प्रशान्त चित्त वाले जितेन्द्रिय के लिए परमात्मा सदा ही आत्मभाव से विद्यमान रहते हैं
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अनुकूल/प्रतिकूल परिस्थितियों, अच्छे/बुरे वातावरण, व मूर्ख/बुद्धिमान के साथ भी आत्मज्ञानी पुरुष सदा प्रशान्त और समभाव में स्थित रहता है। ऐसे ज्ञानी पुरुष को परमात्मा नित्य-प्राप्त हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं --
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥६:२२॥"
अर्थात् -- "जिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके मानने में भी नहीं आता, और जिस में स्थित होने पर वह बड़े भारी दु:ख से भी विचलित नहीं होता है॥
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इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति हो सकती है। इसके लिए हमें भगवान विष्णु के ऊर्ध्वस्थ सर्वव्यापी पुरुषोत्तम रूप या भगवान शिव के परमशिव रूप का कूटस्थ में निरंतर ध्यान करना होगा। इन दोनों की अनुभूतियाँ एक ही हैं, केवल बाहरी अभिव्यक्तियाँ ही पृथक पृथक हैं।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
४ मई २०२६
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