Friday, 23 January 2026

- (१) भगवान के मोक्षदायी शाश्वत वचन। (२) भगवान का ध्यान किस रूप में करना चाहिये। (३) भगवान का नाम क्या है?

 मुझे आदेश प्राप्त हुआ है कि मैं निम्न तीन विषयों पर सत्संग करूँ। आप इसे निज बुद्धि और विवेक के प्रकाश में समझ्न सकते हैं। मंत्रों के अर्थ और व्याख्या नहीं लिख रहा हूँ, अन्यथा लेख बहुत अधिक लंबा हो जाता, जिसे कोई नहीं पढ़ता। अतः मंत्रों के अर्थ और भाष्यों का अनुसंधान आप स्वयं करें।

विषय :--- (१) भगवान के मोक्षदायी शाश्वत वचन।
(२) भगवान का ध्यान किस रूप में करना चाहिये।
(३) भगवान का नाम क्या है?
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(१) सारे वचन भगवान के ही हैं। लेकिन इस समय निम्न लिखने की ही प्रेरणा मिल रही है। जो इसे समझ कर इसका अनुस्मरण करेगा वह कृतकृत्य हो जाएगा। ये भगवान के शाश्वत वचन है --
"कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥८:९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥८:१०॥"
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥"
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
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(२) हम जीवन में क्या चाहते हैं? हमारे मनुष्य जीवन का उच्चतम लक्ष्य है -- "भगवत्-प्राप्ति"। अंत समय में वही याद रहता है जिसे करते करते पूरा जीवन व्यतीत होता है। अतः भगवान का ध्यान निरंतर हमारी स्मृति में रहना चाहिये।
आरंभ में ध्यान में मुझे भगवान श्रीकृष्ण के ज्योतिर्मय विग्रह के दर्शन बंद आँखों के अंधकार के पीछे भ्रूमध्य में होते थे, जिसमें वे शांभवी-मुद्रा में ध्यानस्थ रहते थे। अब उनके दर्शन ऊर्ध्वमूल कूटस्थ में पुरुषोत्तम के अवर्णनीय रूप में होते हैं।
पुरुषोत्तम का ध्यान करते करते ही यह जीवन व्यतीत हो जाये, यही एकमात्र लौकिक कामना है। भगवान ने स्वयं को पुरुषोत्तम बताया है, और मुझे तो उनका आदेश है कि मैं उनका ध्यान पुरुषोत्तम के रूप में ही करूँ। तंत्र के परमशिव भी वे ही हैं।
"यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१५:१८॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१५:१९॥"
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(३) "ॐ तत् सत्" -- परमात्मा यानि ब्रह्म के तीन नाम हैं, जिनका प्रयोग सृष्टि के आरंभ में ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञों की रचना के लिए किया गया था। ये नाम जप, तप और दान जैसी क्रियाओं में आने वाली कमियों को पूरा करते हैं। वेदान्त में ब्रह्मज्ञानियों द्वारा भी यह माना गया है।
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥१७:२३॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥१७:२४॥"
"तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:॥१७:२५॥"
"सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥१७:२६॥"
"यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥१७:२७॥"
"अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥१७:२८॥"
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उपरोक्त मंत्रों की विस्तृत व्याख्या करने में तो एक पूरी पुस्तक ही बन जाती, अतः अति संक्षिप्त रूप से लिखा है। उपरोक्त मंत्रों के अर्थों का स्वाध्याय और मनन आप स्वयं करें। आप सभी निजात्माओं को नमन। आपका जीवन कृतार्थ होगा, व आप कृतकृत्य होंगे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जनवरी २०२६

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