Saturday, 24 May 2025

आज मीरपुर डे है, परन्तु न तो मेन स्ट्रीम मीडिया और न ही कोई पत्रकार व लेखक इसका उल्लेख करना चाहता है।

आज मीरपुर डे है, परन्तु न तो मेन स्ट्रीम मीडिया और न ही कोई पत्रकार व लेखक इसका उल्लेख करना चाहता है।
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इस मीरपुर डे का बैकग्राउंड यह है कि आज से 74 वर्ष पूर्व 25 नवंबर 1947 को जम्मू कश्मीर के मीरपुर जिले पर पाकिस्तान ने आक्रमण किया था और वहां रहने वाले 20,000 निहत्थे हिंदू और सिखों का नरसंहार कर दिया। वहां से बचकर केवल 2500 मीरपुर के निवासी किसी तरह से भूखे प्यासे कई दिनों तक पैदल चलकर जम्मू पहुंच सके थे।
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यह सब इसलिए हुआ क्योंकि पाकिस्तान ने मीरपुर के रहने वाले हिंदुओं व सिखों को चेतावनी दी थी कि यदि बचना चाहते हो तो अपने घर पर सफेद झंडा आत्मसमर्पण के चिन्ह के रूप में लगा देना, परंतु मीरपुर के निवासी हिंदुओं व् सिखों ने अपने घरों पर लाल झंडा फहरा कर यह संदेश दिया कि हम आत्मसमर्पण नहीं अपितु लड़ कर अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे।
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मीरपुर पर आक्रमण के लिए पाकिस्तान सरकार ने कबायलियों और पठानों के साथ एक समझौता किया था जिसका नाम था "ज़ेन और जार" समझौता, जिसका अर्थ था मीरपुर पर कब्जा करने के बाद वहां रहने वाले हिंदुओं व् सिखों की सारी संपत्ति जमीन और धन दौलत पाकिस्तान सरकार की होगी और वहां रहने वाली सभी हिंदू व सिख महिलाएं पठानों की सम्पत्ति होंगीं।
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आप जानते हैं हिंदुओं और सिखों को धोखा किसने दिया ?
मीरपुर निवासी हिंदुओं व् सिखों के मुस्लिम पड़ोसीयों ने, जो उसी वर्ष अगस्त में बंटवारे के बाद मीरपुर छोड़ कर पाकिस्तान चले गए और पाकिस्तान आर्मी को मीरपुर की भौगौलिक स्थिति, स्थानीय आबादी की पूरी जानकारी उपलब्ध करवाई, जिससे पाक आर्मी सफलतापूर्वक मीरपुर पर कब्जा कर उसे पाकिस्तान में मिला सके।
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क्या आप जानते हैं कि उस आक्रमण के समय हमारे देश के महान स्टेट्समैन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी कांग्रेस सरकार ने क्या किया ?
भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस सरकार ने मीरपुर के निवासियों की सहायता करने से मना कर दिया।नेहरू ने 20,000 हिंदुओं सिखों को पाकिस्तानी सेना और कबायलियों द्वारा मारे लुटे जाने के लिए छोड़ दिया, कबायलियों और पठानों द्वारा हजारों हिंदू और सिख बच्चियों, लड़कियों औरतों को अपनी हवस का शिकार बनाने के बाद उन्हें उठा उठाकर पाकिस्तान ले जाने दिया। पाकिस्तानियों और कबायली पठानों से बचने के लिए मीरपुर में कई हिन्दू व सिख महिलाओं ने आत्महत्या तक कर ली थी।
