Wednesday, 22 July 2026

ताइवान से यदि चीन का युद्ध हुआ तो अंततः उसमें चीन हारेगा और चीन का सात टुकड़ों में इस तरह विभाजन होगा ---

 ताइवान से यदि चीन का युद्ध हुआ तो अंततः उसमें चीन हारेगा और चीन का सात टुकड़ों में इस तरह विभाजन होगा ---

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यह लेख अंतर्जाल पर विभिन्न स्त्रोतों से मिले, चीन के बारे में पूरी जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों द्वारा निकाले गए निष्कर्षों का सार है। उनका कहना है कि चीन का अमेरिका व जापान से युद्ध संभावित है, जिसके बाद चीन का सात टुकड़ों में बंटना निश्चित है, जो अगले सात वर्षों में पूर्ण हो जाएगा। जो भाग चीन से अलग होंगे, वे इस प्रकार हैं --
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(१ व २) सबसे पहले चीन से तिब्बत और क्विङ्ग्हाई प्रांत अलग होंगे और मिलकर एक स्वतंत्र देश बना लेंगे। भारतीय ज्योतिषियों का कहना है कि कैलाश और मानसरोवर को भारत अपने अधिकार में ले लेगा।
(३) दूसरा भाग जो चीन से पृथक होगा, वह सिंजियांग प्रांत है। यह पूर्वी तुर्की कहलाता था। कभी भी चीन का भाग नहीं था।
(४) तीसरा भाग जो चीन से पृथक होगा वह मंचूरिया होगा, जिसे चीन ने तीन प्रान्तों में बाँट रखा है -- लियानोनिंग, जिलियान व हेलोंगजियांग।
(५) इन्नर मंगोलिया, जो चीन की दीवार के उत्तर में है।
(पास में ही एक छोटा सा प्रांत और है जिसका नाम निंगसिया है, उसके बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता।)
(६) गुयाङ्गदोंग प्रांत व हैनान द्वीप। होङ्ग्कोंग व मकाऊ इसी का भाग हो जाएँगे।
(७) ताइवान -- जो इस समय भी चीन से पृथक है।
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भारत की सीमा चीन से कहीं पर भी नहीं लगेगी। चीन द्वारा कब्जाए गए सारे भारतीय क्षेत्रों को भारत छुड़ा लेगा।
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चीन के उत्तर-पूर्व में चीन की दीवार के दक्षिण में जो क्षेत्र है, जहाँ से चीन की दीवार का आरंभ होता है, वहाँ तो सन १९८५ में मैं भी एक बार गया हुआ हूँ। चीन की दीवार पर दो बार चढ़ा भी हूँ, और किसी की बाइसिकल मांग कर चीन की दीवार के साथ साथ घूमा भी बहुत हूँ। बड़ा उपजाऊ और अच्छा इलाका है। वहाँ के लोग सप्ताह में एक दिन नहाते हैं, सर्दियों में महीने में एक बार नहाते हैं। विदेशियों का सम्मान भी करते हैं। चीन की मुख्य भूमि में शाकाहारी भोजन नहीं मिलता, खुद को ही व्यवस्था करनी पड़ती है। फल, फलों का रस, दूध, सब्जियाँ, ब्रेड, आटा, दाल, चावल, वनस्पति तेल, आदि मिल जाते हैं। अपने भोजन की व्यवस्था खुद कर लो। वहाँ मक्खन गलती से भी मत खरीदना, वह जानवरों की चर्बी से बनता है। किसी भोजनालय में तो भोजन कर ही नहीं सकते। शाकाहारी को तो ५० मीटर दूर से ही बास आती है। टेबल पर हड्डियाँ उबलती रहती हैं, उसी का पानी पीते हैं। होटल में घुसते ही दरवाजे पर टबों में झींगे, जीवित मछलियां आदि पानी के टबों में रखी रहती हैं। जो भी आपको पसंद आए वह बता दो। तुरंत उसे काट कर और पका कर ला देंगे। उन दिनों साँप का सूप और बंदर की खोपड़ी का मांस खूब लोकप्रिय था।
दो बार पार्टियों में जाना पड़ा। एक बार तो खाना बनाने वाली को समझा दिया कि शुद्ध वनस्पति तेल में थोड़ा सा चावल और फलियाँ पकाकर बना दो। मसालों के नाम पर काली मिर्च का पाउडर और नमक के सिवाय और कुछ भी न हो। एक बार एक पार्टी में सिर्फ दूध और बादाम आदि सूखे फल ही लिए। कहीं घूमने जाता तो साथ में ब्रेड सेंडविच और कोकोकोला ले जाता था। भूख लगती तो किसी पार्क में बैठकर ब्रेड सेंडविच खा लेता और कोकोकोला पी लेता।
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दक्षिण कोरिया में तो एक बार एक बड़े धर्म संकट में फंस गया था। किसी मित्र के घर भोजन के लिए निमंत्रित था। वहीं पता चला कि वहाँ तो लोग कुत्ते का मांस भी खाते हैं। उस परिवार को अङ्ग्रेज़ी आती थी, अतः उनको समझा दिया। दूध और फल आदि से ही मेरा भोजन हो गया।
कृपा शंकर
२२ जुलाई २०२२

दिव्य प्रेमलीला ---

 दिव्य प्रेमलीला ---

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जो भाव मैं व्यक्त करना चाहता हूँ, उस के लिए प्रेमलीला से अधिक अच्छा शब्द मेरे शब्दकोष में नहीं है। एक तो वास्तविक भक्ति रूपी महासागर होता है जिसमें सारे योग समाहित हो जाते हैं, उससे विपरीत मनुष्य का लोभ और अहंकार रूपी दिखावा यानि पाखंड होता है, जो उसे कालनेमि बना देता है। भूल से उधर देखना भी नहीं चाहिए, क्योंकि उसका परिणाम बड़ी भयंकर दुर्गति के रूप में होता है।
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जितने भी योग और साधनाएँ होती हैं, वे सब की सब नदियों की तरह हैं, जो भक्ति रूपी महासागर में समाहित हो जाती हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई हुई भक्ति अनन्य और अव्यभिचारिणी है, जहाँ भगवान के अतिरिक्त अन्य किसी से किसी भी तरह का कोई अनुराग नहीं होता।
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नारद भक्तिसूत्रों का छठा सूत्र कहता है -- "यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति॥" जब हम आत्माराम बन जाते हैं, अर्थात् आत्मा में रमण करने लगते हैं, तब वह अवस्था भक्ति की परिणिति होती है। वह भक्ति कामनायुक्त नहीं, बल्कि निरोधस्वरूपा होती है। लौकिक और वैदिक समस्त कर्मों के स्वभाविक त्याग को निरोध कहते हैं। प्रियतम परमात्मा में अनन्यता, और परमात्मा से अन्य विषयों में उदासीनता को भी निरोध कहते हैं। सातवें , आठवें और नौवें भक्तिसूत्रों में भी यही बात कही गई है। जहाँ कोई कामना होती है वह भगवान के साथ एक व्यापार होता है, भक्ति नहीं। लेकिन किसी भी परिस्थिति में शास्त्रोक्त कर्म नहीं छोडने चाहियें, अन्यथा पतन की संभावना रहती है। शांडिल्य सूत्रों में भी लगभग यही बात कही गई है।
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यह जो आत्मारामो वाली स्थिति है वह अवर्णनीय आनंददायक है। उसे ही मैं प्रेमलीला कहता हूँ। हम भगवान के साथ अपनी प्रेमलीला करते रहें, यानि अपनी सर्वव्यापी आत्मा में रमण करते रहें, इन्हीं मंगलमय शुभ कामनाओं के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम देता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
२२ जुलाई २०२३

