Friday, 23 January 2026

शिवकृपा यानि हरिःकृपा कैसे प्राप्त हो ?

 शिवकृपा यानि हरिःकृपा कैसे प्राप्त हो ?

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निरंतर सकारात्मक अभिपुष्टि यानि प्रतिज्ञान (Affirmation) के बिना किसी भी तरह की आध्यात्मिक और लौकिक प्रगति असंभव है। आध्यात्मिक मार्ग में कोई भी हमें यदि नकारात्मक प्रतिज्ञान दे (जो हमें परमात्मा से दूर ले जाये) तो उस व्यक्ति, संस्था, सिद्धान्त या गुरु को विष यानि जहर की तरह त्याग देना चाहिये। उस व्यक्ति का मुंह भी नहीं देखना चाहिए, आध्यात्म में जो हमें नकारात्मक अभिपुष्टि दे, संसार की दृष्टि में वह चाहे कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो।
कोई भी शिव से बड़ा नहीं है। मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि शिव हैं। गुरु रूप में वे ही दक्षिणामूर्ति हैं जो पूर्ण रूप से मौन निःशब्द रहते हुये समस्त ज्ञान हमें दे रहे हैं।
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अब मैं अपने मूल विषय पर आता हूँ कि हमें शिवकृपा कैसे प्राप्त हो। मानसिक रूप से कम से कम दस दिनों तक निरंतर यह भाव रखें मैं हर पल परम शिवमय हो रहा हूँ। मैं स्वयं शिव हूँ, शिव शिव शिव शिव शिव शिवोहं शिवोहं शिवोहं, अहं ब्रह्मास्मि, शिव शिव शिव शिव शिव ॐ ॐ ॐ। कम से कम दस दिन भी यदि हम अपनी चेतना में मानसिक रूप से निरंतर शिवमय होकर रहें, तो ग्यारहवें दिन निश्चित रूप से हम पर परमशिव की कृपा होगी। यह बात अटल परम सत्य है, जिसे मैं डंके की चोट से कह रहा हूँ। यदि मेरी बात असत्य है तो मुझे भी विष की तरह त्याग दें।
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अभिपुष्टि -- किसी भी चीज को सही या सत्य मान कर उसके समर्थन को अभिपुष्टि या प्रतिज्ञान कहते हैं। अङ्ग्रेज़ी भाषा में इसके लिए 'Affirmation' शब्द है। यह मानसिक रूप से एक सकारात्मक गंभीर घोषणा है कि कोई बात सत्य है। यह सब तरह के नकारात्मक विचारों को चुनौती है। सदा यह भाव रखें कि 'मैं सक्षम हूँ', मैं निरंतर 'शिवमय' हो रहा हूँ। यह एक दृढ़ और अटल भाव हो। यही 'शिव संकल्प' है। "तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।"
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ॐ शिव शिव शिव शिव शिव॥ तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥ ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२६

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