Saturday, 27 June 2026

कूटस्थ चैतन्य ---

 कूटस्थ चैतन्य ---

भगवान श्रीकृष्ण ने "कालव्यापी परम चेतना" को व्यक्त करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता में "कूटस्थ" शब्द का प्रयोग अनेक बार किया है। तत्पश्चात् १९वीं शताब्दी में वाराणसी के महान गृहस्थ योगी श्री श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय (३० सितम्बर १८२८ – २६ सितम्बर १८९५) ने कूटस्थ शब्द का प्रयोग सर्वाधिक किया है। अब तो उनकी परंपरा में, और आध्यात्मिक क्षेत्र में यह शब्द बहुत सामान्य हो गया है।
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हम निरंतर कूटस्थ-चैतन्य में रहें, और कूटस्थ का ही ध्यान करें। यह सर्वव्यापी अनंतता में समर्पण की अनुभूति है जिसमें हम निरंतर परमात्मा की असीम अनंत चेतना में स्वयं का विलय करते हैं, और उसी चेतना से एकाकार होकर रहते हैं। आज्ञाचक्र पर ध्यान करते करते साधक की पात्रतानुसार एक श्वेत ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। आरंभ में यह थोड़ी धुंधली होती है तत्पश्चात अत्यधिक चमकीले रंग में परिवर्तित होकर एक श्वेत पंचकोणीय नक्षत्र का आकार ले लेती है। इसके चारों ओर दूध जैसे रंग की एक श्वेत आभा बिखरी होती है जो एक नीले और स्वर्णिम चक्राकार से घिरी रहती है। शनैः शनैः उस ज्योति में से प्रणव नाद की ध्वनि निःसृत होने लगती है। उस सर्वव्यापी ज्योति व नाद में, जो सारी सृष्टि में व्याप्त है, व सारी सृष्टि जिसमें समाहित है, स्वयं की चेतना का विलय करते हुए ध्यान किया जाता है। यह ध्यान किया जाता है कि मैं यह नश्वर देह नहीं, सर्वव्यापी अनंत चैतन्य हूँ। वह सर्वव्यापी अनंतता की चेतना ही कालातीत परम चैतन्य है, और यही कूटस्थ चैतन्य है। इसे ही कूटस्थ कहते हैं।
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जिन्हें संस्कृत भाषा का ज्ञान है, और जिनका संस्कृत भाषा में शब्दों का उच्चारण शुद्ध है, उन्हें पुरुष सूक्त का नित्य पाठ करना चाहिए। मेरी अपनी आस्था है कि हर घर में नित्य शिवपूजा और गीतापाठ अवश्य होना चाहिए। गीता के कम से कम पाँच श्लोकों का अर्थ समझते हुए नित्य पाठ करना चाहिए। भगवान शिव देवाधिदेव हैं, उनकी पूजा से सभी देवताओं की पूजा हो जाती है। जो नित्य वेदपाठ करना चाहते हैं, उसके लिए निम्न विधि महात्माओं ने बताई है --
पुरुषसूक्त का नित्य पाठ वेदपाठ ही है। यदि समय मिले तो पुरुषसूक्त के साथ साथ -- श्री-सूक्त, रुद्र-सूक्त, सूर्य-सूक्त और भद्र-सूक्त का पाठ भी करें। उपरोक्त पाँचों सूक्तों का पाठ अधिक से अधिक एक घंटे में हो जाता है। इनका फल पूरे वेदपाठ के बराबर है। जिनको अभ्यास है वे आधे घंटे में ही पाँचों सूक्तों का पाठ कर लेते हैं। इस विषय पर किसी श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ महात्मा से मार्गदर्शन प्राप्त करें।
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जिनका उपनयन यानि यज्ञोपवीत संस्कार हो चुका है, उन्हें नित्य कम से कम दस (१० की संख्या में) बार गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। अधिकतम की कोई सीमा नहीं है। कोई संशय है तो जहाँ से आपने दीक्षा ली हैं वहीं से अपनी गुरु-परंपरा में अपने संशय का निवारण करें। गायत्री जप का अधिकार उन्हें ही है जिनका उपनयन संस्कार हो चुका है, अन्यों को नहीं। अपनी अपनी गुरु-परंपरानुसार नित्य संध्या करें।
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अब एक व्यक्तिगत बात कहना चाहता हूँ। मेरे इस शरीर की भौतिक आयु भी बहुत अधिक हो गई है। एक किनारे पर बैठा हूँ, आगे का कोई भरोसा नहीं है। अतः सारा अवशिष्ट जीवन परम शिव परमात्मा को समर्पित है। जो परम शिव हैं, वे ही श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम हैं, वे ही वेदान्त के परम ब्रह्म हैं, और वे ही भगवान विष्णु व उनके सारे अवतार हैं। मेरे शाश्वत मित्र तो वे पुराण-पुरुष स्वयं हैं, जिनका साथ शाश्वत है। जैसी भी और जो भी उनकी इच्छा है वही मेरी इच्छा है, और कुछ भी नहीं।
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥"
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ मई २०२६

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