हठयोग पर जो भी उपलब्ध साहित्य है उसमें सबसे मुख्य "घेरण्ड संहिता" है| इस पर प्रामाणिक और सबसे अच्छा ज्ञान "बिहार स्कूल ऑफ योगा" मुंगेर (बिहार) के आचार्य स्वामी निरंजनानन्द ने दिया है| उन्होने घेरण्ड संहिता पर भाष्य और अन्य अनेक प्रामाणिक पुस्तकें लिखी हैं| उनके सन्यासी व अन्य शिष्य हठयोग का प्रामाणिक ज्ञान पूरे विश्व में दे रहे हैं| घेरण्ड मुनि का समय विवादास्पद है| अंग्रेज़ इतिहासकार उन्हें १७वीं शताब्दी का बताते हैं जो अविश्वसनीय है| घेरण्ड संहिता में सात अध्याय हैं जो निम्न विषयों पर प्रकाश डालते हैं .... षट्कर्म, आसन, मुद्रा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान, और समाधि|
Tuesday, 16 June 2026
हठयोग पर जो भी उपलब्ध साहित्य है उसमें सबसे मुख्य "घेरण्ड संहिता" है ।
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भारत के एक विश्वविख्यात योगाचार्य योग के नाम पर जो भी आसन, प्राणायाम आदि जो कुछ भी सिखा रहे हैं वह घेरण्ड संहिता का ज्ञान है, जिसका श्रेय वे पातंजलि ऋषि को दे रहे हैं| यह असत्य का प्रचार है|
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इसके अतिरिक्त दो और प्रामाणिक ग्रंथ हैं .... 'शिव संहिता" और "हठयोग प्रदीपिका"| ये दोनों ग्रंथ "घेरण्ड संहिता" से भी अधिक प्राचीन हैं| ये दोनों ग्रंथ नाथ संप्रदाय के मुख्य ग्रन्थों में आते हैं| इनमें भी हठयोग का पूरा ज्ञान है| इन ग्रन्थों के आचार्य स्वयं गुरु गोरखनाथ हैं| शिवसंहिता की रचना उनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ की है और हठयोगप्रदीपिका की रचना उनके शिष्य स्वात्मारामनाथ की है।
16 जून 2020
ध्यान ---
"वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥१०:२२॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
(अर्थात् -- मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में वासव (इन्द्र) हूँ; मैं इन्द्रियों में मन और भूतप्राणियों में चेतना (ज्ञानशक्ति) हूँ॥)
ध्यान :--- आज्ञा चक्र में एक प्रकाश की कल्पना करें जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है| पूरा ब्रह्मांड उसी प्रकाश के घेरे में है| फिर यह भाव करें कि "मैं स्वयं ही वह प्रकाश हूँ, यह देह नहीं"।
"परमात्मा की पूर्ण कृपा मुझ पर है| मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, मेरा सम्पूर्ण प्रेम परमात्मा को समर्पित है| मेरा प्रेम पूरी समष्टि में व्याप्त है| पूरी समष्टि ही मेरा प्रेम है| समस्त प्रेम मैं स्वयं हूँ| जहां भी मैं हूँ, वहीं परमात्मा हैं| परमात्मा सदा मेरे साथ हैं| मेरे से पृथक कुछ भी नहीं है| मैं यह देह नहीं, परमात्मा की सर्वव्यापकता हूँ|".
"मैं ज्योतिषांज्योति हूँ, सारे सूर्यों का सूर्य हूँ, प्रकाशों का प्रकाश हूँ| जैसे भगवान भुवन भास्कर के समक्ष अन्धकार टिक नहीं सकता वैसे ही मेरे परम प्रेम रूपी प्रकाश के समक्ष अज्ञान, असत्य और अन्धकार की शक्तियां नहीं टिक सकतीं|"
"मैं पूर्ण हूँ, सम्पूर्ण पूर्णता हूँ, परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हूँ| मेरी पूर्णता ही सच्चिदानंद है, मेरी पूर्णता ही परमेश्वर है| मैं मेरे प्रियतम प्रभु के साथ एक हूँ|"
शिवोहं शिवोहं शिव शिव शिव !! जय गुरु !! ॐ गुरु !! ॐ ॐ ॐ॥
(अब अजपा-जप की गहन साधना दीर्घकाल यानि खूब देर तक करें।)
कृपा शंकर
१६ जून २०१६
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