जिनका बोझ था, उसे वे स्वयं ही उठा रहे हैं ---
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समय के साथ साथ सोच विचार भी बदलते रहते हैं। अब मेरी समस्याएँ दूसरी हैं। स्वयं की व्यक्तिगत समस्याएँ भी अनेक हैं, जिन्हें किसी के साथ साझा नहीं कर सकता।
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आध्यात्मिक समस्याएँ अनेक थीं, लेकिन भगवान ने अब अपने ऊपर सारी ज़िम्मेदारी ले ली है। सारी समस्याएँ अब उनकी हो गई हैं। एक ही काम भगवान ने मुझे यह सुनिश्चित करने को सौंपा है कि मेरे हृदय में उनके प्रति भक्ति और समर्पण का भाव जरा सा भी कम न हो। अब क्या करना है? वह मेरे और भगवान के बीच का निजी मामला है। अब से बचा-खुचा जो भी जीवन है, वह प्रियतम परमात्मा को समर्पित है।
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और लिखने के अब कुछ भी नहीं बचा है। मेरा अस्तित्व ही भगवान की अभिव्यक्ति है। जहाँ मैं हूँ, वहीं वे भी हैं। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०२२
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