भगवान शिव की उपासना के पवित्र मास श्रावण का आरंभ हो रहा है, लगातार "शिव-भाव" में स्थित रहने की उपासना करें। सभी पर शिवकृपा हो ---

 आज सोमवार से भगवान शिव की उपासना के पवित्र मास श्रावण का आरंभ हो रहा है, लगातार "शिव-भाव" में स्थित रहने की उपासना करें। सभी पर शिवकृपा हो ---

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आप स्वयं शिव हैं, अपने शिवभाव को जागृत कीजिये, और निरंतर शिवभाव में स्थित रहिए। यही भगवान शिव की सबसे बड़ी उपासना है। कौन क्या कहता है इसकी चिंता न करें। आप शिव की दृष्टि में क्या हैं? -- महत्व इसी का है, न कि इस बात का कि इस नश्वर संसार की दृष्टि में आप क्या हैं। आप स्वयं शिव बनें।
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आप के शरीर में कौन यह जीवन जी रहा है? आप के हृदय में कौन धड़क रहा है? आपके मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से कौन सोच-विचार कर रहा है? आपकी आँखों से कौन देख रहा है? आपके हाथों से कौन काम कर रहा है? आपके पैरों से कौन चल रहा है? आपके भोजन को कौन पचा रहा है? आपकी वाणी से कौन बोल रहा है? आपके देह की हरेक गतिविधि को, आपकी इंद्रियों और उनकी तन्मात्राओं को कौन संचालित कर रहा है? इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है -- "परम शिव रूप में परमात्मा"।
(प्रश्न): मैं कौन हूँ ? *** (उत्तर): इसका एक ही उत्तर है -- "परमशिव""।
हम स्वयं "परमशिव" हैं, न कि यह नश्वर देह।
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ध्यान के आसन पर मेरूदण्ड को उन्नत, और ठुड्डी को भूमि के समानान्तर रखते हुए, पूर्व या उत्तर दिशा की मुंह कर के सुख से बैठ जाएँ। बंद आँखों से भ्रूमध्य में एक ज्योति पुंज की कल्पना करें। (निष्ठावान साधकों को कुछ कालावधि की साधना के पश्चात वह ज्योति-पुंज यानि प्रकाश स्वतः ही दिखना आरंभ हो जायेगा) उस प्रकाश का विस्तार करते करते सम्पूर्ण सृष्टि को उसके लपेटे में ले लें। सारी सृष्टि उस ज्योति में है, और वह ज्योति सारी सृष्टि में है।
अब यह भाव कीजिये कि वह ज्योति ही परमशिव है, जो आप स्वयं हैं। जब सांस भीतर जाती है तब मानसिक रूप से सःSSSSSSSSSSSS का मानसिक जाप कीजिये। सांस अंदर या बाहर रुक जाती है तो रुक जाने दें, आप मात्र एक दृष्टा हैं, कर्ता नहीं। सांस बाहर जाती है तो मानसिक रूप से बोलिए हंsssssssssss। किसी किसी गुरु-परंपरा में अंदर जाती सांस के साथ हंssssssssss, और बाहर आती सांस के साथ सssssssssss का भाव किया जाता है। यह सारी सृष्टि ही आपका अस्तित्व है। बीच-बीच में कभी कभी एक बार इस देह को देख कर यह भाव कर सकते हैं कि मैं यह शरीर नहीं, ईश्वर की अनंतता हूँ। यह साधना अर्ध-खेचरी या खेचरी मुद्रा में करें। उस ज्योतिपुंज से प्रणव की ध्वनि भी निःसृत होती रहती है, जिसे भी सुनिए और उसका मानसिक जाप भी करते रहें। यह साधना नित्य कम से कम एक घंटे प्रातः और एक घंटे सायं या रात्रि में करें।
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अपनी जो आकाशगंगा है (जिसका एक नक्षत्र अपना सूर्य भी है), उस आकाश गंगा के एक छोर से दूसरे छोर तक यदि प्रकाश की गति से यात्रा की जाये तो उस यात्रा को पूर्ण करने में लगभग एक लाख वर्ष लग जाएँगे। इस तरह की अनगिनत लाखों आकाश गंगाएँ हैं। हमारे सूर्य जैसे करोड़ों सूर्य हैं। इस पृथ्वी जैसी अनगिनत पृथ्वियाँ हैं। इस भौतिक जगत से परे अनेक सूक्ष्म लोक हैं। अनेक लोक अंधकारमय हैं तो अनेक ज्योतिर्मय और हिरण्यमय भी हैं।
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किसी स्वच्छ अंधेरी रात में अपने घर की छत पर जाकर ध्रुव तारे को देखिये। उस ध्रुव तारे के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में साढ़े लगभग चार सौ वर्षों से भी अधिक का समय लगा है। जो आपको दिखाई दे रहा है, वह ध्रुव तारा लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पूर्व था। आकाश के कई नक्षत्र अब दिखाई दे रहे हैं, जब कि वे सैंकड़ों वर्ष पूर्व थे। वहाँ से प्रकाश की किरणों को पृथ्वी तक पहुँचने में कई सौ वर्ष लगे हैं।
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अरबों-खरबों प्रकाश वर्ष दूर भी अनंत सृष्टियाँ हैं, जिन्हें समझना मनुष्य की बुद्धि से परे है। वहाँ से प्रकाश की किरणें जब चली थीं तब पृथ्वी ग्रह का कोई अस्तित्व नहीं था। जब तक वे किरणें पृथ्वी तक पहुँचेंगी, तब तक पृथ्वी भी नष्ट भी हो गई होगी। यह तो रही स्थूल जगत की बात, सूक्ष्म जगत तो और भी अधिक विराट है। उस से भी परे कारण जगत है जो अकल्पनीय है। विभिन्न आयामों में अनंत सृष्टियाँ हैं। ये स्वर्ग-नर्क आदि सब मनोमय सृष्टियाँ हैं। उनसे परे भी अन्य आयामों की अनंत सृष्टियाँ हैं।
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जो चीज मुझे थोड़ी-बहुत समझ में आती है, वही लिखता हूँ। जो अज्ञात है वह कोरी कल्पना है। कल्पना में रहना स्वयं को धोखा देना है।
(१) एक बात तो अनुभूत सत्य है कि मैं यह शरीर नहीं हूँ। यह शरीर एक दुपहिया वाहन है जो इस लोकयात्रा के लिए मिला हुआ है। यह नष्ट हो जाएगा तो अंत समय की मति के अनुसार तुरंत दूसरा शरीर मिल जाएगा। पुनर्जन्म का सिद्धान्त शत-प्रतिशत सत्य है।
(२) हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं, जिनका परिणाम निश्चित रूप से मिलता है। कर्मफलों का सिद्धान्त -- शत-प्रतिशत सत्य है। यह सृष्टि परमात्मा के मन का एक विचार है। हमारे विचार ही हमारे कर्म है जिनके अनुसार हमें उनके फल मिलते हैं।
(३) हम यह शरीर नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं। सारे देवी-देवता हमारे साथ एक हैं। कोई भी या कुछ भी हमारे से पृथक नहीं है। आगे की बात समझने के लिए हमें वीतराग और त्रिगुणातीत होना पड़ेगा। तभी हम सत्य को समझ सकेंगे। गीता के अनुसार --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥२:४५॥"
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आत्मवान होकर ही सत्य को समझ सकेंगे। अभी भी अनेक हमारी कमियाँ हैं, जिन्हें दूर करना ही पड़ेगा। परम सत्य परमात्मा को मैं नमन करता हूँ।
""त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥ "(गीता)
"वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥११:३९॥" (गीता)
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥" (गीता)
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमः शिवाय॥
कृपा शंकर
२२ जुलाई २०२४

