Wednesday, 22 July 2026

ताइवान से यदि चीन का युद्ध हुआ तो अंततः उसमें चीन हारेगा और चीन का सात टुकड़ों में इस तरह विभाजन होगा ---

 ताइवान से यदि चीन का युद्ध हुआ तो अंततः उसमें चीन हारेगा और चीन का सात टुकड़ों में इस तरह विभाजन होगा ---

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यह लेख अंतर्जाल पर विभिन्न स्त्रोतों से मिले, चीन के बारे में पूरी जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों द्वारा निकाले गए निष्कर्षों का सार है। उनका कहना है कि चीन का अमेरिका व जापान से युद्ध संभावित है, जिसके बाद चीन का सात टुकड़ों में बंटना निश्चित है, जो अगले सात वर्षों में पूर्ण हो जाएगा। जो भाग चीन से अलग होंगे, वे इस प्रकार हैं --
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(१ व २) सबसे पहले चीन से तिब्बत और क्विङ्ग्हाई प्रांत अलग होंगे और मिलकर एक स्वतंत्र देश बना लेंगे। भारतीय ज्योतिषियों का कहना है कि कैलाश और मानसरोवर को भारत अपने अधिकार में ले लेगा।
(३) दूसरा भाग जो चीन से पृथक होगा, वह सिंजियांग प्रांत है। यह पूर्वी तुर्की कहलाता था। कभी भी चीन का भाग नहीं था।
(४) तीसरा भाग जो चीन से पृथक होगा वह मंचूरिया होगा, जिसे चीन ने तीन प्रान्तों में बाँट रखा है -- लियानोनिंग, जिलियान व हेलोंगजियांग।
(५) इन्नर मंगोलिया, जो चीन की दीवार के उत्तर में है।
(पास में ही एक छोटा सा प्रांत और है जिसका नाम निंगसिया है, उसके बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता।)
(६) गुयाङ्गदोंग प्रांत व हैनान द्वीप। होङ्ग्कोंग व मकाऊ इसी का भाग हो जाएँगे।
(७) ताइवान -- जो इस समय भी चीन से पृथक है।
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भारत की सीमा चीन से कहीं पर भी नहीं लगेगी। चीन द्वारा कब्जाए गए सारे भारतीय क्षेत्रों को भारत छुड़ा लेगा।
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चीन के उत्तर-पूर्व में चीन की दीवार के दक्षिण में जो क्षेत्र है, जहाँ से चीन की दीवार का आरंभ होता है, वहाँ तो सन १९८५ में मैं भी एक बार गया हुआ हूँ। चीन की दीवार पर दो बार चढ़ा भी हूँ, और किसी की बाइसिकल मांग कर चीन की दीवार के साथ साथ घूमा भी बहुत हूँ। बड़ा उपजाऊ और अच्छा इलाका है। वहाँ के लोग सप्ताह में एक दिन नहाते हैं, सर्दियों में महीने में एक बार नहाते हैं। विदेशियों का सम्मान भी करते हैं। चीन की मुख्य भूमि में शाकाहारी भोजन नहीं मिलता, खुद को ही व्यवस्था करनी पड़ती है। फल, फलों का रस, दूध, सब्जियाँ, ब्रेड, आटा, दाल, चावल, वनस्पति तेल, आदि मिल जाते हैं। अपने भोजन की व्यवस्था खुद कर लो। वहाँ मक्खन गलती से भी मत खरीदना, वह जानवरों की चर्बी से बनता है। किसी भोजनालय में तो भोजन कर ही नहीं सकते। शाकाहारी को तो ५० मीटर दूर से ही बास आती है। टेबल पर हड्डियाँ उबलती रहती हैं, उसी का पानी पीते हैं। होटल में घुसते ही दरवाजे पर टबों में झींगे, जीवित मछलियां आदि पानी के टबों में रखी रहती हैं। जो भी आपको पसंद आए वह बता दो। तुरंत उसे काट कर और पका कर ला देंगे। उन दिनों साँप का सूप और बंदर की खोपड़ी का मांस खूब लोकप्रिय था।
दो बार पार्टियों में जाना पड़ा। एक बार तो खाना बनाने वाली को समझा दिया कि शुद्ध वनस्पति तेल में थोड़ा सा चावल और फलियाँ पकाकर बना दो। मसालों के नाम पर काली मिर्च का पाउडर और नमक के सिवाय और कुछ भी न हो। एक बार एक पार्टी में सिर्फ दूध और बादाम आदि सूखे फल ही लिए। कहीं घूमने जाता तो साथ में ब्रेड सेंडविच और कोकोकोला ले जाता था। भूख लगती तो किसी पार्क में बैठकर ब्रेड सेंडविच खा लेता और कोकोकोला पी लेता।
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दक्षिण कोरिया में तो एक बार एक बड़े धर्म संकट में फंस गया था। किसी मित्र के घर भोजन के लिए निमंत्रित था। वहीं पता चला कि वहाँ तो लोग कुत्ते का मांस भी खाते हैं। उस परिवार को अङ्ग्रेज़ी आती थी, अतः उनको समझा दिया। दूध और फल आदि से ही मेरा भोजन हो गया।
कृपा शंकर
२२ जुलाई २०२२

