Sunday, 22 February 2026

'सत्संग' की मेरी अवधारणा ----

'सत्संग' की मेरी अवधारणा ----

कुसंग के सर्वदा त्याग और सत्संग की महिमा से हमारे ग्रन्थ भरे पड़े हैं| पर आज के परिप्रेक्ष्य में सत्संग को परिभाषित करना भी अत्यंत आवश्यक है| सामान्य भाषा में सत्संग का अर्थ होता है -- 'सत्य' का संग| पर 'सत्य' क्या है इसकी भी स्पष्ट अवधारणा होनी चाहिए| 'सत्य' अपने आप में इतना विराट है कि उस के अर्थ को सीमित करना असम्भव है| यह एक कटोरी में महासागर को भरने के प्रयास जैसा है| सीमित बुद्धि से इसे समझने का प्रयास भी कनक कसौटी पर हीरे को कसना है|
पर क्या 'सत्य' वास्तव में अपरिभाष्य है?
इसकी अनुभूति की जा सकती है, इसकी झलक पाई जा सकती है; ऐसा मेरा अनुभव है| शब्दों में ही व्यक्त करना चाहें तो असम्भव है| अधिक से अधिक इतना ही कह सकते हैं कि भगवान ही एकमात्र सत्य हैं| भगवान को भी 'सच्चिदानंद' से अधिक और कुछ कहना कम से कम मेरे लिए तो सम्भव नहीं है| मैं ना तो भगवान को सीमित कर सकता हूँ और ना ही गुरु तत्व को|
दूसरी बात जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि इस सृष्टि में 'निराकार' कुछ भी नहीं है| सब कुछ 'साकार' है| जो भी सृष्ट हुआ है वह साकार है| जो साधक अपने को निराकार के साधक कहते हैं वे भी या तो भ्रूमध्य में प्रकाश, किसी पवित्र मन्त्र, या अपने गुरु के भौतिक स्वरुप का ध्यान करते हैं| यह भी साकारता ही है, इसमें निराकारता कहाँ हुई? परमात्मा की सर्वव्यापकता का आभास और उस में समर्पण भी साकारता ही है| सृष्टि निरंतर परिवर्तनशील है| विचार और चेतना भी परिवर्तित होती रहती है| अतः जो भी साकार है वह भी परिवर्तनशील है|
अतः कुछ ना कुछ या किसी ना किसी रूप में परमात्मा की साकारता की भी परिकल्पना करनी ही होगी और उस का नित्य निरंतर संग भी करना होगा|
मेरे विचार से यही 'सत्संग' है|
जो भी इससे परे ले जाए वह चाहे कोई व्यक्ति हो या कोई विचार, उसका संग ही कुसंग है जो सर्वदा त्याज्य है|
अब मैं मेरी व्यक्तिगत बात करूँगा जिसमें मेरी चिंतनधारा को व्यक्त करने का प्रयास है| यह कोई अहंकार की यात्रा नहीं है| इसका कोई उद्देष्य नहीं है|
जैसे नदी बहती है, फूल खिल कर अपनी सुगंध फैलाते हैं व प्रकृति अपना कार्य करती है --- उसका कोई उद्देष्य नहीं है| यह उसका स्वभाव है| वैसे ही प्रेम मेरा स्वभाव है जो व्यक्त हुए बिना नहीं रह सकता| मेरे लिए प्रभु के प्रेम में मग्न रहना ही 'सत्संग' है| इससे परे और कुछ भी मेरे लिए नहीं है|
मैं उन सब को नमन करता हूँ जो भगवान को प्रेम करते है| मैं उन के चरणों का सेवक मात्र हूँ, उस से अधिक कुछ भी नहीं|
परमात्म रूप में व्यक्त आप सब को मेरा प्रणाम| ॐ ॐ ॐ ||
२२ फरवरी २०१४

प्रभु से प्रेम कैसे करें ?

 प्रभु से प्रेम कैसे करें ?

