-से-अच्छी तरह कैसे निभा सकते हैं, जो हमें यह दिखाता है कि इसके सूक्ष्म-से-सूक्ष्म नियम क्या हैं, इसके महान्-से-महान् विधान कौन-से हैं। यही एक ऐसा धर्म है जो जीवन की छोटी-से-छोटी बात को भी धर्म से अलग नहीं करता, जो यह जानता है कि अमरता क्या है और जिसने मृत्यु की वास्तविकता को हमारे अंदर से एकदम निकाल दिया है।
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यही वह वाणी है जो आपको सुनाने के लिये आज मेरी जबान पर रख दी गयी थी। मैं जो कुछ कहना चाहता था वह तो मुझसे अलग कर दिया गया है और जो मुझे कहने के लिये दिया गया है उससे अधिक मेरे पास कहने के लिये कुछ नहीं है। जो वाणी मेरे अंदर रख दी गयी थी केवल वही आपको सुना सकता हूँ। अब वह समाप्त हो चुकी है। पहले भी एक बार जब मेरे अंदर यही शक्ति काम कर रही थी तो मैंने आपसे कहा था कि यह आंदोलन राजनीतिक आंदोलन नहीं है और राष्ट्रीयता राजनीति नहीं, बल्कि एक धर्म है, एक विश्वास है, एक निष्ठा है। उसी बात को आज फिर मैं दोहराता हूँ, किन्तु आज मैं उसे दूसरे ही रूप में उपस्थित कर रहा हूँ। आज मैं यह नहीं कहता कि राष्ट्रीयता एक विश्वास है, एक धर्म है, एक निष्ठा हे, बल्कि मैं यह कहता हूँ कि सनातन धर्म ही हमारे लिये राष्ट्रीयता है। यह हिन्दुजाति सनातन धर्म को लेकर ही पैदा हुई है, उसी को लेकर चलती है और उसी को लेकर पनपती है। जब सनातन धर्म की हानि होती है तब इस जाति की भी अवनति होती है और यदि सनातन धर्म का विनाश संभव होता तो सनातन धर्म के साथ ही-साथ इस जाति का विनाश हो जाता। सनातन धर्म ही है राष्ट्रीयता। यही वह संदेश है जो मुझे आपको सुनाना है।

आत्मज्ञान ही स्वतन्त्रता और परमधर्म है ...

हमारा "स्व" परमात्मा, और "तंत्र" उसकी व्यवस्था है| आत्म-साक्षात्कार यानि आत्मज्ञान ही स्वतन्त्रता है, और परमात्मा से पृथकता ही परतंत्रता है| परमात्मा से पृथकता का कारण है ... राग-द्वेष, अहंकार, लोभ, भय और क्रोध; अन्यथा परमात्मा तो नित्यप्राप्त है| आत्मज्ञान का बोध स्थितप्रज्ञता में होता है| भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं ...

"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः| वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते||२:५६||"
अर्थात् दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है, जिसके मन से राग, भय, और क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है||
आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं ...
दुःख तीन प्रकार के होते हैं ... "आध्यात्मिक", "आधिभौतिक" और "आधिदैविक"| इन दुःखों से जिनका मन उद्विग्न यानि क्षुभित नहीं होता उसे "अनुद्विग्नमना" कहते हैं| सुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा यानि तृष्णा नष्ट हो गयी है (ईंधन डालने से जैसे अग्नि बढ़ती है वैसे ही सुख के साथ साथ जिसकी लालसा नहीं बढ़ती) वह "विगतस्पृह" कहलाता है| राग, द्वेष और अहंकार से मुक्ति वीतरागता है| जो वीतराग है और जिसके भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह "वीतरागभयक्रोध" कहलाता है| ऐसे गुणोंसे युक्त जब कोई हो जाता है तब वह "स्थितधी" यानी "स्थितप्रज्ञ" और मुनि या संन्यासी कहलाता है|
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सब प्रकार के मायावी बंधनों और पाशों से मुक्त होकर ही हम स्वतंत्र हो सकते हैं| स्वतन्त्रता भीतर है, बाहर नहीं| हमारे बिना भी यह संसार चलता रहेगा| हमारे जीवन का उद्देश्य परमात्मा को उपलब्ध होना है, न कि उसकी रचना को| हमारे प्रभु किस बात से प्रसन्न होते हैं, वही महत्वपूर्ण है, न कि अन्य कुछ| आत्मा की पूर्णता के द्वारा ही बाह्य परिवेश को पूर्ण बनाया जा सकता है| परमात्मा उपयोगितावाद की कोई उपयोगी वस्तु नहीं है| हम अपना परम प्रेम परमात्मा को देंगे तो हमारी रक्षा भी होगी, और मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा|
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हमारी कैसी स्थिति है? ... एक अस्पताल में भर्ती रोगी "स्वास्थ्य दिवस" मनाते थे| स्वस्थ होने का झंडा फहरा कर सब एक दुसरे को स्वस्थ होने का अभिनंदन और बधाई देते थे| डॉक्टर उनका उपचार नहीं कर सकते थे क्योंकि डॉक्टर स्वयं बीमार थे और स्वस्थ होने व स्वस्थ करने का नाटक करते थे| मरीजों को बिना दवा दिए ही बोलते थे कि तुम तो अब स्वस्थ हो, देखो अपना स्वस्थ होने का झंडा फहर रहा है| यही स्थिति हमारी है|
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अगस्त २०२०