दिव्य प्रेमलीला ---

 दिव्य प्रेमलीला ---

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जो भाव मैं व्यक्त करना चाहता हूँ, उस के लिए प्रेमलीला से अधिक अच्छा शब्द मेरे शब्दकोष में नहीं है। एक तो वास्तविक भक्ति रूपी महासागर होता है जिसमें सारे योग समाहित हो जाते हैं, उससे विपरीत मनुष्य का लोभ और अहंकार रूपी दिखावा यानि पाखंड होता है, जो उसे कालनेमि बना देता है। भूल से उधर देखना भी नहीं चाहिए, क्योंकि उसका परिणाम बड़ी भयंकर दुर्गति के रूप में होता है।
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जितने भी योग और साधनाएँ होती हैं, वे सब की सब नदियों की तरह हैं, जो भक्ति रूपी महासागर में समाहित हो जाती हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई हुई भक्ति अनन्य और अव्यभिचारिणी है, जहाँ भगवान के अतिरिक्त अन्य किसी से किसी भी तरह का कोई अनुराग नहीं होता।
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नारद भक्तिसूत्रों का छठा सूत्र कहता है -- "यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति॥" जब हम आत्माराम बन जाते हैं, अर्थात् आत्मा में रमण करने लगते हैं, तब वह अवस्था भक्ति की परिणिति होती है। वह भक्ति कामनायुक्त नहीं, बल्कि निरोधस्वरूपा होती है। लौकिक और वैदिक समस्त कर्मों के स्वभाविक त्याग को निरोध कहते हैं। प्रियतम परमात्मा में अनन्यता, और परमात्मा से अन्य विषयों में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं। सातवें , आठवें और नौवें भक्तिसूत्रों में भी यही बात कही गई है। जहाँ कोई कामना होती है वह भगवान के साथ एक व्यापार होता है, भक्ति नहीं। लेकिन किसी भी परिस्थिति में शास्त्रोक्त कर्म नहीं छोडने चाहियें, अन्यथा पतन की संभावना रहती है। शांडिल्य सूत्रों में भी लगभग यही बात कही गई है।
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यह जो आत्मारामो वाली स्थिति है वह अवर्णनीय आनंददायक है। उसे ही मैं प्रेमलीला कहता हूँ। हम भगवान के साथ अपनी प्रेमलीला करते रहें, यानि अपनी सर्वव्यापी आत्मा में रमण करते रहें, इन्हीं मंगलमय शुभ कामनाओं के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
२२ जुलाई २०२३

