अनन्य भाव से की गई अव्यभिचारिणी भक्ति ही परमात्मा को पाने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है -
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मैं एक ऐसे स्थान पर और ऐसे ही लोगों के मध्य रहना चाहता हूँ, जहां परमात्मा के स्पंदन पूर्ण रूपेण व्यक्त हों। मुझे न तो ऐसा कोई स्थान मिला, और न ही ऐसे लोग जो निरंतर परमात्मा की चेतना में रहते हों। थक हार के कूटस्थ में ही परमात्मा का ध्यान आरंभ किया। कूटस्थ ने मुझे कभी निराश नहीं किया। वहीं मुझे अनुभूति हुई कि मेरे से अन्य कोई नहीं है। उस अनन्य भाव में ही परमात्मा की अनुभूतियाँ हुईं। उस अनन्यता में अव्यभिचारिणी भक्ति हो, इसके अतिरिक्त कोई अन्य अभीप्सा अब नहीं है।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई हुई अनन्य भाव से अव्यभिचारिणी भक्ति ही परमात्मा को उपलब्ध होने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। भगवान कहते हैं --
"मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४:२६॥"
अर्थात् -- जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है॥
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् -- अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
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उपरोक्त विषय पर स्वनामधन्य आचार्य शंकर सहित अनेक आचार्यों ने भाष्य लिखे हैं। उन भाष्यों का स्वाध्याय भी उपयोगी होगा। महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान श्री कृष्ण ने एक स्थान पर महाराजा युधिष्ठिर को भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उपदेश दिया है (तंडी ऋषि कृत शिवसहस्त्रनाम में, जो उन्हें उपमन्यु ऋषि से प्राप्त हुआ।)।
यह लिखने के पश्चात अन्य कुछ लिखने का प्रयोजन ही नहीं रहा है। धीरे धीरे उन सब अनेक समूहों को छोड़ रहा हूँ जिन का सदस्य मुझे लोगों ने बिना पूछे बना दिया है। फेसबुक पर साढ़े चार हज़ार (४५०० +) से अधिक लेख लिख चुका हूँ। अनन्य योग से अव्यभिचारिणी भक्ति से आगे लिखने योग्य भी अन्य कुछ नहीं है।
आप सब में भगवान वासुदेव को नमन॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ मार्च २०२६
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