निष्काम भाव से "आत्मा" यानि "आत्म-तत्व" की ही साधना करनी चाहिए ---
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यह मेरा निजी अनुभव है कि स्वयं से पृथक कुछ भी नहीं है। निष्काम साधना ही हमें जीवनमुक्त बना सकती है। सकाम साधना -- बंधन और पुनर्जन्म का कारण बनती हैं। किसी भी तरह की कोई कामना या आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। जो भी साधना भोग व योग दोनों का आश्वासन देती हैं, वे भी बंधनों में ही डालती हैं। जैसे प्रकाश और अंधकार साथ-साथ नहीं रह सकते, वैसे ही राम और काम कभी साथ साथ नहीं हो सकते। इसी लिए गीता में भगवान हमें निष्काम, वीतराग, निस्त्रेगुण्य और स्थितप्रज्ञ होने को कहते हैं। साधना वो ही करनी चाहिए जो हमें वीतराग, निस्त्रेगुण्य और स्थितप्रज्ञ बनाती हैं। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२३ अप्रेल २०२६
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