गहरे ध्यान में सहस्त्रारचक्र से ऊपर का भाग खुल जाता है, और हमारी चेतना इस भौतिक देह में न रहकर भगवान की ज्योतिर्मय विराट अनंतता के साथ एक हो जाती है। उस अनंतता में जितना भी ऊपर उठ सकते हो, उतना ऊपर उठ जाओ। जहां भी आपकी चेतना है, वहाँ से लाखों करोड़ किलोमीटर ऊपर उठ जाओ। और भी ऊपर उठो, उठते रहो, उठते रहो, उठते रहो जब तक चरम सीमा तक न पहुँच जाओ। जब अधिकतम की सीमा आ जायेगी, वहाँ आपको एक परम ज्योतिर्मय मण्डल में एक पंचकोणीय नक्षत्र के दर्शन होंगे। उस नक्षत्र का भी भेदन करना पड़ता है। उस ज्योतिर्मय सूर्यमण्डल में समर्पित होकर भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान कीजिये। हम उनके साथ एक हैं। उनसे पृथक हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। उनके साथ एकाकार होना ही ब्राह्मी-स्थिति है, यही कूटस्थ-चैतन्य है। पृथकता के बोध अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को भगवान पुरुषोत्तम में विलीन कर दें। ज्योतिषांज्योति हम स्वयं हैं। गीता में भगवान कहते हैं --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥ (श्रीमद्भगवद्गीता)
श्रुति भगवती कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ (कठोपनिषद २-२-१५)
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गीता के पुरुषोत्तम-योग का कभी कभी स्वाध्याय करें, और सूर्यमण्डल में नित्य पुरुषोत्तम का दीर्घ व गहनतम ध्यान करें। सबसे बड़ी शक्ति जो हमें भगवान की ओर ले जा सकती है, वह है -- "परमप्रेम" यानि "अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति।" तब सारा मार्गदर्शन स्वयं भगवान ही करते हैं। वह परमप्रेम सब में जागृत हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२६
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