"अनन्य-योग" --
इस अति मत्वपूर्ण विषय पर कुछ लिखने की जिज्ञासा हुई, अतः यह प्रस्तुति है।
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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने तीन बार अनन्य-योग पर प्रकाश डाला है। वे कहते हैं -
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् --
"हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥८:१४॥"
"अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥९:२२॥"
"अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥१३:११॥"
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नारायण ! परम पुरुष परमात्मा से मैं पृथक नहीं हूँ, इस प्रकार परमात्मा से अपने को एक जान कर जो परमप्रेम व्यक्त किया जाता है वही अनन्य योग है। परमात्मा को जब तक हम स्वयं से भिन्न समझते हैं, तब तक कामनाओं का जन्म होता ही रहता है। लेकिन जब हम परमात्मा को अपने स्वरूप में जानते हैं, तब परमात्मा से जो प्रेम होता है, वह अनन्य परमप्रेम है। परमात्मा अन्य नहीं है, परमात्मा को अपना स्वरूप जान कर जब भक्ति अर्थात् परमप्रेम किया जाता है तब वह अनन्य योग है। अनन्य योग के अभाव को यानि भगवान से अन्य किसी भी चीज की कामना को भगवान ने व्यभिचार की संज्ञा दी है।
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इस लेख का यदि विस्तार किया जाये तो इसका कोई अंत नहीं है। कम से कम शब्दों में परम सत्य को यहाँ व्यक्त किया गया है। यह अभ्यास, अनुभव और भगवान की परमकृपा का विषय है, बुद्धि का नहीं।
ॐ ऐं श्रीगुरवे नमः॥ ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जनवरी २०२६
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