Monday, 4 May 2026

परमात्मा ही हमारा अस्तित्व है। हम परमात्मा को कैसे प्राप्त हों?

 परमात्मा ही हमारा अस्तित्व है। हम परमात्मा को कैसे प्राप्त हों?

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इस सृष्टि का नियम है कि हम अपनी भौतिक मृत्यु के समय जिस भी भाव का चिंतन करते हैं, अगले जन्म में हम उसी भाव को प्राप्त होते हैं। इसलिए हमें हर समय अनन्य भाव से परमात्मा का चिंतन करते रहना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण हमें मूर्धा में ओंकार के जप को कहते हैं। इस की विधि बड़ी सरल है। मेरुदण्ड को उन्नत और ठुड्डी को भूमि के समानांतर रखते हुए, सुख से अर्ध या पूर्ण खेचरीमुद्रा लगाकर बैठ जायें। ध्यान आज्ञाचक्र पर रखें। यदि सीधे बैठने में कोई असुविधा हो तो नितंबों के नीचे एक पतली सी गद्दी रख लें। मानसिक रूप से ओंकार का जप आरंभ कर दें। भगवान श्रीकृष्ण की परम कृपा से ध्यान स्वतः ही होने लगेगा। ध्यान में जो साधक "रां" बीज का जप करते हैं, उन्हें भी वही लाभ प्राप्त होता है, जो ॐ के जप से होता है।
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सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च |
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ||८:१२||
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् |
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ||८:१३|| (श्रीमद्भगवद्गीता)
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ध्यान — तेलधारा की भांति अखंड हो, यानी उसमें निरंतरता हो। ओंकार के ध्यान से देह के अभ्यंतर की अधोमुखी क्रियाएँ सुषुम्नापथ द्वारा ऊर्ध्वगामी हो जाती हैं। इसीलिए इसे "ओंकार" कहते हैं। यह ओंकार ही जब प्राण-तत्व को परमात्मा के चरणों में प्रणत करता है, तब इसे "प्रणव" कहते हैं। ओंकार का ध्यान ही चिदाकाश, दहराकाश, महाकाश, पराकाश और सूर्याकाश आदि से पार करा कर मह:, जन:, तप: और सत्यलोक से भी परे ले जाकर हमें ब्रह्ममय बना देता है। इसका कभी क्षय नहीं होता, अतः यह अक्षर या अक्षय है। यह साक्षात ब्रह्म साधना है जिसकी घोषणा सभी उपनिषद् और भगवद्गीता करती हैं। इसकी विधि बड़ी सरल है।
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सार की बात यह है कि अंत समय में जिसकी जैसी मति होती है वैसी ही उसकी गति होती है। महात्माओं ने बताया है कि इस देह में ग्यारह छिद्र हैं जिनसे जीवात्मा का मृत्यु के समय निकास होता है -- दो आँख, दो कान, दो नाक, एक पायु, एक उपस्थ, एक नाभि, एक मुख और एक मूर्धा।
(१). यह मूर्धा वाला मार्ग अति सूक्ष्म है और पुण्यात्माओं के लिए ही है।
(२). नरकगामी जीव पायु यानि गुदामार्ग से बाहर निकलता है।
(३). कामुक व्यक्ति मुत्रेंद्रियों से निकलता है और निकृष्ट योनियों में जाता है|
(४). नाभि से निकलने वाला प्रेत बनता है|
(५). भोजन लोलूप व्यक्ति मुँह से निकलता है।
(६). गंध प्रेमी नाक से।
(७). संगीत प्रेमी कान से, और
(८). तपस्वी व्यक्ति आँख से निकलता है|
अंत समय में जहाँ जिसकी चेतना है वह उसी मार्ग से निकलता है और सब की अपनी अपनी गतियाँ हैं। अनेक बातें यहाँ नहीं लिख रहा, क्योंकि ये ज्ञान की बातें ऋषि याज्ञवल्क्य और राजा जनक के संवादों में मिल जायेंगी|
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जो ब्राह्मण संकल्प कर के और दक्षिणा लेकर भी यज्ञादि अनुष्ठान विधिपूर्वक नहीं करते/कराते वे ब्रह्मराक्षस बनते हैं| मद्य, मांस और परस्त्री का भोग करने वाला ब्राह्मण ब्रह्मपिशाच बनता है| इस तरह की कर्मों के अनुसार अनेक गतियाँ हैं| कर्मों का फल सभी को मिलता है, कोई इससे बच नहीं सकता|
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सबसे बुद्धिमानी का कार्य है परमात्मा से परम प्रेम, निरंतर स्मरण का अभ्यास और ध्यान। यह लेख कहीं लंबा न हो जाये इसलिए इसका यहीं समापन करता हूँ। आप सब पर परमात्मा की कृपा हो। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
३० अप्रेल २०२६