Monday, 20 July 2026

यह संसार - मनुष्य रूप में आजकल भूत-पिशाचों से भरा हुआ है। जिधर देखो उधर चारों ओर अनेक नर-पिशाच घूम रहे हैं। अब अंजनेय का आश्रय लिया है। क्योंकि ---

यह संसार - मनुष्य रूप में आजकल भूत-पिशाचों से भरा हुआ है। जिधर देखो उधर चारों ओर अनेक नर-पिशाच घूम रहे हैं। अब अंजनेय का आश्रय लिया है। क्योंकि ---
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"भूत-पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे।"
"नाशे रोग हरे सब पीरा, जो सुमिरत हनुमत बलबीरा।"
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और चाहिए ही क्या?
"अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता, अस वर दीन जानकी माता।
राम रसायन तुम्हारे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥"
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हनुमान का अर्थ है अपने मान का हनन करना, निरहंकारी अभिमानरहित होना। इसके लिए निर्मल मति होना आवश्यक है। राम भी उसी को मिलते हैं जिसके मन में कोई छल-छिद्र नहीं होता, और जिसका निर्मल मन होता है। मन निर्मल कैसे हो? ---
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"जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपा निरमल मति पावउँ॥"
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"जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करो गुरुदेव की नाई॥
इतने से ही मन तृप्त हो गया है। अब कोई आकांक्षा नहीं रही है।
जय हनुमान, जय सियाराम !! २० जुलाई २०२२

भारत की रक्षा स्वयं भगवान कर रहे हैं, अन्यथा भारत कभी का नष्ट हो गया होता ---

भारत की रक्षा स्वयं भगवान कर रहे हैं, अन्यथा भारत कभी का नष्ट हो गया होता। भारत पर जितने प्रहार हुये हैं, उसके दस-लाखवें भाग जितना भी प्रहार किसी अन्य देश या संस्कृति पर होता तो वह नष्ट हो गई होती। भारत की रक्षा आध्यात्म ने की है। जब तक भारत में दस भी ऐसे व्यक्ति हैं जो भगवान से जुड़े हुए हैं, भारत कभी नष्ट नहीं हो सकता।

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आजकल एक पाकिस्तानी जासूस महिला के समाचारों से मीडिया भरा पड़ा है। ऐसी पता नहीं कितने देशों की कितनी जासूस भारत में हैं। पता नहीं कितने देशों के स्त्री/पुरुष जासूस कितने देशों में जासूसी कर रहे हैं। जासूसों से प्राप्त सूचनाओं की सहायता से ही सारे युद्ध जीते जाते हैं।
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एक इज़राइली जासूस एली कोहेन तो सीरिया का राष्ट्रपति बनने वाला था। इसकी घोषणा भी हो गई थी। राष्ट्रपति बनने से पूर्व उसे वहाँ का रक्षामंत्री बनाया जाने वाला था। ऐन मौके पर ही वह पकड़ा गया और उसे दमिश्क के सबसे बड़े चौराहे पर सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई।
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इस तथाकथित पाकिस्तानी जासूस सीमा हैदर का भारतीय पति सचिन गलती से एक वकील के पास सलाह लेने चला गया कि उनका कोर्ट में रजिस्टर्ड विवाह कैसे हो सकता है। उस वकील ने पुलिस को सूचित कर दिया। अन्यथा उस पाकिस्तानी महिला जासूस को किसी का बाप भी नहीं पकड़ सकता था। एक अनुमान के अनुसार भारत में कम से कम भी दो-तीन करोड़ अवैध घुसपैठिए हैं।
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भारत के पता नहीं कितने राजनेता और पत्रकार दूसरे देशों के लिए जासूसी करते हैं। हम सदा सजग और सतर्क रहें, व अपना स्वधर्म नहीं छोड़ें।
ॐ तत्सत् !!
२० जुलाई २०२३

जैसी भी आपकी श्रद्धा और विश्वास है, वैसे ही परमात्मा का निरंतर स्मरण करते रहें

 जैसी भी आपकी श्रद्धा और विश्वास है, वैसे ही परमात्मा का निरंतर स्मरण करते रहें

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ॐ नमः शिवाय विष्णु रूपाय, शिव रूपाय विष्णवे।
शिवस्य हृदयं विष्णुं, विष्णोश्च हृदयं शिवः॥ (स्कन्दपुराण)
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मैं विष्णुरूप शिव को, और शिवरूप विष्णु को नमन करता हूँ। शिव के हृदय में विष्णु हैं, और विष्णु के हृदय में शिव हैं। (जैसे शिव हैं वैसे ही विष्णु हैं, तथा जैसे विष्णु हैं वैसे ही शिव हैं। तत्व रूप में शिव और विष्णु में तनिक भी अंतर नहीं है।)
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जैसी भी आपकी श्रद्धा और विश्वास है वैसे ही परमात्मा का चिंतन, मनन, निदिध्यासन, और ध्यान कीजिये। परमात्मा के अनंत ज्योतिर्मय रूप का निरंतर स्मरण और उसमें स्वयं की पृथकता के बोध का समर्पण -- परमात्मा का ध्यान है। कौन क्या कहता है, इसकी परवाह न करते हुए, निरंतर परमात्मा के प्रियतम रूप का स्मरण करते रहें। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
*अर्थात् - हे पार्थ ! जो अनन्य चित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्य युक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
*भावार्थ - परमात्मा से अन्य कुछ भी नहीं है। जिस का चित्त निरंतर परमात्मा की चेतना में रहता है, उस नित्य समाधिस्थ को भगवान अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं।
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पूरी गीता का ही क्रमशः नित्य स्वाध्याय करें। सारा मार्गदर्शन प्राप्त हो जाएगा। सिर्फ परमात्मा पर ही निर्भर रहें। उनके सिवाय कोई अन्य नहीं है। कूटस्थ सूर्यमण्डल में अनन्यगामी चित्त द्वारा पुरुषोत्तम का ध्यान करें। सब कुछ इसी जीवन में प्राप्त हो जाएगा, यानि आप स्वयं इसी जीवन काल में परमात्मा को उपलब्ध हो जाएँगे।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जुलाई २०२४