जन्माष्टमी का पर्व मेरे लिये हर पल है। मेरी मान्यता है कि जो वेदान्त के ब्रह्म हैं, वे ही साकार रूप में भगवान श्रीकृष्ण हैं।

 जन्माष्टमी का पर्व मेरे लिये हर पल है। मेरी मान्यता है कि जो वेदान्त के ब्रह्म हैं, वे ही साकार रूप में भगवान श्रीकृष्ण हैं। वे ही परमशिव और वे ही महादेव हैं। मैं उनका ध्यान कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम या परमशिव के रूप में करता हूँ, वहीं मुझे उनकी अनुभूतियाँ होती हैं। जन्माष्टमी का दीर्घ व गहन ध्यान आज भी होगा और कल भी होगा।

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"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥"
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"वसुदॆव सुतं दॆवं कंस चाणूर मर्दनम्।
दॆवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दॆ जगद्गुरुम्॥"
"वंशीविभूषित करान्नवनीरदाभात् , पीताम्बरादरूण बिम्बफला धरोष्ठात्।
पूर्णेंदु सुन्दर मुखादरविंदनेत्रात् , कृष्णात्परं किमपि तत्वमहं न जाने॥"
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"कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:॥"
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च, जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥"
"कस्तूरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु: करे कंकणम्।
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावली,
गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूड़ामणि:॥"
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अगस्त २०२५

Friday, 14 August 2026

अखंड भारत दिवस : 14 अगस्त

 अखंड भारत दिवस : 14 अगस्त |

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भारतवर्ष का अखंड होना उसकी नियति है| श्रीअरविन्द के शब्दों में भारतवर्ष एक भूमि का टुकड़ा, मिटटी, पहाड़, और नदी नाले नहीं है| न ही इस देश के वासियों का सामूहिक नाम भारत है| भारतवर्ष एक जीवंत सत्ता है| भारतवर्ष हमारे लिए साक्षात माता है जो मानव रूप में भी प्रकट हो सकती है| वर्तमान में भारतवर्ष के अनेक टुकड़े हो गए हैं जिनमें से सबसे बड़ा टुकड़ा India है, फिर बाकि अनेक| पर भारत की आत्मा एक है अतः भारत का अखंड होना निश्चित है| भारतवर्ष दो विपरीत ध्रुवों के समन्वय का देश है| भारतीय मानस आध्यात्मिक, नीतिपरक, बौद्धिक और कलात्मक है|
भारत का पतन इसलिए हुआ कि लोगों का जीवन अधार्मिक, अहंकारी, स्वार्थपरक और भौतिक हो गया| एक ओर अत्यधिक बाह्याचार, कर्मकांड, यंत्रवत भक्तिभावरहित पूजापाठ में हम लोग भटक गए, दूसरी ओर अत्यधिक पलायनवादी वैराग्य वृत्ति में उलझ गये, जिसने समाज की सर्वोत्तम प्रतिभाओं को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया| जो लोग आध्यात्मिक समाज के अवलम्ब और ज्योतिर्मय जीवनदाता बन सकते थे वे समाज के लिए मृत हो गए| फिर हमें कोई सही मार्गदर्शक नहीं मिले|
श्रीमद् भगवद्गीता हमारी राष्ट्रीय धरोहर है अतः इससे प्रेरणा लेकर हमें शक्ति की साधना और देशभक्ति की भावना बढानी चाहिए| केवल भारत की आत्मा ही इस देश को एक कर सकती है| भारत की आत्मा को व्यक्त करने और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने के लिए --------- हमें राष्ट्रभाषा के रूप में संस्कृत को अपनाना होगा और वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बनाना होगा|
आओ हम सब दृढ़ निश्चय कर यह संकल्प करें कि भारत माँ अपने परम वैभव के साथ अखण्डता के सिंहासन पर बैठ रही है और अपने भीतर और बाहर के शत्रुओं का विनाश कर रही है| भारतवर्ष अखंड होगा, होगा, और होगा| धर्म की पुनर्स्थापना होगी और अन्धकार, असत्य व अज्ञान की शक्तियों का नाश होगा| वन्दे मातरम| भारत माता की जय|
सुजलां सुफलां मलय़जशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।१।।
शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम् । वन्दे मातरम् ।।२।।
कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले,
कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
के बॉले माँ तुमि अबले,
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।३।।
तुमि विद्या तुमि धर्म,
तुमि हृदि तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे,
बाहुते तुमि माँ शक्ति,
हृदय़े तुमि माँ भक्ति,
तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे। वन्दे मातरम् ।।४।।
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।५।।
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्,
धरणीं भरणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।६।।
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हमारी अखंडता का संकल्प सांस्कृतिक है, न कि सैन्य|
भारतवर्ष का अखंड होना उसकी नियति है|