इस लौकिक जीवन में अब मैं किसी भी तरह की वचनबद्धता का निर्वाह करने में असमर्थ हूँ ---

इस लौकिक जीवन में अब मैं किसी भी तरह की वचनबद्धता का निर्वाह करने में असमर्थ हूँ। इस जीवन में जो भी थोड़ी-बहुत ऊर्जा बची है, वह पूरी तरह से परमब्रह्म परमात्मा को समर्पित है। एकमात्र उद्देश्य है -- परमात्मा को "पूर्ण समर्पण"। घनीभूत प्राण-तत्व के रूप में जगन्माता स्वयं परमशिव की उपासना कर रही हैं। जो परमशिव हैं वे ही श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम हैं, और वे ही वेदान्त के ब्रह्म हैं। उनसे अन्य कोई भी या कुछ भी नहीं है। समस्त जीवन उन्हें समर्पित है। वे कुछ भी करें। यदि कहीं कोई कमी है तो वह मेरी समझ में ही है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। .

मुक्ति या मोक्ष की कामना ही मुक्ति और मोक्ष के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। जब तक मुक्ति और मोक्ष की कामना है, तब तक हम बंधन में हैं। तब न तो मुक्ति मिल सकती है और न ही मोक्ष। "शिवो भूत्वा शिवं यजेत्।" स्वयं शिव बनकर शिव की उपासना करो॥ ॐ नमः शिवाय। ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर १ मई २०२६

वैशाख पूर्णिमा ----

आज १ मई २०२६ को वैशाख पूर्णिमा है। अङ्ग्रेज़ी तिथि से १ मई का भी बहुत अधिक अंतर्राष्ट्रीय महत्व है, और हिन्दी तिथि से वैशाख-पूर्णिमा का भी बहुत अधिक अंतर्राष्ट्रीय महत्व है। एक मई को तो अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस है। इस दिन का बहुत बड़ा ऐतिहासिक महत्व है जिसके ऊपर कई लेख विस्तार से लिखे जा चुके हैं। सभी पूर्व साम्यवादी देशों में तो आज के दिन छुट्टी होती थी और उत्सव मनाए जाते थे। दिन में एक श्रमिक केवल ८ घंटे काम करता है, और सप्ताह में एक दिन की छुट्टी होती है, यह श्रेय जाता है अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस पर हुए अनेक आंदोलनों की सफलता को।

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वैशाख पूर्णिमा को सभी बौद्ध मतानुयायी देशों में सबसे बड़ा त्योहार होता है। इसे बुद्ध-पूर्णिमा भी कहते हैं और वैशाख भी कहते हैं। इस दिन महात्मा बुद्ध का जन्म, ज्ञान और निर्वाण दिवस मनाया जाता है। पूरे विश्व में बौद्धों का यह सबसे बड़ा त्योहार है।
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भारत में इस दिन अनेक लोग सत्यनारायण व्रत कथा का आयोजन करवाते हैं। हर महीने की पूर्णिमा को भगवान विष्णु के सत्यनारायण रूप की पूजा विशेष फलदायी होती है। वास्तव में भगवान का सत्य-नारायण रूप ही सर्वश्रेष्ठ है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ मई २०२६