यथार्थ में शिव ही गुरु हैं। गुरु-पूर्णिमा पर गुरु-परंपरा और शिव रूप में गुरु को नमन ---

 यथार्थ में शिव ही गुरु हैं। गुरु-पूर्णिमा पर गुरु-परंपरा और शिव रूप में गुरु को नमन

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ॐ गं गणपतये नमः॥ श्रीगुरवे नमः॥ श्रीपरमगुरवे नमः॥ श्रीपरात्परगुरवे नमः॥
श्रीपरमेष्ठिगुरवे नमः॥ श्रीपरमात्मने नमः॥"
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्।
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥"
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"ॐ ऐं गुरवे नमः॥" (गुरु ॐ)
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गुरु महाराज की प्रतीकात्मक "चरण पादुका" (खड़ाऊँ) की विधि-विधान से पूजा करें, और ध्यान करने के पश्चात समष्टि के कल्याण की प्रार्थना करें।
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"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥" (गीता)
"वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥११:३९॥" (गीता)
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥" (गीता)
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जब तक संतुष्टि न मिले, तब तक भगवान का खूब ध्यान करें। उन्हें अपनी स्मृति में हर समय रखें। जब भी समय मिले भगवान का स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करें। गीता में भगवान कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
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"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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हर घर में नित्य शिवपूजा और गीतापाठ अवश्य होना चाहिए। भगवान शिव देवाधिदेव हैं। उनकी पूजा से सभी देवी-देवताओं की पूजा हो जाती है।
श्रीमद्भगवद्गीता में सभी शास्त्रों का सार है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जुलाई २०२४

Saturday, 18 July 2026

'एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ---

 'एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति ---

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कल मध्यरात्रि में लगभग १.३० बजे सोते हुए अचानक ही नींद में एक विचार आया कि इस पूरी सृष्टि में मैं अकेला हूँ, मेरे से अन्य कोई नहीं है, और न कभी होगा।
"एकोहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति।" इस विचार से सोते हुए उठ गया। यह वेदवाक्य है, जिसका अभिप्राय है कि इस ब्रह्माण्ड मे एक ईश्वर ही है, अन्य कोई नहीं है। वही सब भूतों में है, वही सर्वत्र है, और जितने भी रूप दिखाई दे रहे हैं, सब में उसी की सत्ता है।
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इस नाम से नरेंद्र कोहली का लिखा हुआ एक उपन्यास भी है, जिसे मैंने नहीं पढ़ा है। मेरे ऊपर Jean-Paul Sartre नाम के पश्चिमी विचारक का भी कोई प्रभाव नहीं है, लेकिन उसकी उक्ति "hell is other people" यानि Other person is the hell बार बार दिमाग में आती रही। ध्यान में इसका अर्थ यही समझ में आया कि -- उपासना में एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी भी सत्ता का चिंतन "नर्क" है। मुझे लगा कि यह विचार मेरे अवचेतन मन से आया है। लेकिन गहराई में जाने से बोध हुआ कि मेरे लिए यह परमात्मा का एक संदेश है।
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मेरे जीवन की एक कुंठा है, जिससे मुझे भगवान ही मुक्त कर सकते हैं, और वे कर भी रहे है। मैं जीवन में विरक्त होना चाहता था, लेकिन इसके लिए कभी साहस नहीं जुटा पाया। इससे व्यक्तित्व कुंठित हो गया। लेकिन अब ईश्वर से अन्य कोई विचार मन में आता ही नहीं है, अतः वह कुंठा भी समाप्त हो रही है। इस संसार को ईश्वर की प्रकृति अपने नियमानुसार चला रही है। नियमों को न जानना हमारी भूल है। हमारा समर्पण सिर्फ परमात्मा के प्रति हो। गीता में भी भगवान यही कहते हैं --
"सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६:२४॥"
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६:२५॥"
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
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भगवान ही सर्वस्व है। वे सर्वदा सर्वत्र हैं। मेरा कोई पृथक अस्तित्व न रहे। मैं उनके साथ एक हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जुलाई २०२४

परमात्मा से प्रेम मेरा स्वभाव है, कोई आत्म-मुग्धता या अहंकार नहीं ---

 परमात्मा से प्रेम मेरा स्वभाव है, कोई आत्म-मुग्धता या अहंकार नहीं ---

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स्वभाववश मैं परमात्मा की महिमा का बखान करता रहता हूँ, जो अनंत है। मैं अपना जीवन परमात्मा में जी रहा हूँ, और परमात्मा ही मेरा यह जीवन जी रहे हैं। मैं जहाँ भी हूँ, वहीं परमात्मा हैं। मैं यह भौतिक शरीर नहीं, परमात्मा की अनंतता हूँ। पूर्व जन्मों के व इस जन्म के गुरु भी मुझ में ही समाहित हो गए हैं। अतः स्वयं भगवान ही यह जीवन जी रहे हैं। सभी का कल्याण हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ जुलाई २०२४

जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है, ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदपाठ है ---

 जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है, ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदपाठ है ---

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मैं वही लिख रहा हूँ जो मुझे पूरी तरह ठीक से समझ में आ रहा है। किसी को कुछ भी समझाने की चेष्टा नहीं करूंगा। आज पुरुषोत्तम मास के पहले दिन भगवान से मैं उनकी "अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति" और "वैराग्य" माँग रहा हूँ। यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। और कुछ भी नहीं चाहिए।
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भगवान कहते हैं कि यह संसाररूप वृक्ष ऊर्ध्वमूल वाला है। काल की अपेक्षा भी सूक्ष्म, सब का कारण, नित्य और महान् होने के कारण अव्यक्त मायाशक्तियुक्त "ब्रह्म" ही इसका मूल है। धर्म-अधर्म रूपी शाखाओं पर सुख-दुःख रूपी फूल इसमें लगे हुए हैं। इसके मूल को जो जान लेता है, वह वेद को जानने वाला है।
इसका अर्थ यही हुआ कि जो ब्रह्मज्ञ है वही वेदज्ञ है। ब्रह्म को जानने की साधना ही वेदाध्ययन यानि वेदपाठ है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जुलाई २०२३

