Wednesday, 17 June 2026

आध्यात्मिक मार्ग पर हम सब की सबसे बड़ी बाधा — "लोकेषणा" है।

लोकेषणा के पश्चात अन्य भी अनेक बाधाएँ हैं, लेकिन वे लोकेषणा से बड़ी नहीं हैं। संसार में यश, प्रसिद्धि और दूसरों से प्रशंसा की चाह को ही लोकेषणा कहते हैं। यह एक मरीचिका और भटकाव है, जिससे अहंकार ही तृप्त होता है, और कुछ भी नहीं मिलता। तृप्ति -- केवल परमात्मा की प्रत्यक्ष उपस्थिती में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सभी विषयों में अनासक्त और मौन व्यक्ति ही परम सिद्ध मुनि हो सकता है।
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कूटस्थ (कालातीत परम आत्म-चैतन्य) सूर्यमण्डल में परमात्मा और स्वयं का निरंतर ध्यान करते रहें, आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाएँगे। कहीं अन्धकार नहीं रहेगा। कूटस्थ में स्वयं की और परमात्मा की उपस्थिति गहनतम प्रेम के साथ हो। अन्य कोई भी आसक्ति व स्पृहा न रहे। ईश्वर के अतिरिक्त संसार में अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है। वे उपलब्ध हो गए तो सब कुछ मिल गया।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
१७ जून २०२६

लोकेषणा -- एक मरीचिका और भटकाव ही है

लोकेषणा (संसार में यश, प्रसिद्धि और दूसरों से प्रशंसा की चाह) -- एक मरीचिका और भटकाव ही है। इससे अहंकार ही पुष्ट होता है, कोई तृप्ति नहीं मिलती। तृप्ति - सिर्फ भगवान की उपासना में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सभी विषयों में अनासक्त व्यक्ति ही परम सिद्ध हो सकता है।

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कूटस्थ में भगवान इसी क्षण यहीं हैं, और नित्य हैं। उनके प्रति श्रद्धा, विश्वास, परमप्रेम और अभीप्सा हो तो आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं, कहीं अन्धकार नहीं रहता। सर्वप्रथम हम भगवान को उपलब्ध हों। कूटस्थ में भगवान की उपस्थिति गहनतम प्रेम के साथ हो। अन्य कोई भी आसक्ति व स्पृहा न रहे। भगवान के अतिरिक्त संसार में अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है। भगवान मिल गए तो सब कुछ मिल गया।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ जून २०२३