गुरु रूप में दक्षिणामूर्ति शिव ---

 गुरु रूप में दक्षिणामूर्ति शिव ---

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विद्या, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति के लिए गुरु रूप में भगवान शिव को ही "दक्षिणामूर्ति" कहा जाता है। प्रतीकात्मक रूप से वे एक वटवृक्ष के नीचे एक चबूतरे पर बैठे हुए ध्यानस्थ हैं। उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर है। अपने दाहिने पैर से उन्होंने एक अज्ञानरूपी जीव को दबा रखा है। वे पूर्णतः मौन हैं। उनके समक्ष जो भी मुनि ध्यानस्थ होते हैं, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है। सारा कार्य मौन में होता है। उनका ध्यान करने से "ॐ तत्त्वमसि" (तत् त्वं असि) जैसा महावाक्य स्वतः ही ध्यान में प्रकट होता है। ऐसे ही किसी महावाक्य द्वारा वे शिष्य में आत्मबोध जागृत करते हैं। वे स्वयं ही मोक्षदायक चैतन्यस्वरूप गुरुतत्त्व हैं। उनके समक्ष “सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म” की अनुभूति होती है। वे अद्वैत-ब्रह्मतत्त्व का बोध कराते हैं। वे ही सद्गुरु हैं। वे “श्रवण, मनन, निदिध्यासन, और ध्यान” के माध्यम से अपने समक्ष उपस्थित मुनि को आत्मस्वरूप में स्थापित करते हैं।
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मोक्ष -- कोई क्रिया, कर्म या यज्ञ नहीं, केवल तत्त्वज्ञान है जो भवबन्धन का क्षय करता है।
वे सदा वंदनीय हैं। उनका उपदेश किसी पार्थिव विद्या के लिए नहीं होता, बल्कि उस चिदात्मा के लिए है, जिसकी प्रकाशमयी सत्ता ही विश्व का आधार है। उन गुरुरूप मौनव्रती आत्मस्वरूप दिग्दर्शक भगवान शिव को मेरा नमन॥
ॐ ह्रीं दक्षिणामूर्तये तुभ्यं वटमूलनिवासिने। ध्यानैकनिरतांगाय नमो रुद्राय शंभवे ह्रीं ॐ।
ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा।
ॐ ह्रीं दक्षिणामूर्तये नमः।
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मेरा व्यक्तिगत निजी अनुभव जिसे बताने की मुझे पूर्ण अनुमति है :---
इस शरीर में सहस्त्रारचक्र उत्तर दिशा है, मूलाधार दक्षिण दिशा, भ्रूमध्य पूर्व दिशा, और मेरुशीर्ष पश्चिम दिशा है। भगवान शिव की अनुभूति हमें उत्तर दिशा यानि सहस्त्रारचक्र में या इससे ऊपर होती है, अतः उनका ध्यान हमें या तो सहस्त्रारचक्र में करना चाहिए, या उससे भी ऊपर जिसकी अनुभूति इस भौतिक देह से बाहर होती है। एक दिन साधक पाता है कि सहस्त्रार से ऊपर का आवरण हट गया है, और वह इस शरीर से बाहर है। यह अनुभूति सूक्ष्म देह की है, भौतिक शरीर की नहीं। उनके दर्शन और अनुभूति सूक्ष्म देह में ही होती है। उनके दर्शन एक श्वेत पञ्चकोणीय नक्षत्र के रूप में होते हैं। इससे अधिक की अनुभूति स्वयं करें।
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श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय के २३वें मंत्र में भगवान के तीन नाम बताए गए हैं -- "ॐ तत् सत्" । सृष्टि के आरंभ में परमात्मा ने स्वयं वेदों, यज्ञों, और ब्राह्मण की रचना की है।
"ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥१७:२३॥"
अर्थात् -- 'ऊँ, तत् सत्' ऐसा यह ब्रह्म का त्रिविध निर्देश (नाम) कहा गया है; उसी से आदिकाल में (पुरा) ब्राहम्ण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं॥ अर्थात् ऊँ, तत् और सत् -- इन तीनों नामोंसे जिस परमात्माका निर्देश किया गया है, उसी परमात्माने सृष्टिके आदिमें वेदों, ब्राह्मणों और यज्ञोंकी रचना की है।
"तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥१७:२४॥"
अर्थात् -- इसलिए, ब्रह्मवादियों की शास्त्र प्रतिपादित यज्ञ, दान और तप की क्रियायें सदैव ओंकार के उच्चारण के साथ प्रारम्भ होती हैं॥
किसी भी प्रकार के यज्ञ, दान और तप का आरंभ हमें ॐ के उच्चारण के साथ करना चाहिए। भगवान शिव का ध्यान भी हमें ॐ मंत्र से ही करना चाहिए। यह मेरा अनुभव है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ मई २०२६

