Friday, 23 January 2026

उन सब महान आत्माओं का स्वागत है जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है --

 उन सब महान आत्माओं का स्वागत है जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है। निज जीवन में धर्म की रक्षा होगी तो राष्ट्र में भी होगी। असत्य और अंधकार की शक्तियों का निरंतर प्रतिकार करें। जितना हो सके उतना अधिक से अधिक समय परमब्रह्म परमात्मा के चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान में व्यतीत करें। यह सबसे बड़ी सेवा है जो हम अपने राष्ट्र और समष्टि के लिए कर सकते हैं।

.
बौद्धिक धरातल पर आध्यात्म में किसी भी तरह का कोई संशय मुझे नहीं है, सिर्फ एक तड़प है परमात्मा को समर्पित होने की। जो भी करना है वह वे ही करेंगे। मैं तो एक निमित्त मात्र उपकरण हूँ। दक्षिणामूर्ति भगवान शिव और जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण को नमन !!
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०२६

अब से यह अवशिष्ट जीवन पूरी तरह परमात्मा को समर्पित है ---

 अब से यह अवशिष्ट जीवन पूरी तरह परमात्मा को समर्पित है। किसी भी तरह का कोई कण मात्र भी संशय नहीं है। अपने भूत और भविष्य को तो तो मैं बदल नहीं सकता अतः उनका चिंतन ही छोड़ दिया है। वर्तमान में निरंतर कूटस्थ-चैतन्य में परमात्मा की चेतना में रहूँ, यही मेरा प्रयास है, और यही सदा रहेगा।

.
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान द्वारा दिये गये अनेक शाश्वत वचनों में से ये दो हैं जो हर समय मेरी चेतना में रहते हैं --
(१) "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् -- मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
(२) "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
.
सभी सिद्धांतों, नियमों व हर तरह के साधन विधानों से ऊपर उठकर हमें शरणागति द्वारा स्वयं का समर्पण परमात्मा को कर देना चाहिए। आप सब में परमब्रह्म को नमन करता हूँ। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२६

अमेरिका का यह राक्षसी कृत्य अक्षम्य अपराध है --

 अमेरिका का यह राक्षसी कृत्य अक्षम्य अपराध है ---

वेनेज़ुएला पर अमेरिकी आक्रमण की मैं निंदा करता हूँ। यह वेनेजुएला के खनिज तेल की खुली लूट है। वेनेजुएला के पास विश्व का सबसे अधिक खनिज तेल है। अमेरिका की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है, जिसे सशक्त बनाने के लिए अमेरिका ने यह खुली लूट और डकैती की है। ड्रग पकड़ने का तो बहाना है, असली लक्ष्य तो खनिज तेल की लूट है। विश्व के हरेक देश को अमेरिका के विरुद्ध सशक्त होना होगा। भारत ने अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाई है जिसके लिये मैं वर्तमान केंद्र सरकार को धन्यवाद देता हूँ।
अमेरिका को ब्रिटेन, स्पेन और पुर्तगाल के डाकुओं ने बसाया था। उन्होंने वहाँ के करोड़ों निवासियों की हत्या कर के गोरों को बसाया। उनके स्वभाव में अभी भी डाकूपन है।
३ जनवरी २०२६

हम किसका ध्यान करें ?

 (Re-Posted after 10 years) हम किसका ध्यान करें ? -- (Very Important)