Friday, 17 July 2026

स्वयं के साथ मौन का अवलोकन कीजिये, यह सबसे बड़ी साधना है ---

स्वयं के साथ मौन का अवलोकन कीजिये, यह सबसे बड़ी साधना है ---
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सारे शब्द सीमित हैं। मौन -- शाश्वत सत्य और विस्तार है। असत्य के लाखों शब्द हैं, लेकिन मौन का एक ही शब्द है। इसलिए शोर के झंझावात से बाहर निकल कर मौन का अवलोकन कीजिये। सूर्य, चन्द्र, आकाश और यह धरा सब मौन है। सारा ज्ञान, और सारे प्रश्नों के उत्तर मौन हैं। सारी शक्ति, सारी भक्ति, ध्यान, विरक्ति, प्रेम, करुणा, और सारे तत्व -- मौन हैं।
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इसलिए मौन रहते हुए हर आती-जाती सांस का अवलोकन कीजिये, और हर सांस के साथ यह भाव करें कि --- यह सारी सृष्टि, सारा विश्व और सारा अनंत विस्तार "मैं" हूँ, यह नश्वर देह नहीं।
उस मौन में से एक प्रणव की ध्वनि निःसृत हो रही है। उस ध्वनि को सुनते हुये उसका मानसिक जप भी करते रहें, और उसी में अपने स्वयं का विलय कर दें। वह मौन की ध्वनि और उस का अनंत विस्तार ही परमात्मा है। उस के साथ स्वयं को एक कर लीजिये। हम धन्य हो जाएँगे, हमारा जन्म सार्थक हो जाएगा। यह सबसे बड़ी सेवा और साधना है जो हम कर सकते हैं।
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमः शिवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ जुलाई २०२३

Wednesday, 15 July 2026

परमात्मा की अनंतता हमारी भी अनंतता है (हम स्वयं वह अनंतता है) --- .

परमात्मा की अनंतता हमारी भी अनंतता है (हम स्वयं वह अनंतता है) ---

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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम् ,
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिलक्ष्यम् |
एकं नित्यं विमलं अचलं सर्वधी साक्षिभूतम् ,
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गगुरुं तं नमामि ||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लङ्घयते गिरिं | यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ||"
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जिस तरह आकाश में विचरण करते हुए पक्षियों का कोई पदचिह्न या सुनिश्चित पथ नहीं होता, वे जहाँ पर भी हैं वहीँ से अपने लक्ष्य की ओर निकल पड़ते हैं वैसे ही भगवान के भक्त जहाँ पर भी हैं, वहीँ से अपने लक्ष्य परमात्मा की ओर चल पड़ते हैं| उनकी कोई शर्त नहीं होती| उन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन स्वयं परमात्मा से ही प्राप्त होता है| उनका समर्पण सिर्फ और सिर्फ परमात्मा के प्रति ही होता है| उन्हें आवश्यकता है सिर्फ प्रभु के प्रति अहैतुकी परम प्रेम, गहन अभीप्सा और समर्पण भाव की जो उन्हें प्रभु की अनंतता में प्रवेश करा ही देता है| जब प्रभु के प्रति परम प्रेम होगा तो यम-नियमादी सारे गुण स्वतः ही अपने आप खिंचे चले आते हैं|
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अपनी साधना से पूर्व अपने गुरु और गुरु परम्परा को प्रणाम करें| मेरुदंड उन्नत रहे यानि सीधे बैठें, शिवनेत्र होकर भ्रूमध्य में एक प्रकाश की कल्पना करें और उस प्रकाश को सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फैला दें| चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश है, कहीं भी अन्धकार नहीं है| जीभ को भी ऊपर की ओर पीछे मोड़ कर तालू से सटा दें| बिलकुल तनाव मुक्त हो जाएँ| अब यह भाव करें की वह समस्त सर्वव्यापी प्रकाश आप स्वयं ही हैं| सृष्टि में दूर से दूर भी जो प्रकाश है वह भी आप हैं| कुछ नक्षत्र ऐसे भी हैं जिनका प्रकाश करोड़ों वर्ष पूर्व चला था, जिसे पृथ्वी पर पहुँचने में अभी लाखों वर्ष और लग जायेंगे, वह प्रकाश भी आप ही हैं| दृष्टि बिना तनाव के भ्रूमध्य में ही रहे| बीच में एक-दो बार देह को देख लें और दृढ़ता से यह संकल्प करें कि आप यह देह नहीं हैं| आप परमात्मा की अनंतता हैं, और वह अनंत आकाश ही आपका घर है| सारी सृष्टि आपके अस्तित्व में समाहित है और आप सारी सृष्टि में व्याप्त हैं|
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हर सांस के साथ यह भाव करें कि आप वह सर्वव्यापी प्रकाश हैं| वह प्रकाश ही प्रभु का प्रेम है| आप स्वयं ही वह प्रेम हैं| जब सांस अन्दर जाए तो मानसिक रूप से दीर्घ "सोSSSSS" और सांस बाहर आये तब दीर्घ "हं....." का मानसिक रूप से जप करें| इससे विपरीत भी कर सकते हैं| यह अजपा-जप कहलाता है| जब भी समय मिले और जब भी दोनों नासिकाओं से सांस चल रही हो, इसका अभ्यास करें| यह भाव सदा रखने का अभ्यास करते रहें कि आप वह अनंत आकाश हैं और यथासंभव खूब अजपा-जप का अभ्यास करें|
{अगर नाक में कोई समस्या हो जैसे DNS या Allergy की तो उसका उपचार किसी अच्छे ENT सर्जन से करवा लें| हठयोग में भी नाक से सम्बंधित अनेक क्रियाएँ हैं जो नासिका मार्ग का शोधन करती हैं|}
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गुरुरूप ब्रह्म की परम कृपा से जिनकी कुण्डलिनी जागृत है, वे मेरुदंडस्थ सुषुम्ना नाड़ी में गुरु प्रदत्त बीजमंत्रों के साथ घनीभूत प्राणऊर्जा का मूलाधार से आज्ञाचक्र के मध्य अपनी गुरु परम्परानुसार सचेतन विचरण करें| आज्ञाचक्र योगियों का ह्रदय है| अपनी चेतना को प्रयासपूर्वक सदा आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य उत्तरा-सुषुम्ना में रखने का अभ्यास करें| वहीँ कूटस्थ में ध्यान करें| जब भ्रूमध्य में कूटस्थ ज्योति के दर्शन होने लगें तब शनेः शनेः उसे भी सहस्त्रार में अपनी चेतना के साथ ले जाएँ| आपकी चेतना आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में ही रहनी चाहिए| जब नाद की ध्वनी सुने उसे भी सहस्त्रार में ले जाइए| गुरुकृपा से जिनकी उत्तरा सुषुम्ना का द्वार खुल गया है वे उत्तरा सुषुम्ना में व इस से ऊपर ही ध्यान करें|
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गुरुकृपा से ब्रह्मरंध्र में ओंकार का ध्यान करते करते सर्वव्यापकता और भगवान शिव की अनुभूतियाँ होंगी| वहाँ जो ध्वनी सुनती है उसे सुनते रहो और ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का मानसिक जाप करते रहो| उस ध्वनि की लय से एकाकार हो जाओ|
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जब गुरुकृपा से विस्तार की अनुभूतियाँ होने लगें तब अभ्यास करते करते एक दिन गुरु का स्मरण कर सहस्त्रार से भी ऊपर उठ जाओ और अनंत आकाश में लाखों करोड़ों कोसों ऊपर चले जाओ| फिर लाखों करोड़ों कोसों दूर तक दायें और बाएं हर ओर दशों दिशाओं में फ़ैल जाओ| और धारणा करो कि यह अनंतता आप स्वयं हो| सारी सृष्टि आप में है और आप समस्त सृष्टि में हो| इस अनंतता की सीमा कहीं भी नहीं है पर केंद्र सर्वत्र है, और वह केंद्र स्वयं आप हो| यह गगन मंडल ही आपका घर है और आप स्वयं यह गगन मंडल हैं|
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कभी कभी अजपा-जाप करो, पर अधिकतः शिवस्वरूप ओंकार का ही ध्यान करो| शिव स्वरुप में अपनी स्वयं की आहुति दे दो यानि अपना सर्वस्व उन्हें समर्पित कर दें| अपना कुछ भी न हो, कोइ पृथकता न हो| यह भाव रखो की आप तो हो ही नहीं, सिर्फ भगवान शिव हैं, वे ही साधना कर रहे हैं| इस शिवभाव में दृढ़ता से रहो| साधक साध्य और साधन सब भगवान शिव हैं|
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जब गगन मंडल से मन भर जाए तब बापस अपने ह्रदय यानि आज्ञाचक्र में आ जाओ, और कभी भी बापस अपने घर उस गगन मंडल में चले जाओ| निरंतर शिवरूप गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ का मानसिक जप करते रहो| भगवान शिव और सारे गुरु आपकी सदा रक्षा और मार्गदर्शन करेंगे|
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जाति, वर्ण, कुल, आदि की चेतना से ऊपर उठो| जैसे विवाह के बाद एक विवाहिता स्त्री की जाति, वर्ण और गौत्र अपने पति का हो जाता है, वैसे ही आपकी जाति, वर्ण और गौत्र वो ही है जो परमात्मा का है| आप परमात्मा के हैं और परमात्मा आपके हैं जो सदा आपके साथ हैं|
ॐ ॐ ॐ |
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लगभग चालीस वर्ष पूर्व गणेशपुरी के स्वामी मुक्तानंद जी की पुस्तक 'चित्तशक्तिविलास' पढी थी जिसमें उन्होंने अपने स्वयं के परलोकगमन आदि के अनुभव लिखे थे, एक नीले नक्षत्र के दर्शन के बारे में भी लिखा था| नीले और श्वेत नक्षत्रों के दर्शन के बारे में अनेक योगियों ने भी लिखा है| स्वामी राम ने भी अनेक दिव्य अनुभव लिखें हैं| एक श्री 'M' ने भी अनेक दिव्य अनुभवों को लिखा है| परमहंस योगानंद ने भी अनेक दिव्य अनुभवों और चमत्कारों के बारे में लिखा है|
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इस बारे में मेरा यह निवेदन है कि हमें अपनी चेतना में इस तरह के अनुभवों की अपेक्षा ही नहीं करनी चाहिए क्योंकि हमारा लक्ष्य परमात्मा है, ये अनुभव नहीं| अपने अनुभव अपने गुरु या गुरुपरंपरा के किसी उन्नत संत के अतिरिक्त अन्य किसी से भी साझा नहीं करने चाहियें|
वैसे सभी उन्नत साधकों को अनेक चमत्कार और दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं पर उनकी परवाह नहीं करनी चाहिए| नीले और सफ़ेद सूक्ष्म लोकों के प्रकाश और पंचकोणीय श्वेत नक्षत्र के दर्शन सभी उन्नत साधकों को होते हैं| ये एक तरह के मील के पत्थर हैं और कुछ नहीं| अपनी चेतना को इनसे भी परे सिर्फ परमात्मा में ले जाना है|
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कहीं भी मत देखो, कुछ भी मत देखो, सिर्फ अपना लक्ष्य परमात्मा सदा दृष्टिपथ में रहे| गुरुकृपा ही केवलं| ॐ गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ गुरु ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ||
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ॐ नमः शिवाय | शिवोहं शिवोहं शिवोहं अयमात्मा ब्रह्म | ॐ ॐ ॐ ||
कृपाशंकर
१९ दिसंबर २०१५
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Tuesday, 14 July 2026

मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, और मेरे एकमात्र मित्र वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं। वे ही सब रूपों में आये, वे ही सर्वस्व यह सम्पूर्ण विश्व हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही गोविंद हैं, और वे ही यह "मैं" बने हुए हैं।

मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, और मेरे एकमात्र मित्र वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण हैं। वे ही सब रूपों में आये, वे ही सर्वस्व यह सम्पूर्ण विश्व हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही गोविंद हैं, और वे ही यह "मैं" बने हुए हैं।

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"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
"ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥" (विष्णु सहस्त्रनाम)
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यह सम्पूर्ण विश्व (सृष्टि) भगवान विष्णु हैं। जिनका यज्ञ और आहुतियों के समय आवाहन किया जाता है, उन्हें वषट्कार कहते हैं। भूतभव्यभवत्प्रभुः का अर्थ भूत, वर्तमान और भविष्य का स्वामी होता है। सब जीवों के निर्माता को भूतकृत् कहते हैं, और सभी जीवों के पालनकर्ता को भूतभृत्। आगे कुछ बचा ही नहीं है।
"ॐ विश्वं विष्णु:" --- बस इतना ही पर्याप्त है पुरुषोत्तम के गहनतम ध्यान में जाने के लिए॥ जो विष्णु हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं॥
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मैं प्रत्यगात्मा उन्हीं से निःसृत और उन्हीं से उद्भूत/उद्भासित हूँ। मेरी नियति भी उन्हीं में विलीन होना है। इस संसार में मैं एक शाश्वत आत्मा हूँ, जिसका स्वधर्म परमात्मा से परमप्रेम और परमात्मा को पूर्ण समर्पण है। यही मेरी पहिचान है। मेरा धर्म सनातन है, जिस से यह सम्पूर्ण सृष्टि संचालित है। मैं अपना सम्पूर्ण अंतःकरण और अस्तित्व वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित करता हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०२४
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जब भी समय मिले, अविच्छिन्न/अनन्य भाव से आप परमात्मा का ध्यान कीजिये, आप मुझे सदा अपने साथ ही पाओगे। मैं आपसे पृथक नहीं हूँ। परमात्मा में मैं आपके साथ एक हूँ। जब भी आप मुझे याद करोगे, मुझे वहीं अपने साथ पाओगे॥ ॐ ॐ ॐ !!

