आध्यात्मिक क्षेत्र में मैं बहुत अधिक देरी से आया, इसलिए स्वयं के व्यक्तित्व में बहुत अधिक गंभीर कमियाँ रह गयीं। वे सब कमियाँ मैं परमात्मा को ही बापस समर्पित कर रहा हूँ, क्योंकि उन्हें दूर करने का सामर्थ्य मुझ में नहीं है। आध्यात्म में पाने को कुछ भी नहीं है, केवल शरणागति द्वारा आत्म-समर्पण में ही सार है। आगे के सारे द्वार इस से खुल जाते हैं, कहीं कोई अंधकार नहीं रहता।
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परमात्मा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है हमारा लोभ और अहंकार। लोभ और अहंकार से ही राग-द्वेष का जन्म होता है, जो अन्य सब बुराइयों को जन्म देते हैं। राग-द्वेष से मुक्त होकर ही हम वीतराग हो सकते हैं। एक वीतराग व्यक्ति ही स्थितप्रज्ञ होकर परमात्मा को उपलब्ध हो सकता है। मेरे लिए परमात्मा का आकर्षण ही उनकी कृपा है। वे हमारी चेतना में निरंतर बने रहें। उनका शाश्वत आश्वासन है --
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
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इस समय अभीप्सा इतनी प्रबल है कि अपना अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) परमात्मा को समर्पित कर दिया है। जो करना है वह भगवान स्वयं करेंगे, मैं नहीं।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जनवरी २०२६
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