.
मेरे विचार से गहन ध्यान में कूटस्थ में दिखाई देने वाली विराट श्वेत ज्योति ही गायत्री मन्त्र के "सविता" देव हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही परम ब्रह्म हैं, वे ही नारायण हैं, वे ही आत्म-सूर्य और सभी तत्वों के तत्व हैं | एक जिज्ञासा उठी है जिसे यहाँ व्यक्त कर रहा हूँ --
हमारा सौर मंडल हमारे भौतिक सूर्य से जीवन पाता है| जो भी भौतिक ऊर्जा हमें प्राप्त है वह हमारे सूर्य से ही है| पर इस सृष्टि में अनंत सूर्य हैं जिनके अपने अपने सौर मंडल हैं, जहाँ पता नहीं कैसे कैसे लोक होंगे|
कहते हैं कि सृष्टि -- भौतिक, सूक्ष्म और कारण -- इन तीन आयामों में हैं| पर इनके मध्य भी अनेक आयामों में अन्य भी अनेक लोक निश्चित रूप से होंगे जो हमारी समझ से परे हैं|
भौतिक जगत भी पता नहीं कितने सारे होंगे| हम इस सौर मंडल में हैं जो हमारे भौतिक सूर्य के इर्दगिर्द है, पर अंतरिक्ष में तो हर तारा एक सूर्य है जिसके भी अनेक ग्रह-उपग्रह हैं| सृष्टि में भौतिक विश्व ही अनंत है, फिर सूक्ष्म जगत तो उससे भी बहुत बड़ा बताते हैं, और कारण जगत तो पता नहीं कितना विराट होगा जिस की कल्पना भी मनुष्य की क्षमता से परे है| देव-असुर आदि भी सर्वत्र होते होंगे|
.
ध्यान साधना में हम देश-काल (Time & Space) से परे होते हैं| हमारी चेतना अनंत में होती है जो हमारा वास्तविक घर है| वहाँ इस सूर्य का कोई महत्व नहीं है|
ध्यान साधना में जिस ज्योतिर्मय ब्रह्म के दर्शन हमें कूटस्थ में होते हैं, वे ही सविता देव हैं -- ऐसी मेरी धारणा है|
सम्पूर्ण सृष्टि जिनसे आभाषित है, वे वही होंगे जिसके बारे में श्रुति भगवती कहती है --
"न तत्र सूर्यो भांति न चन्द्र-तारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कूतोऽयमग्नि |
तम् एव भान्तम् अनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वम् इदं विभाति ||"
.
"हिरन्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्
तत् त्वं पूषन्न्-अपावृणु सत्य-धर्माय दृष्टये |"
.
"पूषन्न् अकर्ये यम सूर्य प्राजापत्य व्युह-रश्मीन् समूह तेजो
यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि यो ऽसव् असौ पुरुषः सो ऽहम् अस्मि ||"
---
हमें उस आभासित ब्रह्म आत्मसूर्य का ही ध्यान करना चाहिए| वह ही हम हैं|
हे प्रभु, मैं अपनी तुच्छ और अति अल्प बुद्धि से कुछ भी समझने में असमर्थ हूँ| अपनी पवित्रता दो, अपना परम प्रेम दो|
हे प्रभु, "तुम हवाओं में बह रहे हो, झोंकों में मुस्करा रहे हो, सितारों में चमक रहे हो, हम सब के विचारों में नृत्य कर रहे हो, समस्त जीवन तुम्हीं हो| हे परमात्मा, हे गुरु रूप ब्रह्म, तुम्हारी जय हो| ॐ तत्सत् | सोsहं | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
३ जनवरी २०१६
.
पुनश्च: --- ब्राह्मण को दिन में कम से कम १० गायत्री मन्त्र का जप नित्य करना अनिवार्य है| अपने ब्राहमणत्व की रक्षा के लिए कम से कम एक जप तो आवश्यक है| ब्राह्मण किसी भी तरह की कोई भी साधना करे पर गायत्री मन्त्र के बिना उसे कोई सिद्धि नहीं मिलती| गायत्री जप न करने वाला ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से च्युत हो जाता है, जिसके लिए उसे प्रायश्चित करना पड़ता है।

गुरु महाराज का जन्म दिवस ---

 ग्रेगोरियन कलेंडर के अनुसार आज ५ जनवरी का दिन मेरे लिए एक विशेष दिन है जो अवशिष्ट निज जीवन में परमात्मा के प्रति गहनतम शर्तरहित अप्रतिबंधित पूर्णप्रेम व समर्पण की दिशा को और भी अधिक दृढ़ता से पुनः स्थापित करेगा।