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तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस सरकार यदि चाहती तो मीरपुर को पाकिस्तानीयों और कबायलियों से बचाने के लिए और वहां के नागरिकों की रक्षा के लिए इंडियन आर्मी को भेज सकते थे, किंतु नेहरू की कांग्रेस सरकार ने जान-बूझ कर ऐसा कुछ नहीं किया, जबकि उस समय मीरपुर से कुछ ही मील दूर झांगर में भारतीय सेना तैनात थी, परंतु भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मीरपुर के हिंदू व सिखों को उनके हाल पर पाकिस्तानियों के हाथों मरने के लिए छोड़ दिया।
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भारत देश के एक पूरे शहर पर कब्जा कर लिया गया।भारत के इस शहर मीरपुर की सम्पूर्ण पुरुष आबादी को 1 दिन में कत्ल कर दिया गया।उस शहर की सभी महिलाओं को अगवा कर लिया गया उनके संग यौन अपराध हुए उन हजारों महिलाओं को उठा कर ले जाया गया, परंतु भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस सरकार चटखारें लेकर मीरपुर के 20,000 हिंदू सिख पुरुषों के जनसंहार और हजारों हिन्दू व् सिख महिलाओं के बलात्कार और अपहरण का दृश्य मजे ले ले कर देखकर आनंदित होते रहे, मौन साध कर बैठे रहे, और उनकी सहायता हेतु सेना नहीं भेजी।
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1 दिन के अंदर ही पूरा मीरपुर कब्रिस्तान में बदल गया।सभी हिंदू व सिख पुरुषों को मार दिया गया। पुरुषों के सामने उनकी बेटियों बहुओं बहनों माओं, पत्नियों का बलात्कार किया गया और फिर उन महिलाओं के सामने ही उनके पुरुषों को मार दिया गया।इसके बाद सभी बच्चियों लड़कियों औरतों को उठा कर पाकिस्तान ले जाया गया केवल कुछ वृद्ध महिलाओं को जीवित छोड़ा गया।
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यह सब इसलिए हुआ क्योंकि नेहरू के नेतृत्व वाली तत्कालीन भारत सरकार ने जान-बूझ कर हिंदुओं व सिखों को मरने दिया,जबकी वहां के निवासी यह सोचकर बैठे थे कि भारत सरकार उनकी सुरक्षा हेतु सेना अवश्य भेजेगी और वे भारतीय सेना के संग कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ते हुए अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे।इसीलिए मीरपुर के हिंदूओं व सिखों ने आत्मसमर्पण के बदले अपनी मातृभूमि के लिए लड़ने का निर्णय किया।
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विडंबना देखिए कि पाकिस्तान द्वारा मीरपुर में अंजाम दिए गए 20,000 निर्दोष हिंदुओं व् सिखों के उस नरसंहार का आज तक कहीं कोई उल्लेख नहीं होता, ना तो आज तक पाकिस्तान सरकार पाकिस्तानी सेना के मानवाधिकार उल्लंघनों और अपराधों की बात होती है, ना ही तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन कांग्रेस सरकार की भूमिका पर प्रश्न उठाए जाते हैं।
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मीरपुर आज भी पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है और कभी वहां रहने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं और सिखों का अब वहां 100% जातीय सफाया पाकिस्तान द्वारा किया जा चुका है।
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(श्री Aditya Narayan Jha Anal की वाल से साभार लिया हुआ) 

