Tuesday, 7 July 2026

सारी साधनाएँ एक बहाना है, असली चीज तो प्रभु की कृपा है ---

सारी साधनाएँ एक बहाना है, असली चीज तो प्रभु की कृपा है| हमारी सारी आध्यात्मिक साधनाएँ, जप-तप, योग, ध्यान, भजन-कीर्तन और पूजा-पाठ आदि आदि सब एक बहाना मात्र हैं| ये सब सिर्फ हमारी कमियों को दूर करती हैं, इनसे प्रभु नहीं मिलते| शरणागति भी हमारी कमियों को ही दूर करती है| उस से भी प्रभु नहीं मिलते| प्रभु तो करूणावश सिर्फ अपनी कृपा से ही मिलते हैं| उन्हें कोई बाध्य नहीं कर सकता|

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एक बालक अपने माता-पिता से मिलना चाहे तो उसके माता-पिता क्या यह कहेंगे कि बेटा, तुम इतना तप करो, इतना जप करो, इतने यज्ञ करो, इतना ध्यान करो, इतना पुण्य करो, इतनी क्रिया करो, तब मैं मिलूंगा ? एक नालायक से नालायक संतान भी अपने माँ-बाप से मिलना चाहे तो माँ-बाप मना नहीं करते| फिर प्रभु से हम दूर क्यों हैं? वे हमें क्यों नहीं मिलते? इस पर ज़रा विचार करें और मुझे भी अपने ज्ञान का प्रकाश दें| धन्यवाद !
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पुनश्चः :-- मेरे लिए तो प्रभु परम कल्याणकारी, प्रेम और आनंद हैं| मैं ऐसे किसी भगवान को नहीं मानता जो प्राणियों की ह्त्या करा कर, उन पर अत्याचार करा कर और दूसरों को दुःख दिला कर प्रसन्न होता है| कृपा शंकर ७ जुलाई २०१९

कर्ताभाव ---

  कर्ताभाव ---

सारे कर्मफलों के मूल में हमारी कामनाएँ और कर्ताभाव है| कामनाओं और कर्ताभाव का मूल अज्ञान है| अपनी आनंदरूपता यानि परमात्मा के साथ ऐक्यता का ज्ञान न होना ही अज्ञान है| सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अज्ञान कैसे दूर हो? सिर्फ पढ़ने मात्र से यह अज्ञान दूर नहीं हो सकता| इसके लिए नियमित गहन ध्यान साधना भी करनी होगी| अकर्ताभाव के बारे में गीता में भगवान कहते हैं .....
"नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌ | पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌ ||५:८||"
इसका भावार्थ है कि कर्मयोगी परमतत्व परमात्मा की अनुभूति करके दिव्य चेतना मे स्थित होकर देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, चलता हुआ, सोता हुआ, श्वांस लेता हुआ इस प्रकार यही सोचता है कि मैं कुछ भी नही करता हूँ|
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पर इसके लिए परम तत्व परमात्मा की अनुभूति होना आवश्यक है| वह अनुभूति कैसे हो? वह ध्यान साधना में परमात्मा की परम कृपा से ही हो सकती है| गीता में भगवान आगे कहते हैं .....
"ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः|
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा||५:१०||"
इसका भावार्थ है कि "कर्म-योगी" सभी कर्म-फ़लों को परमात्मा को समर्पित करके निष्काम भाव से कर्म करता है, तो उसको पाप-कर्म कभी स्पर्श नही कर पाते है, जिस प्रकार कमल का पत्ता जल को स्पर्श नही कर पाता है|
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हमें हर कार्य भगवान को समर्पित कर के ही करना चाहिए| इसके लिए अभ्यास करना होगा, वह अभ्यास ही साधना है| गीता में साधना के ऊपर भगवान ने बहुत प्रकाश डाला है| हर मुमुक्षु को चाहिए कि वह गीता का स्वाध्याय करे| कृष्ण यजुर्वेद के श्वेताश्वतरोपनिषद में योग साधना के ऊपर बहुत गहराई और विस्तार से बताया गया है| उसका भी स्वाध्याय आवश्यक है| अंत में सबसे महत्वपूर्ण है परमात्मा की परम कृपा जो परमप्रेम और शरणागति से प्राप्त होती है| वह परम कृपा ही हमारा अज्ञान दूर सकती है|
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ॐ तत्सत् ! ॐ गुरु ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ जुलाई २०१८

जीवन में हमारे भटकाव और पीड़ाओं से भगवान भी खिन्न हैं .....