परमात्मा से परम प्रेम -- मेरा स्वभाव और मेरा जीवन है। इसकी गहनतम अभिव्यक्ति इस जीवन में अभी और इसी समय ही नहीं, बल्कि सभी भावी जन्मों में निरंतर हो। किसी भी तरह के अन्य विचार का जन्म ही न हो।
.
मेरा परमप्रेम केवल परमात्मा से ही हो सकता है। वे ही मेरे विखंडित विचारों के ध्रुव हैं। इस जन्म में तो उनके साथ हूँ ही, इस जन्म से पूर्व भी उन्हीं के साथ था, और इस जन्म के उपरांत भी उन्हीं के साथ रहूंगा। इस जन्म में वे ही सभी संबंधियों, मित्रों व शत्रुओं के रूप में आये, इस जन्म का संचालन भी उन्हीं ने किया, और भविष्य में भी मेरे माध्यम से सदा वे स्वयं को ही व्यक्त करेंगे।
भगवान कहते हैं --
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्"॥६:२५॥ (गीता)
अर्थात् - शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥
.
समय समय पर अपने मन को परमात्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करें। यह बड़ी से बड़ी साधना है। यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ जहाँ विचरण करता है, वहाँ वहाँ से हटाकर इसको एक परमात्मा में ही लगायें। विक्षेप का कारण रजोगुण है। हम सर्वत्र यानि सभी प्राणियों में अपने स्वरूप को देखें, और सभी प्राणियों को अपने स्वरूप में देखें।
.
ॐ हे प्रेममय ज्योतिर्मय गुरुरूप कूटस्थ ब्रह्म, मेरे ह्रदय को इतना पवित्र कर दो कि श्वेत कमल भी इसे देख कर शरमा जाय। तुम इस नौका के कर्णधार हो जिसे द्वैत से परे ले चलो। तुम सब नाम और रूपों से परे हो। तुम्हारा निवास कूटस्थ में है, जहाँ तुम सदा मेरे साथ हो। तुम स्वयं कूटस्थ ब्रह्म हो। जब तुम साथ में हो, तब मुझे अब और कुछ भी नहीं चाहिये। तुम्हारे विराट महासागर में मैं एक कण था, जो तुम्हारे में विलीन होकर तुम्हारा ही एक प्रवाह बन गया हूँ। मैं तुम्हारे साथ एक हूँ और सदा एक ही रहूँगा॥
.
मैं, मेरे गुरु महाराज, और मेरे उपास्य परमशिव/पुरुषोत्तम -- ध्यान में तीनों एक हैं। मैं कूटस्थ सूर्यमंडल में उन्हीं का ध्यान करता हूँ। परमशिव के ध्यान में स्वयं की पृथकता के बोध को विलीन कर रहा हूँ। जो परमशिव हैं, वे ही पुरुषोत्तम हैं, वे ही श्रीहरिः भगवान विष्णु हैं।
.
ब्रह्मानंदम् परम सुखदम् केवलं ज्ञान मूर्तिम्।
द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।।
एकं नित्यं विमलं चलम् सर्वधीसाक्षी भूतम्।
भावातीतं त्रिगुण रहितं सद्गुरुं तम् नमामि।।
.
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥"
वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥"
नमः पुरस्तात् पृष्ठतस्ते नमोस्तु ते सर्वत एव सर्व
अनन्तवीर्याअमितविक्रमस्त्वम् सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः॥"
ॐ ॐ ॐ !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
५ जनवरी २०२६
🙏🌹🌺🕉️🕉🕉🌺🌹🙏

मुझ अकिंचन को अपना आशीर्वाद देते रहिये। मैं आप सब का सेवक मात्र हूँ ---

 साधना के मार्ग पर हमारा प्रथम लक्ष्य है -- सच्चिदानंद ब्रह्म परमात्मा से परमप्रेम और उन्हें पूर्ण समर्पण। उस अवस्था में हम शनैः शनैः राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त होकर वीतराग होने लगते हैं। वीतराग व्यक्ति ही जीवनमुक्त है। उस पर कोई बंधन नहीं है। वीतराग व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ हो सकता है, जिसकी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित है। समर्पित होकर परमात्मा का अधिकाधिक ध्यान करें और उन्हें निरंतर अपनी स्मृति में रखें। इसके अतिरिक्त भी यदि अन्य कोई मार्ग है तो मुझे उसका पता नहीं है।

.
मुझ अकिंचन को अपना आशीर्वाद देते रहिये। मैं आप सब का सेवक मात्र हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ जनवरी २०२६

