वर्तमान विकट समय में जब भारत की अस्मिता (सत्य_सनातन_हिन्दू_धर्म) पर मर्मांतक प्रहार हो रहे हैं, हमें उन्हीं देवी/देवताओं की ही उपासना करनी होगी जिन्होंने शत्रुओं के विनाश के लिए अस्त्र-शस्त्र धारण कर रखे हैं|
Monday, 29 June 2026
हमें उन्हीं देवी/देवताओं की ही उपासना करनी होगी जिन्होंने शत्रुओं के विनाश के लिए अस्त्र-शस्त्र धारण कर रखे हैं ---
भगवान क्या खाते हैं ?? इसका उत्तर भगवान स्वयं देते हैं ----
जहाँ स्वयं का बल नहीं चलता, वहाँ परमात्मा की शरण लेनी ही पड़ती है ---
जहाँ स्वयं का बल नहीं चलता, वहाँ परमात्मा की शरण लेनी ही पड़ती है ---
स्वयं भगवान विष्णु ही यह विश्व बन गये हैं ---
स्वयं भगवान विष्णु ही यह विश्व बन गये हैं। विष्णु-सहस्त्रनाम का आरंभ ही इसे सिद्ध करता है। "ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः। भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥ पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः। अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च॥"
भगवान का कोई भरोसा नहीं है, उनकी पकड़ बड़ी मजबूत है ---
भगवान का कोई भरोसा नहीं है। उनकी पकड़ बड़ी मजबूत है। कभी भी किसी भी समय अचानक हमें पकड़ लेते हैं। उनकी पकड़ से बचना असंभव है। अच्छा है वे स्वयं ही पकड़ते हैं, कोई अन्य नहीं। बुरा तो तब लगता है जब वे छोड़ कर चले जाते हैं, और मिलते नहीं हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनका भी मन हमारे बिना लगता नहीं है। थोड़ी देर बाद फिर बापस आ जाते हैं। अब से प्रयास यही करेंगे कि वे कहीं जाये नहीं।
Saturday, 27 June 2026
आज श्रीहनुमान-जयंती है इसे श्रीहनुमान-जन्मोत्सव या श्रीहनुमान प्राकट्योत्सव भी कहते हैं।
आज श्रीहनुमान-जयंती है इसे श्रीहनुमान-जन्मोत्सव या श्रीहनुमान प्राकट्योत्सव भी कहते हैं। सभी श्रद्धालुओं को नमन। हनुमान जी का प्राकट्य हमारे निज जीवन में हो, तभी इस उत्सव की सार्थकता है। श्रीहनुमान जी हमारी चेतना में हैं, कहीं बाहर नहीं। यह उत्सव प्रतिवर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस वर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा १ अप्रैल २०२६ को प्रातः ७ बजकर ६ मिनट से २ अप्रैल को प्रातः ७ बजकर ४१ मिनट तक थी। उदया तिथि के चलते हनुमान जयंती का उत्सव २ अप्रैल २०२६ को मनाया जा रहा है।
अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति एक व्यापार है ----
जिसके हृदय में परमात्मा को उपलब्ध होने की भूख-प्यास और तड़प है, व अपनी सारी वेदनाओं के पश्चात भी जिसे परमात्मा से परमप्रेम है, वही वास्तविक भक्त है; अन्य सब लाभार्थी व्यापारी हैं, जिनके लिए अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति एक व्यापार है।
सांसारिक मान-सम्मान और प्रसिद्धि की कामना, व वासनात्मक विचारों का कण मात्र भी अवशेष --- हमारी जड़ता और आध्यात्मिक अवनति की निशानी है।
सांसारिक मान-सम्मान और प्रसिद्धि की कामना, व वासनात्मक विचारों का कण मात्र भी अवशेष --- हमारी जड़ता और आध्यात्मिक अवनति की निशानी है।
सब तरह के कर्मफलों, पाप-पुण्य, व सांसारिकता से मुक्ति का एकमात्र उपाय -- "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" --
सब तरह के कर्मफलों, पाप-पुण्य, व सांसारिकता से मुक्ति का एकमात्र उपाय -- "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" --
एक बहुत पुरानी स्मृति ---
