Tuesday, 3 February 2026

आज बसंतपंचमी और सरस्वती-पूजा है। मंगलमय शुभ कामनाएँ ..... .

 आज बसंतपंचमी और सरस्वती-पूजा है। मंगलमय शुभ कामनाएँ .....

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आज से बसंत ऋतू का प्रारम्भ हो गया है। पचास-साठ वर्ष पूर्व तक प्रत्येक हिन्दू मंदिर में आज के दिन खूब भजन कीर्तन होते थे, और ठाकुर जी को भोग लगाकर खूब गुलाल उड़ाई जाती थी। सभी हिन्दू आश्रमों और गुरुकुलों में अब भी आज के दिन समारोह मनाये जाते हैं। गुरुकुलों में गुरु जी के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। प्राचीन भारत में आज से विद्याध्ययन आरम्भ होता था, और माँ सरस्वती की आराधना होती थी।
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आज अधिक से अधिक मौन रखिये और भगवान का खूब ध्यान कीजिये। माँ सरस्वती के वाग्भव बीज मन्त्र "ॐ ऐं" का खूब मानसिक जप करें। वाग्भव बीज मन्त्र से माँ सरस्वती को नमन होता है, गुरु महाराज को भी नमन होता है, और अपने अपने पिताजी को भी नमन होता है। मेरी माताजी शरीर में नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृति को मैं भगवती भुवनेश्वरी के बीज मंत्र "ॐ ह्रीं" से नित्य नमन करता हूँ। इससे मुझे उनका आशीर्वाद उसी क्षण प्राप्त होता है। ऐसे ही मेरे पिताजी शरीर में नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृति को मैं नित्य "ॐ ऐं" मंत्र से नमन करता हूँ। इसी मंत्र से नित्य मानसिक रूप से गुरु-चरणों में भी नमन करता हूँ। इससे मुझे उन सब के आशीर्वाद की बहुत अधिक प्राप्ति उसी क्षण होती है।
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"या कुंदेंदु तुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता |
या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना ||
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता |
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ||
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमां आद्यां जगद्व्यापिनीं |
वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यान्धकारापहां ||
हस्ते स्फटिक मालीकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां |
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदां" ||
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०२६
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पुनश्च: --- आज के दिन से वीर बालक हकीकत राय की पुण्य स्मृति जुडी हुई है। विभाजन से पूर्व -- लाहौर और अन्य अनेक नगरों में वीर बालक हक़ीक़त राय की स्मृति में मेला भरता था और पतंगें उड़ाई जाती थीं। हकीकत राय का बलिदान हिन्दू धर्म के प्रति निष्ठा और धर्मरक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक बन गया है।
हकीकत राय (लगभग 1719-1734) पंजाब के सियालकोट के एक साहसी हिन्दू बालक थे, जिन्होंने अपने धर्म के अपमान का विरोध करने पर मृत्युदंड स्वीकार किया और बलात् इस्लाम कबूल करने से इनकार कर दिया, जिससे वे हिन्दू धर्म के लिए बलिदान देने वाले एक अमर बलिदानी के रूप में जाने जाते हैं। उनका बलिदान बसंत पंचमी के दिन हुआ था, और उनकी स्मृति में कई स्थानों पर मेले लगते हैं, जैसे बटाला में उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी की समाधि पर।
सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में जन्मे, हकीकत राय बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और संस्कृत व इतिहास का अध्ययन किया था। एक बार मदरसे में उनके मुस्लिम सहपाठियों ने उनके धर्म और देवी-देवताओं का अपमान किया, जिसका उन्होंने प्रतिकार किया, जिससे विवाद बढ़ा। मुल्लाओं ने उन्हें इस्लाम अपनाने का आदेश दिया, लेकिन वे अपने धर्म पर अडिग रहे. माता-पिता के समझाने पर भी वे नहीं माने और अंततः बसंत पंचमी के दिन उनका सिर कलम कर दिया गया।
तत्कालीन परंपरानुसार उनका विवाह बचपन में ही हो गया था। उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी ने भी पति के बलिदान के बाद सती होकर अपने प्राण त्याग दिए। उनकी समाधि पर भी मेला लगता है।
वीर बालक हक़ीक़त राय की समाधि विभाजन के बाद लाहौर में रह गयी, लेकिन भारत के कई स्थानों, जैसे दिल्ली के 'हकीकत नगर' और बटाला में उनकी याद में मेले आयोजित होते हैं। उनका बलिदान हिन्दू धर्म के प्रति निष्ठा और धर्मरक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक बन गया है।

