"सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः"
Friday, 26 June 2026
सत्य की विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य के द्वारा ही देवयान मार्ग (मोक्ष का मार्ग) प्रशस्त होता है ---
निज चेतना में यदि कुछ उपलब्ध होने को है तो वह "तुरीयातीत अवस्था" है ---
निज चेतना में यदि कुछ उपलब्ध होने को है तो वह "तुरीयातीत अवस्था" है, जिसमें साधक का पृथक अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाता है, और वह ईश्वर के साथ एक होता है। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, के पश्चात तुरीय अवस्था आती है, जिसमें साधक एक साक्षीमात्र हो जाता है, और उसका मन पूर्णतः शांत हो जाता है।
परमात्मा से हमारा क्या संबंध है?
यह प्रश्न ही असंगत यानी गलत है। संबंध वहीं होता है जहां कोई भेद होता है। यहाँ तो कोई भेद ही नहीं है, अतः संबंध होने या न होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। परमात्मा ही हमारा एकमात्र अस्तित्व है। यह बात मैं नहीं कह रहा, बल्कि श्रुति भगवती स्वयं सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद (६.२.३) में कह रही है --
प्रश्नोपनिषद के ऊपर एक लघु चर्चा ---
प्रश्नोपनिषद के ऊपर एक लघु चर्चा ---
जो सर्वात्म-भाव में हैं, वे ईश्वर के साथ एक हैं ---
अब तक आप के हृदय में ईश्वर के प्रति एक परमप्रेम जागृत हो गया होगा, जिसमें आप उनके सौन्दर्य, माधुर्य और परमप्रेम में डूब गये होंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ है तो यह एक अति गंभीर चिंता का विषय है। आप प्रयासपूर्वक निरंतर उनके प्रेमसिंधु में डूबे रहें, यही उनकी बड़ी से बड़ी उपासना है। आपके और उनके बीच में केवल प्रेम का रस रहना चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं। उस प्रेमरस में पूरी तरह डूब जाएँ, कहीं कोई भेद न रहे। गीता में भगवान कहते हैं --
आजकल ब्राह्मणों के विरुद्ध बहुत अधिक भेदभाव, अन्याय और दुष्प्रचार हो रहा है।
आजकल ब्राह्मणों के विरुद्ध बहुत अधिक भेदभाव, अन्याय और दुष्प्रचार हो रहा है। दुर्भाग्य से यह सत्य है। ईसाई मज़हब के प्रचारकों ने सनातन हिन्दू धर्म को नष्ट करने के लिए सर्वप्रथम ब्राह्मणों की संस्था को समाप्त करने की पूरी चेष्टा की, और अभी भी कर रहे हैं। उन्होंने हिन्दू धर्मग्रन्थों को प्रक्षिप्त किया, ब्राह्मणों के विरुद्ध बहुत अधिक दुष्प्रचार किया, और बहुत बड़ी संख्या में ब्राह्मणों की हत्याएँ की। उनके द्वारा लिखे गए झूठे इतिहास को अब भी पढ़ाया जाता है। इतना अधिक असत्य फैलाया गया है, और अभी भी फैलाया जा रहा है, जिसका दुष्परिणाम ब्राह्मणों के विरुद्ध हो रहा अत्याचार है।
ब्राह्मण एक विशेष रचना है भगवान की ---
ब्राह्मण एक विशेष रचना है भगवान की ---
मैं फेसबुक और सोशल मीडिया पर क्यों आया, और क्यों हूँ?
मैं फेसबुक और सोशल मीडिया पर क्यों आया, और क्यों हूँ?
जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम। घर हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम॥
जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम। घर हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम॥
जाने-अनजाने में कभी किसी जन्म में कोई पुण्य किया होगा जो अब फलीभूत हो रहा है।
जाने-अनजाने में कभी किसी जन्म में कोई पुण्य किया होगा जो अब फलीभूत हो रहा है। प्रातःकाल मैं सोकर नहीं उठता। स्वयं परमात्मा ही सोकर उठते हैं। निरंतर उन्हीं की चेतना बनी रहती है। अब जीवन का हरेक क्षण वे ही जी रहे हैं। भगवान ने मुझे सब कर्तव्यों से मुक्त कर दिया है। मेरा इस जीवन अब कोई कर्तव्य अवशिष्ट नहीं है। मेरा एकमात्र कर्तव्य निज जीवन में उन्हें निरंतर व्यक्त करना है, अन्य कोई कर्तव्य नहीं है। उनकी चेतना समष्टि में व्याप्त हो। किसी अन्य का कोई अस्तित्व नहीं है। अब पीछे मुड़कर देखने का अवकाश नहीं है। सामने भगवान स्वयं बिराजमान हैं। अब जीवन परमात्ममय है। उनके सिवाय कुछ भी अन्य नहीं है। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
यह सारा ब्रह्मांड / सारी सृष्टि -- हमारी देह है ---
यह सारा ब्रह्मांड / सारी सृष्टि -- हमारी देह है ---
"पुरुषोत्तम" शब्द का अर्थ जो मुझे समझ में आया है --
"पुरुषोत्तम" शब्द का अर्थ जो मुझे समझ में आया है --
भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं ---
भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं। धर्म-निरपेक्षता का अर्थ है -- अधर्म-सापेक्षता। भारत की अस्मिता "सनातन-धर्म" है।सनातन धर्म ही भारत है, और भारत ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म का उत्थान ही भारत का उत्थान है, और सनातन धर्म का पतन ही भारत का पतन है। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है। रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ ही भारत के प्राण हैं। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में जो आश्वासन दिया है, उसी पर आस्था और श्रद्धा-विश्वास के कारण हम जीवित हैं। अन्यथा अब तक जीवित रहने का अन्य कोई कारण नहीं है।
एक बार अपने गंतव्य पर पहुँच जाने के पश्चात किसी मार्गदर्शिका की आवश्यकता नहीं पड़ती।
एक बार अपने गंतव्य पर पहुँच जाने के पश्चात किसी मार्गदर्शिका की आवश्यकता नहीं पड़ती। भगवान जब स्वयं ही हमारे समक्ष हैं तो किसी मार्गदर्शक सिद्धांत की अब और आवश्यकता नहीं है। उनके अमृतसिंधु में डूबकर स्वयं अमृतमय हो जाएँ।
हमारे सब दुःखों, अभावों, पीड़ाओं, और कष्टों का एकमात्र कारण परमात्मा से हमारी दूरी है। इसका प्रमाण वेदों में है।
गीता का पुरुषोत्तम योग ---
गीता का पुरुषोत्तम योग ---
.जो सारी सृष्टि में व्याप्त है, जिससे यह सारी सृष्टि निर्मित हुई है, भगवान विष्णु का वह विराटतम अनंत रूप ही पुरुषोत्तम है। पूर्ण परमप्रेम यानि पूर्ण भक्ति से आप विष्णु के इस अनंत रूप का ध्यान कीजिये, आप निहाल व कृतकृत्य हो जाओगे। सारी साधनाओं का सार व उनकी अंतिम परिणिति यह पुरुषोत्तम योग है। जो पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं। तत्व रूप में उनमें कोई भेद नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता का सार पुरुषोत्तम योग है। जितनी क्षमता भगवान ने दी है, उसका सदुपयोग कीजिये। ॐ तत् सत् !!