आत्म-रक्षा हेतु हमें स्वयं में भी क्षत्रियत्व विकसित करना होगा ---

जो क्षति से त्राण करता है, वह क्षत्रिय है। राष्ट्र की रक्षा क्षत्रिय-धर्म ही करेगा। भारत में सभी क्षत्रियों को अपने साथ अपने अस्त्र-शस्त्र रखने की अनुमति हो, वैसे ही जैसे सिखों को कृपाण रखने की अनुमति है। क्षत्रियों ने ही राष्ट्र की रक्षा सदा ही की है। यह उनका धर्म है। क्षत्रियों को चाहिये कि वे धर्मरक्षार्थ अपने अस्त्र-शस्त्र सदा अपने साथ रखने का प्रावधान प्राप्त करें।

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हमारी (सारे हिंदु समाज की) दुर्दशा का मुख्य कारण हमारी कायरता है। इस कायरता को दूर करने का एकमात्र उपाय है -- भगवान श्रीराम का ध्यान। चिंतन, मनन, निदिध्यासन, ध्यान/उपासना द्वारा उन्हें निज जीवन में अवतरित करना होगा। हर क्षेत्र में हमें स्वयं राम बनना होगा। हमारा जीवन राममय हो। अन्य कोई उपाय नहीं है। भगवान को छल-कपट पसंद नहीं है। जो दूसरों के साथ छल करते हैं, उनका कोई पुण्य उनके काम नहीं आयेगा। उनका अपने परिवार सहित नर्कगामी होना सुनिश्चित है। .
सत्य-सनातन-धर्म और भारत की रक्षा करो, हे भगवन् !!
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि।।

२५ मई २०२२

हमें (मुझे या किसी को भी) परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती, इसका एकमात्र कारण परमप्रेम (भक्ति), और सत्यनिष्ठा (sincerity & integrity) का अभाव है

 हमें (मुझे या किसी को भी) परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती, इसका एकमात्र कारण परमप्रेम (भक्ति), और सत्यनिष्ठा (sincerity & integrity) का अभाव है। अन्य कोई कारण नहीं है।

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द्वैत-भाव की समाप्ति -- "समर्पण" है, और आत्म-तत्व में स्थिति -- ध्यान, उपासना, व उपवास है। भगवान सत्य-नारायण हैं। सत्यनिष्ठा से समर्पित हुआ जाये तो परमात्मा की उपासना और परमात्मा की प्राप्ति अति सरल है। सत्यनिष्ठा के अभाव से ही हम परमात्मा से दूर हैं। 'उपासना' का अर्थ है -- अपने इष्टदेव के समीप उपस्थिति या आसीन होना (आसन)।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥१२:३॥"
अर्थात् - "जो अपनी इन्द्रियों को वश में कर के अचिन्त्य, सर्वत्र परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में रत और सर्वत्र समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।"
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यहाँ भगवान श्री कृष्ण ने "उपासते" यानि उपासना शब्द का प्रयोग किया है।
आचार्य शंकर के अनुसार -- "उपास्य वस्तु को शास्त्रोक्त विधि से बुद्धि का विषय बनाकर, उसके समीप पहुँचकर, तैलधारा के सदृश समानवृत्तियों के प्रवाह से दीर्घकाल तक उसमें स्थिर रहने को उपासना कहते हैं" (गीता १२:३ पर शंकर भाष्य)।
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एक बर्तन से दूसरे बर्तन में जब तेल डालते हैं तब तेल की धार टूटती नहीं है। वैसे ही अपने प्रेमास्पद परमात्मा का ध्यान निरंतर तेलधारा के समान अखंड होना चाहिए, यानि बीच-बीच में खंडित न हो। साथ-साथ यदि भक्ति यानि परमप्रेम भी हो तो आगे का सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, और आगे के सारे द्वार भी स्वतः ही खुल जाते हैं। यही उपासना है।
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आपके समक्ष मिठाई रखी है तो मिठाई को चखिए, खाइये और उसका आनंद लें। उसके बखान में कोई आनंद नहीं है। भगवान सामने बैठे हैं, उनमें स्वयं को समर्पित कर दीजिये। बातों में कोई सार नहीं है। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ मई २०२४

भक्त साधक को कभी भी मार्गदर्शन का अभाव नहीं रहता| परमात्मा सदा उसका मार्गदर्शन और रक्षा करते हैं|

मनुष्य मौज-मस्ती करता है सुख की खोज में| यह सुख की खोज, अचेतन मन में छिपी आनंद की ही चाह है| सांसारिक सुख की खोज कभी संतुष्टि नहीं देती, अपने पीछे एक पीड़ा की लकीर छोड़ जाती है| आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं सिर्फ ..... भगवान के ध्यान में| भगवान ही आनंद हैं, परम प्रेम जिनका द्वार है| सभी जीवों पर उनकी अपार परम कृपा हो| उनकी परम कृपा हम सब पर है इसी लिए हम जीवित हैं|

