ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
जिस निर्जन में सागर लहरी,
अम्बर के कानों में गहरी,
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।
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समीक्षकों की दृष्टि में जयशंकर प्रसाद की लिखी यह कविता हिंदी साहित्य में छायावाद की एक उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है। लेकिन मेरी दृष्टि में यह परमात्मा की भक्ति की एक उत्कृष्ट रचना है। यहाँ नाविक कौन है? परमात्मा ही नाविक है। यहाँ निर्जन में सागर लहरी -- स्वयं का अस्तित्व यानि कूटस्थ-चैतन्य है। कोलाहल की अवनी में प्रेम-कथा -- परमात्मा के नाम यानि प्रणव की ध्वनि का स्पंदन है जो निरंतर सुनाई दे रहा है। चारों ओर आनंद ही आनंद है। परमात्मा के सिवाय किसी अन्य का कोई अस्तित्व ही नहीं है। पूरी कविता इस प्रकार है --
ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
जिस निर्जन में सागर लहरी,
अम्बर के कानों में गहरी,
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।
जहाँ साँझ-सी जीवन-छाया,
ढीली अपनी कोमल काया,
नील नयन से ढुलकाती हो-
ताराओं की पाँति घनी रे ।
जिस गम्भीर मधुर छाया में,
विश्व चित्र-पट चल माया में,
विभुता विभु-सी पड़े दिखाई-
दुख-सुख बाली सत्य बनी रे ।
श्रम-विश्राम क्षितिज-वेला से
जहाँ सृजन करते मेला से,
अमर जागरण उषा नयन से-
बिखराती हो ज्योति घनी रे !
ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे ।
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