ग्रेट निकोबार द्वीप की गैलाथिया खाड़ी प्रोजेक्ट का पूर्ण समर्थन ---

ग्रेट निकोबार द्वीप की गैलाथिया खाड़ी प्रोजेक्ट का पूर्ण समर्थन --
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भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप का सुनामी आने से पहिले मैंने दो बार भ्रमण किया है, और वहाँ खूब घूमा हूँ। दो बार वहाँ पर भारत के दक्षिणतम बिन्दु "इंदिरा पॉइंट" प्रकाश-स्तम्भ पर भी चढ़ा हूँ। बड़े ही शानदार और सुंदर अविकसित समुद्री तट हैं। मैं भारत सरकार के ग्रेट निकोबार द्वीप की गैलाथिया खाड़ी प्रोजेक्ट का पूर्ण समर्थन करता हूँ। इससे नुकसान केवल चीन को है, शायद इसीलिए एक भारतीय राजनेता इसका खूब विरोध कर रहे हैं।
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वहाँ एक प्रमुख रणनीतिक और बुनियादी ढांचा विकास कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर में चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति का मुकाबला करना और भारत को समुद्री व्यापार का केंद्र बनाना है। मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) के पास स्थित होने के कारण, यह पोर्ट भारतीय नौसेना की क्षमता बढ़ाएगा और क्षेत्र में चीन के जहाजों की गतिविधियों पर भी नजर रखेगा। इतना ही नहीं इससे भारत एक वैश्विक कंटेनर ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में स्थापित हो जाएगा, क्योंकि भारत में इतना गहरा बन्दरगाह अन्यत्र कहीं है ही नहीं।
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चिंता का विषय यह है कि चीन -- थाइलैंड के साथ मिलकर थाइलैंड-की-खाड़ी से बंगाल-की-खाड़ी के मध्य एक समुद्री नहर बनाने की योजना पर काम शुरू करने वाला है जिससे मलक्का जलडमरूमध्य का महत्व बहुत कम रह जाएगा। बंगाल की खाड़ी में यह नहर निकोबार द्वीप समूह के बिल्कुल ऊपर खुलेगी। भारत को होने वाले हानि-लाभ की थाह लेना तो विशेषज्ञों का काम है। संबंधित नक्शे देखें, फिर विचार करें।
कृपा शंकर
२ मई २०२६

आध्यात्मिक मार्ग पर बाधाएँ कैसे दूर हों? सत्य-संकल्प की दृढ़ता में कैसे वृद्धि हो?

 आध्यात्मिक मार्ग पर बाधाएँ कैसे दूर हों? सत्य-संकल्प की दृढ़ता में कैसे वृद्धि हो?

