दिव्य प्रेमलीला ---
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जो भाव मैं व्यक्त करना चाहता हूँ, उस के लिए प्रेमलीला से अधिक अच्छा शब्द मेरे शब्दकोष में नहीं है। एक तो वास्तविक भक्ति रूपी महासागर होता है जिसमें सारे योग समाहित हो जाते हैं, उससे विपरीत मनुष्य का लोभ और अहंकार रूपी दिखावा यानि पाखंड होता है, जो उसे कालनेमि बना देता है। भूल से उधर देखना भी नहीं चाहिए, क्योंकि उसका परिणाम बड़ी भयंकर दुर्गति के रूप में होता है।
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जितने भी योग और साधनाएँ होती हैं, वे सब की सब नदियों की तरह हैं, जो भक्ति रूपी महासागर में समाहित हो जाती हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई हुई भक्ति अनन्य और अव्यभिचारिणी है, जहाँ भगवान के अतिरिक्त अन्य किसी से किसी भी तरह का कोई अनुराग नहीं होता।
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नारद भक्तिसूत्रों का छठा सूत्र कहता है -- "यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति॥" जब हम आत्माराम बन जाते हैं, अर्थात् आत्मा में रमण करने लगते हैं, तब वह अवस्था भक्ति की परिणिति होती है। वह भक्ति कामनायुक्त नहीं, बल्कि निरोधस्वरूपा होती है। लौकिक और वैदिक समस्त कर्मों के स्वभाविक त्याग को निरोध कहते हैं। प्रियतम परमात्मा में अनन्यता, और परमात्मा से अन्य विषयों में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं। सातवें , आठवें और नौवें भक्तिसूत्रों में भी यही बात कही गई है। जहाँ कोई कामना होती है वह भगवान के साथ एक व्यापार होता है, भक्ति नहीं। लेकिन किसी भी परिस्थिति में शास्त्रोक्त कर्म नहीं छोडने चाहियें, अन्यथा पतन की संभावना रहती है। शांडिल्य सूत्रों में भी लगभग यही बात कही गई है।
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यह जो आत्मारामो वाली स्थिति है वह अवर्णनीय आनंददायक है। उसे ही मैं प्रेमलीला कहता हूँ। हम भगवान के साथ अपनी प्रेमलीला करते रहें, यानि अपनी सर्वव्यापी आत्मा में रमण करते रहें, इन्हीं मंगलमय शुभ कामनाओं के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
२२ जुलाई २०२३
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