भारत पुनश्च: अखंड होगा ---

 सन १९४७ में अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट एवं ट्रूमेन, ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल और एटली, सोवियत संघ के तानाशाह स्तालिन, तथा भारत के मोहनदास गांधी, जवाहर लाल नेहरू, और मुहम्मद अली जिन्ना ने मिलकर पाकिस्तान नाम का एक अलग मजहबी स्टेट बना दिया जो अब पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के रूप में है। लेकिन यह विभाजन स्थायी नहीं है। भारत शीघ्र ही फिर से अखंड होगा। यह मैं अपनी अंतर्चेत्ना से कह रहा हूँ। कब होगा? यह मैं नहीं कह सकता।

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अगले सात वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका का विखंडन हो जाएगा। अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था विफल हो जाएगी। वहाँ मंहगाई बढ़नी आरंभ हो चुकी है। दो साल बाद वहाँ असंतोष फ़ेल जाएगा, और सरकार विरोधी प्रदर्शन आरंभ हो जाएँगे। अमेरिका में महाविनाश होगा, जिसमें रूस की बड़ी भूमिका होगी।
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शीघ्र ही कुछ वर्षों में ब्रिटेन पर अफ्रीका और एशिया से आये काले लोगों का राज होगा। अंग्रेज़ उनके गुलाम होंगे।
यूरोप की समृद्धि एशिया और अफ्रीका से लूट-खसोट के धन से थी। अब वे लूट-खसोट नहीं कर सकते। यूरोप के सब देश अगले सात वर्षों में गरीब देश हो जाएँगे।
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पाकिस्तान का चार, और चीन का सात टुकड़ों में बंटना तय है। अगले सात वर्षों में विश्व की अधिकांश जनसंख्या नष्ट हो जाएगी। बहुत कम लोग बचेंगे।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१४ अगस्त २०२३

क्या यह संसार परमात्मा के मन का एक स्वप्न मात्र है? ---

  क्या यह संसार परमात्मा के मन का एक स्वप्न मात्र है?

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लगता तो ऐसा ही है। परमात्मा से लगातार जुड़े होने के कारण परमात्मा की मादकता (नशा) भी छाने लगी है। अब अच्छा-बुरा जो कुछ भी संसार में हो रहा है, उससे मुझे अब कुछ भी फर्क पड़ना कम होते होते बंद होने लगा है। यह सृष्टि परमात्मा की है, मेरी नहीं। अपनी सृष्टि के लिए परमात्मा स्वयं जिम्मेदार हैं। मेरी ज़िम्मेदारी सिर्फ मेरे अपने विचारों और कर्मों की है। जैसे सिनेमा हॉल में सिनेमा देखते हैं, वैसे ही संसार को निरपेक्ष भाव से देख रहा हूँ।
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मेरी कमियों को दूर करने की, मेरे निर्वाह की, और मुझे अपने साथ एक करने की सारी ज़िम्मेदारी अब स्वयं परमात्मा की है, मेरी नहीं।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
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अपने भाष्य में आचार्य शंकर लिखते हैं कि -- "जो अनन्य भाव से, यानि भगवान को आत्म-रूप से जानते हुए भगवान का निरन्तर चिन्तन करते हैं, भगवान में स्थित उन परमार्थ-ज्ञानियों का योगक्षेम भगवान स्वयं चलाते हैं।
अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम क्षेम है। उनके ये दोनों काम भगवान स्वयं करते हैं। अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योग-क्षेम सम्बन्धी चेष्टा नहीं करते। वे जीने और मरने में भी अपनी वासना नहीं रखते। केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रह जाते हैं। अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं।"
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सच्चिदानंद परमात्मा के सान्निध्य का नशा बड़ा आनंददायक है। संसार के सब नशे उस के सामने बेकार हैं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ अगस्त २०२३