समर्पण ---
पिछले चौदह वर्षों से भक्ति, योग, वेदान्त और ब्रह्मज्ञान पर अपनी क्षमतानुसार यथासंभव निःस्वार्थ भाव से खूब लेख (चार हजार से अधिक) सोशियल मीडिया पर लिखे हैं। अब और कुछ भी लिखने की क्षमता नहीं रही है। अवशिष्ट जीवन ईश्वर की उपासना को समर्पित है। ईश्वर की चेतना में ही अंत समय तक रहूँगा।
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मै केवल उन्हीं से मिलता हूँ जो इसी जीवन में परमात्मा को उपलब्ध होना चाहते हैं, जिनके हृदय में कूट कूट कर भगवान की भक्ति भरी पड़ी है, और जो नित्य नियमित उपासना करते हैं। अन्य किसी से भी मिलने की इच्छा नहीं है।
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मैं योगमार्ग का साधक हूँ। कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन ही योग है। कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में जगन्माता मुझे निमित्त बनाकर परमशिव की उपासना स्वयं करती हैं। गीता में जो पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं। अवशिष्ट जीवन परमशिव/पुरुषोत्तम को समर्पित हैं।
ॐ तत् सत् । ॐ ऐं श्रीगुरवे नमः !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ जनवरी २०२६
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