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भगवान की भक्ति करते-करते उन का ध्यान भी स्वतः ही होने लगता है| जब भी आवश्यकता होती है, भगवान अपने भक्त का मार्गदर्शन करते हैं| भगवान का ध्यान करते करते उनकी कृपा से भ्रूमध्य में ब्रहमज्योति के दर्शन होने लगते हैं तब उस ज्योतिर्मय ब्रह्म का ही ध्यान करना चाहिए| एक ध्वनी भी सुनाई देने लगती है जो किसी शब्द का प्रयोग नहीं करती| उस ध्वनि के साथ-साथ गुरु-प्रदत्त बीजमंत्र या प्रणव का जप करते-करते उस में तन्मय हो जाना चाहिए| उस ध्वनि को ही अनाहत नाद कहते हैं| उस ज्योतिर्मय ब्रह्म और नाद की चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है जिसकी परिणिति गीता में बताई हुई ब्राह्मी स्थिति में होती है|
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प्राण ऊर्जा का घनीभूत होकर मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी के छः चक्रों में ऊर्ध्वगमन, कुंडलिनी जागरण कहलाता है| यह योगमार्ग की साधना है| कूटस्थ का स्थान भी धीरे धीरे भ्रूमध्य से सहस्त्रार में चला जाता है| फिर धीरे धीरे चेतना में विस्तार की अनुभूतियाँ होने लगती हैं, तब यह लगता है कि हम यह देह नहीं परमात्मा की अनंतता हैं| फिर उस अनंतता का ही ध्यान करना चाहिए| वह ज्योति और ध्वनि भी धीरे धीरे उस अनंतता से परे चले जाती हैं और एक पंचकोणीय नक्षत्र के दर्शन होने लगते हैं| यह एक बहुत ही उच्च स्थिति है| जो सर्वत्र समभाव में व्याप्त हैं वे भगवान वासुदेव हैं| वे ही परमशिव हैं, और वे ही नारायण हैं|
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भक्त साधक को कभी भी मार्गदर्शन का अभाव नहीं रहता| परमात्मा सदा उसका मार्गदर्शन और रक्षा करते हैं| एकमात्र आवश्यकता है भगवान के प्रति परमप्रेम और उन्हें पाने की अभीप्सा| बाकी सारा काम भगवान का है| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ मई २०२०

सत्संग क्या है? सत्संग का मापदंड क्या है?

सत्संग की महिमा तो बहुत सुनी है, पर सत्संग क्या है? सत्संग का मापदंड क्या है कि हम सत्संग कर रहे हैं या समय ही नष्ट कर रहे हैं? सत्संग का अर्थ है सत्य का संग| एकमात्र सत्य .... "परमात्मा" है| जहाँ पर, जिस की उपस्थिती में, परमात्मा का आभास परमप्रेम (भक्ति) और परमात्मा के आनंद के रूप में स्पष्टतः होता है, वही सत्संग है, अन्यथा समय की बर्बादी है|

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महात्मा वह ही है जिस की उपस्थिती में हम परमात्मा के आनंद और भक्ति से भर जाएँ| महात्मा का अर्थ है जो महत् तत्व यानि परमात्मा की सर्वव्यापकता से जुड़ा है| जिस के संग से भगवान की भक्ति जागृत हो जाये और भगवान की अनुभूति होने लगे उसी का संग करना चाहिए|
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जो भगवान से दूर ले जाये वह कुसंग है, जिसका त्याग सर्वदा करना चाहिए|
भक्ति सूत्रों में नारद जी कहते हैं ... दुस्सङ्गः सर्वथैव त्याज्यः||४३|| अर्थात दुसंग सर्वदा त्याज्य है|
कामक्रोधमोहस्मृतिभ्रंशबुद्धिनाशकारणत्वात्||४४|| अर्थात (कुसंग) काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश एवं सर्वनाश का कारण है||
संत तुलसीदास जी कहते हैं ... "जाके प्रिय न राम बैदेही| तजिये ताहि कोटि बैरी सम जद्यपि परम स्नेही||"
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अतः सावधान रहें कि कहीं सत्संग के नाम पर हम कुसंग तो नहीं कर रहे हैं|
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय || ॐ नमः शिवाय || ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२४ मई २०२०

नित्य सन्यासी कौन है?