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श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ৷৷15.1৷৷
भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा इस वृक्ष के पत्ते वैदिक स्तोत्र है, जो इस अविनाशी वृक्ष को जानता है वही वेदों का जानकार है। ৷৷15.1৷৷
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अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ৷৷15.2৷৷
भावार्थ : इस संसार रूपी वृक्ष की समस्त योनियाँ रूपी शाखाएँ नीचे और ऊपर सभी ओर फ़ैली हुई हैं, इस वृक्ष की शाखाएँ प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा विकसित होती है, इस वृक्ष की इन्द्रिय-विषय रूपी कोंपलें है, इस वृक्ष की जड़ों का विस्तार नीचे की ओर भी होता है जो कि सकाम-कर्म रूप से मनुष्यों के लिये फल रूपी बन्धन उत्पन्न करती हैं৷৷15.2৷৷
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न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा৷৷15.3৷৷
भावार्थ : इस संसार रूपी वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत में नहीं किया जा सकता है क्योंकि न तो इसका आदि है और न ही इसका अन्त है और न ही इसका कोई आधार ही है, अत्यन्त दृड़ता से स्थित इस वृक्ष को केवल वैराग्य रूपी हथियार के द्वारा ही काटा जा सकता है৷৷15.3৷৷
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ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी৷৷15.4৷৷
भावार्थ : वैराग्य रूपी हथियार से काटने के बाद मनुष्य को उस परम-लक्ष्य (परमात्मा) के मार्ग की खोज करनी चाहिये, जिस मार्ग पर पहुँचा हुआ मनुष्य इस संसार में फिर कभी वापस नही लौटता है, फिर मनुष्य को उस परमात्मा के शरणागत हो जाना चाहिये, जिस परमात्मा से इस आदि-रहित संसार रूपी वृक्ष की उत्पत्ति और विस्तार होता है৷৷15.4৷৷
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निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्৷৷15.5৷৷
भावार्थ : जो मनुष्य मान-प्रतिष्ठा और मोह से मुक्त है तथा जिसने सांसारिक विषयों में लिप्त मनुष्यों की संगति को त्याग दिया है, जो निरन्तर परमात्म स्वरूप में स्थित रहता है, जिसकी सांसारिक कामनाएँ पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी है और जिसका सुख-दुःख नाम का भेद समाप्त हो गया है ऎसा मोह से मुक्त हुआ मनुष्य उस अविनाशी परम-पद (परम-धाम) को प्राप्त करता हैं৷৷15.5৷৷
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न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम৷৷15.6৷৷
भावार्थ : उस परम-धाम को न तो सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा प्रकाशित करता है और न ही अग्नि प्रकाशित करती है, जहाँ पहुँचकर कोई भी मनुष्य इस संसार में वापस नहीं आता है वही मेरा परम-धाम है৷৷15.6৷৷
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श्रीभगवानुवाच
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति৷৷15.7৷৷
भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में प्रत्येक शरीर में स्थित जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है, जो कि मन सहित छहों इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति के अधीन होकर कार्य करता है ৷৷15.7৷৷
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शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्৷৷15.8৷৷
भावार्थ : शरीर का स्वामी जीवात्मा छहों इन्द्रियों के कार्यों को संस्कार रूप में ग्रहण करके एक शरीर का त्याग करके दूसरे शरीर में उसी प्रकार चला जाता है जिस प्रकार वायु गन्ध को एक स्थान से ग्रहण करके दूसरे स्थान में ले जाती है৷৷15.8৷৷
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श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते৷৷15.9৷৷
भावार्थ : इस प्रकार दूसरे शरीर में स्थित होकर जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन की सहायता से ही विषयों का भोग करता है৷৷15.9৷৷
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उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः৷৷15.10৷৷
भावार्थ : जीवात्मा शरीर का किस प्रकार त्याग कर सकती है, किस प्रकार शरीर में स्थित रहती है और किस प्रकार प्रकृति के गुणों के अधीन होकर विषयों का भोग करती है, मूर्ख मनुष्य कभी भी इस प्रक्रिया को नहीं देख पाते हैं केवल वही मनुष्य देख पाते हैं जिनकी आँखें ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो गयी हैं৷৷15.10৷৷
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यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः৷৷15.11৷৷
भावार्थ : योग के अभ्यास में प्रयत्नशील मनुष्य ही अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को देख सकते हैं, किन्तु जो मनुष्य योग के अभ्यास में नहीं लगे हैं ऐसे अज्ञानी प्रयत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं देख पाते हैं৷৷15.11৷৷
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यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्৷৷15.12৷৷
भावार्थ : हे अर्जुन! जो प्रकाश सूर्य में स्थित है जिससे समस्त संसार प्रकाशित होता है, जो प्रकाश चन्द्रमा में स्थित है और जो प्रकाश अग्नि में स्थित है, उस प्रकाश को तू मुझसे ही उत्पन्न समझ৷৷15.12৷৷