निकट भविष्य में भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव होगा, व सत्य-सनातन-धर्म की सम्पूर्ण विश्व में पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा।

 मुझे एक आतंरिक आश्वासन प्राप्त है कि निकट भविष्य में भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव होगा, व सत्य-सनातन-धर्म की सम्पूर्ण विश्व में पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा।

जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि होती है, व जिसके दस लक्षण मनुस्मृति में बताये गए हैं, वह सत्य-सनातन-धर्म है। रात्रि में सोने से पूर्व, और प्रातः उठते ही कुछ देर भगवान का भजन, कीर्तन व ध्यान करें। पूरे दिन भगवान को अपनी स्मृति में रखें और निज जीवन का केंद्र-बिन्दु बनायें। हम निमित्त मात्र होकर भगवान के उपकरण बनेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेगा। निज जीवन में भगवद्-प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार हमारा बड़े से बड़ा धर्म है। भगवान को निरंतर अपनी स्मृति में रखें, कभी भूलें नहीं। हरिः ॐ तत्सत् ॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
६ जनवरी २०२६

सभी प्रसन्न हों और निरंतर सदा परमात्मा की चेतना ब्राह्मीस्थिति में रहें ---

 सभी प्रसन्न हों और निरंतर सदा परमात्मा की चेतना ब्राह्मीस्थिति में रहें। परमात्मा से पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। यह शरीर रहे या न रहे, इसका महत्व नहीं है। महत्व एक ही बात का है कि हमारे अस्तित्व के केंद्र बिन्दु केवल कूटस्थ ब्रह्म हों। गीता में भगवान कहते हैं --

"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१० जनवरी २०२६

- (१) भगवान के मोक्षदायी शाश्वत वचन। (२) भगवान का ध्यान किस रूप में करना चाहिये। (३) भगवान का नाम क्या है?

 मुझे आदेश प्राप्त हुआ है कि मैं निम्न तीन विषयों पर सत्संग करूँ। आप इसे निज बुद्धि और विवेक के प्रकाश में समझ्न सकते हैं। मंत्रों के अर्थ और व्याख्या नहीं लिख रहा हूँ, अन्यथा लेख बहुत अधिक लंबा हो जाता, जिसे कोई नहीं पढ़ता। अतः मंत्रों के अर्थ और भाष्यों का अनुसंधान आप स्वयं करें।

विषय :--- (१) भगवान के मोक्षदायी शाश्वत वचन।
(२) भगवान का ध्यान किस रूप में करना चाहिये।
(३) भगवान का नाम क्या है?
.
(१) सारे वचन भगवान के ही हैं। लेकिन इस समय निम्न लिखने की ही प्रेरणा मिल रही है। जो इसे समझ कर इसका अनुस्मरण करेगा वह कृतकृत्य हो जाएगा। ये भगवान के शाश्वत वचन है --
"कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥८:९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥८:१०॥"
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥"
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
.
(२) हम जीवन में क्या चाहते हैं? हमारे मनुष्य जीवन का उच्चतम लक्ष्य है -- "भगवत्-प्राप्ति"। अंत समय में वही याद रहता है जिसे करते करते पूरा जीवन व्यतीत होता है। अतः भगवान का ध्यान निरंतर हमारी स्मृति में रहना चाहिये।
आरंभ में ध्यान में मुझे भगवान श्रीकृष्ण के ज्योतिर्मय विग्रह के दर्शन बंद आँखों के अंधकार के पीछे भ्रूमध्य में होते थे, जिसमें वे शांभवी-मुद्रा में ध्यानस्थ रहते थे। अब उनके दर्शन ऊर्ध्वमूल कूटस्थ में पुरुषोत्तम के अवर्णनीय रूप में होते हैं।
पुरुषोत्तम का ध्यान करते करते ही यह जीवन व्यतीत हो जाये, यही एकमात्र लौकिक कामना है। भगवान ने स्वयं को पुरुषोत्तम बताया है, और मुझे तो उनका आदेश है कि मैं उनका ध्यान पुरुषोत्तम के रूप में ही करूँ। तंत्र के परमशिव भी वे ही हैं।
"यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१५:१८॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१५:१९॥"
.
(३) "ॐ तत् सत्" -- परमात्मा यानि ब्रह्म के तीन नाम हैं, जिनका प्रयोग सृष्टि के आरंभ में ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञों की रचना के लिए किया गया था। ये नाम जप, तप और दान जैसी क्रियाओं में आने वाली कमियों को पूरा करते हैं। वेदान्त में ब्रह्मज्ञानियों द्वारा भी यह माना गया है।
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥१७:२३॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥१७:२४॥"
"तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:॥१७:२५॥"
"सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥१७:२६॥"
"यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥१७:२७॥"
"अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥१७:२८॥"
.
उपरोक्त मंत्रों की विस्तृत व्याख्या करने में तो एक पूरी पुस्तक ही बन जाती, अतः अति संक्षिप्त रूप से लिखा है। उपरोक्त मंत्रों के अर्थों का स्वाध्याय और मनन आप स्वयं करें। आप सभी निजात्माओं को नमन। आपका जीवन कृतार्थ होगा, व आप कृतकृत्य होंगे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२६