गीता में भगवान कहते हैं ---
"ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥५:३॥" 

अर्थात - जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा,  वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है;  क्योंकि,  हे महाबाहो ! द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्धन मुक्त हो जाता है॥ .
अपने भाष्य में आचार्य शंकर कहते हैं --- उस कर्मयोगी को सदा संन्यासी ही समझना चाहिये कि जो न तो द्वेष करता है और न किसी वस्तु की आकाङ्क्षा ही करता है। अर्थात् जो सुख दुःख और उनके साधनों में उक्त प्रकार से रागद्वेष रहित हो गया है वह कर्म में बर्तता हुआ भी सदा संन्यासी ही है ऐसे समझना चाहिये। क्योंकि हे महाबाहो रागद्वेषादि द्वन्द्वों से रहित हुआ पुरुष सुखपूर्वक अनायास ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
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भगवान् द्वारा यहां दी हुई संन्यास की परिभाषा प्रचलित निरर्थक धारणाओं को दूर कर देती है। वेषभूषा के बाह्य आडंबर की अपेक्षा आन्तरिक गुणों का अधिक महत्व है। श्रीकृष्ण के विचारानुसार राग और द्वेष से रहित पुरुष ही संन्यासी कहलाने योग्य है। यह एक बहुत गहरा विषय है जिस पर शांति से मनन करना चाहिये। 
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!  
कृपा शंकर 
२४ मई २०२० 

जैसे जैसे हमारी आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है, वैसे वैसे असत्य का अंधकार भी हमारी चेतना से दूर होता जाता है।

 जैसे जैसे हमारी आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है, वैसे वैसे असत्य का अंधकार भी हमारी चेतना से दूर होता जाता है। हमारे पतन का कारण -- हमारे जीवन में तमोगुण का होना है। चेतना के उत्थान का एकमात्र मार्ग -- अनंत ज्योतिर्मय परमात्मा (ब्रह्म) का ध्यान है। श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय, और सच्चिदानंद परमात्मा का ध्यान करें, यही कल्याण का मार्ग है।

गीता के पुरुषोत्तम योग का भगवान की कृपा से अनुभूतियों द्वारा समझ में आ जाना बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस अनुभूति के पश्चात कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का नित्य नियमित ध्यान करें। आप कृतकृत्य और कृतार्थ हो जायेंगे। इस समय इसके अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं कहना है। हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२१ मई २०२५

एक नये युग का आरंभ हो चुका है ---

 एक नये युग का आरंभ हो चुका है ---

कोई मेरी इस बात को माने या न माने, लेकिन यह सत्य है कि एक नये युग का आरंभ हो चुका है। एक अति प्रबल सकारात्मक शक्ति हमें परमात्मा की ओर खींच रही है। दूसरी नकारात्मक शक्ति हमें परमात्मा से दूर ले जा रही है। यह विकल्प हमारे ऊपर है कि हम किस का साथ दें।
यह मैं अपनी अनुभूतियों से कह रहा हूँ कि इस युग में थोड़ी सी साधना भी बहुत अधिक फल देगी। हमारा लक्ष्य सत्यनिष्ठा से परमात्मा को पूर्ण समर्पण है। हम सब परमात्मा को उपलब्ध हों, यही मेरी शुभ कामना है। आप सब में मैं प्रभु को नमन करता हूँ। हर समय मैं आप के साथ एक हूँ।
हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ मई २०२५