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गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः৷৷15.13৷৷
भावार्थ : मैं ही प्रत्येक लोक में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सभी प्राणीयों को धारण करता हूँ और मैं ही चन्द्रमा के रूप से वनस्पतियों में जीवन-रस बनकर समस्त प्राणीयों का पोषण करता हूँ৷৷15.13৷৷
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अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्৷৷15.14৷৷
भावार्थ : मैं ही पाचन-अग्नि के रूप में समस्त जीवों के शरीर में स्थित रहता हूँ, मैं ही प्राण वायु और अपान वायु को संतुलित रखते हुए चार प्रकार के (चबाने वाले, पीने वाले, चाटने वाले और चूसने वाले) अन्नों को पचाता हूँ৷৷15.14৷৷
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सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ৷৷15.15৷৷
भावार्थ : मैं ही समस्त जीवों के हृदय में आत्मा रूप में स्थित हूँ, मेरे द्वारा ही जीव को वास्तविक स्वरूप की स्मृति, विस्मृति और ज्ञान होता है, मैं ही समस्त वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ, मुझसे ही समस्त वेद उत्पन्न होते हैं और मैं ही समस्त वेदों को जानने वाला हूँ৷৷15.15৷৷
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द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ৷৷15.16৷৷
भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में दो प्रकार के ही जीव होते हैं एक नाशवान (क्षर) और दूसरे अविनाशी (अक्षर), इनमें समस्त जीवों के शरीर तो नाशवान होते हैं और समस्त जीवों की आत्मा को अविनाशी कहा जाता है৷৷15.16৷৷
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उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः৷৷15.17৷৷
भावार्थ : परन्तु इन दोनों के अतिरिक्त एक श्रेष्ठ पुरुष है जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह अविनाशी भगवान तीनों लोकों में प्रवेश करके सभी प्राणीयों का भरण-पोषण करता है৷৷15.17৷৷
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यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः৷৷15.18৷৷
भावार्थ : क्योंकि मैं ही क्षर और अक्षर दोनों से परे स्थित सर्वोत्तम हूँ, इसलिये इसलिए संसार में तथा वेदों में पुरुषोत्तम रूप में विख्यात हूँ৷৷15.18৷৷
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यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ৷৷15.19৷৷
भावार्थ : हे भरतवंशी अर्जुन! जो मनुष्य इस प्रकार मुझको संशय-रहित होकर भगवान रूप से जानता है, वह मनुष्य मुझे ही सब कुछ जानकर सभी प्रकार से मेरी ही भक्ति करता है৷৷15.19৷৷
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इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ৷৷15.20৷৷
भावार्थ : हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह शास्त्रों का अति गोपनीय रहस्य मेरे द्वारा कहा गया है, हे भरतवंशी जो मनुष्य इस परम-ज्ञान को इसी प्रकार से समझता है वह बुद्धिमान हो जाता है और उसके सभी प्रयत्न पूर्ण हो जाते हैं৷৷15.20৷৷
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ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥
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पुनश्च: --- सर्व कालव्यापी निज परम चैतन्य में ईश्वर की चेतना का निरंतर विस्तार ही इस जीवन का उद्देश्य है। अपने प्रारब्ध कर्मों के भोग के लिए यह अति अति कष्टमय जन्म लिया था। अगले जन्म में जन्म से ही ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की पूर्णता हो, यह ईश्वर से प्रार्थना है।
८ जून २०२५ को "पुरुषोत्तम" शब्द के अपनी समझ के अनुसार मैंने ३ अर्थ बताए थे। उनका अवलोकन एक बार अवश्य कर लीजिये। .
ब्राह्मणत्व का ह्रास ही राष्ट्र का पतन है ---
जहां तक मेरी सोच है, भारत और सनातन-धर्म दोनों आपस में गूँथे हुए एक ही हैं। भारत की उन्नति वर्णाश्रम-व्यवस्था से थी। मैं यहाँ ब्राह्मण जाति की बात नहीं कर रहा, ब्राह्मणत्व की बात कर रहा हूँ। जिस दिन से भारत में अंग्रेजों ने गुरुकुल शिक्षा पद्धति समाप्त की, ब्राह्मणत्व का ह्रास आरंभ हुआ और अब ब्राह्मणत्व लगभग समाप्त हो चुका है। उसके अवशेष ही बाकी बचे हैं। ब्राह्मणत्व ही अन्य सब वर्णों का मार्गदर्शन करता था। भारत के उत्थान का कारण ब्राह्मणत्व की प्रखरता थी। ब्राह्मणत्व का ह्रास ही राष्ट्र का पतन है।
परमात्मा की एक शक्ति है जिसने इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण कर रखा है, प्राण रूप में समस्त चैतन्य वे स्वयं हैं, उपासना उन्हीं की करें ---
"मांगतोड़ा" शब्द का अर्थ -- राजस्थान में मांगतोड़ा या मांगतोड़ उस व्यक्ति को कहते हैं जो दूसरों से हमेशा कुछ-न-कुछ मांगने की आदत रखता है। जब कोई व्यक्ति बार-बार लोगों से कुछ न कुछ मांगता रहता है, उसे मांगतोड़ा या मांगतोड़ कहा जाता है। ऐसे ही परमात्मा का एक परम ज्योतिर्मय रूप है जो हमारे भीतर के तमस को दूर करता है, उसी का ध्यान करें, और उसी को जीवन में अवतरित करें। परमात्मा से कुछ भी नहीं मांगें, अपितु अपना सम्पूर्ण अस्तित्व उन्हें समर्पित कर दें।
ईश्वर को प्रसन्न करने का एकमात्र मार्ग ---
ईश्वर को प्रसन्न करने का एकमात्र मार्ग ---
नित्य नियमित ध्यान-साधना बहुत अधिक आवश्यक है ---
नित्य नियमित ध्यान-साधना बहुत अधिक आवश्यक है ---
२१ जून को ही भारत में योग-दिवस क्यों मनाया जाता है ?
