Tuesday, 31 March 2026

होली के त्योहार को मनाने के तरीकों में एक सकारात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन आया है जो स्वागत योग्य व हर्ष का विषय है|

 होली के त्योहार को मनाने के तरीकों में एक सकारात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन आया है जो स्वागत योग्य व हर्ष का विषय है| पिछले साठ वर्षों से अधिक की स्पष्ट स्मृतियाँ हैं, जब होली का त्योहार अत्यधिक अश्लीलता व फूहड़ता से मनाया जाता था| लोग एक-दूसरे को अत्यधिक गंदी व अश्लील गालियां बकते थे और उनका आचरण भी बहुत अधिक निंदनीय होता था| मुझे यह देखकर स्वयं पर और अपने समाज पर शर्म आती थी कि इस पवित्र त्योहार को मनाने का तरीका इतना निकृष्ट और निंदनीय है| महिलाओं का तो साहस ही नहीं होता था कि घर से बाहर कदम भी रख सकें| मैं तो असहाय था और भगवान से प्रार्थना ही कर सकता था कि समाज से यह आसुरी-भाव और तामसिकता समाप्त हो|

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अब तो परिदृश्य एकदम से ही बदल गया है| अब तो महिलाएँ भी खुले में फूलों की होली खेलती हैं, और भजन-कीर्तन करते हुए प्रभात-फेरी भी निकालती हैं| किसी भी तरह का फूहड़पन और अश्लीलता नहीं रही है| अबकी बार भी नगर के चुने हुए तीन-चार मंदिरों में महिलाओं ने खूब भजन-कीर्तन किए और ठाकुर जी के साथ फूलों की होली खेली|
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समय का चक्र सही दिशा में जा रहा है| लोगों की मानसिकता और सोच में भी परिवर्तन हो रहा है| एक दिन में ही सब कुछ नहीं बदल सकता, लेकिन निश्चित रूप से धीरे-धीरे सकारात्मक परिवर्तन हो रहा है| लोगों में आध्यात्मिकता, भक्ति और परोपकार की भावना भी बढ़ रही है| आने वाला समय अच्छा ही अच्छा होगा|
ॐ तत्सत् !!
३१ मार्च २०२१

Saturday, 28 March 2026

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ..... यही शास्त्रों का सार है ---

 गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ..... यही शास्त्रों का सार है||