अनन्य-योग" और "अव्यभिचारिणी-भक्ति" से ही परमात्मा की प्राप्ति (भगवत्-प्राप्ति) हो सकती है ---

 "अनन्य-योग" और "अव्यभिचारिणी-भक्ति" से ही परमात्मा की प्राप्ति (भगवत्-प्राप्ति) हो सकती है। अन्य कोई मार्ग नहीं है। हम कोई भी साधना करें, ईश्वर-लाभ केवल "अनन्य-योग" और "अव्यभिचारिणी-भक्ति" से ही होगा ---

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"भगवान की प्राप्ति अनन्य-योग से ही हो सकती है" -- यह गीता में भगवान श्रीकृष्ण का कथन है। इस अति महत्वपूर्ण विषय पर कुछ लिखने की जिज्ञासा हुई, अतः यह प्रस्तुति है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कम से कम चार बार "अनन्य-योग" पर प्रकाश डाला है। वे कहते हैं --
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥८:२२॥"
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् --
"हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥८:१४॥"
"हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है॥८:२२॥"
"अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥९:२२॥"
"अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥१३:११॥"
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नारायण ! परम पुरुष परमात्मा से मैं पृथक नहीं हूँ, इस प्रकार परमात्मा से अपने को एक जान कर जो परमप्रेम व्यक्त किया जाता है वही अनन्य योग है। परमात्मा को जब तक हम स्वयं से भिन्न समझते हैं, तब तक कामनाओं का जन्म होता ही रहता है। लेकिन जब हम परमात्मा को अपने स्वरूप में जानते हैं, तब परमात्मा से जो प्रेम होता है, वह अनन्य परमप्रेम है। परमात्मा अन्य नहीं है, परमात्मा को अपना स्वरूप जान कर जब भक्ति अर्थात् परमप्रेम किया जाता है तब वह अनन्य योग है। अनन्य योग के अभाव को यानि भगवान से अन्य किसी भी चीज की कामना को भगवान ने व्यभिचार की संज्ञा दी है। भगवान बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं। वे हमारा शत-प्रतिशत प्रेम मांगते हैं। उनको ९९.९९% प्रतिशत भी नहीं चलता। वे १००% ही मांगते हैं। हमें ईश्वर-लाभ की पूर्ण अभीप्सा हो, व किसी भी तरह की कोई कामना न हो।
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महाभारत के अनुशासन पर्व में भगवान श्रीकृष्ण ने महाराजा युधिष्ठिर को तंडि ऋषि कृत "शिवसहस्त्रनाम" का उपदेश दिया है, जो भगवान श्रीकृष्ण को उपमन्यु ऋषि से प्राप्त हुआ था। उसके १६६वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने महाराजा युधिष्ठिर को भी अव्यभिचारिणी भक्ति का उपद्श दिया है --
"एतद् देवेषु दुष्प्रापं मनुष्येषु न लभ्यते।
निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिर्व्यभिचारिणी॥"
(यहाँ "निर्विघ्ना" और "निश्चला" शब्दों का भी प्रयोग हुआ है)
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इस लेख का यदि विस्तार किया जाये तो इसका कोई अंत नहीं है। कम से कम शब्दों में परम सत्य को यहाँ व्यक्त किया गया है। यह अभ्यास, अनुभव और भगवान की परमकृपा का विषय है, बुद्धि का नहीं। मेरा जीवन धन्य हुआ जो हरिः कृपा से यह बात मुझे बहुत गहराई से समझ में आयी।
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ॐ ऐं श्रीगुरवे नमः॥ ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२६

श्रीमद्भगवद्गीता का सार जो मुझे अपनी अति अल्प और सीमित बुद्धि से समझ में आया है -- .

