गुरु रूप में दक्षिणामूर्ति शिव ---
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विद्या, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति के लिए गुरु रूप में भगवान शिव को ही "दक्षिणामूर्ति" कहा जाता है। प्रतीकात्मक रूप से वे एक वटवृक्ष के नीचे एक चबूतरे पर बैठे हुए ध्यानस्थ हैं। उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर है। अपने दाहिने पैर से उन्होंने एक अज्ञानरूपी जीव को दबा रखा है। वे पूर्णतः मौन हैं। उनके समक्ष जो भी मुनि ध्यानस्थ होते हैं, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है। सारा कार्य मौन में होता है। उनका ध्यान करने से "ॐ तत्त्वमसि" (तत् त्वं असि) जैसा महावाक्य स्वतः ही ध्यान में प्रकट होता है। ऐसे ही किसी महावाक्य द्वारा वे शिष्य में आत्मबोध जागृत करते हैं। वे स्वयं ही मोक्षदायक चैतन्यस्वरूप गुरुतत्त्व हैं। उनके समक्ष “सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म” की अनुभूति होती है। वे अद्वैत-ब्रह्मतत्त्व का बोध कराते हैं। वे ही सद्गुरु हैं। वे “श्रवण, मनन, निदिध्यासन, और ध्यान” के माध्यम से अपने समक्ष उपस्थित मुनि को आत्मस्वरूप में स्थापित करते हैं।
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मोक्ष -- कोई क्रिया, कर्म या यज्ञ नहीं, केवल तत्त्वज्ञान है जो भवबन्धन का क्षय करता है।
वे सदा वंदनीय हैं। उनका उपदेश किसी पार्थिव विद्या के लिए नहीं होता, बल्कि उस चिदात्मा के लिए है, जिसकी प्रकाशमयी सत्ता ही विश्व का आधार है। उन गुरुरूप मौनव्रती आत्मस्वरूप दिग्दर्शक भगवान शिव को मेरा नमन॥
ॐ ह्रीं दक्षिणामूर्तये तुभ्यं वटमूलनिवासिने। ध्यानैकनिरतांगाय नमो रुद्राय शंभवे ह्रीं ॐ।
ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा।
ॐ ह्रीं दक्षिणामूर्तये नमः।
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मेरा व्यक्तिगत निजी अनुभव जिसे बताने की मुझे पूर्ण अनुमति है :---
इस शरीर में सहस्त्रारचक्र उत्तर दिशा है, मूलाधार दक्षिण दिशा, भ्रूमध्य पूर्व दिशा, और मेरुशीर्ष पश्चिम दिशा है। भगवान शिव की अनुभूति हमें उत्तर दिशा यानि सहस्त्रारचक्र में या इससे ऊपर होती है, अतः उनका ध्यान हमें या तो सहस्त्रारचक्र में करना चाहिए, या उससे भी ऊपर जिसकी अनुभूति इस भौतिक देह से बाहर होती है। एक दिन साधक पाता है कि सहस्त्रार से ऊपर का आवरण हट गया है, और वह इस शरीर से बाहर है। यह अनुभूति सूक्ष्म देह की है, भौतिक शरीर की नहीं। उनके दर्शन और अनुभूति सूक्ष्म देह में ही होती है। उनके दर्शन एक श्वेत पञ्चकोणीय नक्षत्र के रूप में होते हैं। इससे अधिक की अनुभूति स्वयं करें।
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श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय के २३वें मंत्र में भगवान के तीन नाम बताए गए हैं -- "ॐ तत् सत्" । सृष्टि के आरंभ में परमात्मा ने स्वयं वेदों, यज्ञों, और ब्राह्मण की रचना की है।
"ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥१७:२३॥"
अर्थात् -- 'ऊँ, तत् सत्' ऐसा यह ब्रह्म का त्रिविध निर्देश (नाम) कहा गया है; उसी से आदिकाल में (पुरा) ब्राहम्ण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं॥ अर्थात् ऊँ, तत् और सत् -- इन तीनों नामोंसे जिस परमात्माका निर्देश किया गया है, उसी परमात्माने सृष्टिके आदिमें वेदों, ब्राह्मणों और यज्ञोंकी रचना की है।
"तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥१७:२४॥"
अर्थात् -- इसलिए, ब्रह्मवादियों की शास्त्र प्रतिपादित यज्ञ, दान और तप की क्रियायें सदैव ओंकार के उच्चारण के साथ प्रारम्भ होती हैं॥
किसी भी प्रकार के यज्ञ, दान और तप का आरंभ हमें ॐ के उच्चारण के साथ करना चाहिए। भगवान शिव का ध्यान भी हमें ॐ मंत्र से ही करना चाहिए। यह मेरा अनुभव है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ मई २०२६
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