नवरात्र का आध्यात्मिक महत्व :---
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दुर्गा देवी तो एक है पर उसका प्राकट्य तीन रूपों में है, या यह भी कह सकते हैं कि इन तीनों रूपों का एकत्व ही दुर्गा है| ये तीन रूप हैं ---- (१) महाकाली| (२) महालक्ष्मी (३) महासरस्वती| नवरात्र में हम माँ के इन तीनों रूपों की साधना करते हैं| माँ के इन तीन रूपों की प्रीति के लिए ही समस्त साधना की जाती है|
(१) महाकाली ---- ======== महाकाली की आराधना से विकृतियों और दुष्ट वृत्तियों का नाश होता है| माँ दुर्गा का एक नाम है -- महिषासुर मर्दिनी| महिष का अर्थ होता है -- भैंसा, जो तमोगुण का प्रतीक है| आलस्य, अज्ञान, जड़ता और अविवेक ये तमोगुण के प्रतीक हैं| महिषासुर वध हमारे भीतर के तमोगुण के विनाश का प्रतीक है| इनका बीज मन्त्र "क्लीम्" है|
(२) महालक्ष्मी ------ ======== ध्यानस्थ होने के लिए अंतःकरण का शुद्ध होना आवश्यक होता है जो महालक्ष्मी की कृपा से होता है| सच्चा ऐश्वर्य है आतंरिक समृद्धि| हमारे में सद्गुण होंगे तभी हम भौतिक समृद्धि को सुरक्षित रख सकते हैं| तैतिरीय उपनिषद् में ऋषि प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु जब पहिले हमारे सद्गुण पूर्ण रूप से विकसित हो जाएँ तभी हमें सांसारिक वैभव देना| हमारे में सभी सद्गुण आयें यह महालक्ष्मी की साधना है| इन का बीज मन्त्र "ह्रीं" है|
(३) महासरस्वती ---- ========= गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अपनी आत्मा का ज्ञान ही ज्ञान है| इस आत्मज्ञान को प्रदान करती है -- महासरस्वती| इनका बीज मन्त्र है "अईम्"|
नवार्ण मन्त्र: ======= माँ के इन तीनों रूपों से प्रार्थना है कि हमें अज्ञान रुपी बंधन से मुक्त करो| बौद्धिक जड़ता सबसे अधिक हानिकारक है| यही अज्ञान है और यही हमारे भीतर छिपा महिषासुर है जो माँ की कृपा से ही नष्ट होता है|
सार ----- === नवरात्रि का सन्देश यही है कि समस्त अवांछित को नष्ट कर के चित्त को शुद्ध करो| वांछित सद्गुणों का अपने भीतर विकास करो| आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करो और सीमितताओं का अतिक्रमण करो| यही वास्तविक विजय है| मैंने मेरी बात कम से कम शब्दों में व्यक्त कर दी है, इससे अधिक लिखना मेरे लिए बौद्धिक स्तर पर संभव नहीं है| जय माँ| सबका कल्याण हो|
भवान्याष्टकम् :- (यह जगन्माता का मेरा सर्वाधिक प्रिय स्तोत्र है)
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न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ १ ॥
भवाब्धावपारे महादुःखभीरु पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः ।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ २ ॥
न जानामि दानं न च ध्यानयोगं न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम् ।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ३ ॥
न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित् ।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मातर्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ४ ॥
कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ५ ॥
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित् ।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ६ ॥
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ७ ॥
अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः ।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रनष्टः सदाहं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ८ ॥
॥ इति श्रीमदादिशंकराचार्य विरचिता भवान्याष्ट्कं समाप्ता ॥ २९ मार्च २०१४

Friday, 27 March 2026

अनन्य भाव से की गई अव्यभिचारिणी भक्ति ही परमात्मा को पाने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है ---

 अनन्य भाव से की गई अव्यभिचारिणी भक्ति ही परमात्मा को पाने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है -

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मैं एक ऐसे स्थान पर और ऐसे ही लोगों के मध्य रहना चाहता हूँ, जहां परमात्मा के स्पंदन पूर्ण रूपेण व्यक्त हों। मुझे न तो ऐसा कोई स्थान मिला, और न ही ऐसे लोग जो निरंतर परमात्मा की चेतना में रहते हों। थक हार के कूटस्थ में ही परमात्मा का ध्यान आरंभ किया। कूटस्थ ने मुझे कभी निराश नहीं किया। वहीं मुझे अनुभूति हुई कि मेरे से अन्य कोई नहीं है। उस अनन्य भाव में ही परमात्मा की अनुभूतियाँ हुईं। उस अनन्यता में अव्यभिचारिणी भक्ति हो, इसके अतिरिक्त कोई अन्य अभीप्सा अब नहीं है।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई हुई अनन्य भाव से अव्यभिचारिणी भक्ति ही परमात्मा को उपलब्ध होने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। भगवान कहते हैं --
"मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४:२६॥"
अर्थात् -- जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है॥
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् -- अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
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उपरोक्त विषय पर स्वनामधन्य आचार्य शंकर सहित अनेक आचार्यों ने भाष्य लिखे हैं। उन भाष्यों का स्वाध्याय भी उपयोगी होगा। महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान श्री कृष्ण ने एक स्थान पर महाराजा युधिष्ठिर को भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उपदेश दिया है (तंडी ऋषि कृत शिवसहस्त्रनाम में, जो उन्हें उपमन्यु ऋषि से प्राप्त हुआ।)।
यह लिखने के पश्चात अन्य कुछ लिखने का प्रयोजन ही नहीं रहा है। धीरे धीरे उन सब अनेक समूहों को छोड़ रहा हूँ जिन का सदस्य मुझे लोगों ने बिना पूछे बना दिया है। फेसबुक पर साढ़े चार हज़ार (४५०० +) से अधिक लेख लिख चुका हूँ। अनन्य योग से अव्यभिचारिणी भक्ति से आगे लिखने योग्य भी अन्य कुछ नहीं है।
आप सब में भगवान वासुदेव को नमन॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०२६

