Tuesday, 16 June 2026

ध्यान ---

 

"वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥१०:२२॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
(अर्थात् -- मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में वासव (इन्द्र) हूँ; मैं इन्द्रियों में मन और भूतप्राणियों में चेतना (ज्ञानशक्ति) हूँ॥)

ध्यान :--- आज्ञा चक्र में एक प्रकाश की कल्पना करें जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है| पूरा ब्रह्मांड उसी प्रकाश के घेरे में है| फिर यह भाव करें कि "मैं स्वयं ही वह प्रकाश हूँ, यह देह नहीं"।

"परमात्मा की पूर्ण कृपा मुझ पर है| मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, मेरा सम्पूर्ण प्रेम परमात्मा को समर्पित है| मेरा प्रेम पूरी समष्टि में व्याप्त है| पूरी समष्टि ही मेरा प्रेम है| समस्त प्रेम मैं स्वयं हूँ| जहां भी मैं हूँ, वहीं परमात्मा हैं| परमात्मा सदा मेरे साथ हैं| मेरे से पृथक कुछ भी नहीं है| मैं यह देह नहीं, परमात्मा की सर्वव्यापकता हूँ|".
"मैं ज्योतिषांज्योति हूँ, सारे सूर्यों का सूर्य हूँ, प्रकाशों का प्रकाश हूँ| जैसे भगवान भुवन भास्कर के समक्ष अन्धकार टिक नहीं सकता वैसे ही मेरे परम प्रेम रूपी प्रकाश के समक्ष अज्ञान, असत्य और अन्धकार की शक्तियां नहीं टिक सकतीं|"
"मैं पूर्ण हूँ, सम्पूर्ण पूर्णता हूँ, परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हूँ| मेरी पूर्णता ही सच्चिदानंद है, मेरी पूर्णता ही परमेश्वर है| मैं मेरे प्रियतम प्रभु के साथ एक हूँ|"
शिवोहं शिवोहं शिव शिव शिव !! जय गुरु !! ॐ गुरु !! ॐ ॐ ॐ॥
(अब अजपा-जप की गहन साधना दीर्घकाल यानि खूब देर तक करें।)
कृपा शंकर
१६ जून २०१६

No comments:

Post a Comment