भ्रूमध्य में गहन ध्यान -- त्रिवेणी संगम में स्नान है। हमारी चेतना जहां है, वहीं परमात्मा हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, और सारे संत-महात्मा वहीं हैं।

 भ्रूमध्य में गहन ध्यान -- त्रिवेणी संगम में स्नान है। हमारी चेतना जहां है, वहीं परमात्मा हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, और सारे संत-महात्मा वहीं हैं।

.
अपनी चेतना को भ्रूमध्य में और उससे ऊपर रखना त्रिवेणी संगम में स्नान करना है। आने-जाने वाली हर सांस के प्रति सजग रहें, और निज चेतना का निरंतर विस्तार करते रहें। गीता में बताई गयी ब्राह्मीस्थिति यानि कूटस्थ-चैतन्य में हम अनंत, सर्वव्यापक, असम्बद्ध, अलिप्त व शाश्वत हैं। हमारे हृदय की हर धड़कन, हर आती जाती साँस, -- परमात्मा की कृपा है। हमारा अस्तित्व ही परमात्मा है।
.
रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान कर के निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में सो जाएँ। दिन का प्रारम्भ परमात्मा के प्रेम रूप पर ध्यान से करें। पूरे दिन परमात्मा की स्मृति रखें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः स्मरण करते रहें। एक दिन पायेंगे कि भवसागर तो कभी का पीछे निकल गया, कुछ पता ही नहीं चला। गीता में भगवान कहते हैं --
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥९:३४॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
अर्थात् - "(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥९:३४॥"
"तुम मच्चित, मद्भक्त और मेरे पूजक (मद्याजी) बनो और मुझे नमस्कार करो; (इस प्रकार) तुम मुझे ही प्राप्त होगे; यह मैं तुम्हे सत्य वचन देता हूँ,(क्योंकि) तुम मेरे प्रिय हो॥१८:६५॥"
.
अभीप्सा, परमप्रेम और समर्पण -- यही वेदान्त है, यही ज्ञान है, यही भक्ति है, और यही सत्य-सनातन-धर्म है। बाकी सब इन्हीं का विस्तार है। सर्वत्र भगवान वासुदेव हैं। वे ही सर्वस्व हैं। कहीं कोई पृथकता नहीं है। अन्य कुछ है ही नहीं।
ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२६

क्या यह देश केवल आरक्षित वर्ग का ही है ?

 क्या यह देश केवल आरक्षित वर्ग का ही है? क्या अनारक्षित वर्ग को आत्म-सम्मान से जीने का अधिकार नहीं है? क्या भारत में कभी समान-नागरिक-संहिता लागू होगी?