भारतीय सभ्यता को नष्ट करने के लिये सर्वप्रथम --- भारत की गुरुकुल शिक्षा पद्धति, और कृषि व्यवस्था को नष्ट किया गया ---

भारतीय सभ्यता को नष्ट करने के लिये सर्वप्रथम --- भारत की गुरुकुल शिक्षा पद्धति, और कृषि व्यवस्था को नष्ट किया गया ---

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प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में गुरुकुलों में -- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, और ज्योतिष आदि वेदांगों की पढ़ाई मुख्य और निःशुल्क होती थी। इन्हें पढ़ाने वाले गुरुओं को "उपाध्याय" कहते थे। वेद, उपनिषद आदि श्रुतियों को पढ़ाने वाले गुरुओं को "आचार्य" कहते थे। इनके अतिरिक्त शास्त्रोक्त अन्य अनेक विषयों के अध्यापक भी होते थे। अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति की जड़ों पर ही प्रहार किया। हमारे पूर्वज ब्राह्मण अध्यापकों, और हिन्दू कृषकों ने अंग्रेज़ी राज्य में कितने मर्मांतक कष्ट सहे, इसकी एक झलक इस लेख में मिल जायेगी।
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Indian Education Act बनाकर सारे गुरुकुलों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, ब्राह्मणों के सारे ग्रन्थ छीन कर जला दिये गये, गुरुकुलों को आग लगा कर नष्ट कर दिया गया और ब्राहमणों को इतना दरिद्र बना दिया गया कि वे अपनी संतानों को पढ़ाने में भी असमर्थ हो गये। सिर्फ वे ही ग्रन्थ मूल रूप से सुरक्षित रहे जिनको ब्राह्मणों ने रट रट कर याद कर रखा था। ग्रंथों को प्रक्षिप्त यानी इस तरह विकृत कर दिया गया जिस से भारतीयों में ब्राह्मण विरोध की भावना और हीनता व्याप्त हो जाये। ब्राह्मणों के अत्याचार की झूठी कहानियाँ गढ़ी गयीं, ब्राह्मणों की संस्था को नष्ट प्राय कर दिया गया। भारत पर आर्य आक्रमण का झूठा और कपोल-कल्पित इतिहास थोपा गया। भारत के हर गाँव में एक न एक गुरुकुल होता था जहाँ ब्राह्मण वर्ग अपना धर्म मान कर निःशुल्क विद्यादान करता था। उसका खर्च समाज चलाता था। वे सारे गुरुकुल बंद कर दिए गये। भारत से जाते हुए भी अंग्रेज़, भारत की सत्ता अपने मानसपुत्रों को सौंप गये, जिन्होनें भारत को नष्ट करने की रही सही कसर भी पूरी कर दी।
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भारत में गायों की संख्या मनुष्यों की संख्या से अधिक थी। हर गाँव में गोचर भूमियाँ थीं। अंग्रेज़ी राज्य में सर्वप्रथम तो एक विशाल पैमाने पर गौ हत्या शुरू की गयी। सबसे पहला क़साईख़ाना सन १७६० ई.में आरम्भ किया गया। फिर हज़ारों कसाईखाने खोले गये। अंग्रेजी राज में प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ गायों की ह्त्या होने लगी थी। खाद के रूप में प्रयुक्त होने वाले गोबर के अभाव में भूमि बंजर होने लगी। फिर जहाँ जहाँ उपजाऊ भूमि थी वहाँ के किसानों को बन्दूक की नोक पर नील की खेती करने को बाध्य किया जाने लगा, जिस से भूमि की उर्वरता बिलकुल ही समाप्त हो गयी।
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लगान वसूली के लिए इंग्लैंड के सारे गुंडों-बदमाशों को भारत में कलेक्टर नियुक्त कर दिया गया जो घोड़े पर बैठकर हर गाँव में हर खेत में जाते और बड़ी निर्दयता से लगान बसूलते। किसानों पर तरह तरह के कर लगा कर उन्हें निर्धन बना दिया गया। अपने खास खास लोगों को जमींदार बना कर जमींदारी प्रथा आरम्भ कर अंग्रेजों ने भारत के किसानों पर बहुत अधिक अत्याचार करवाये। सबसे अधिक अत्याचार तो बंगाल में हुए, जहाँ कृत्रिम अकाल उत्पन्न कर के करोड़ों लोगों को भूख से मरने के लिए बाध्य कर दिया गया। नेपाल की तराई के क्षेत्रों में भूमि बहुत अधिक उपजाऊ थी जिस पर नील की खेती करा कर भूमि को बंजर बना दिया गया। भारत अभी तक कृषि के क्षेत्र में उबर नहीं पाया है।
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देखिये अब आगे और क्या होता है। भगवान से प्रार्थना करते हैं की जो भी हो वह अच्छा ही हो। ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ मार्च २०२६