२१ जून को ही भारत में योग-दिवस क्यों मनाया जाता है ?
अति निकट भविष्य में भारत एक सतोगुण प्रधान अति पराक्रमी देश होगा, जहाँ असत्य के अंधकार का कोई अवशेष नहीं रहेगा।
अति निकट भविष्य में भारत एक सतोगुण प्रधान अति पराक्रमी देश होगा, जहाँ असत्य के अंधकार का कोई अवशेष नहीं रहेगा। ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति सभी के जीवन में होगी। हमारी सारी आध्यात्मिक साधना इसी उद्देश्य के लिए है। हमारा उच्चतम दायित्व परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण है। सबसे बड़ी सेवा जो हम समाज, राष्ट्र और दूसरों के लिए कर सकते हैं, वह है परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण। जिस प्रकार एक इंजन अपने ड्राइवर के हाथों में सब कुछ सौंप देता है, एक विमान अपने पायलट के हाथों में सब कुछ सौंप देता है वैसे ही हम चाहते हैं कि हमारी अपनी सम्पूर्ण सत्ता परमात्मा के हाथों में हो। ॐ तत् सत् !!
भगवान के वास्तविक भक्त केवल वर्तमान में जीते हैं। उनका भूतकाल से कोई संबंध नहीं होता।
भगवान के वास्तविक भक्त केवल वर्तमान में जीते हैं। उनका भूतकाल से कोई संबंध नहीं होता।
ईश्वर से ईश्वर के अतिरिक्त हमें कुछ अन्य चाहिए ही नहीं ---
ईश्वर से ईश्वर के अतिरिक्त हमें कुछ अन्य चाहिए ही नहीं ---
आपसे दिल लगाकर देख लिया। अब देखने को और कुछ भी नहीं बचा है।
आपसे दिल लगाकर देख लिया। अब देखने को और कुछ भी नहीं बचा है।
हमारी कोई आयु नहीं हो सकती। हमारा जन्म ही नहीं हुआ तो आयु कैसे हो सकती है?
वह परिवर्तन हम स्वयं हैं जो विश्व में होते हुए देखना चाहते हैं। अन्धकार का सकारात्मक प्रतिकार निरंतर होते रहना चाहिये। पूरे विश्व में उथल-पुथल हो जाये, या सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाये, हमारे ह्रदय में शान्ति बनी रहनी चाहिये। यह तभी संभव है जब हम निरंतर कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी स्थिति में रहें। परमात्मा की शक्ति -- सृष्टि की धारा को बदलने में पूर्णतः सक्षम है। कमी हमीं में है। हम उनका स्मरण नहीं करते, उनके प्रति समर्पित होकर नहीं रहते।
"अहं ब्रह्मास्मि" यानि मैं ब्रह्म हूँ, या "शिवोहं" यानि मैं शिव हूँ; यह कहना अहंकार नहीं है। अहंकार है स्वयं को यह देह, मन, और बुद्धि समझ लेना।
"अहं ब्रह्मास्मि" यानि मैं ब्रह्म हूँ, या "शिवोहं" यानि मैं शिव हूँ; यह कहना अहंकार नहीं है। अहंकार है स्वयं को यह देह, मन, और बुद्धि समझ लेना।