.
वर्ग-संघर्ष अपने पीछे एक विनाशलीला छोड़ जाता है। विश्व में जहाँ भी वर्ग-संघर्ष हुआ है उसमें लाभ केवल शासकों को ही हुआ है। भारत में शासकों ने "अन्य पिछड़ा वर्ग" नाम से एक वर्ग को बलात् उत्पन्न कर उसे तथाकथित अगड़ा वर्ग के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। उनके अनुसार यह देश सनातन धर्म को गर्व से मानने वाले ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों का नहीं है, केवल तथाकथित दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों, और अल्पसंख्यकों का ही है।
.
इसी तरह उत्तर और दक्षिण भारतीयों, मराठी और गैर-मराठी भाषियों, बंगालियों और गैर-बंगालियों के मध्य भी वर्ग-संघर्ष उत्पन्न किया जा रहा है। यह देश सरकारों द्वारा आरक्षित घोषित किए गए लोगों का ही देश नहीं है, अनारक्षित लोगों का भी है, उनके भी कुछ राजनीतिक अधिकार हैं, जिनसे उन्हें वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है।
.
साम्यवाद व समाजवाद जैसी व्यवस्थाओं का जन्म वर्ग-संघर्ष से ही होता है। इन व्यवस्थाओं का अंत भी समय के साथ हो जाता है। भारत के संविधान में सेकुलर और समाजवादी शब्द जोड़े गए हैं, जिन का अब कोई औचित्य नहीं है। भारत में आरक्षण तो लगता है तब तक रहेगा जब तक यह लोकतन्त्र है। इस लोकतन्त्र की समाप्ति ही आरक्षण की समाप्ती होगी। वर्णाश्रम धर्म की स्थापना निश्चित रूप से एक दिन बापस होगी। तब तक यह कुव्यवस्था बनी रहेगी।
.
पुनश्च : --- भारत के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य मतदाताओं को अब अन्य राजनीतिक विकल्प देखना चाहिये। भाजपा के अलावा अन्य कोई राष्ट्रभक्त राजनीतिक दल हो तो उसे ही अपना मत (Vote) देना चाहिये। जो राष्ट्रभक्त लोग समान-नागरिक-संहिता की अपेक्षा कर रहे थे, उन्हें बड़ी निराशा हुई है।
१७ जनवरी २०२६

परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ व सर्वोच्च अनुभूति ऊर्ध्वमूल कूटस्थ सूर्यमण्डल में परमशिव पुरुषोत्तम के ध्यान में होती है ---

गहरे ध्यान में सहस्त्रारचक्र से ऊपर का भाग खुल जाता है, और हमारी चेतना इस भौतिक देह में न रहकर भगवान की ज्योतिर्मय विराट अनंतता के साथ एक हो जाती है। उस अनंतता में जितना भी ऊपर उठ सकते हो, उतना ऊपर उठ जाओ। जहां भी आपकी चेतना है, वहाँ से लाखों करोड़ किलोमीटर ऊपर उठ जाओ। और भी ऊपर उठो, उठते रहो, उठते रहो, उठते रहो जब तक चरम सीमा तक न पहुँच जाओ। जब अधिकतम की सीमा आ जायेगी, वहाँ आपको एक परम ज्योतिर्मय मण्डल में एक पंचकोणीय नक्षत्र के दर्शन होंगे। उस नक्षत्र का भी भेदन करना पड़ता है। उस ज्योतिर्मय सूर्यमण्डल में समर्पित होकर भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान कीजिये। हम उनके साथ एक हैं। उनसे पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। उनके साथ एकाकार होना ही ब्राह्मी-स्थिति है, यही कूटस्थ-चैतन्य है। पृथकता के बोध अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को भगवान पुरुषोत्तम में विलीन कर दें। ज्योतिषांज्योति हम स्वयं हैं। गीता में भगवान कहते हैं --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥ (श्रीमद्भगवद्गीता)
श्रुति भगवती कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (कठोपनिषद २-२-१५)
.
गीता के पुरुषोत्तम-योग का कभी कभी स्वाध्याय करें, और सूर्यमण्डल में नित्य पुरुषोत्तम का दीर्घ व गहनतम ध्यान करें। सबसे बड़ी शक्ति जो हमें भगवान की ओर ले जा सकती है, वह है -- "परमप्रेम" यानि "अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति।" तब सारा मार्गदर्शन स्वयं भगवान ही करते हैं। वह परमप्रेम सब में जागृत हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२६

शिवकृपा यानि हरिःकृपा कैसे प्राप्त हो ?

 शिवकृपा यानि हरिःकृपा कैसे प्राप्त हो ?