मेरा चंचल मन बार बार मुझे परमात्मा से दूर ले जाता है। यह मेरा परम धर्म है कि मैं इसे पुनश्च: परमात्मा में स्थित करूँ ---

मेरा चंचल मन बार बार मुझे परमात्मा से दूर ले जाता है। यह मेरा परम धर्म है कि मैं इसे पुनश्च: परमात्मा में स्थित करूँ ---
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आप सब से करबद्ध प्रार्थना है कि इस जीवन में मैंने परमात्मा के अतिरिक्त जो कुछ भी अन्य कहा है उसे विस्मृत कर दें, और स्वयं को परमात्मा में ही स्थित करें। अब इसी समय से मेरा सदा यही प्रयास रहेगा कि परमात्मा से पृथक कोई अन्य विचार मेरे मन में आये ही नहीं। जो बीत गया, सो बीत गया; भविष्य में मेरा चिंतन केवल परमात्मा का ही होगा।
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥"
अर्थात् -- जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है, ऐसा मेरा मत है॥
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भगवान कहते हैं --
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
अर्थात् -- यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
अर्थात् -- हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता॥
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
अर्थात् -- (तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
"ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥१८:५४॥"
अर्थात् -- ब्रह्मभूत (जो साधक ब्रह्म बन गया है), प्रसन्न मन वाला पुरुष न इच्छा करता है और न शोक, समस्त भूतों के प्रति सम होकर वह मेरी परा भक्ति को प्राप्त करता है॥
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् -- मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
अर्थात् -- तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो॥
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
"य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिम् मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥१८:६८॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझसे परम प्रेम (परा भक्ति) करके इस परम गुह्य ज्ञान का उपदेश मेरे भक्तों को देता है, वह नि:सन्देह मुझे ही प्राप्त होता है॥
"न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिंमेप्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥१८:६९॥"
अर्थात् -- उसके समान मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य करनेवाला मनुष्योंमें कोई भी नहीं है और इस भूमण्डलपर उसके समान मेरा दूसरा कोई प्रियतर होगा भी नहीं।
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आप सब में मैं परमात्मा को नमन करता हूँ। एकमात्र अस्तित्व केवल परमात्मा का है। अन्य कुछ भी नहीं है। ॐ तत् सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२५ मार्च २०२६

यह लेख उनके लिए है जो भगवान की भक्ति तो करना चाहते हैं, लेकिन साहस नहीं जुटा पा रहे ---

 यह लेख उनके लिए है जो भगवान की भक्ति तो करना चाहते हैं, लेकिन साहस नहीं जुटा पा रहे ---

