मैं तटस्थ नहीं रह सकता। नदी के तीर पर खड़ा हूँ, नदी में छलांग लगाये बिना नहीं रह सकता। जो होगा सो देखा जायेगा। यदि प्रारब्ध में जीवन लिखा है तो जीवित रहूँगा, अन्यथा होनी को कोई रोक नहीं सकता।
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तीर पर कैसे रुकूँ मैं आज लहरों का निमंत्रण? मैं कहीं भी टिक नहीं पाता। प्रवाह ही तृप्ति है, प्रवाह ही जीवन है, और निष्क्रियता मृत्यु। प्रवाह का आरंभ ही स्पंदन है। वह स्पंदन ही हमें परमात्मा की अनभूति कराता है।
"विषमता की पीड़ा से व्यक्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान।" प्रवाह परमात्मा है। उसमें स्वयं का विलय ही परमात्मा की प्राप्ति है। वह प्रवाह हमें कूटस्थ (अविनाशी आत्म-तत्व) में अनुभूत होता है। उसी में विसर्जित हो जाना भगवान को समर्पण है।
(इस आलेख का आरंभ बच्चन जी की एक कविता की एक पंक्ति से किया था। आगे प्रसाद जी के महाकाव्य कामायनी की कुछ पंक्तियों का सहारा लिया है। फिर सामवेद के छांदोग्य उपनिषद में ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार और देवर्षि नारद के साथ सत्संग लाभ लेते हैं।)
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"तपस्वी क्यों हो इतने क्लांत? वेदना का यह कैसा वेग?
आह! तुम कितने अधिक हताश, बताओ यह कैसा उद्वेग?"
"जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल।
ईश का वह रहस्य वरदान,
कभी मत इसको जाओ भूल॥"
"विषमता की पीडा से व्यक्त, हो रहा स्पंदित विश्व महान।
यही दुख-सुख विकास का सत्य, यही भूमा का मधुमय दान।"
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यहाँ भूमा तत्व की बात की गई है। भूमा तत्व ही ब्रह्मज्ञान है। इस शब्द का प्रयोग ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार ने अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को उपदेश देते समय किया है। भूमा के प्रति सचेतन हो जाना ही ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति है। इसका संकेत सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद (७:२३:१) में है।
(इसका ज्ञान ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य और भगवत्-कृपा से ही हो सकता है।) भगवान सनतकुमार की कृपा ही इसका बोध करा सकती है :--- "यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति॥"
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इसके अर्थ और इससे आगे की अनभूति सुपात्र शिष्य को अनंत ज्योतिर्मय ब्रह्म, और भगवान विष्णु की अनंत विराटता के गहन ध्यान में गुरु रूप ब्रह्म की परम कृपा से ही होती है। हरेक श्रद्धालु को इसकी अनुभूति का अधिकार है, लेकिन सद्गुरु रूप ब्रह्म की परम कृपा का होना भी अति आवश्यक है। यही ब्रह्मज्ञान है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ अप्रेल २०२६
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