आप सब से मिले प्रेम और आशीर्वाद के लिये आभारी हूँ। साधुवाद।

 आप सब से मिले प्रेम और आशीर्वाद के लिये आभारी हूँ। साधुवाद।

ज्ञान का एकमात्र स्त्रोत परमात्मा है। पुस्तकें केवल सूचनाओं एवं पूर्व अनुभूतियों का संग्रहण मात्र है, जिनसे प्रेरणा मिल सकती है, अन्य कुछ भी नहीं। अभी कुछ भी लिखने योग्य नहीं है। कोई महत्वपूर्ण बात होगी तो अवश्य लिखूंगा।
सारा मार्गदर्शन -- उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता में है। सच्चिदानंदघन परमात्मा को अपने हृदय का सर्वश्रेष्ठ पूर्ण प्रेम दें। आप सब के लिए मैं सदा उपलब्ध हूँ।
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"असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे।
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी॥
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं।
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥"
(गंधर्वराज पुष्पदन्त द्वारा रचित शिवमहिम्न स्तोत्र से संकलित)
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कृपा शंकर
२३ मई २०२५

इस जीवन का जो भी समय बचा है, वह धर्म, राष्ट्र व परमात्मा को समर्पित है।

 इस जीवन का जो भी समय बचा है, वह धर्म, राष्ट्र व परमात्मा को समर्पित है। हम शाश्वत आत्मा हैं जिसका धर्म -- परमात्मा को पूर्ण समर्पण है। यही राष्ट्र व समष्टि की सर्वोच्च सेवा है। हमें आवश्यकता व्यवहारिक उपासना की है, बौद्धिक चर्चा की नहीं। आध्यात्म की गूढ़ बातें बुद्धि द्वारा नहीं, प्रत्यक्ष गहन अनुभूतियों द्वारा ही समझ में आती हैं। जैसे शिक्षा में क्रम होते हैं -- एक बालक चौथी में पढ़ता है, एक बालक बारहवीं में, एक बालक कॉलेज में; वैसे ही साधना के भी क्रम होते हैं। प्रवचनों को सुनने, या उपदेशों को पढ़ने मात्र से हम परमात्मा को उपलब्ध नहीं हो सकते। हम जितने समय तक स्वाध्याय करते हैं, उससे कई गुणा अधिक समय तक परमात्मा की उपासना करनी पड़ती है।

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श्रुति भगवती कहती है ---
"नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्‌ ॥"
"नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्‌ ॥" (कठोपनिषद्)
अर्थात् -- "यह 'आत्मा' प्रवचन द्वारा लभ्य नहीं है, न मेधाशक्ति से, न बहुत शास्त्रों के श्रवण से 'यह' लभ्य है। यह आत्मा जिसका वरण करता है उसी के द्वारा 'यह' लभ्य है, उसी के प्रति यह 'आत्मा' अपने कलेवर को अनावृत करता है।"
''जो दुष्कर्मों से विरत नहीं हुआ है, जो शान्त नहीं है, जो अपने में एकाग्र (समाहित) नहीं है अथवा जिसका मन शान्त नहीं है ऐसे किसी को भी यह 'आत्मा' प्रज्ञा द्वारा प्राप्त नहीं हो सकता।"
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आपके सामने मिठाई पड़ी है तो आनंद उसे खाने में हैं, न कि उसके विवरण में। आध्यात्मिक लेखों या पुस्तकों को सिर्फ पढ़ने मात्र से कोई लाभ नहीं है। उनके उपदेशों के अनुसार आचरण करना पड़ता है। पुस्तकों से पढ़कर कोई वायुयान का पायलट, या जलयान का कप्तान नहीं बन सकता। तैरने के बारे में पढ़ने मात्र से कोई तैरना नहीं सीख सकता। जैसे वातावरण में जो रहता है, वह वैसा ही बन जाता है। हम सब परमात्मा में ही निरंतर रमण करें।
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जब सत्यनिष्ठा से परमात्मा को उपलब्ध होने की अभीप्सा होती है, तब परमात्मा स्वयं ही किन्हीं मार्गदर्शक ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य, या किसी अन्य माध्यम से मार्गदर्शन की व्यवस्था कर देते हैं। परमात्मा के प्रति प्रेम ही था जो मेरे माध्यम से व्यक्त हुआ। अब जैसी उनकी इच्छा होगी वैसा ही होगा। मेरी कोई आकांक्षा या अभिलाषा नहीं है, केवल एक अव्यक्त अभीप्सा है पूर्ण रूपेण समर्पित होने की।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२३ मई २०२५