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वे भगवान श्रीराम का नित्य नियमित नामजप और ध्यान करें। आध्यात्मिक साधना के मार्ग में सबसे बड़ी कमजोरी --- हमारे में साहस का अभाव है, जरा जरा सी विपरीतताओं से हम घबरा जाते हैं। अन्य कोई समस्या नहीं है। साहस के अभाव में हम कोई निर्णय नहीं ले पाते। निर्भीक बनने के लिए हमें भगवान श्रीराम या श्रीकृष्ण का ध्यान करना चाहिए। स्वयं निमित्त मात्र होकर उन्हें जीवन का कर्ता बनायें।
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अंधकार में रहते रहते हमें अंधेरे में रहने की बहुत बुरी आदत पड़ गई है। हमें पता है कि हमारी सब समस्याओं का निदान परमात्मा के प्रकाश यानि भगवत्-प्राप्ति (आत्म-साक्षात्कार) में है। लेकिन हम साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। अन्य कोई समस्या नहीं है। साहस का अभाव ही हमारी एकमात्र समस्या है। सिर्फ हमारी ही नहीं, सभी की यही एकमात्र समस्या है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ मार्च २०२६

मेरे लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग व भक्तियोग क्या हैं?

मेरे लिए निष्काम भाव से की गई ईश्वर की साधना कर्मयोग है। साधना के पश्चात ईश्वर से एकत्व की अनुभूतियाँ ज्ञानयोग है। ईश्वर से परमप्रेम, और अभीप्सा की अग्नि में समस्त आकांक्षाओं/कामनाओं की आहुति भक्तियोग है।
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भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है। वे स्वयं प्रत्यक्ष देवता हैं। सफलता उनके पीछे पीछे चलती है। उन्होंने कभी कोई विफलता नहीं देखी। असत्य और अंधकार की कोई आसुरी शक्ति, उनके समक्ष नहीं टिक सकती। उनसे अधिक शक्तिशाली और ज्ञानी अन्य कोई नहीं है।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
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आध्यात्मिक उन्नति के लिए हमारी दृष्टि -- समष्टि-दृष्टि हो, न कि व्यक्तिगत। परमात्मा की सर्वव्यापकता और पूर्णता पर हमारा ध्यान और समर्पण होगा तभी हमारी आध्यात्मिक उन्नति होगी। एक साधक के लिए उन्नति का आधार और मापदंड उसका ब्रह्मज्ञान हो, न कि कुछ अन्य।
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जो बीत गया सो बीत गया, जो हो गया सो हो गया। भूतकाल को तो बदल नहीं सकते, अभी जब से होश आया है, तब इसी समय से परमात्मा की चेतना में रहें। हमारा कार्य परमात्मा में पूर्ण समर्पण है। यह शरीर रहे या न रहे, इसका कोई महत्व नहीं है। महत्व इस बात का है कि निज जीवन में परमात्मा का अवतरण हो।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ मार्च २०२६

