आज बसंतपंचमी और सरस्वती-पूजा है। मंगलमय शुभ कामनाएँ .....
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आज से बसंत ऋतू का प्रारम्भ हो गया है। पचास-साठ वर्ष पूर्व तक प्रत्येक हिन्दू मंदिर में आज के दिन खूब भजन कीर्तन होते थे, और ठाकुर जी को भोग लगाकर खूब गुलाल उड़ाई जाती थी। सभी हिन्दू आश्रमों और गुरुकुलों में अब भी आज के दिन समारोह मनाये जाते हैं। गुरुकुलों में गुरु जी के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है। प्राचीन भारत में आज से विद्याध्ययन आरम्भ होता था, और माँ सरस्वती की आराधना होती थी।
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आज अधिक से अधिक मौन रखिये और भगवान का खूब ध्यान कीजिये। माँ सरस्वती के वाग्भव बीज मन्त्र "ॐ ऐं" का खूब मानसिक जप करें। वाग्भव बीज मन्त्र से माँ सरस्वती को नमन होता है, गुरु महाराज को भी नमन होता है, और अपने अपने पिताजी को भी नमन होता है। मेरी माताजी शरीर में नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृति को मैं भगवती भुवनेश्वरी के बीज मंत्र "ॐ ह्रीं" से नित्य नमन करता हूँ। इससे मुझे उनका आशीर्वाद उसी क्षण प्राप्त होता है। ऐसे ही मेरे पिताजी शरीर में नहीं हैं, लेकिन उनकी स्मृति को मैं नित्य "ॐ ऐं" मंत्र से नमन करता हूँ। इसी मंत्र से नित्य मानसिक रूप से गुरु-चरणों में भी नमन करता हूँ। इससे मुझे उन सब के आशीर्वाद की बहुत अधिक प्राप्ति उसी क्षण होती है।
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"या कुंदेंदु तुषारहार धवला, या शुभ्र वस्त्रावृता |
या वीणावर दण्डमंडितकरा, या श्वेतपद्मासना ||
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभ्रृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता |
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ||
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमां आद्यां जगद्व्यापिनीं |
वीणा पुस्तक धारिणीं अभयदां जाड्यान्धकारापहां ||
हस्ते स्फटिक मालीकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां |
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धि प्रदां शारदां" ||
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०२६
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पुनश्च: --- आज के दिन से वीर बालक हकीकत राय की पुण्य स्मृति जुडी हुई है। विभाजन से पूर्व -- लाहौर और अन्य अनेक नगरों में वीर बालक हक़ीक़त राय की स्मृति में मेला भरता था और पतंगें उड़ाई जाती थीं। हकीकत राय का बलिदान हिन्दू धर्म के प्रति निष्ठा और धर्मरक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक बन गया है।
हकीकत राय (लगभग 1719-1734) पंजाब के सियालकोट के एक साहसी हिन्दू बालक थे, जिन्होंने अपने धर्म के अपमान का विरोध करने पर मृत्युदंड स्वीकार किया और बलात् इस्लाम कबूल करने से इनकार कर दिया, जिससे वे हिन्दू धर्म के लिए बलिदान देने वाले एक अमर बलिदानी के रूप में जाने जाते हैं। उनका बलिदान बसंत पंचमी के दिन हुआ था, और उनकी स्मृति में कई स्थानों पर मेले लगते हैं, जैसे बटाला में उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी की समाधि पर।
सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में जन्मे, हकीकत राय बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और संस्कृत व इतिहास का अध्ययन किया था। एक बार मदरसे में उनके मुस्लिम सहपाठियों ने उनके धर्म और देवी-देवताओं का अपमान किया, जिसका उन्होंने प्रतिकार किया, जिससे विवाद बढ़ा। मुल्लाओं ने उन्हें इस्लाम अपनाने का आदेश दिया, लेकिन वे अपने धर्म पर अडिग रहे. माता-पिता के समझाने पर भी वे नहीं माने और अंततः बसंत पंचमी के दिन उनका सिर कलम कर दिया गया।
तत्कालीन परंपरानुसार उनका विवाह बचपन में ही हो गया था। उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी ने भी पति के बलिदान के बाद सती होकर अपने प्राण त्याग दिए। उनकी समाधि पर भी मेला लगता है।
वीर बालक हक़ीक़त राय की समाधि विभाजन के बाद लाहौर में रह गयी, लेकिन भारत के कई स्थानों, जैसे दिल्ली के 'हकीकत नगर' और बटाला में उनकी याद में मेले आयोजित होते हैं। उनका बलिदान हिन्दू धर्म के प्रति निष्ठा और धर्मरक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक बन गया है।
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