सब पीड़ाओं, दुःखों और कष्टों का स्वागत है; उनके आगमन से अब कोई परेशानी नहीं होती ---

 सब पीड़ाओं, दुःखों और कष्टों का स्वागत है; उनके आगमन से अब कोई परेशानी नहीं होती ---

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संत तुलसीदासजी ने लिखा है ---
"'कह हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई, जब तब सुमिरन भजन न होई।"
हनुमान जी महाराज भगवान श्रीराम को कहते हैं कि -- "हे प्रभु, जीवन में विपत्ति ही तब आती है, जब आपका भजन और सुमिरन नहीं होता है।"
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जिस दिन भगवान का भजन नहीं होता, उस दिन बड़ी भयंकर असह्य पीड़ा होती है, जो भगवान के भजन से ही दूर होती है। उस समय ऐसा लगता है जैसे मैं इस पृथ्वी पर एक पशु की तरह चरते हुए व्यर्थ ही यह जीवन नष्ट कर रहा हूँ। मेरे लिये तो इस संसार में सबसे बड़ा कष्ट ही भगवान का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान का नहीं होना है। अतः सब ओर से मन को हटाकर भगवान में ही लगाना पड़ेगा। स्वयं भगवान का भी यही निर्देश है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं ---
"सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६:२४॥"
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६:२५॥"
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
अर्थात् --
"संकल्प से उत्पन्न समस्त कामनाओं को नि:शेष रूप से परित्याग कर मन के द्वारा इन्द्रिय समुदाय को सब ओर से सम्यक् प्रकार वश में करके॥"
"शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥"
"यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे॥"
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समस्त कामनाओं से मुक्त हो कर धैर्ययुक्त बुद्धि से धीरे धीरे मन को सर्वव्यापी आत्मा में स्थित कर के अन्य किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे। यह योग की परम श्रेष्ठ विधि है। इस प्रकार योगाभ्यास के बल से योगी का मन आत्मा में ही शान्त हो जाता है। उपनिषदों की सहायता से इसे बहुत अच्छी तरह से समझाया जा सकता है। यह साधक की पात्रता पर निर्भर है कि वह कितना समझ सकता है। अतः किसी भी साधक को एक बार तो किन्हीं ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य से व्यक्तिगत मार्गदर्शन लेना ही पड़ेगा। "मूमुक्षुत्व और फलार्थित्व" -- दोनों साथ साथ नहीं चल सकते। जब मुमुक्षुत्व जागृत होता है तब शनैः शनैः कर्ताभाव और सब कामनाएँ नष्ट होने लगती हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०२४

Monday, 13 July 2026

कूटस्थ चैतन्य ..... (बहुत पुराना लेख)

 कूटस्थ चैतन्य ..... (बहुत पुराना लेख)

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"कूटस्थ" शब्द का प्रयोग भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में किया है| "कूटस्थ" को अविनाशी 'परम अव्यक्त' भी कह सकते हैं| वह जो सर्वत्र है, जिसने सर्वस्व का निर्माण किया है, पर कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं है, वह "कूटस्थ" है| उसकी चेतना "कूटस्थ चैतन्य" है| एक लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर "कूटस्थ" का नहीं| योग साधक, ध्यान में दिखाई देने वाले सर्वव्यापक विराट अनंत ज्योतिर्मय ब्रह्म और अनाहत नाद को "कूटस्थ" कहते हैं| जब ज्योतिर्मय चेतना सर्वव्यापक हो जाती है वह "कूटस्थ चैतन्य" कहलाती है| "कूटस्थ चैतन्य" में हम सदा परमात्मा के साथ हैं|
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शिवनेत्र होकर (बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीपतम लाकर भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर) अजपा-जप करते हुए साथ साथ प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का चिंतन करते रहें| विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होगी| ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में रहें| यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता| एक लघुत्तम जीवाणु से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता| यही "कूटस्थ" है, और इसकी चेतना ही "कूटस्थ चैतन्य" है| यह योगमार्ग की उच्चतम साधनाओं/उपलब्धियों में से है|
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आज्ञाचक्र योगी का ह्रदय है, भौतिक देह वाला ह्रदय नहीं| आरम्भ में ज्योति के दर्शन आज्ञाचक्र से थोड़ा सा ऊपर होते हैं, वह स्थान कूटस्थ बिंदु है| आज्ञाचक्र का स्थान Medulla Oblongata यानि मेरुशीर्ष के ऊपर खोपड़ी के मध्य में पीछे की ओर है| यही जीवात्मा का निवास है|
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यदि प्रभु के प्रति परमप्रेम, श्रद्धा-विश्वास और निष्ठा होगी तब निश्चित रूप से मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा, सहायता भी मिलेगी और रक्षा भी होगी| आवश्यकता है एक गहनतम अभीप्सा और परमप्रेम की|
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०१९

ब्रह्मचर्य ---

 ब्रह्मचर्य

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ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म यानि परमात्मा का सा आचरण, ब्र्ह्मचैतन्य में स्थिति, और हर उस कर्म से विमुखता जो ब्रह्म यानि परमात्मा से दूर करता है| यह योगदर्शन के पांच यमों में आता है और महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित पञ्च महाव्रतों में आता है जिन्हें पंचशील भी कहते हैं|
ब्रह्मचर्य का व्रत देवों को भी दुर्लभ है| ब्रह्मचर्य की महिमा को यदि मैं श्रुति, स्मृति, पुराणों व महाभारत से उद्धृत करूँ, या जैन साहित्य से उद्धृत करना आरम्भ करूँ तो इस लेख को कभी भी समाप्त नहीं कर पाऊँगा|
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प्राचीन काल में जब गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ब्रह्मचर्य अनिवार्य हुआ करता था, तब वीर, योद्धा, ज्ञानी व तपस्वी लोग होते थे, आज की तरह की घटिया मनुष्यता नहीं| जैसे दीपक का तेल-बत्ती के द्वारा ऊपर चढक़र प्रकाश के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर का ओज सुषुम्रा नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान-दीप्ति में परिणित हो जाता है|
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इस विषय पर अधिक नहीं लिखना चाहता क्योंकि इस विषय पर बहुत अधिक साहित्य और मार्गदर्शन उपलब्ध है| अपने खान-पान में, संगति में, अध्ययन में और वातावरण के प्रति सजग रहें| ऐसे कोई विचार न आने दें जिनसे ब्रह्मचर्य भंग हो| जो आध्यात्मिक साधक हैं, उन्हें इस विषय पर पर्याप्त मार्गदर्शन उपलब्ध है| उन्हें ऐसे लेखों की आवश्यकता नहीं है|
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सभी को शुभ कामनाएँ !
१३ जुलाई २०१९

परमशिव

 परमशिव...