अपनी संतान को दुःखी देखकर हर पिता दुःखी हो जाता है| हमारे दुःख और पीड़ाओं से भगवान भी बहुत खिन्न हैं| वे चाहते हैं कि उनकी संतान लौट कर बापस उनके पास आए, पर उनके पास कोई आना ही नहीं चाहता| सभी उनकी महाठगिनी माया से ही प्रसन्न हैं| भगवान भी कुछ नहीं कर सकते| अपने बनाए नियमों को वे नहीं तोड़ते, अन्यथा सृष्टि नहीं चलेगी| माया-मोह में दुःख ही दुःख हैं|

"ॐ खं ब्रह्म" || 'ख' आकाश-तत्व को कहते हैं| आकाश-तत्व परमात्मा का द्योतक है| योगी, आकाश-तत्व का ध्यान करते हैं, और आकाश-तत्व में विचरण करते हैं| जो 'ख' के समीप है वह सुखी है, और जो 'ख' से दूर है, वह दुःखी है|
हिरण्येन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम |
योसावादित्ये पुरुषः सोसावहम| ॐ खं ब्रह्म ||
७ जुलाई २०२०

परमात्मा ही हमारा घर है, वहीं हम सुखी हैं, अन्यत्र कहीं भी नहीं ....

 परमात्मा ही हमारा घर है, वहीं हम सुखी हैं, अन्यत्र कहीं भी नहीं ....

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पता नहीं कितने जन्म हो गए हैं भटकते-भटकते| भगवान भी बहुत अधिक दुःखी हो गए हमारी पीड़ाओं और दुःख से| वे भी कब तक दुःखी रहते? करुणावश उन्होनें भी ठान ही लिया कि मेरे बिना बहुत दुखी इन सब जीवात्माओं को मुक्त करना ही है| बस! जब उन्होने ही ठान लिया है तब हमें और करना ही क्या है? कुछ भी नहीं| सारी चिंताएँ उन की, अन्य कोई तो है ही नहीं| उनका नित्य नवीन आनंद ही हमारा आनंद है| वे ही हमारी गति और हमारे घर हैं| ॐ ॐ ॐ !! कृपा शंकर ७ जुलाई २०२०

ध्यान गुरु-तत्व का ही करना चाहिए ----

 ध्यान गुरु-तत्व का ही करना चाहिए| गुरु-तत्व का बोध भी एक दिव्य अनुभूति है जो गुरुकृपा से ही होती है| हमारी चेतना कहाँ पर है उसी के अनुसार हमारे विचार निर्मित होते हैं| गुरु महाराज का आदेश था कि चेतना को कभी आज्ञाचक्र से नीचे मत आने दो| उनके आदेश का तो पूरी तरह पालन नहीं कर पाये पर उन्होने कृपा कर के पदोन्नति कर दी| आज्ञाचक्र से वे ध्यान का केंद्रबिन्दु सहस्त्रार में, और सहस्त्रार से ब्रह्मरंध्र में कर दिया| एक दिन पाया कि चेतना ब्रह्मरंध्र से भी परे जाकर अनंताकाश में विचरण कर रही है| यह विराटता की अनुभूति उनकी परम कृपा थी| गुरुकृपा यहीं नहीं रुकी, उन्होंने उस अनंतता से भी परे का बोध करा कर सारे संदेह दूर कर दिये, और बापस इस देह की चेतना में लाकर छोड़ दिया| अब उनके बताए मार्ग पर चलना ही मेरा कर्मयोग और पुरुषार्थ है| इधर-उधर देखना भी पाप है| जय गुरु !! ॐ गुरु !!

कृपा शंकर ७ जुलाई २०२०

सारी साधनाएँ एक बहाना है, उनसे भगवान नहीं मिलते, असली चीज तो भगवान की कृपा है ---

 सारी साधनाएँ एक बहाना है, उनसे भगवान नहीं मिलते, असली चीज तो भगवान की कृपा है ---