भगवान शिव की उपासना के पवित्र मास श्रावण का आरंभ हो रहा है, लगातार "शिव-भाव" में स्थित रहने की उपासना करें। सभी पर शिवकृपा हो ---

 आज सोमवार से भगवान शिव की उपासना के पवित्र मास श्रावण का आरंभ हो रहा है, लगातार "शिव-भाव" में स्थित रहने की उपासना करें। सभी पर शिवकृपा हो ---

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आप स्वयं शिव हैं, अपने शिवभाव को जागृत कीजिये, और निरंतर शिवभाव में स्थित रहिए। यही भगवान शिव की सबसे बड़ी उपासना है। कौन क्या कहता है इसकी चिंता न करें। आप शिव की दृष्टि में क्या हैं? -- महत्व इसी का है, न कि इस बात का कि इस नश्वर संसार की दृष्टि में आप क्या हैं। आप स्वयं शिव बनें।
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आप के शरीर में कौन यह जीवन जी रहा है? आप के हृदय में कौन धड़क रहा है? आपके मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से कौन सोच-विचार कर रहा है? आपकी आँखों से कौन देख रहा है? आपके हाथों से कौन काम कर रहा है? आपके पैरों से कौन चल रहा है? आपके भोजन को कौन पचा रहा है? आपकी वाणी से कौन बोल रहा है? आपके देह की हरेक गतिविधि को, आपकी इंद्रियों और उनकी तन्मात्राओं को कौन संचालित कर रहा है? इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है -- "परम शिव रूप में परमात्मा"।
(प्रश्न): मैं कौन हूँ ? *** (उत्तर): इसका एक ही उत्तर है -- "परमशिव""।
हम स्वयं "परमशिव" हैं, न कि यह नश्वर देह।
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ध्यान के आसन पर मेरूदण्ड को उन्नत, और ठुड्डी को भूमि के समानान्तर रखते हुए, पूर्व या उत्तर दिशा की मुंह कर के सुख से बैठ जाएँ। बंद आँखों से भ्रूमध्य में एक ज्योति पुंज की कल्पना करें। (निष्ठावान साधकों को कुछ कालावधि की साधना के पश्चात वह ज्योति-पुंज यानि प्रकाश स्वतः ही दिखना आरंभ हो जायेगा) उस प्रकाश का विस्तार करते करते सम्पूर्ण सृष्टि को उसके लपेटे में ले लें। सारी सृष्टि उस ज्योति में है, और वह ज्योति सारी सृष्टि में है।
अब यह भाव कीजिये कि वह ज्योति ही परमशिव है, जो आप स्वयं हैं। जब सांस भीतर जाती है तब मानसिक रूप से सःSSSSSSSSSSSS का मानसिक जाप कीजिये। सांस अंदर या बाहर रुक जाती है तो रुक जाने दें, आप मात्र एक दृष्टा हैं, कर्ता नहीं। सांस बाहर जाती है तो मानसिक रूप से बोलिए हंsssssssssss। किसी किसी गुरु-परंपरा में अंदर जाती सांस के साथ हंssssssssss, और बाहर आती सांस के साथ सssssssssss का भाव किया जाता है। यह सारी सृष्टि ही आपका अस्तित्व है। बीच-बीच में कभी कभी एक बार इस देह को देख कर यह भाव कर सकते हैं कि मैं यह शरीर नहीं, ईश्वर की अनंतता हूँ। यह साधना अर्ध-खेचरी या खेचरी मुद्रा में करें। उस ज्योतिपुंज से प्रणव की ध्वनि भी निःसृत होती रहती है, जिसे भी सुनिए और उसका मानसिक जाप भी करते रहें। यह साधना नित्य कम से कम एक घंटे प्रातः और एक घंटे सायं या रात्रि में करें।
