भगवान की भक्ति — एक बड़ा जोखिम भरा धंधा है। इस में कुछ मिलता नहीं है, बल्कि जो कुछ भी पास में है, वह भी छीन लिया जाता है। लेकिन बड़ा आनंद और बड़ा प्रबल आकर्षण इसमें है। भगवान ने अपनी कुछ बड़ी भयंकर शर्तें रख दी हैं, जिनकी पालना बड़ी कठिन ही नहीं, लगभग असंभव है। लेकिन हम भी उन्हें पा कर ही रहेंगे।
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(१) पहली शर्त तो है — अव्यभिचारिणी भक्ति और अनन्य योग। भगवान ने अपने स्वयं के अतिरिक्त अन्य किसी भी चाहत को व्यभिचार कहा है। उनकी उपासना में यह भाव कि उनके अतिरिक्त अन्य कोई भी या कुछ भी नहीं है; का होना अनिवार्य है। भगवान बड़े ईर्ष्यालु प्रेमी हैं। वे १००% प्रेम मांगते हैं। उनके यहाँ ९९.९९% भी नहीं चलता।
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(२) दूसरी शर्त तो और भी भयंकर है। इसमें उनका मांग-पत्र है जैसे कोई लड़का अपने विवाह में दहेज मांग रहा हो। उनकी मांगे निम्न हैं --
"अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम॥"
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(३) उनकी तीसरी शर्त उनके मांग-पत्र का अगला पृष्ठ है --
इन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म मृत्यु वृद्धावस्था व्याधि और दुख में दोष दर्शन॥"
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(४) उनकी चौथी शर्त जो उनके मांग-पत्र का अगला व अंतिम पृष्ठ है --
"आसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता॥"
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मेरा मामला तो पूरी तरह से बिगड़ चुका है। बड़ी निराशाजनक, नियंत्रण से बाहर, विफल हो गई Hopeless स्थिति है। लेकिन जहां भी मैं हूँ, वहाँ भगवान को आना ही पड़ेगा। वे भी मेरे बिना नहीं रह सकते। ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर / १८ अप्रेल २०२६
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