सम्पूर्ण भारत -- परमात्मा की दिव्य ज्योति से आलोकित हो ------

 सम्पूर्ण भारत -- परमात्मा की दिव्य ज्योति से आलोकित हो; असत्य का अंधकार सदा के लिए दूर हो। मैं वर्णाश्रम-धर्म और भारत की पुरातन-शिक्षा व कृषि-व्यवस्था का पूर्ण समर्थन करता हूँ। अपने द्विगुणित परम वैभव और सत्य-निष्ठा के साथ भारत अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान हो।

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सम्पूर्ण भारत में भगवान श्रीकृष्ण की मुरली की मधुर ध्वनि, और भगवान श्रीराम के कोदंड धनुष की टंकार सुनाई दे। धर्म रूप नंदी पर बैठ कर भ्रमण करते हुए भगवान शिव सभी को सर्वत्र दृष्टिगोचर हों। पूरा भारत सत्य-धर्मनिष्ठ हो। और कुछ भी नहीं चाहिये।
ॐ शांति शांति शांति॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२४ मई २०२३

लू प्राणघातक है, लेकिन साथ साथ जीवन दायक भी है। इससे अनेक लाभ भी होते हैं -----

 लू प्राणघातक है, लेकिन साथ साथ जीवन दायक भी है। इससे अनेक लाभ भी होते हैं

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नालियों में पनप रहे सारे मच्छर लू से मर जाते है, उनके अंडे भी नष्ट हो जाते हैं।
फसलों को हानि पहुंचाने वाले सारे कृमि लू के प्रभाव से समाप्त हो जाते हैं। भूमि गर्म होने से चूहों, साँपों व बिच्छुओं के बच्चे भी मर जाते हैं। उनकी संख्या कम होती जाती है। टिड्डियों के अंडे भी नष्ट हो जाते हैं। टिड्डियाँ तो आजकल भारत में प्रवेश करने से पूर्व ही नष्ट कर दी जाती हैं। उत्तरी पश्चिमी अफ्रीका में टिड्डियाँ जन्म लेती है, फिर पश्चिमी एशिया, ईरान व पाकिस्तान होते हुए भारत आती हैं।
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आज बाहर लू चल रही है। मौसम विभाग ने लाल चेतावनी जारी कर रखी है। तापमान ४८ डिग्री सेल्सियस है। दोपहर से ही सड़कें सुनसान हैं। मनुष्य की बात तो छोड़िए, कोई पशु-पक्षी भी सड़क पर नहीं दिखाई दे रहा है।
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अत्यधिक गर्मी के कारण दो दिनों से तबीयत खराब है। एयर-कंडीशनर व कूलर की हवा मेरे स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं है। बचपन में जब बिजली नहीं थी तब खिड़कियों पर खसखस की टाट बांधकर उस पर राम-सागर (तांबे का एक विशेष बर्तन) से पानी छिड़कते रहते थे। अब की पीढ़ी को तो वह पता भी नहीं है। इस बार गर्मी कुछ अधिक ही पड़ रही है। गर्मी से होने वाले कष्ट भी सहन करने ही चाहिएँ।
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लेकिन ध्यान रखिए --- कोई अति आवश्यक कार्य होने पर ही घर से बाहर निकलें। पीने के पानी की दो बोतलें साथ लेकर चलें। थोड़ी थोड़ी देर से थोड़ा थोड़ा पानी पीते रहें। सिर को, गले को और शरीर को ढक कर रखें। धूप व गर्म हवा से स्वयं को बचाएं। अपना काम होते ही सीधे घर बापस आ जाएँ।
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कृपा शंकर
२४ मई २०२४