उन सब महान आत्माओं का स्वागत है जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है। निज जीवन में धर्म की रक्षा होगी तो राष्ट्र में भी होगी। असत्य और अंधकार की शक्तियों का निरंतर प्रतिकार करें। जितना हो सके उतना अधिक से अधिक समय परमब्रह्म परमात्मा के चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान में व्यतीत करें। यह सबसे बड़ी सेवा है जो हम अपने राष्ट्र और समष्टि के लिए कर सकते हैं।
Friday, 23 January 2026
उन सब महान आत्माओं का स्वागत है जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है --
अब से यह अवशिष्ट जीवन पूरी तरह परमात्मा को समर्पित है ---
अब से यह अवशिष्ट जीवन पूरी तरह परमात्मा को समर्पित है। किसी भी तरह का कोई कण मात्र भी संशय नहीं है। अपने भूत और भविष्य को तो तो मैं बदल नहीं सकता अतः उनका चिंतन ही छोड़ दिया है। वर्तमान में निरंतर कूटस्थ-चैतन्य में परमात्मा की चेतना में रहूँ, यही मेरा प्रयास है, और यही सदा रहेगा।
अमेरिका का यह राक्षसी कृत्य अक्षम्य अपराध है --
अमेरिका का यह राक्षसी कृत्य अक्षम्य अपराध है ---
हम किसका ध्यान करें ?
(Re-Posted after 10 years) हम किसका ध्यान करें ? -- (Very Important)
गुरु महाराज का जन्म दिवस ---
ग्रेगोरियन कलेंडर के अनुसार आज ५ जनवरी का दिन मेरे लिए एक विशेष दिन है जो अवशिष्ट निज जीवन में परमात्मा के प्रति गहनतम शर्तरहित अप्रतिबंधित पूर्णप्रेम व समर्पण की दिशा को और भी अधिक दृढ़ता से पुनः स्थापित करेगा।
मुझ अकिंचन को अपना आशीर्वाद देते रहिये। मैं आप सब का सेवक मात्र हूँ ---
साधना के मार्ग पर हमारा प्रथम लक्ष्य है -- सच्चिदानंद ब्रह्म परमात्मा से परमप्रेम और उन्हें पूर्ण समर्पण। उस अवस्था में हम शनैः शनैः राग-द्वेष और अहंकार से मुक्त होकर वीतराग होने लगते हैं। वीतराग व्यक्ति ही जीवनमुक्त है। उस पर कोई बंधन नहीं है। वीतराग व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ हो सकता है, जिसकी प्रज्ञा निरंतर परमात्मा में स्थित है। समर्पित होकर परमात्मा का अधिकाधिक ध्यान करें और उन्हें निरंतर अपनी स्मृति में रखें। इसके अतिरिक्त भी यदि अन्य कोई मार्ग है तो मुझे उसका पता नहीं है।
निकट भविष्य में भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव होगा, व सत्य-सनातन-धर्म की सम्पूर्ण विश्व में पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा।
मुझे एक आतंरिक आश्वासन प्राप्त है कि निकट भविष्य में भारत से असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव होगा, व सत्य-सनातन-धर्म की सम्पूर्ण विश्व में पुनः प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा।
सभी प्रसन्न हों और निरंतर सदा परमात्मा की चेतना ब्राह्मीस्थिति में रहें ---
सभी प्रसन्न हों और निरंतर सदा परमात्मा की चेतना ब्राह्मीस्थिति में रहें। परमात्मा से पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। यह शरीर रहे या न रहे, इसका महत्व नहीं है। महत्व एक ही बात का है कि हमारे अस्तित्व के केंद्र बिन्दु केवल कूटस्थ ब्रह्म हों। गीता में भगवान कहते हैं --
- (१) भगवान के मोक्षदायी शाश्वत वचन। (२) भगवान का ध्यान किस रूप में करना चाहिये। (३) भगवान का नाम क्या है?
मुझे आदेश प्राप्त हुआ है कि मैं निम्न तीन विषयों पर सत्संग करूँ। आप इसे निज बुद्धि और विवेक के प्रकाश में समझ्न सकते हैं। मंत्रों के अर्थ और व्याख्या नहीं लिख रहा हूँ, अन्यथा लेख बहुत अधिक लंबा हो जाता, जिसे कोई नहीं पढ़ता। अतः मंत्रों के अर्थ और भाष्यों का अनुसंधान आप स्वयं करें।
भ्रूमध्य में गहन ध्यान -- त्रिवेणी संगम में स्नान है। हमारी चेतना जहां है, वहीं परमात्मा हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, और सारे संत-महात्मा वहीं हैं।
भ्रूमध्य में गहन ध्यान -- त्रिवेणी संगम में स्नान है। हमारी चेतना जहां है, वहीं परमात्मा हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, और सारे संत-महात्मा वहीं हैं।
क्या यह देश केवल आरक्षित वर्ग का ही है ?
क्या यह देश केवल आरक्षित वर्ग का ही है? क्या अनारक्षित वर्ग को आत्म-सम्मान से जीने का अधिकार नहीं है? क्या भारत में कभी समान-नागरिक-संहिता लागू होगी?
परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ व सर्वोच्च अनुभूति ऊर्ध्वमूल कूटस्थ सूर्यमण्डल में परमशिव पुरुषोत्तम के ध्यान में होती है ---
शिवकृपा यानि हरिःकृपा कैसे प्राप्त हो ?
शिवकृपा यानि हरिःकृपा कैसे प्राप्त हो ?
हमारा समर्पण सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की अनंत असीम समग्रता के प्रति है, न कि उनकी किसी अभिव्यक्ति पर ---
हमारा समर्पण सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की अनंत असीम समग्रता के प्रति है, न कि उनकी किसी अभिव्यक्ति पर ---
परमात्मा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है हमारा लोभ और अहंकार ---
आध्यात्मिक क्षेत्र में मैं बहुत अधिक देरी से आया, इसलिए स्वयं के व्यक्तित्व में बहुत अधिक गंभीर कमियाँ रह गयीं। वे सब कमियाँ मैं परमात्मा को ही बापस समर्पित कर रहा हूँ, क्योंकि उन्हें दूर करने का सामर्थ्य मुझ में नहीं है। आध्यात्म में पाने को कुछ भी नहीं है, केवल शरणागति द्वारा आत्म-समर्पण में ही सार है। आगे के सारे द्वार इस से खुल जाते हैं, कहीं कोई अंधकार नहीं रहता।
आजकल कहा जा रहा है कि जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता --
आजकल कहा जा रहा है कि जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता। संस्कार व कर्म से ही ब्राह्मण होता है। चलो यह मान लेते हैं।