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हमारी सारी आध्यात्मिक साधनाएँ -- जप-तप, योग, ध्यान, भजन-कीर्तन और पूजा-पाठ आदि आदि सब एक बहाना मात्र हैं। ये हमारी कमियों को दूर करती हैं। इन से भगवान नहीं मिलते। शरणागति भी हमारी कमियों को ही दूर करती है, इस से भी भगवान नहीं मिलते। भगवान तो अपनी करुणावश सिर्फ अपनी कृपा से ही मिलते हैं। उन्हें कोई बाध्य नहीं कर सकता।
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एक बालक अपने माता-पिता से मिलना चाहे तो उसके माता-पिता क्या यह कहेंगे कि बेटा, तुम इतना तप करो, इतना जप करो, इतने यज्ञ करो, इतना ध्यान करो, इतना पुण्य करो, इतनी क्रिया करो, तब मैं मिलूंगा ?
एक नालायक से नालायक संतान भी अपने माँ-बाप से मिलना चाहे तो माँ-बाप मना नहीं करते। फिर भगवान हम से दूर क्यों हैं? वे हमें क्यों नहीं मिलते? इस पर ज़रा विचार करें, और मुझे भी बतायें।
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मेरे लिए तो भगवान परम कल्याणकारी, प्रेम और आनंद हैं। वे लुका-छिपी का खेल खेल रहे हैं। मेरे लिए तो वे अभी भी बालरूप में ही हैं, और उनका बचपना अभी तक गया नहीं है। वे प्रेम के भूखे हैं, उन्हें हमारा प्रेम चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं। निरीह प्राणियों पर अत्याचार, उनकी हत्या, और अधर्म उन्हें पसंद नहीं है।
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उनसे प्रेम करो, और अधिक प्रेम करो, व हर समय प्रेम करो, फिर वे और नहीं छिप सकते। उन्हें प्रकट होना ही पड़ेगा। हमारा प्रेम ही उन्हें प्रकट होने को बाध्य कर सकता है, अन्य कुछ भी नहीं।
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पुनश्च :-- श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम ने एक ऐसा सूत्र पकड़ा दिया है, जिस से भगवान स्वयं ही पकड़ में आ गये हैं। वह सूत्र है --
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥"
जो इस बात को समझ कर अपने आचरण में ले आयेगा, वह एक न एक दिन भगवान को अवश्य प्राप्त कर लेगा।
"मिले न रघुपति बिन अनुरागा, किये जोग जप ताप विरागा॥"
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ जुलाई २०२२

अंतरार्ष्ट्रीय राजनीति में सबसे बड़ा आश्चर्य -- चीन और पाकिस्तान की मित्रता है ---

अंतरार्ष्ट्रीय राजनीति में सबसे बड़ा आश्चर्य -- चीन और पाकिस्तान की मित्रता है। उनमें इतना अधिक वैचारिक अंतर है कि कोई समझौता हो ही नहीं सकता। फिर भी वे परम मित्र हैं। मैं तीन-चार बार चीन का भ्रमण कर चुका हूँ, वहाँ के बारे में खूब अध्ययन भी किया है, और वहाँ के बारे में काफी कुछ जानता भी हूँ। भारत में भारतीय मुस्लिम जितने सुखी हैं, उतने तो किसी मुस्लिम देश में भी नहीं हैं। मैंने अपने जीवन में विश्व के अनेक मुस्लिम देशों -- तुर्की, सऊदी अरब, मिश्र, यमन, ईरान, अबूधाबी, मोरक्को, इन्डोनेशिया, मलयेशिया और बांग्लादेश का भ्रमण किया है। वहाँ के बारे में बहुत अच्छी जानकारी है।

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(१) चीनियों का मुख्य भोजन सूअर का मांस है। वे सूअर के भूने हुए मांस को चावल के साथ सब्जी की तरह मिला कर खाते हैं। पाकिस्तान में सूअर का मांस खाना हराम है।
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(२) चीन में सिंकियांग प्रांत के अलावा कहीं भी मुसलमान नहीं के बराबर हैं। वहाँ इस्लाम मजहब पर पूर्ण प्रतिबंध है। नमाज पर प्रतिबंध है, ईद मनाने पर प्रतिबंध है, मुसलमानों द्वारा दाढ़ी रखने पर प्रतिबंध है, कुरान शरीफ रखने पर और मुसलमानी नाम रखने पर प्रतिबंध है। लाखों मुसलमानों को बाड़े में बंद कर के रखा हुआ है। उनको बंदूक की नोक पर सूअर का मांस खिलाया जाता है और शराब पिलायी जाती है। अब तो सबसे घृणित कार्य यह हो रहा है कि जो मुसलमान पुरुष बाड़ों में बंद हैं, उनकी बीबियों से बंदूक की नोक पर चीनी सैनिक बच्चे पैदा कर के उन की नस्ल ही बदल रहे हैं। चीन ने इस्लाम को एक मानसिक बीमारी घोषित किया हुआ है।
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किसी भी मुस्लिम देश में साहस नहीं है वे चीन का विरोध कर सकें। चीन के अनेक पुरुषों ने पाकिस्तान की गरीब मुस्लिम लड़कियों से बिना दहेज के शादी कर रखी है, और उन लड़कियों को चीन में वेश्यावृति के धंधे में धकेल दिया है। पाकिस्तान में विरोध करने का साहस नहीं है।
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रोहिंगिया मुसलमान म्यांमार के अराकान प्रदेश से आते हैं जिसकी सीमा चीन से लगी हुई है। वे शरणार्थी बनकर चीन में क्यों नहीं जाते? भारत में ही क्यों आते हैं? पाकिस्तान में भी क्यों नहीं जाते?
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सिर्फ भारत-विरोध के नाम पर चीन और पाकिस्तान परम मित्र हैं, अन्यथा उनमें कुछ भी सामान्य नहीं है। मेरा किसी से कोई विरोध नहीं है। सबके प्रति सदभावना है। सिर्फ एक वास्तविकता लिख रहा हूँ।
कृपा शंकर
७ जुलाई २०२२