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अपनी जो आकाशगंगा है (जिसका एक नक्षत्र अपना सूर्य भी है), उस आकाश गंगा के एक छोर से दूसरे छोर तक यदि प्रकाश की गति से यात्रा की जाये तो उस यात्रा को पूर्ण करने में लगभग एक लाख वर्ष लग जाएँगे। इस तरह की अनगिनत लाखों आकाश गंगाएँ हैं। हमारे सूर्य जैसे करोड़ों सूर्य हैं। इस पृथ्वी जैसी अनगिनत पृथ्वियाँ हैं। इस भौतिक जगत से परे अनेक सूक्ष्म लोक हैं। अनेक लोक अंधकारमय हैं तो अनेक ज्योतिर्मय और हिरण्यमय भी हैं।
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किसी स्वच्छ अंधेरी रात में अपने घर की छत पर जाकर ध्रुव तारे को देखिये। उस ध्रुव तारे के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में साढ़े लगभग चार सौ वर्षों से भी अधिक का समय लगा है। जो आपको दिखाई दे रहा है, वह ध्रुव तारा लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पूर्व था। आकाश के कई नक्षत्र अब दिखाई दे रहे हैं, जब कि वे सैंकड़ों वर्ष पूर्व थे। वहाँ से प्रकाश की किरणों को पृथ्वी तक पहुँचने में कई सौ वर्ष लगे हैं।
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अरबों-खरबों प्रकाश वर्ष दूर भी अनंत सृष्टियाँ हैं, जिन्हें समझना मनुष्य की बुद्धि से परे है। वहाँ से प्रकाश की किरणें जब चली थीं तब पृथ्वी ग्रह का कोई अस्तित्व नहीं था। जब तक वे किरणें पृथ्वी तक पहुँचेंगी, तब तक पृथ्वी भी नष्ट भी हो गई होगी। यह तो रही स्थूल जगत की बात, सूक्ष्म जगत तो और भी अधिक विराट है। उस से भी परे कारण जगत है जो अकल्पनीय है। विभिन्न आयामों में अनंत सृष्टियाँ हैं। ये स्वर्ग-नर्क आदि सब मनोमय सृष्टियाँ हैं। उनसे परे भी अन्य आयामों की अनंत सृष्टियाँ हैं।
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जो चीज मुझे थोड़ी-बहुत समझ में आती है, वही लिखता हूँ। जो अज्ञात है वह कोरी कल्पना है। कल्पना में रहना स्वयं को धोखा देना है।
(१) एक बात तो अनुभूत सत्य है कि मैं यह शरीर नहीं हूँ। यह शरीर एक दुपहिया वाहन है जो इस लोकयात्रा के लिए मिला हुआ है। यह नष्ट हो जाएगा तो अंत समय की मति के अनुसार तुरंत दूसरा शरीर मिल जाएगा। पुनर्जन्म का सिद्धान्त शत-प्रतिशत सत्य है।
(२) हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं, जिनका परिणाम निश्चित रूप से मिलता है। कर्मफलों का सिद्धान्त -- शत-प्रतिशत सत्य है। यह सृष्टि परमात्मा के मन का एक विचार है। हमारे विचार ही हमारे कर्म है जिनके अनुसार हमें उनके फल मिलते हैं।
(३) हम यह शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं। सारे देवी-देवता हमारे साथ एक हैं। कोई भी या कुछ भी हमारे से पृथक नहीं है। आगे की बात समझने के लिए हमें वीतराग और त्रिगुणातीत होना पड़ेगा। तभी हम सत्य को समझ सकेंगे। गीता के अनुसार --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥२:४५॥"
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आत्मवान होकर ही सत्य को समझ सकेंगे। अभी भी अनेक हमारी कमियाँ हैं, जिन्हें दूर करना ही पड़ेगा। परम सत्य परमात्मा को मैं नमन करता हूँ।
""त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥ "(गीता)
"वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥११:३९॥" (गीता)
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥" (गीता)
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमः शिवाय॥
कृपा शंकर
२२ जुलाई २०२४