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राम अभी तक वन में हैं, रावण सबके मन में है -- यही एकमात्र कारण है हमारे आध्यात्मिक पतन का। जब कि होना यह चाहिए कि -- "रामहि केवल प्रेम पियारा। जान लेहु जो जानन हारा।"
रामचरितमानस में एक स्थान पर लिखा है --
"तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिअ तुला इक अंग।
तुल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग॥"
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स्वनामधान्य भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर ने अपनी रचना भजगोविन्दम् (मोहमुद्गर) के १३वें श्लोक में लिखा है --
"क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका, भवति भवार्णवतरणे नौका॥"
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श्रीरामचरितमानस, भागवत पुराण, और श्रीमद्भगवद्गीता जैसे ग्रन्थों का नित्य नियमित स्वाध्याय और सत्संग ही -- मेरी दृष्टि में एकमात्र उपाय है, आध्यात्मिक बाधाओं को दूर करने, और संकल्प में निरंतर दृढ़ता लाने का। सबसे दुर्लभ चीज सत्संग ही है। कुसंग का तो किसी भी परिस्थिति में त्याग हो।
"एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।
‘भीखा’ संगति साधु की, कटें कोटि अपराध॥"
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भगवान विष्णु या उनके अवतारों या परमशिव की अनंतता का ध्यान हमें नित्य नियमित करना चाहिए। इससे अतिरिक्त अन्य कुछ मुझे समझ में नहीं आता। सभी मित्रों को साधुवाद देता हूँ, जिन्होंने अपने सुझाव लिखे हैं। सभी का कल्याण हो। हरिः ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
३ मई २०२६

सन्यासी और योगी कौन हैं? ---

 सन्यासी और योगी कौन हैं? ---

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मैं एक शाश्वत आत्मा हूँ, जिसका एकमात्र स्वधर्म परमब्रह्म परमात्मा को पूर्ण समर्पण और निज जीवन में उन की पूर्ण अभिव्यक्ति है। उनकी परमकृपा से किसी भी तरह का कोई संशय मुझे नहीं है। मेरा स्वधर्म — मेरा कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग ही है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥६:१॥"
अर्थात् - श्रीभगवान् ने कहा -- जो पुरुष कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है, न कि वह जिसने केवल अग्नि का और क्रियायों का त्याग किया है॥
आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या की है। हमें अपने कर्म का निर्वाह अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए, न कि कर्मफल की प्राप्ति के लिए। तभी हम सन्यासी व योगी हैं, अन्यथा नहीं।
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भगवान हमें सब संकल्पों के त्याग को भी कहते हैं, क्योंकि संकल्पों को त्यागे बिना कोई न तो कोई सन्यासी हो सकता है और न योगी। इच्छाओं को त्याग कर ही हम आध्यात्मिक हो सकते हैं। हम अपने द्वारा अपना उद्धार स्वयं
करें, अपना पतन न करे; क्योंकि हम स्वयं ही अपने मित्र हैं, और स्वयं ही अपने शत्रु।
"जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥६:७॥"
अर्थात् -- जिसने अपने-आप पर अपनी विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) सुख-दुःख तथा मान-अपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।
(सार की बात यह है कि जो समभाव में स्थित है, उसे ईश्वर नित्य प्राप्त हैं।)
ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ मई २०२६

प्रशान्त चित्त वाले जितेन्द्रिय के लिए परमात्मा सदा ही आत्मभाव से विद्यमान रहते हैं

 प्रशान्त चित्त वाले जितेन्द्रिय के लिए परमात्मा सदा ही आत्मभाव से विद्यमान रहते हैं

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अनुकूल/प्रतिकूल परिस्थितियों, अच्छे/बुरे वातावरण, व मूर्ख/बुद्धिमान के साथ भी आत्मज्ञानी पुरुष सदा प्रशान्त और समभाव में स्थित रहता है। ऐसे ज्ञानी पुरुष को परमात्मा नित्य-प्राप्त हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं --
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥६:२२॥"
अर्थात् -- "जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके मानने में भी नहीं आता, और जिस में स्थित होने पर वह बड़े भारी दु:ख से भी विचलित नहीं होता है॥
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इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति हो सकती है। इसके लिए हमें भगवान विष्णु के ऊर्ध्वस्थ सर्वव्यापी पुरुषोत्तम रूप या भगवान शिव के परमशिव रूप का कूटस्थ में निरंतर ध्यान करना होगा। इन दोनों की अनुभूतियाँ एक ही हैं, केवल बाहरी अभिव्यक्तियाँ ही पृथक पृथक हैं।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
४ मई २०२६