मेरा स्वभाव भक्ति-प्रधान है। भक्ति शब्द का एकमात्र अर्थ है -- भगवान से परम प्रेम। कोई दूसरा अर्थ नहीं है। परमप्रेम में कोई शर्त या माँग नहीं होती, सिर्फ समर्पण होता है।
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भगवान एक अनुभूति है, जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। विष्णु-पुराण में "भगवान" को परिभाषित किया गया है, जिसकी व्याख्या अनेक आचार्यों ने की है।
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जब भगवान से प्रेम होता है, तब सारे सिद्धांत गौण हो जाते हैं। भगवान सब सिद्धांतों से ऊपर हैं। विभिन्न स्वनामधन्य आचार्यों ने सारे सिद्धांत बनाए हैं। भगवान किसी भी सिद्धांत के बंधन में नहीं हैं।
जो परमात्मा को पाने का मार्ग बता दे, और परमात्मा की अनुभूति करा दे, वही सद्गुरु है। शिष्यत्व -- एक सद्गुण है, जिसके बिना शिष्य कोई प्रगति नहीं कर सकता।
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जब भगवान से प्रेम होता है, तब सारे सिद्धांत गौण हो जाते हैं। भक्ति में नियमित निदिध्यासन बहुत आवश्यक है, इसके बिना भक्ति क्षीण होने लगती है। जब एक बर्तन से दूसरे बर्तन में तेल डालते हैं, तब तेल की धार खंडित नहीं होती। उसी तेल की धार की तरह अविछिन्न रूप से भगवान के चिंतन, मनन और श्रवण को निदिध्यासन कहते हैं।
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भगवान के समीप बैठना, उनकी उपासना है। स्वयं की पृथकता के बोध को भूलकर सिर्फ परमात्मा की चेतना में स्थिति ध्यान है। गीता में बताए हुए समत्व में अधिष्ठान, समाधि है।
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और अधिक जानने की आवश्यकता ही नहीं है। भगवान से जब परमप्रेम होता है, तब सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते है, कहीं कोई अंधकार नहीं रहता, सारे दीप अपने आप जल जाते हैं।
ॐ तत्सत् !!
२५ जुलाई २०२२
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