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इस प्रश्न का उत्तर मेरी तो सीमित तुच्छ बुद्धि से परे है| मुझे तो लगता है कि प्रेम एक स्थिति है, कोई क्रिया नहीं| यह हो जाता है, किया नहीं जाता| क्या यह किया जा सकता है? यदि हाँ तो कैसे? कृपया मुझे यह बताएँ|
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को माध्यम बना कर सारे संसार को कहा है कि "मद्भक्तः" अर्थात् जो मुझे प्रेम करता है वह मेरा ही स्वरूप होगा। भगवान् ने असीम प्रेम को ही मोक्ष का साधन बतलाया है| पर वह प्रेम क्या है? यही जानना चाहता हूँ| भक्त बनें तो कैसे बनें ?
दूसरा प्रश्न जो मैं पूछना चाहता हूँ वह यह कि भारत में और विश्व में भी अनेक समाज सुधारक हुए है, पर वे कभी आत्म साक्षात्कार के मार्ग पर नहीं चल पाए| ऐसा क्यों ?
क्या ये दोनों मार्ग अलग है या आत्म-साक्षात्कार ही समाज सेवा है?
अभी अभी एक श्रद्धेय स्वामीजी के लेख का स्वाध्याय कर रहा था। उनके अनुसार इस संसार में जो "हेय-उपादेय" बुद्धि रखेगा वह "अहेय-अनुपादेय" ब्रह्मतत्त्व को कभी पा नहीं सकता। जो "अहेय-अनुपादेय" परमार्थतत्त्व को पकड़ना चाहता है वह "हेय-उपादेय" दृष्टि कर नहीं सकता।
उनकी बात मुझे सही लग रही है| आध्यात्मिक व्यक्ति किसी की निंदा, आलोचना या शिकायत नहीं करते, इसका औचित्य समझने में मुझे कुछ और समय लगेगा|
पर प्रभु के प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति ही इस सृष्टि की सबसे बड़ी सेवा है यह बात समझ में तो आती है पर यह कैसे हो, यह समझ से परे है|
हमारे लिए तो उन का प्रेम ही सब कुछ है| उन में लीन होकर रहना ही हमारा तीर्थ है, वे ही हमारे एकमात्र सम्बन्धी हैं, वे ही हमारे एकमात्र "सखा" मित्र हैं, और उन में तन्मयता ही हमारा जीवन है| वे हमारे इतने समीप हैं की हम उनका बोध ही नहीं कर पाते|
उन से हमारी एकमात्र प्रार्थना है कि वे हमारे प्रेम को अपनी पूर्णता दें| उन की और आप सब की जय हो|
कृपा शंकर
२२ फरवरी २०१४

भगवान नटराज का नृत्य ---

 भगवान नटराज का नृत्य ---

यह अनंत ऊर्जा-खंडों का प्रवाह, और उन से परमाणुओं का सृजन और विसर्जन, -- जिन से उत्पन्न हुई यह समस्त सृष्टि -- भगवान नटराज का नृत्य है|

मूल रूप से किसी भी पदार्थ का कोई अस्तित्व नहीं होता, सब कुछ ऊर्जा है| उस ऊर्जा के पीछे भी एक विचार है, और उस विचार के पीछे एक परम चेतना है| वह परम चेतना और उससे भी परे जो है, वह परमशिव है, जिसके संकल्प से ऊर्जा और प्राणशक्ति का प्राकट्य हुआ| ऊर्जा से भौतिक सृष्टि निर्मित हुई और प्राणशक्ति ने सभी जीवों में प्राणों का संचार किया| और भी अनेक आयामों में अनेक प्रकार की सृष्टियाँ हैं, जिनका बोध हमें नहीं है|
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मनुष्य की अति अल्प और सीमित बुद्धि द्वारा परमात्मा अचिन्त्य और अगम्य है| लेकिन जो परमात्मा में निरंतर विचरण करते हैं, उनके लिए परमात्मा बोधगम्य है|
ॐ तत्सत् !!
२२ फरवरी २०२१