लोकेषणा के पश्चात अन्य भी अनेक बाधाएँ हैं, लेकिन वे लोकेषणा से बड़ी नहीं हैं। संसार में यश, प्रसिद्धि और दूसरों से प्रशंसा की चाह को ही लोकेषणा कहते हैं। यह एक मरीचिका और भटकाव है, जिससे अहंकार ही तृप्त होता है, और कुछ भी नहीं मिलता। तृप्ति -- केवल परमात्मा की प्रत्यक्ष उपस्थिती में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सभी विषयों में अनासक्त और मौन व्यक्ति ही परम सिद्ध मुनि हो सकता है।
.
कूटस्थ (कालातीत परम आत्म-चैतन्य) सूर्यमण्डल में परमात्मा और स्वयं का निरंतर ध्यान करते रहें, आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाएँगे। कहीं अन्धकार नहीं रहेगा। कूटस्थ में स्वयं की और परमात्मा की उपस्थिति गहनतम प्रेम के साथ हो। अन्य कोई भी आसक्ति व स्पृहा न रहे। ईश्वर के अतिरिक्त संसार में अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है। वे उपलब्ध हो गए तो सब कुछ मिल गया।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
१७ जून २०२६