हमारे सभी तरह के सभी संशयों का निवारण कैसे हो? ---

 हमारे सभी तरह के सभी संशयों का निवारण कैसे हो? ---

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ईश्वर ने चाहा तो हमें आज इस लेख में सबके-सब तरह के संशयों का निवारण हो जाएगा। यदि फिर भी कोई संशय रहता है तो उसका निवारण गुरुरूप में स्वयं जगत्-गुरु भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण, या दक्षिणामूर्ति रूप में भगवान शिव ही कर सकते हैं। हमें सब तरह की कामनाओं, किन्तु-परन्तुओं, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म से ऊपर उठकर, व कर्ताभाव से मुक्त होकर, परमात्मा को समर्पित होना ही पड़ेगा। हृदय में (यहाँ हृदय का अर्थ हमारे भावों और विचारों से है, न कि भौतिक हृदय से) किसी भी तरह की कोई आकांक्षा न होकर केवल परमात्मा को समर्पित होने की अभीप्सा हो।
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उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता, भागवत पुराण, व रामचरितमानस जैसे ग्रन्थों का स्वाध्याय समय समय पर करते रहना चाहिए। इससे प्रेरणा मिलती रहती है और अभीप्सा की अग्नि प्रज्ज्वलित रहती है। भौतिक शरीर की क्षमता व मनोबल को बनाए रखने के लिए हठयोग भी आवश्यक है। ध्यान -- अनन्य भाव से ज्योतिर्मय ब्रह्म का करें। अजपा-जप और नादश्रवण — ये दोनों जपयोग के अंतर्गत ही आते हैं। हमारा चाल-चलन, और आचरण पवित्रतम हो, और हमारी भक्ति अव्यभिचारिणी हो। जितने समय तक हम स्वाध्याय करते हैं, उससे कई गुणा अधिक समय तक हमें नाद-श्रवण सहित ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करना चाहिए।
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यदि अब भी किसी भी तरह का कोई संशय हो तो उसका निवारण किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय (जिन्हें श्रुतियों का ज्ञान हो) आचार्य से करें क्योंकि यह श्रुति भगवती का आदेश है। ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करते करते साधक को परमशिव व पुरुषोत्तम की अनुभूति व उन का बोध भी उनकी परम कृपा से हो जायेगा।
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यह लेख परिचयात्मक भी है और मार्गदर्शक भी। इससे अधिक लिखने में इस समय असमर्थ हूँ। आपको मेरे हृदय का पूर्ण प्रेम अर्पित है। आपका जीवन कृतार्थ हो, व आप कृतकृत्य हों। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२७ मार्च २०२६

Thursday, 26 March 2026

सत्साहित्य पढ़ने से भक्ति जागृत होती है .... .

 सत्साहित्य पढ़ने से भक्ति जागृत होती है ....

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यह मेरा सौभाग्य था कि किशोरावस्था से ही मुझे पढ़ने के लिए प्रचूर मात्रा में बहुत अच्छा साहित्य मिला जिनमें महापुरुषों की जीवनियाँ, उनके लेख, और तत्कालीन हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृतियाँ थीं| पढ़ने का शौक भी बहुत अधिक था जिसे पूरा करने केलिए बहुत अच्छा वातावरण मिला| उस जमाने में बहुत अच्छी पत्रिकाओं का प्रकाशन हिंदी भाषा में होता था जैसे ... "साप्ताहिक हिन्दुस्तान", "धर्मयुग", "कादम्बिनी", "नवनीत" आदि| बाल साहित्य भी खूब अच्छा मिलता था और बालकों के लिए भी अनेक ज्ञानवर्धक व रोचक पत्रिकाएँ छपती थीं, जैसे "बालभारती", "चंदामामा" आदि, जिनमें से कइयों के तो अब नाम भी याद नहीं हैं| पूरी महाभारत और रामायण तो घर पर ही किशोरावस्था में पढ़ ली थीं| बहुत अच्छे पुस्तकालय थे और लोगों को पढने का शौक भी बहुत था| अब तो लगता है कि वह ज़माना ही दूसरा था| आजकल के विद्यार्थियों पर तो ट्यूशन और कोचिंग का इतना अधिक भार है कि वे पाठ्यक्रम से बाहर का कुछ पढ़ने की सोच ही नहीं सकते| पहले हिंदी के समाचार पत्रों में भी बड़े अच्छे अच्छे ज्ञानवर्धक लेख आते थे जो अब नहीं आते|
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मेरे पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा सम्पूर्ण विवेकानंद साहित्य का जो मैनें १५-१६ वर्ष की आयु में ही पूरा पढ़ लिया था| फिर रमण महर्षि का सारा साहित्य पढ़ा| संघ का और संघ से सम्बंधित सारा उपलब्ध राष्ट्रवादी साहित्य पढ़ा| हिंदी में ओशो की जितनी भी पुस्तकें मिलीं, सारी पढ़ डालीं| संत साहित्य और आर्य समाज का साहित्य भी खूब पढ़ा| स्वामी रामतीर्थ के वेदान्त पर सारे उपलब्ध लेख पढ़े| परमहंस योगानंद का साहित्य भी पूरा पढ़ा| अनेक साहित्यिक रचनाएँ भी पढ़ीं जब तक मन पूरी तरह नहीं भर गया| सिर्फ वही नहीं पढ़ा जिसे समझने की क्षमता नहीं थी| इस अध्ययन से सबसे बड़ा लाभ तो यह हुआ कि भगवान की भक्ति जागृत हुई जिसे मैं जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूँ| भगवान की कृपा से जीवन में बड़े अच्छे अच्छे लोग मिले|
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अब और पढने की क्षमता नहीं है अतः पढ़ना छोड़ दिया है| बचा हुआ शेष जो जीवन है उसे गीता के स्वाध्याय और ध्यान साधना में ही बिताने की प्रेरणा मिल रही है| अंत समय में चेतना पूरी तरह परमात्मा में हो इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं चाहिए| भगवान ही जिससे मिलाना चाहे उससे मिला दे, पर चलाकर अब मेरी किसी से भी मिलने की इच्छा नहीं है| कभी कभी कुछ आश्रमों में एकांत लाभ के लिए चला जाता हूँ, पर सामाजिकता या पर्यटन के नाते कहीं भी नहीं जाता| किसी भी विषय पर अब किसी से भी कोई चर्चा या वाद-विवाद नहीं करता| किसी भी तरह की कोई शंका या संदेह नहीं है| भगवान् ने सारी जिज्ञासाओं की पूर्ती कर दी है|
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परमात्मा के प्रति प्रेम बना रहे, और इस जीवन का यह अंतिम समय भी परमात्मा के प्रेम में ही बीत जाए, यही प्रार्थना है| अंत समय में कोई कष्ट नहीं होगा सचेतन रूप से ही प्राण छूटेंगे, इतनी तो मेरी आस्था और विश्वास है|
सभी को मेरी शुभ कामनाएँ और नमन ! सब पर परमात्मा की परम कृपा बनी रहे|
ॐ ॐ ॐ !!
२६ मार्च २०१८