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यह शब्द "परमशिव" मुझे अत्यधिक प्रिय है, पता नहीं क्यों? परमात्मा के लिए मैं या तो गीता के "वासुदेव" (समान रूप से सर्वत्र व्याप्त) शब्द का प्रयोग करता हूँ, या तंत्र और शैवागमों के शब्द "परमशिव" का| तत्वरूप में दोनों एक ही हैं, केवल शाब्दिक अर्थ पृथक-पृथक हैं| परमशिव का शाब्दिक अर्थ होता है ..... परम कल्याणकारी| परमशिव एक अनुभूति है जो तब होती है जब हमारे प्राणों की गहनतम चेतना (जिसे तंत्र में कुण्डलिनी महाशक्ति कहते हैं) सहस्त्रार चक्र और ब्रह्मरंध्र का भी भेदन कर परमात्मा की अनंतता में और उससे भी परे विचरण कर बापस लौट आती है| परमात्मा की वह अनंतता ही "परमशिव" है, जिसका ध्यान परम कल्याणकारी है| यह मुझ बुद्धिहीन अकिंचन को गुरुकृपा से ही समझ में आया है| गुरु के उपदेश और आदेश से ध्यान भी उस अनंतता का ही होता है, जो "परमशिव" है|
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परमात्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति पर ही हमें पूरा ध्यान देना चाहिए| शास्त्र हमें दिशा और प्रेरणा देते हैं पर अनुभूति तो उपासना में "परमशिव" की परमकृपा से ही होती है| उनकी परमकृपा होने पर सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है| "परमशिव" शब्द का प्रयोग तंत्रागमों में तो आचार्य शंकर ने "सौन्दर्य लहरी" ग्रंथ में, और शैवागमों में कश्मीर शैव दर्शन के आचार्य अभिनवगुप्त ने प्रत्यभिज्ञा दर्शन में किया है|
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स्वनामधन्य आचार्य शंकर अपने ग्रंथ "सौंदर्य लहरी" में लिखते हैं ...
"सुधा सिन्धोर्मध्ये सुरविटपवाटी परिवृते, मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणि गृहे|
शिवाकारे मञ्चे परमशिव पर्यङ्क निलयम्, भजन्ति त्वां धन्यां कतिचन चिदानन्द लहरीम्||"
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प्रख्यात वैदिक विद्वान श्री अरुण उपाध्याय के अनुसार अनाहत चक्र में कल्पवृक्ष के नीचे शिव रूपी मञ्च है| उसका पर्यङ्क परमशिव है| आकाश में सूर्य से पृथ्वी तक रुद्र, शनि कक्षा (१००० सूर्य व्यास तक सहस्राक्ष) तक शिव, उसके बाद १ लाख व्यास दूर तक शिवतर, सौर मण्डल की सीमा तक शिवतम है| आकाशगंगा में सदाशिव तथा उसके बाहर विश्व का स्रोत परमशिव है जिसने सृष्टि के लिये सङ्कल्प किया|
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एक शब्द "सदाशिव" है जिसका शाब्दिक अर्थ तो है सदा कल्याणकारी और नित्य मंगलमय| पर यह भी एक अनुभूति है जो विशुद्धि चक्र के भेदन के पश्चात होती है| ऐसे ही एक "रूद्र" शब्द है जिस में ‘रु’ का अर्थ है .... दुःख, तथा ‘द्र’ का अर्थ है .... द्रवित करना या हटाना| दुःख को हरने वाला रूद्र है| दुःख का भी शाब्दिक अर्थ है .... 'दुः' यानि दूरी, 'ख' यानि आकाश तत्व रूपी परमात्मा| परमात्मा से दूरी ही दुःख है और समीपता ही सुख है| रुद्र भी एक अनुभूति है जो ध्यान में गुरुकृपा से ही होती है|
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हमारे स्वनामधन्य महान आचार्यों को ध्यान में जो प्रत्यक्ष अनुभूतियाँ हुईं उनके आधार पर ही उन्होंने गहन दर्शन शास्त्रों की रचना की| हमारा जीवन अति अल्प है, पता नहीं कौन सी सांस अंतिम हो, अतः अपने हृदय के परमप्रेम को जागृत कर यथासंभव अधिक से अधिक समय परमात्मा के ध्यान में ही व्यतीत करना चाहिए| वे जो ज्ञान करा दें वह ही ठीक है, और जो न कराएँ वह भी ठीक है| उन परमात्मा को ही मैं 'परमशिव' के नाम से ही संबोधित करता हूँ ..... यही परमशिव शब्द का रहस्य है| उन परमशिव का भौतिक स्वरूप ही शिवलिंग है जिसमें सब का लीन यानि विलय हो जाता है, जिस में सब समाहित है|
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अंत में जगत्गुरु भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण को नमन करता हूँ जिन से बड़ा गुरु कोई अन्य नहीं है| उन का कथन है ...
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते| वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः||७:१९||"
गुरु महाराज को नमन, जिनकी कृपा से मेरे जैसा अकिंचन बुद्धिहीन भी शास्त्रों की चर्चा करने लगता है| ॐ तत्सत्||
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२०

(प्रश्न १) भवसागर क्या है? (प्रश्न 2) भवसागर को कैसे पार करें? ---

 (प्रश्न १) भवसागर क्या है? (प्रश्न 2) भवसागर को कैसे पार करें? --- .

(उत्तर १) भवसागर क्या है? :-- भव-सागर को इस उदाहरण से समझ सकते हैं -- हम खाते क्यों हैं? -- कमाने के लिए, और कमाते क्यों हैं? -- खाने के लिए। यह चक्र कभी समाप्त नहीं होता। यही भवसागर का एक छोटा सा रूप है। इस संसार से सुख की आशा ही हमें इस भवसागर में फँसाए रखती है, जो कभी किसी को नहीं मिलता। यह एक मृगतृष्णा है। हमारी कामनाएँ और वासनाएँ ही इस तृष्णा रूपी भवसागर का निर्माण करती हैं।
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कामनाओं ओर वासनाओं से मुक्त होना ही भवसागर को पार करना है। और भी स्पष्ट शब्दों में संसार की निःसारता को समझ कर, विषय-वासनाओं को त्याग कर परमात्मा के प्रेम में मग्न हो जाना ही -- भवसागर को पार करना है।
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(उत्तर २) भवसागर को कैसे पार करें? :-- श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में संत तुलसीदास जी ने भवसागर को पार करने की जो विधि भगवान श्रीराम के मुख से कहलवाई है, वह समझने में सबसे अधिक सरल है --
चौपाई :--
"नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।"
दोहा/सोरठा :--
"जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥"
इसका सार यह कि यह मनुष्य शरीर इस भवसागर को पार करने के लिए भगवान द्वारा दी हुई एक नौका है। सन्मुख वायु -- भगवान का अनुग्रह है। इस नौका के कर्णधार सदगुरु हैं। जो इस नौका को पाकर भी भवसागर को न तरे, उस से बड़ा अभागा अन्य कोई नहीं है।
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भवसागर पार करने का एक पंक्ति का सूत्र -- "सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो"।
गुरु तो स्वयं भगवान हैं, उन्हें कर्ता बनाओ, और सन्मुख मरुत यानि सामने जो ये सांसें चल रही हैं, उनसे निरंतर अजपा-जप करो। अजपा-जप क्या है? --
"सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आत्म अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥"
भावार्थ - 'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखंड (तैलधारावत कभी न टूटने वाली) वृत्ति है, वही (उस ज्ञानदीपक की) परम प्रचंड दीपशिखा (लौ) है। (इस प्रकार) जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है,॥
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सार की बात -- अपने परमात्व-तत्व में स्थिति ही भवसागर को पार करना है। यदि मेरी बात समझ में नहीं आई है तो किसी उच्च कोटि के संत-महात्मा के समक्ष बैठकर बड़ी विनम्रता से उनसे ज्ञान प्राप्त करें।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१३ जुलाई २०२१