 श्रीमद्भगवद्गीता का सार जो मुझे अपनी अति अल्प और सीमित बुद्धि से समझ में आया है --

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मैं बात वही कह रहा हूँ जो मुझे समझ में आयी है, किसी की नकल नहीं कर रहा। विद्वान मनीषी संतजन कहते हैं कि वेद-उपनिषदों का सार श्रीमद्भगवद्गीता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने केवल तीन विषयों -- ज्ञान, भक्ति और कर्म -- पर ही चर्चा की है। उपरोक्त तीन विषयों की चर्चा में ही उन्होंने पूरे सनातन धर्म को लपेट लिया है। जिन में सतोगुण की प्रधानता है वे ही ज्ञान और भक्ति को समझ सकते हैं, जिनमें रजोगुण की प्रधानता है वे कर्म को समझ सकते हैं। जिनमें तमोगुण प्रधान है, वे गीता को नहीं समझ सकते। उनका आध्यात्म में प्रवेश नहीं हो सकता। उनके लिए सामान्य पूजा-पाठ ही उचित है।
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वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण की परम कृपा से जो भी ज्ञान, भक्ति और कर्म मुझे समझ में आये हैं, उन्हें मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ। वे हैं --
(१) पुरुषोत्तम योग, (२) अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति, और (३) उपासना।
पुरुषोत्तम योग को सामान्य बुद्धि से नहीं समझ सकते। यह भगवान की प्रत्यक्ष विशेष कृपा से ही समझा जा सकता है। अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति को समझा जा सकता है। परमात्मा को पाने की अनवरत अभीप्सा और उपासना (साधना) ही मेरी दृष्टि में कर्मयोग हैं। अनन्य भक्ति को निम्न श्लोकों से समझ सकते हैं --
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
"पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥८:२२॥"
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् --
"हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥८:१४॥"
"हे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है॥८:२२॥"
"अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥९:२२॥"
"अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥१३:११॥"
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गीता का सर्वोच्च सार -- शरणागति द्वारा समर्पण है। यह भी उनकी विशेष कृपा से ही समझा जा सकता है। किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय महात्मा से ही मार्गदर्शन लें। अन्यथा गुरु रूप में दक्षिणामूर्ति भगवान शिव, और जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण हैं। इन दोनों रूपों में अंतर इतना ही है कि भगवान दक्षिणामूर्ति शिव पूर्णतः मौन हैं। वे मुंह से कुछ भी नहीं बोलते, उनके समक्ष ध्यानस्थ होते ही ज्ञान अपने आप प्राप्त हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण मौन भी हैं और बोलते भी हैं। लेकिन ज्ञान की प्राप्ति उनकी परम कृपा से ही होती है। हम उनकी परम कृपा के पात्र बनें।
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२४ जनवरी २०२६

समर्पण ---

समर्पण ---
पिछले चौदह वर्षों से भक्ति, योग, वेदान्त और ब्रह्मज्ञान पर अपनी क्षमतानुसार यथासंभव निःस्वार्थ भाव से खूब लेख (चार हजार से अधिक) सोशियल मीडिया पर लिखे हैं। अब और कुछ भी लिखने की क्षमता नहीं रही है। अवशिष्ट जीवन ईश्वर की उपासना को समर्पित है। ईश्वर की चेतना में ही अंत समय तक रहूँगा।
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मै केवल उन्हीं से मिलता हूँ जो इसी जीवन में परमात्मा को उपलब्ध होना चाहते हैं, जिनके हृदय में कूट कूट कर भगवान की भक्ति भरी पड़ी है, और जो नित्य नियमित उपासना करते हैं। अन्य किसी से भी मिलने की इच्छा नहीं है।
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मैं योगमार्ग का साधक हूँ। कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग है। कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में जगन्माता मुझे निमित्त बनाकर परमशिव की उपासना स्वयं करती हैं। गीता में जो पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं। अवशिष्ट जीवन परमशिव/पुरुषोत्तम को समर्पित हैं।
ॐ तत् सत् । ॐ ऐं श्रीगुरवे नमः !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ जनवरी २०२६

किसी भी तरह का वर्ग-संघर्ष, विशेषकर जातिगत वर्ग-संघर्ष, समाज और राष्ट्र के लिए बहुत अधिक घातक है ---

 किसी भी तरह का वर्ग-संघर्ष, विशेषकर जातिगत वर्ग-संघर्ष, समाज और राष्ट्र के लिए बहुत अधिक घातक है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि जो लोग "सामाजिक समरसता" की बातें करते थे, वे ही अब "सामाजिक विषमता" उत्पन्न कर रहे हैं। दूसरों का सिर काट कर कोई बड़ा नहीं बन सकता। आरक्षण के नाम पर दूसरों (अनारक्षित वर्ग) का सिर काटा जा रहा है।

