सारी साधनाएँ एक बहाना है, उनसे भगवान नहीं मिलते, असली चीज तो भगवान की कृपा है ---
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हमारी सारी आध्यात्मिक साधनाएँ -- जप-तप, योग, ध्यान, भजन-कीर्तन और पूजा-पाठ आदि आदि सब एक बहाना मात्र हैं। ये हमारी कमियों को दूर करती हैं। इन से भगवान नहीं मिलते। शरणागति भी हमारी कमियों को ही दूर करती है, इस से भी भगवान नहीं मिलते। भगवान तो अपनी करुणावश सिर्फ अपनी कृपा से ही मिलते हैं। उन्हें कोई बाध्य नहीं कर सकता।
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एक बालक अपने माता-पिता से मिलना चाहे तो उसके माता-पिता क्या यह कहेंगे कि बेटा, तुम इतना तप करो, इतना जप करो, इतने यज्ञ करो, इतना ध्यान करो, इतना पुण्य करो, इतनी क्रिया करो, तब मैं मिलूंगा ?
एक नालायक से नालायक संतान भी अपने माँ-बाप से मिलना चाहे तो माँ-बाप मना नहीं करते। फिर भगवान हम से दूर क्यों हैं? वे हमें क्यों नहीं मिलते? इस पर ज़रा विचार करें, और मुझे भी बतायें।
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मेरे लिए तो भगवान परम कल्याणकारी, प्रेम और आनंद हैं। वे लुका-छिपी का खेल खेल रहे हैं। मेरे लिए तो वे अभी भी बालरूप में ही हैं, और उनका बचपना अभी तक गया नहीं है। वे प्रेम के भूखे हैं, उन्हें हमारा प्रेम चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं। निरीह प्राणियों पर अत्याचार, उनकी हत्या, और अधर्म उन्हें पसंद नहीं है।
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उनसे प्रेम करो, और अधिक प्रेम करो, व हर समय प्रेम करो, फिर वे और नहीं छिप सकते। उन्हें प्रकट होना ही पड़ेगा। हमारा प्रेम ही उन्हें प्रकट होने को बाध्य कर सकता है, अन्य कुछ भी नहीं।
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पुनश्च :-- श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम ने एक ऐसा सूत्र पकड़ा दिया है, जिस से भगवान स्वयं ही पकड़ में आ गये हैं। वह सूत्र है --
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥"
जो इस बात को समझ कर अपने आचरण में ले आयेगा, वह एक न एक दिन भगवान को अवश्य प्राप्त कर लेगा।
"मिले न रघुपति बिन अनुरागा, किये जोग जप ताप विरागा॥"
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
७ जुलाई २०२२
एक आध्यात्मिक साधक कभी -- धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, और सुख-दुःख की परवाह नहीं करता। उसकी रुचि इन सब में नहीं होती। जैसे चुंबक की सूई सदा उत्तर दिशा में ही रहती है, वैसे ही प्रियतम परमात्मा के सिवाय उसे अन्य कुछ भी दृष्टिगत नहीं होता। वास्तव में परमात्मा के सिवाय अन्य सब व्यर्थ है।
ReplyDeleteभगवान के चरण कमलों में आश्रय चाहोगे तो वे अपने हृदय में ही आश्रय दे देंगे।
ॐ तत्सत् !!
०७ जुलाई २०२२