एक बहुत पुरानी स्मृति है। सन २००१ की बात है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कच्छल द्वीप पर एक असामान्य रूप से अति विशाल और बहुत ही ऊँचे वृक्ष को देखा, जिस पर एक लता भी चढ़ी हुई थी| वृक्ष की जितनी ऊँचाई थी, लिपटते-लिपटते वहीं तक वह लता भी पहुँच गई थी| जीवन में पहली बार ऐसे उस दृश्य को देखकर परमात्मा और जीवात्मा की याद आ गई, और एक भाव-समाधि लग गई| वह बड़ा ही शानदार दृश्य था जहाँ मुझे परमात्मा की अनुभूति हुई| प्रभु को समर्पित होने से बड़ी कोई उपलब्धी नहीं है| जीवात्मा जब परमात्मा से लिपटी रहती है, तब वह भी परमात्मा से एकाकार होकर उसी ऊँचाई तक पहुँच जाती है| परमात्मा को हम कितना भी भुलायें, पर वे हमें कभी भी नहीं भूलते| सदा याद करते ही रहते हैं| उन्हें भूलने का प्रयास भी करते हैं तो वे और भी अधिक याद आते हैं| वास्तव में वे स्वयं ही हमें याद करते हैं| कभी याद न आए तो मान लेना कि -- "हम में ही न थी कोई बात, याद न तुम को आ सके।" ७ अप्रेल २०२६
हिन्दू शब्द का अर्थ है -- जो हिंसा से दूर है (यहाँ हिंसा का अर्थ लोभ व अहंकार से है जो हिंसा के एकमात्र कारण हैं)।
जिनकी आस्था -- ईश्वर के अवतारों, आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल, पुनर्जन्म व अहिंसा में है, मैं उन्हे ही हिन्दू कहता हूँ। हिन्दू शब्द का अर्थ है -- जो हिंसा से दूर है (यहाँ हिंसा का अर्थ लोभ व अहंकार से है जो हिंसा के एकमात्र कारण हैं)।
ध्यान, समर्पण, कूटस्थ, महात्मा, वीतराग और स्थितप्रज्ञ ---
ध्यान, समर्पण, कूटस्थ, महात्मा, वीतराग और स्थितप्रज्ञ ---
महात्मा कौन है? ---
महात्मा कौन है?
इस पृथ्वी पर एक ही राष्ट्र है जिसका नाम "भारत" है, अन्य सब कलिकाल की भ्रांतियाँ हैं।
इस पृथ्वी पर एक ही राष्ट्र है जिसका नाम "भारत" है, अन्य सब कलिकाल की भ्रांतियाँ हैं। राष्ट्र उसे कहते हैं जो चारों पुरुषार्थों द्वारा प्रजा का रञ्जन करे।
ईश्वर की आज्ञा सर्वोपरी ---
ईश्वर की आज्ञा सर्वोपरी ---
भगवान की भक्ति — एक बड़ा जोखिम भरा धंधा है।
भगवान की भक्ति — एक बड़ा जोखिम भरा धंधा है। इस में कुछ मिलता नहीं है, बल्कि जो कुछ भी पास में है, वह भी छीन लिया जाता है। लेकिन बड़ा आनंद और बड़ा प्रबल आकर्षण इसमें है। भगवान ने अपनी कुछ बड़ी भयंकर शर्तें रख दी हैं, जिनकी पालना बड़ी कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है। लेकिन हम भी उन्हें पा कर ही रहेंगे।
भारत की आध्यात्मिकता में भारत की सब समस्याओं का समाधान है ---
मुझे वर्ग-भेद और वर्ग-संघर्ष से भय लगता है, क्योंकि वर्ग-संघर्ष से मार्क्सवाद का जन्म होता है। मुझे मार्क्सवाद से भय इसलिये लगता है क्योंकि मार्क्सवाद की नारकीयता को मैं बहुत गहराई से समझता हूँ। मार्क्सवाद का सबसे बड़ा शत्रु है भारत का वेदान्त-दर्शन। भारत के वेदान्त और योग-दर्शन के समक्ष मार्क्सवाद कहीं भी नहीं टिकता। इसीलिए मार्क्स, धर्म को अफीम का नशा कहता है।
हम भगवान विष्णु की अनंत विराटता की चेतना में रहें ---
जो व्यक्ति भगवान विष्णु के अनंत विराट स्वरूप का नित्य नियमित ध्यान करता है वह इस पृथ्वी पर चलता-फिरता देवता है। सूक्ष्म जगत के देवता भी उसे नमन करते हुए आनंदित होते हैं। वह कुल और वे माता-पिता भी धन्य हैं जहां ऐसे महात्मा का जन्म होता है। उसकी सात पीढ़ियों का तुरंत उद्धार हो जाता है।
अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ --- .
अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती की हार्दिक शुभ कामनाएँ ---
मैं तटस्थ नहीं रह सकता। नदी के तीर पर खड़ा हूँ, नदी में छलांग लगाये बिना नहीं रह सकता। जो होगा सो देखा जायेगा। यदि प्रारब्ध में जीवन लिखा है तो जीवित रहूँगा, अन्यथा होनी को कोई रोक नहीं सकता।
मैं तटस्थ नहीं रह सकता। नदी के तीर पर खड़ा हूँ, नदी में छलांग लगाये बिना नहीं रह सकता। जो होगा सो देखा जायेगा। यदि प्रारब्ध में जीवन लिखा है तो जीवित रहूँगा, अन्यथा होनी को कोई रोक नहीं सकता।
आने वाले समय में धर्म की, और वर्तमान लोकतन्त्र के स्थान पर धर्मरक्षक क्षत्रिय राजाओं के राज्य की पुनः स्थापना होगी।
मुझे बार बार यह अनुभूति होती है कि आने वाले समय में धर्म की, और वर्तमान लोकतन्त्र के स्थान पर धर्मरक्षक क्षत्रिय राजाओं के राज्य की पुनः स्थापना होगी। युग-परिवर्तन और धर्म की पुनः स्थापना का समय लगभग आ गया है। धर्म एक ही है जिसे वैशेषिक-सूत्रों में कणाद ऋषि ने परिभाषित किया है और मनुस्मृति में जिसके दस लक्षण बताए गए हैं। महाभारत ग्रंथ में इसे बड़ी गहराई से समझाया गया है। मुझे अपने स्वधर्म का बोध है और उसे ही निज जीवन में व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ। "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह" -- इसके अतिरिक्त कहने को अन्य कुछ भी नहीं है। ॐ तत् सत् !!
भगवत्पाद आद्यगुरु आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) के २५३३ वें जयंती महामहोत्सव (२१ अप्रेल २०२६) की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएं, बधाई और अभिनंदन ---
भगवत्पाद आद्यगुरु आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) के २५३३ वें जयंती महामहोत्सव (२१ अप्रेल २०२६) की मंगलमय हार्दिक शुभ कामनाएं, बधाई और अभिनंदन ---
(१) सर्वश्रेष्ठ तीर्थ कौन सा है? (२) मन को कहाँ लगाएं? (३) किस की व क्या उपासना करें? (४) मनुष्य जीवन की सार्थकता क्या है? (५) कूटस्थ का अर्थ क्या है?
(उत्तर) : (१) जहां भी मेरा अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त अहंकार) स्वतः ही कूटस्थ में रमण करने लगे, वहीं सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। (२) अपने मन को सब विषय-वासनाओं से बाहर खींचकर निरंतर कूटस्थ में ही लगाये रखें। (३) कूटस्थ में स्वयं को विलीन कर कूटस्थ की ही उपासना करें। (४) मनुष्य जीवन की सार्थकता कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी स्थिति है। (५) "कालव्यापी अविनाशी आत्म-तत्व को ही 'कूटस्थ' कहते है।"