देश में समान नागरिक संहिता तुरंत प्रभाव से लागू हो, और किसी भी तरह का जातिगत भेदभाव किसी से भी न हो।
पुनश्च: --- आज चाहे कितना भी असत्य और अन्धकार छाया हो, भारतवर्ष निकट भविष्य में निश्चित रूप से एक महान आध्यात्मिक राष्ट्र होगा, और अपने परम वैभव को प्राप्त करेगा। मुझे कोई संदेह नहीं है। आसुरी और पैशाचिक शक्तियाँ कितनी भी प्रबल हों, वे निश्चित रूप से पराभूत होंगी। ॐ ॐ ॐ !!
२५ जनवरी २०२६

भारत में क्षत्रिय राजाओं का राज्य फिर से स्थापित होगा --- .

 भारत में क्षत्रिय राजाओं का राज्य फिर से स्थापित होगा ---

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वर्तमान व्यवस्था स्थायी नहीं है। धर्म की पुनः स्थापना का समय आ गया है। धर्म की पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा। क्षत्रिय राजाओं का राज्य भी पुनः स्थापित होगा। क्षत्रिय राजाओं के लिये राज्याभिषेक के समय सनातन धर्मरक्षा की प्रतिज्ञा लेना अनिवार्य था। पुरोहित उन्हें धर्मरक्षा का संकल्प और प्रतिज्ञा कराता था। वेदों और आगम शास्त्रों में इसे राजा का सर्वोच्च कर्तव्य बताया गया है। जो क्षति से त्राण करता है वह क्षत्रिय है। क्षत्रियों का क्षात्रधर्म -- भूमि और प्रजा की रक्षा, न्याय की स्थापना, और व्यवस्था बनाये रखना था। राजा अपने राज्य में सनातन धर्म, संस्कृति, मंदिरों और ऋषियों की रक्षा करने का प्रण लेते थे। साथ साथ युद्ध में अचल रहने की प्रतिज्ञा भी लेते थे। सरल शब्दों में, क्षत्रिय राजाओं के लिए धर्म की रक्षा उनका परम कर्तव्य था।
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धर्म की स्थापना का युग आरंभ हो गया है। समय के साथ शीघ्र ही वर्णाश्रम धर्म की पुनर्स्थापना होगी। कोई चाहे या न चाहे भारत में क्षत्रिय राजाओं का राज्य पुनर्स्थापित होगा। यह कब और कैसे होगा? इस बारे में कुछ कह नहीं सकता, लेकिन निश्चित रूप से होगा।
ॐ तत् सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ जनवरी २०२६

आप से मैं केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना ही कर सकता हूँ ---

आप से मैं केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना ही कर सकता हूँ। यह भी आपसे एक विनम्र प्रार्थना ही है। अपनी पूरी चेतना से निवेदन कर रहा हूँ कि अगले चार से छह महिने तक आत्म-संयम बना कर ईश्वर को हर समय अपनी स्मृति में रखें। भटकें नहीं। स्वधर्म पर दृढ़ रहें। जो होगा वह अच्छा ही होगा। आपका कल्याण होगा।

"अहं इन्द्रो न पराजिग्ये" ऋग्वेद (१०.४८.५) का एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र है, जिसका अर्थ है- "मैं इन्द्र (विजेता) हूँ, कभी पराजित नहीं होता"।
गुरु महाराज और ईश्वर हमारे साथ हैं। ॐ तत् सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
२६ जनवरी २०२६
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पुनश्च: --- मुझे एक तपस्वी संत ने अपने सत्संग में यह बात बताई ---
प्रातः अपनी नींद से इस भाव से उठिए जैसे आपके इष्ट देवता सो कर उठे हैं। उनको सो कर उठने के लिए नमन कीजिये। आप स्वयं नहीं उठे हैं, आपके इष्ट देवता सो कर उठे हैं।
फिर बिस्तर पर ही लेटे लेटे, या बैठे-बैठे, मन ही मन, या बोलकर उनका कीर्तन करें। पूरे दिन उनकी याद बनी रहेगी।
रात्रि को सोने से पूर्व भी यही भाव रखो कि अपने इष्ट देवता को आप सुला रहे हैं। सोने से पूर्व भी कुछ देर कीर्तन कर के ही सोएँ।

सनातन-धर्म का उद्देश्य ---

 सनातन-धर्म का उद्देश्य --- "मनुष्य जीवन में जो भी सर्वश्रेष्ठ हैं उसे निज जीवन में व्यक्त करना सनातन धर्म है। हम सब अव्यक्त ब्रह्म है। उस ब्रह्मत्व को अभिव्यक्त करना सनातन धर्म है।"