Wednesday, 25 March 2026

सत्संग ---

 सत्संग ---

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भगवान का निरंतर मानसिक स्मरण ही सबसे अच्छा सत्संग है। अपने इष्ट देवी/देवता को हर समय अपनी स्मृति में रखो, उन्हें सर्वत्र, व सब में उन्हीं को देख​ते हुए मानसिक रूप से उनका नाम-जप करते रहो। भगवान का स्मरण करते हुए धर्मग्रंथों का स्वाध्याय भी बहुत अच्छा सत्संग है। अच्छे विरक्त तपस्वी महात्माओं का आजकल सत्संग मिलना बहुत दुर्लभ है। इसलिए सबसे अच्छा सत्संग तो भगवान के साथ ही है। भगवान स्वयं ही एकमात्र सत्य, यानि सत्य-नारायण हैं। भगवान का जो भी नाम-रूप हमें पसंद है, उसको सदा अपने चित्त में रखो। इससे अच्छा सत्संग कोई दूसरा नहीं है।
वासनाएँ बहुत अधिक शक्तिशाली हैं, जिनसे हम नहीं लड़ सकते। वासनाओं का प्रतिकार हम निरंतर सत्संग से ही कर सकते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥६:२९॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् --
योगयुक्त अन्त:करण वाला और सर्वत्र समदर्शी योगी आत्मा को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा में देखता है॥
जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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यह एक ऐसा विषय है जिस पर कितना भी लिखते रहो, लेखनी रुक नहीं सकती। अतः यहीं पर लेखनी को विराम दे रहा हूँ। भगवान का संग ही सबसे अच्छा सत्संग है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ मार्च २०२४

Sunday, 22 March 2026

प्रार्थना ---

 प्रार्थना ---

"भारत एक सत्यनिष्ठ सनातन-धर्मपरायण परम शक्तिशाली आध्यात्मिक राष्ट्र अपने द्वीगुणित परम वैभव को प्राप्त कर अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान हो। इस राष्ट्र में कहीं किंचित मात्र भी असत्य का अंधकार न रहे। ॐ ॐ ॐ !!"
उपरोक्त संकल्प के साथ हम शक्ति आराधना कर रहे हैं। "हमारी गति जगन्माता (परमात्मा का मातृरूप) हैं। हम परमब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित हों। नववर्ष मंगलमय हो। ॐ ॐ ॐ !!"

