Thursday, 12 February 2026

शिवभाव में करें गुरु रूप शिव का ध्यान

 शिवभाव में करें गुरु रूप शिव का ध्यान .........

भावजगत में सम्पूर्ण समष्टि के साथ स्वयं को एकाकार करें| आप यह देह नहीं बल्कि परमात्मा की अनंतता और उनका सम्पूर्ण प्रेम हैं| शिवनेत्र होकर कूटस्थ में सर्वव्यापी सद्गुरु रूप शिव का ध्यान करें|
निष्ठावान मुमुक्षु का सारा मार्गदर्शन निश्चित रूप से भगवान स्वयं करते हैं और उसकी रक्षा भी होती है| आपकी सारी जिज्ञासाओं के उत्तर और सारी समस्याओं का समाधान परमात्मा में ही मिलेगा|
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ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ! ॐ शिव ॐ शिव ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपाशंकर
१३ फरवरी २०१६

फ़ेसबुक/ट्वीटर/व्हाट्सएप्प/ईमेल आदि की दुनियाँ आभासी नहीं, वास्तविक है ---

 फ़ेसबुक/ट्वीटर/व्हाट्सएप्प/ईमेल आदि की दुनियाँ आभासी नहीं, वास्तविक है| फ़ेसबुक पर मुझे अनेक सत्संगी मित्र मिले हैं, कई अच्छे/बुरे अनुभव हुए हैं, और बहुत कुछ जानने को भी मिला है| सबसे बड़ा लाभ तो यह हुआ है कि मुझे अपने विचारों और भावों को व्यक्त करने का अवसर मिला| हृदय में परमात्मा और राष्ट्र के प्रति जो परमप्रेम था, उसे शब्द देकर मैं व्यक्त कर सका, इसका मुझे बड़ा गर्व और प्रसन्नता है|

आरंभ में मैं अंग्रेजी में लिखता था, तब बहुत सारे विदेशी मित्र थे| संतुष्टि मुझे हिन्दी में लिख कर ही मिली| हिन्दी में लिखने के कारण विदेशी मित्र सब हट गए और भारतीय मित्र खूब हो गए| फ़ेसबुक पर सैंकड़ों मित्र बने, सैंकड़ों चले गए और सैकड़ों हैं| सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि जो मित्र आरंभ से ही मेरे साथ टिके हुए हैं वे कभी बोर नहीं हुए और अभी भी मेरे लेखों को पढ़ते हैं| मैं एक ही विषय पर लिखता हूँ, वह है भक्ति ..... या तो परमात्मा की या फिर राष्ट्र की|
मेरे निजात्म आप सब को मेरा सप्रेम सादर नमन ! ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ !
१३ फरवरी २०२०

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ---

 यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ---

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मेरे लिए अभी और लिखने के लिए कुछ नहीं बचा है। जो कुछ भी लिखने की प्रेरणा भगवान से मिली, वह सब खूब लिखा है। अब इस संसार से मन पूर्णतः तृप्त हो गया है, किसी भी तरह की कोई आकांक्षा नहीं रही है। इस बचे हुए जीवनकाल में भगवान जिन-जिन संत-महात्माओं और सदगृहस्थों से मिलवायेंगे उन सब से अवश्य मिलूँगा। जहाँ कोई बहुत प्रेम से बुलायेंगे, तो वहाँ भी क्षमतानुसार अवश्य जाऊँगा। यह अंतःकरण भगवान को समर्पित है।
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सारा अवशिष्ट जीवन भगवान के ध्यान, उपासना और स्वाध्याय में ही बीत जायेगा। जब भी भगवान का आदेश होगा तब ब्रह्मरंध्र के मार्ग से स्वयं ही इस शरीर का त्याग कर के सचेतन रूप से भगवान के धाम चले जायेंगे।
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥ (गीता)
"अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥८:२१॥" (गीता)
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"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (कठोपनिषद २-२-१५)
१३ फरवरी २०२३