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वर्णाश्रम धर्म सनातन का ही भाग है, अतः सारे सनातन धर्मावलम्बी सवर्ण हैं। यहाँ कोई अवर्ण नहीं है। जो भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र हैं, सभी सवर्ण हैं। सवर्ण शब्द का अर्थ ही हिन्दू होना है। अतः कृपा कर के इस शब्द "सवर्ण" का दुरुपयोग न करें। सनातन धर्म में चार ही वर्ण हैं, और चार ही आश्रम हैं।
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हम सब मूल रूप से शाश्वत आत्मा है। आत्मा का स्वधर्म परमात्मा की प्राप्ति है। हम परमात्मा की चेतना में रहें, यही हमारा स्वधर्म है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
०३ फरवरी २०२६

वर्तमान परिस्थितियों में ईश्वर का आश्रय लें, और अनन्य भाव से ज्ञान, भक्ति व कर्म में लीन रहते हुए 'मोह' रूपी कलिल से स्वयं को मुक्त करें ---

वर्तमान परिस्थितियों में ईश्वर का आश्रय लें, और अनन्य भाव से ज्ञान, भक्ति व कर्म में लीन रहते हुए 'मोह' रूपी कलिल से स्वयं को मुक्त करें ---

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इस लेख को लिखने में मैंने अपना पूरा हृदय पूर्ण भक्ति से उंडेल दिया है। इस तरह के लेख भगवान की प्रत्यक्ष परम कृपा के बिना नहीं लिखे जा सकते। अपने हृदय की पूर्ण भक्ति से यह लेख लिखा गया है। सही बात तो यह है कि स्वयं भगवान ने ही मुझे निमित्त बनाकर यह लेख लिखा है।
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हम न तो पूर्वानुभूत विषय सुखों का स्मरण करें, और न ही भविष्य में प्राप्त होनेवाले अनुभवों की आशा। वर्तमान में ईश्वर में स्थिर होकर ही स्थित रहें। अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि उसके लिये क्या करें?
उसके लिये भगवान को कर्ता बनाकर अनन्य भक्तियोग से उन्हें निज जीवन में अवतरित करें। गीता में भगवान कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो। मुझ में अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
"सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥२:३८॥"
अर्थात् -- सुख-दु:ख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ; इस प्रकार तुमको पाप नहीं लगेगा॥
"बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥२:५०॥"
अर्थात् -- समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है, इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है॥
"यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥२:५२॥"
अर्थात् -- जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूप दलदल (कलिल) को तर जायेगी तब तुम उन सब वस्तुओं से निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त हो जाओगे जो सुनने योग्य और सुनी हुई हैं॥
भगवान का आदेश है --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
अर्थात् -- (तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
भगवान हमें निरंतर अपना भजन करने को कहते हैं -- "अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।" अर्थात् "यह शरीर अनित्य और दुखों से भरा है, इसे प्राप्त करके तुम मेरी भक्ति करो।"
भगवान यह भी कहते हैं कि देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरपूजक पितरों को जाते हैं, भूतों का यजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं, और भगवान को पूजने वाले भक्त भगवान को ही प्राप्त होते हैं॥
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अनन्य भाव से भगवान को भजने वाला भक्त कभी नष्ट नहीं होता। अनन्य भाव से भगवान को अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी भजता है तो वह साधु हो जाता है। वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है।
भगवान कहते हैं --
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
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भगवान चाहते हैं कि हम अपने सारे कर्म उन्हें ही अर्पित कर दें --
"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥९:२६॥"
"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥९:२७॥"
अर्थात् -- जो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ (पत्र पुष्पादि) मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ॥
हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो॥
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अब आते हैं एक ऐसे मंत्र पर जो गीता का मध्य बिन्दु है, जिसे समझ कर आध्यात्मिक क्षेत्र में निश्चित रूप से महान सफलता प्राप्त की जा सकती है। भगवान श्रीकृष्ण यह वचन देते हैं कि "अनन्यभाव से जो मेरा अर्थात् आत्मस्वरूप का ध्यान करते हैं, उन नित्ययुक्त भक्तजनों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।" शंकर भाष्य के अनुसार यहाँ योग का अर्थ है -- अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति, और क्षेम का अर्थ है -- प्राप्त वस्तु की रक्षा। भगवान कहते हैं ---
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
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भगवान एक चेतावनी भी देते हैं--
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् -- मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
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इस लेख को अपने हृदय की पूर्ण अनन्य भक्ति से लिखा है। इससे अच्छा लिखना मेरे लिए संभव नहीं है। भगवान की पूर्ण कृपा आप सब पर हो। सब का मंगल हो।
हरिः ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ फरवरी २०२६

राष्ट्र की वर्तमान दशा में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं?