.
निरंतर सकारात्मक अभिपुष्टि यानि प्रतिज्ञान (Affirmation) के बिना किसी भी तरह की आध्यात्मिक और लौकिक प्रगति असंभव है। आध्यात्मिक मार्ग में कोई भी हमें यदि नकारात्मक प्रतिज्ञान दे (जो हमें परमात्मा से दूर ले जाये) तो उस व्यक्ति, संस्था, सिद्धान्त या गुरु को विष यानि जहर की तरह त्याग देना चाहिये। उस व्यक्ति का मुंह भी नहीं देखना चाहिए, आध्यात्म में जो हमें नकारात्मक अभिपुष्टि दे, संसार की दृष्टि में वह चाहे कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो।
कोई भी शिव से बड़ा नहीं है। मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि शिव हैं। गुरु रूप में वे ही दक्षिणामूर्ति हैं जो पूर्ण रूप से मौन निःशब्द रहते हुये समस्त ज्ञान हमें दे रहे हैं।
.
अब मैं अपने मूल विषय पर आता हूँ कि हमें शिवकृपा कैसे प्राप्त हो। मानसिक रूप से कम से कम दस दिनों तक निरंतर यह भाव रखें मैं हर पल परम शिवमय हो रहा हूँ। मैं स्वयं शिव हूँ, शिव शिव शिव शिव शिव शिवोहं शिवोहं शिवोहं, अहं ब्रह्मास्मि, शिव शिव शिव शिव शिव ॐ ॐ ॐ। कम से कम दस दिन भी यदि हम अपनी चेतना में मानसिक रूप से निरंतर शिवमय होकर रहें, तो ग्यारहवें दिन निश्चित रूप से हम पर परमशिव की कृपा होगी। यह बात अटल परम सत्य है, जिसे मैं डंके की चोट से कह रहा हूँ। यदि मेरी बात असत्य है तो मुझे भी विष की तरह त्याग दें।
.
अभिपुष्टि -- किसी भी चीज को सही या सत्य मान कर उसके समर्थन को अभिपुष्टि या प्रतिज्ञान कहते हैं। अङ्ग्रेज़ी भाषा में इसके लिए 'Affirmation' शब्द है। यह मानसिक रूप से एक सकारात्मक गंभीर घोषणा है कि कोई बात सत्य है। यह सब तरह के नकारात्मक विचारों को चुनौती है। सदा यह भाव रखें कि 'मैं सक्षम हूँ', मैं निरंतर 'शिवमय' हो रहा हूँ। यह एक दृढ़ और अटल भाव हो। यही 'शिव संकल्प' है। "तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।"
.
ॐ शिव शिव शिव शिव शिव॥ तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥ ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२६

हमारा समर्पण सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की अनंत असीम समग्रता के प्रति है, न कि उनकी किसी अभिव्यक्ति पर ---

हमारा समर्पण सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की अनंत असीम समग्रता के प्रति है, न कि उनकी किसी अभिव्यक्ति पर ---

.
जब तक हम स्वयं को यह शरीर मानते हैं, तब तक आध्यात्मिक साधना में कोई प्रगति नहीं कर सकते। हमारी प्रगति उसी क्षण से आरंभ होती है जिस क्षण यह लगे कि हम यह शरीर नहीं हैं, और साधक साध्य व साधना सिर्फ परमात्मा हैं। ईश्वर अपनी साधना स्वयं कर रहे हैं, हम तो एक निमित्त मात्र हैं। वे ही दृष्टा, दृश्य व दृष्टि हैं। यह भौतिक सूक्ष्म व कारण शरीर, अंतकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार), कर्मेन्द्रियाँ, ज्ञानेंद्रियाँ, व उनकी तन्मात्राएं -- ईश्वर की सिर्फ अभिव्यक्तियाँ हैं।
.
यह भौतिक शरीर -- लोकयात्रा के लिए मिला हुआ एक वाहन मात्र है जैसे कोई मोटर साइकिल। जैसे मोटर साइकिल की देखभाल करते हैं, वैसे ही इस शरीर की भी करनी पड़ती है। संसार हमें इस मोटर साइकिल के रूप में ही जानता है। हमारे आत्म-तत्व को कोई अन्य नहीं जान सकता। सदा यह भाव रखें कि स्वयं परमात्मा ही हमारे माध्यम से साँस ले रहे हैं, और वे ही सारे कार्य संपादित कर रहे हैं। हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं है। एकमात्र अस्तित्व परमात्मा का है।
.
वे ही यह मैं बन गए है, मेरे से अन्य कोई भी या कुछ भी नहीं है। इस सृष्टि का सम्पूर्ण अस्तित्व "मैं" हूँ। मेरे से अन्य कोई नहीं है। ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२४

