Friday, 23 January 2026

अब से यह अवशिष्ट जीवन पूरी तरह परमात्मा को समर्पित है ---

 अब से यह अवशिष्ट जीवन पूरी तरह परमात्मा को समर्पित है। किसी भी तरह का कोई कण मात्र भी संशय नहीं है। अपने भूत और भविष्य को तो तो मैं बदल नहीं सकता अतः उनका चिंतन ही छोड़ दिया है। वर्तमान में निरंतर कूटस्थ-चैतन्य में परमात्मा की चेतना में रहूँ, यही मेरा प्रयास है, और यही सदा रहेगा।

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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान द्वारा दिये गये अनेक शाश्वत वचनों में से ये दो हैं जो हर समय मेरी चेतना में रहते हैं --
(१) "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् -- मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
(२) "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
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सभी सिद्धांतों, नियमों व हर तरह के साधन विधानों से ऊपर उठकर हमें शरणागति द्वारा स्वयं का समर्पण परमात्मा को कर देना चाहिए। आप सब में परमब्रह्म को नमन करता हूँ। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२६

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