 राष्ट्र की वर्तमान दशा में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं?

हमारी जाति और धर्म क्या है?
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इस विषय पर मेरी सोच स्पष्ट है। मेरा एकमात्र उत्तर है कि हमें अपने स्वधर्म का सदैव पालन करते रहना चाहिए। धर्म का अर्थ Religion नहीं है। वास्तव में धर्म शब्द का अनुवाद नहीं हो सकता। धर्म धर्म ही रहेगा। वैशेषिक-सूत्रों, महाभारत, मनु-स्मृति, और अन्य अनेक आगम ग्रंथों में में धर्म शब्द की सर्वोच्च व्याख्या की गई है। इस विषय पर मैं अनेक बार लिख चुका हूँ। बार बार लिखना पुनरोक्ति दोष होगा, फिर भी लिख रहा हूँ। हम शाश्वत् आत्मा हैं, आत्मा का स्वधर्म परमात्मा की अभीप्सा, उपासना और पूर्ण समर्पण है। यही हमारा स्वधर्म है।
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कुछ लोग मुझे जातिवादी कह कर अपने मन की कुंठा को ही व्यक्त करते हैं जो सबसे बड़ा झूठ है। उनको मेरा एक ही उत्तर है -- जब मैं यह शरीर ही नहीं हूँ तो मेरी जाति क्या हो सकती है? ---
"जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम।
गृह हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम॥"
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और मुझे कुछ भी नहीं कहना है। गुरु महाराज ने तो योग और वेदान्त की शिक्षा दी, व उपासना का मर्म समझाया। गुरुकृपा से ही यह समझ पाया हूँ कि इस समय तो परमात्मा को पूर्ण आत्म-समर्पण ही मेरा स्वधर्म है॥ इस जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो। गुरु महाराज ने परमात्मा का बोध भी अनेक बार बड़े स्पष्ट रूप से कराया है। अतः कोई संशय नहीं है।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ शिवोहम् शिवोहम् शिवोहम् !! अहं ब्रह्मास्मि !!
ॐ तत् ॐ सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ फरवरी २०२६

हम इस सृष्टि के लिए हैं, या यह सृष्टि हमारे लिए है? ---

 हम इस सृष्टि के लिए हैं, या यह सृष्टि हमारे लिए है?