परमात्मा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है हमारा लोभ और अहंकार ---

 आध्यात्मिक क्षेत्र में मैं बहुत अधिक देरी से आया, इसलिए स्वयं के व्यक्तित्व में बहुत अधिक गंभीर कमियाँ रह गयीं। वे सब कमियाँ मैं परमात्मा को ही बापस समर्पित कर रहा हूँ, क्योंकि उन्हें दूर करने का सामर्थ्य मुझ में नहीं है। आध्यात्म में पाने को कुछ भी नहीं है, केवल शरणागति द्वारा आत्म-समर्पण में ही सार है। आगे के सारे द्वार इस से खुल जाते हैं, कहीं कोई अंधकार नहीं रहता।

.
परमात्मा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है हमारा लोभ और अहंकार। लोभ और अहंकार से ही राग-द्वेष का जन्म होता है, जो अन्य सब बुराइयों को जन्म देते हैं। राग-द्वेष से मुक्त होकर ही हम वीतराग हो सकते हैं। एक वीतराग व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ होकर परमात्मा को उपलब्ध हो सकता है। मेरे लिए परमात्मा का आकर्षण ही उनकी कृपा है। वे हमारी चेतना में निरंतर बने रहें। उनका शाश्वत आश्वासन है --
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
.
इस समय अभीप्सा इतनी प्रबल है कि अपना अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) परमात्मा को समर्पित कर दिया है। जो करना है वह भगवान स्वयं करेंगे, मैं नहीं।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जनवरी २०२६

आजकल कहा जा रहा है कि जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता --

आजकल कहा जा रहा है कि जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता। संस्कार व कर्म से ही ब्राह्मण होता है। चलो यह मान लेते हैं।

फिर यह भी मानना पड़ेगा कि जन्म से कोई अनुसूचित जाति / जनजाति / अन्य पिछड़ा वर्ग / व अल्प संख्यक भी नहीं होता, सब कर्म से ही होते हैं।
.
यह परिभाषित हो कि आरक्षित वर्ग का मापदंड क्या व क्यों है ? क्या यह देश केवल आरक्षित वर्ग का ही है? क्या अनारक्षित वर्ग को आत्म-सम्मान से जीने का अधिकार नहीं है? क्या भारत में कभी समान-नागरिक-संहिता लागू होगी?
.
भारत में शासकों ने "अन्य पिछड़ा वर्ग" नाम से एक वर्ग को बलात् उत्पन्न कर उसे तथाकथित अगड़ा वर्ग के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। उनके अनुसार यह देश सनातन धर्म को गर्व से मानने वाले ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों का नहीं है, केवल तथाकथित दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों, और अल्पसंख्यकों का ही है।
.
वर्ग-संघर्ष अपने पीछे एक विनाशलीला छोड़ जाता है। विश्व में जहाँ भी वर्ग-संघर्ष हुआ है उसमें लाभ केवल शासकों को ही हुआ है। अनारक्षित लोगों को हीन न माना जाये। साम्यवाद व समाजवाद जैसी व्यवस्थाओं का जन्म वर्ग-संघर्ष से ही होता है। इन व्यवस्थाओं का अंत भी समय के साथ हो जाता है। सेकुलर और समाजवादी शब्दों का अब कोई औचित्य नहीं है।
वर्णाश्रम धर्म की स्थापना निश्चित रूप से एक दिन बापस होगी। तब तक यह कुव्यवस्था बनी रहेगी। जो राष्ट्रभक्त लोग समान-नागरिक-संहिता की अपेक्षा कर रहे थे, उन्हें बड़ी निराशा हुई है। मैं किसी भी तरह के आरक्षण का विरोध करता हूँ। समान नागरिक संहिता लागू हो।
१९ जनवरी २०२६