नवरात्रि का पर्व हमारे जीवन में व्याप्त सब तरह के विकारों और अभावों को दूर कर सद्गुणों को प्राप्त करने की साधना है।

 नवरात्रि का पर्व हमारे जीवन में व्याप्त सब तरह के विकारों और अभावों को दूर कर सद्गुणों को प्राप्त करने की साधना है। हमारे जीवन में अभाव क्यों हैं? उनके कारणों का विश्लेषण कर उन्हें दूर कीजिये। मुख्य कारण है—जीवन में तमोगुण की प्रधानता, जिसके कारण प्रज्ञा यानी विवेक का अभाव है। इसी के कारण सब तरह की दरिद्रता है।

नवरात्रों के पर्व पर हम इसीलिए जगन्माता के तीन रूपों -- महासरस्वती, महालक्ष्मी, और महाकाली की आराधना करते हैं। इन तीनों का समन्वित रूप महादुर्गा है। महाकाली हमारे में सब तरह के विकारों को दूर करती है। महालक्ष्मी हर प्रकार की दरिद्रता दूर करती है। महासरस्वती हमें विवेक प्रदान कर आत्म-साक्षात्कार कराती है।
अपने विवेक से इस विषय पर ध्यान दें, और परमात्मा के मातृरूप की आराधना करें।
कृपा शंकर
२० मार्च २०२६

हमें असत्य के अंधकार में कौन भटकाता है?

 हमें असत्य के अंधकार में कौन भटकाता है?

(यानि हमें परमात्मा से दूर कौन करता है? परमात्मा ही एकमात्र "सत्य" है, और उनसे विमुखता ही "असत्य" है।)
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यहाँ मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ, वह अपने अनुभवों से लिख रहा हूँ। मेरे अनुभव ही प्रमाण हैं। यदि कोई कमी है तो वह मेरे अनुभवों में ही हो सकती है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। हम असत्य के अंधकार में भटकते हैं इसका एकमात्र कारण हमारा "तमोगुण" है। अन्य कोई कारण नहीं है। यह तमोगुण हमारे में मुख्यतः "लोभ", "अहंकार", "प्रमाद" और "दीर्घसूत्रता" के रूप में व्यक्त होता है। तमोगुण से मुक्ति का मार्ग -- "वीतरागता" है, और इसका लक्षण "स्थितप्रज्ञता" है। "राग-द्वेष" और "अहंकार" से मुक्त जीवात्मा वीतराग है, और जिसकी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित है, वह स्थितप्रज्ञ है। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक है। वीतरागता ही हमें महत् तत्व से जोड़ कर "महात्मा" बनाती है। महात्मा का लक्षण -- वीतरागता है। जो वीतराग नहीं है, वह कभी भी महात्मा नहीं हो सकता, उसे महात्मा न कहें।
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तमोगुण से मुक्ति के लिये हम या तो भगवान विष्णु (या उनके अवतारों), या जगन्माता, या वेदान्त दर्शन के अनुसार परमब्रह्म, या परमशिव की उपासना करें। श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम और परमशिव की अनुभूतियाँ एक ही होती हैं, अतः इनमें कोई भेद नहीं है। स्थितप्रज्ञता ही हमें परमात्मा का साक्षात्कार कराती है, और स्थितप्रज्ञ होने के लिए वीतराग होना आवश्यक है। तमोगुण से मुक्त हुए बिना हम आध्यात्म को नहीं समझ सकते। संक्षेप में तमोगुण ही हमें परमात्मा से विमुख करता है। अन्य कोई कारण नहीं है।
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जैसा मुझे समझ में आया, उसका सार ही यहाँ लिखा है। कोई कमी है तो वह मेरी समझ में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। आप सब के रूप में परमशिव को नमन॥
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ नमः शिवाय। ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२१ मार्च २०२६