Saturday, 25 July 2026

उसे लेकर मैं क्या करूँ जो मुझे अमर न बना सके ---

 उसे लेकर मैं क्या करूँ जो मुझे अमर न बना सके ---

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मेरी गति ब्रह्म ही हैं। ब्रह्म बन कर ही मैं ब्रह्म को जान सकता हूँ​। जिन के द्वारा मेरी वाणी बोलती है, जिन के द्वारा मेरी बुद्धि जानती है, जिन के द्वारा मेरी आँखे देखती हैं, जिन के द्वारा मेरे कान सुनते हैं, जो इस देह में साँसें ले रहे हैं, जिन की मैं उपासना करता हूँ, -- वे ही मेरे अवर्णनीय उपास्य परमब्रह्म परमात्मा हैं।
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बृहदारण्यकोपनिषद में महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि दृष्टा का दर्शन, और विज्ञाता का विज्ञान असम्भव है। क्योंकि जिस विज्ञाता के द्वारा यह सब कुछ जाना जाता है, उसे विषयरूप में कैसे जाना जा सकता है? ब्रह्म का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि ब्रह्म के द्वारा ही सब कुछ जाना जा सकता है। विज्ञाता का विषय के रूप में ज्ञान नहीं हो सकता।
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"नेति नेति" की परिणति "मौन" में है और मौन ही सर्वोच्च दर्शन है। पुत्रेषणा, लोकेषणा, और वित्तेषणा का त्याग कर हमें निर्दोष और सरल होकर मौन में रहना चाहिए। अंत में मौन तथा अमौन दोनों से ऊपर उठ कर अपरोक्षानुभूति में लीन हो जाना चाहिए।
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महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि मोक्ष हमारा निज-स्वरूप है। वह किसी नयी अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति नहीं है। आत्मज्ञान यानि ब्रह्मज्ञान ही मोक्ष है। आत्मा नित्यमुक्त है। बन्धन और मोक्ष दोनों ही अविद्या हैं।
जब तक जीवात्मा स्वयं को बद्ध मानता है, तब तक उसके लिए मोक्ष-प्राप्ति चरम लक्ष्य है। मोक्ष-प्राप्ति के लिए साधना करना परम आवश्यक है।
अपरोक्षानुभूति से भी आत्म-ज्ञान होता है। अविद्यानिवृत्ति होते ही आत्मतत्त्व अपने शुद्ध चैतन्य और अखण्ड आनन्दस्वरूप में प्रकाशित होता है।
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जो ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है। ब्रह्म की प्राप्ति यहीं, इसी लोक और इसी जन्म में हो सकती है। उस परम तत्त्व को यहीं प्राप्त किया जा सकता है। एक बार हम जीवन्मुक्त हो जायें -- तो प्रिय-अप्रिय, लौकिक सुख-दुःख हमारा स्पर्श भी नहीं कर सकते। हमें अपनी भौतिक देहों से मोह नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रारब्ध कर्मों का क्षय होने पर यह देह अपने आप ही छूट जाएगी। हमारी नियति विदेह और जीवनमुक्त होने की है।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०२३

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