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न तो हम इस सृष्टि के लिए हैं, और न ही यह सृष्टि हमारे लिए है। हम स्वयं ही यह सृष्टि हैं। हमारे विचार ही घनीभूत होकर भौतिक विश्व में प्रकट होते हैं। यह सृष्टि हमारे विचारों का ही घनीभूत रूप है। हमारी सोच और हमारे विचार ही हमारे उत्थान-पतन के कारण हैं। जैसा हम लगातार सोचते हैं वैसे ही हो जाते हैं। बचपन से ही हम सुनते और पढ़ते आये हैं कि कामिनी और कांचन मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति में बाधक हैं। यह बात पूरी तरह असत्य यानि झूठ है। मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ। आध्यात्मिक प्रगति में यदि कुछ बाधक है तो वह हमारा लोभ, राग-द्वेष और अहंकार है, अन्य कुछ भी नहीं। इसीलिए गीता में भगवान हमें निःस्पृह, वीतराग और स्थितप्रज्ञ होने का उपदेश देते हैं। जैसे एक पुरुष एक स्त्री के प्रति आकर्षित होता है वैसे ही एक स्त्री भी पुरुष के प्रति होती है, तो क्या स्त्री की प्रगति में पुरुष बाधक हो गया?
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विद्यारण्य स्वामी के अनुसार एक स्त्री को कामी पुरुष काम-संकल्प से देखता है, कुत्ता कुछ खाने को मिल जाएगा इस लोभ से देखता है, ब्रह्मविद अनासक्ति के भाव से देखता है, और एक भक्त उसे माता के रूप में देखता है। मेरी दृष्टि में साधु वही है जो निःस्पृह, वीतराग और स्थितप्रज्ञ है। अन्यथा वह एक जिज्ञासु मात्र है। जो व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर्य आदि आसुरी दुर्गुणों से भरा पड़ा है वह एक असुर है जो हर दृष्टि से त्याज्य है।
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कांचन के बिना यह लोकयात्रा नहीं चलती। मनुष्य को भूख-प्यास भी लगती है, सर्दी-गर्मी भी लगती है, बीमारी में दवा भी आवश्यक है, और रहने को निवास की भी आवश्यकता होती है। हर क़दम पर पैसा चाहिये। जैसे आध्यात्मिक दरिद्रता एक अभिशाप है, उससे कई गुणा अधिक भौतिक दरिद्रता भी अभिशाप है।
वनों, गुफाओं और आश्रमों में रहने वाले विरक्तों को भी भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और बीमारियाँ लगती है। उनकी भी कई भौतिक आवश्यकताएँ होती हैं, जिनके लिए वे संसार पर ही निर्भर होते हैं।
जो सत्यनिष्ठा से भगवान से जुड़ा है, उसकी तो हर आवश्यकता की पूर्ति स्वयं भगवान करते हैं। लेकिन ऐसा भक्त और विरक्त लाखों में एक होता है।
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मनुष्य की कल्पना -- मनुष्य की ही सृष्टि है जो बाधक है, ईश्वर की सृष्टि नहीं। यदि ईश्वर की सृष्टि बाधक होती तो सभी को बंधनकारक होती। अतः अपने विचारों और अपने भावों पर नियंत्रण रखें, ईश्वर की सृष्टि को दोष न दें।
एक व्यक्ति एक महात्मा के पास गया और बोला कि मुझे संन्यास चाहिये, मैं यह संसार छोड़ना चाहता हूँ। महात्मा ने इसका कारण पूछा तो उस व्यक्ति ने कहा कि मेरा धन मेरे सम्बन्धियों ने छीन लिया, स्त्री-पुत्रों ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया, और सब मित्रों ने भी मेरा त्याग कर दिया; अब मैं उन सब का त्याग करना चाहता हूँ। महात्मा ने कहा कि तुम उनका क्या त्याग करोगे? उन्होंने ही तुम्हें त्याग दिया है।
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भौतिक समृद्धि -- आध्यात्मिक समृद्धि का आधार है। एक व्यक्ति जो दिन-रात रोटी और धन के बारे में ही सोचता है, वह परमात्मा का चिंतन नहीं कर सकता। पहले भारत में बहुत समृद्धि थी। एक छोटा-मोटा गाँव भी हज़ारों साधुओं को भोजन करा सकता था, व उन्हें आश्रय भी दे सकता था। लेकिन अब परिस्थितियाँ वे नहीं हैं।
सबसे अधिक महत्वपूर्ण तो व्यक्ति के विचार और भाव हैं, उन्हें शुद्ध रखना एक उच्च कोटि की साधना है। मनुष्य के भाव और सोच-विचार ही उसके पतन और उत्थान के कारण हैं। कोई अन्य कारण नहीं है।
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मैं आप सब को धन्यवाद देता हूँ कि आपने इन पंक्तियों को पढ़ा। आप सब में हृदयस्थ श्रीहरिः को नमन। मैं आप सब के कल्याण की प्रार्थना करता हूँ। आपके कल्याण में ही मेरा कल्याण निहित है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ शिव शिव शिव शिव शिव॥
कृपा शंकर
३ फरवरी २०२५

असत्य का अंधकार दूर हो, सत्य की जय हो ---

 असत्य का अंधकार दूर हो, सत्य की जय हो ---

आध्यात्मिक साधना (उपासना) द्वारा हम अपने सपनों का भारत -- एक सत्यधर्मनिष्ठ हिन्दू राष्ट्र स्थापित करेंगे। यह हमारा विचारपूर्वक किया हुआ संकल्प है। अब अनात्म विषयों से रुचि समाप्त हो गयी है, केवल आत्मविषयों पर ही विचार करेंगे। ध्यान साधना का समय भी नित्य अधिकतम संभव रखा है। अब से सोशियल मीडिया के लिये समय नहीं मिलेगा। परमात्मा की उपासना के अतिरिक्त अन्य कुछ मुझे आता जाता भी नहीं है।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ ॐ तत् सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
२ फरवरी २०२६