यह सारी सृष्टि, सारा विश्व -- भगवान विष्णु है। वे स्वयं ही यह संसार बन गए हैं ---

 यह सारी सृष्टि, सारा विश्व -- भगवान विष्णु है। वे स्वयं ही यह संसार बन गए हैं ---

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पूर्णतः खुली आँखों से दशों दिशाओं में घूर-घूर कर जितनी भी दूर तक हो सके, उतनी दूर तक, और उससे भी परे, जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, उसे बहुत अच्छी तरह से देखें। वह सब भगवान विष्णु है। भगवान विष्णु ही यह विश्व बन गए हैं। हम उनके साथ एक हैं। हमारा निवास भगवान विष्णु के हृदय में है। उन्हें और स्वयं को नमन करें।
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पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के, कमर सीधी रखते हुए एक ऊनी आसन पर बैठ जाएँ। अपने नेत्रों को बिना किसी तनाव के भ्रूमध्य की ओर देखते हुए स्थिर कर लें। अब बहुत ध्यान से देखिये कि बंद आँखों के अंधकार के पीछे क्या है। उस अंधकार के पीछे भगवान विष्णु ही छिपे हुए हैं। उन्हें देखते रहें। कई दिनों के अभ्यास के उपरांत, यदि आपके हृदय में भक्ति है तो, आप पर गुरु-कृपा अवश्य फलीभूत होगी। गुरु-कृपा के फलीभूत होते ही उन बंद आँखों के अंधकार के पीछे एक ब्रह्म-ज्योति का प्राकट्य होगा। उस ब्रह्म ज्योति को ही हर समय देखते रहें। वह ब्रह्म-ज्योति बहुत स्पष्ट रूप से स्वयं भगवान विष्णु है। उस ब्रह्म-ज्योति का दर्शन हो जाये तो वह कभी भी नहीं छूटती। उसको छोडने का प्रयास करने पर यह शरीर ही नष्ट हो सकता है, लेकिन वह ज्योति कभी नष्ट नहीं हो सकती। वह ब्रह्म-ज्योति ही "कूटस्थ" है, जिसका उल्लेख गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कई बार किया है। वह सर्वत्र है लेकिन कहीं भी नहीं है, इसीलिए वह कूटस्थ है।
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गुरु-कृपा और भी प्रखर होने पर उस ज्योति से निःसृत होती हुई एक मंत्रमय ध्वनि सुनाई देगी, जिसे हर समय सुनते रहें। वह ध्वनि ही शब्द यानि अक्षर-ब्रह्म है। कूटस्थ ब्रह्म में स्वयं को समर्पित कर दें। दिन भर उनका स्मरण रखें। वे ही हमारे पैरों से चल रहे हैं, इन हाथों से काम कर रहे हैं, इन नेत्रों से वे ही देख रहे हैं, और वे ही हर रूप में हमें मिल रहे हैं। हमारा एकमात्र व्यवहार उन्हीं से है। वे ही सर्वस्व हैं, और एकमात्र अस्तित्व भी उन्हीं का है।
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प्रातः काल उठते ही कूटस्थ सूर्यमण्डल में भगवान पुरुषोत्तम (भगवान विष्णु को ही पुरुषोत्तम कहा गया है) का ध्यान करें। वहाँ सुनाई दे रहे कूटस्थ शब्द-ब्रह्म का श्रवण करें। फिर खूब देर तक द्वादशाक्षरी भागवत मंत्र का मानसिक रूप से कूटस्थ में जप करें। दिन भर चलते-फिरते, उठते-बैठते हर समय भगवान की चेतना में रहें। अपनी अनंत चेतना में उनके साथ एक होकर भगवान के विराट रूप का ध्यान करें। उनकी विराट अनंतता हम स्वयं हैं, यह नश्वर देह नहीं। एक दिन हम पायेंगे की भगवान हम से पृथक नहीं, हमारे साथ एक हैं। आगे का मार्गदर्शन वे स्वयं करेंगे, लेकिन अन्य कोई आकांक्षा नहीं होनी चाहिए।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६:३०॥"
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
"अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१८:५३॥"
"मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥१८:६५॥"
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
७ जुलाई २०२३