Friday, 26 June 2026

ब्राह्मण एक विशेष रचना है भगवान की ---

 ब्राह्मण एक विशेष रचना है भगवान की ---

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भगवान ने "ऊँ", "तत्", और "सत्" ये अपने तीन नाम बताए हैं। और यह भी बताया है कि इनसे उन्होंने "ब्राह्मण", "वेद", और "यज्ञ" की रचना की है। सृष्टि के त्वरित विकास के लिए भगवान ने ब्राह्मण की एक विशेष रचना की है।
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मैं जो लिख रहा हूँ, यह भगवान का आश्वासन है। ब्राह्मण अपना धर्म न छोड़ें। ब्राह्मण का सर्वोपरी धर्म है —"ब्रह्म का अनुसंधान"। आप ब्रह्मज्ञ होंगे तो देवता भी आपके समक्ष झुकेंगे। गीता में भगवान कहते हैं --
"ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥१७:२३॥"
अर्थात् -- 'ऊँ, तत् सत्' ऐसा यह ब्रह्म का त्रिविध निर्देश (नाम) कहा गया है; उसी से आदिकाल में (पुरा) ब्राहम्ण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं॥
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भगवान ने ब्राह्मण के ये स्वभाविक कर्म बतलाए हैं ---
"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥१८:४२॥"
अर्थात् -- शम, दम, तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य - ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं॥
Serenity, self-restraint, austerity, purity, forgiveness, as well as uprightness, knowledge, wisdom and faith in God -- these constitute the duty of a spiritual Teacher.
मन का निग्रह करना, इन्द्रियों को वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतर से शुद्ध रहना; दूसरों के अपराध को क्षमा करना; शरीर, मन आदि में सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधि को अनुभव में लाना; और परमात्मा, वेद आदि में आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं।
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इस विषय पर एक विस्तृत लेख पहिले भी लिखा था। अब उसकी आवश्यकता नहीं है। हमारे शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण का उच्चतम कर्तव्य -- "ब्रह्म का अनुसंधान" यानि "संध्या, गायत्री, प्राणायाम व सविता देव की भर्गः ज्योति का गहनतम ध्यान" है। इस विषय पर मैंने खूब स्वाध्याय किया है। यदि किसी को कण मात्र भी संशय है तो मनुस्मृति, उपनिषदों, वैशेषिक-सूत्रों व महाभारत का स्वाध्याय करें। क्षत्रिय राजाओं के राज्य में राजा का राज्याभिषेक तभी होता था जब वह धर्मरक्षा की प्रतिज्ञा करता था। धर्म की रक्षा करना सभी वर्णों का परमधर्म है। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२६

मैं फेसबुक और सोशल मीडिया पर क्यों आया, और क्यों हूँ?

 मैं फेसबुक और सोशल मीडिया पर क्यों आया, और क्यों हूँ?

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स्वयं को, यानी स्वयं के विचारों व भावनाओं को व्यक्त करने की एक अभिलाषा थी; जिसने मुझे फ़ेसबुक व अन्य सोशल मीडिया की ओर आकर्षित किया। इससे मुझे अनेक मित्र व शुभचिंतक मिले जो अन्यथा कहीं पर भी नहीं मिल सकते थे। अब मैं पूर्णतः तृप्त और संतुष्ट हूँ। किसी से कुछ भी नहीं चाहिए। मैं सभी को उनकी मंगलमय शुभ कामनाओं के लिए साभार धन्यवाद देता हूँ।
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मेरा चिंतन और मेरे विचार आध्यात्मिक हैं। आध्यात्मिक विचारों के लोगों का मिलना बड़ा दुर्लभ होता है। सर्वव्यापी व सर्वस्व भगवान स्वयं ही मेरे गुरु हैं, जिनके आदेश का पालन करने की अब चेष्टा कर रहा हूँ। उनका आदेश है कि मैं दिन में यदि एक घंटे स्वाध्याय करूँ तो उससे आठ गुणा अधिक यानि कम से कम आठ घंटे परमब्रह्म परमात्मा का ध्यान करूँ। परमब्रह्म स्वयं ही यह सृष्टि बन गए हैं, और हमारा उच्चतम कर्तव्य उनका साक्षात्कार करना है। यही मेरा स्वधर्म है। इस जीवन का अधिक समय नहीं बचा है। जो भी समय बचा है, वह परमात्मा को पूर्णतः समर्पित है।
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सूक्ष्म जगत की अनेक अवर्णनीय दुर्लभ अनुभूतियाँ मुझे गुरुकृपा से हुई हैं। उन्होंने क्या कहा? अब इसका कोई महत्व नहीं है। वे क्या हैं? महत्व केवल इसी का है। ऊर्ध्व कूटस्थ सूर्यमण्डल में परमब्रह्म परमात्मा का ध्यान करते करते ब्रह्मरंध्र के मार्ग से एक दिन स्वतः ही इस शरीर महाराज का साथ छूट जाएगा। वह वास्तविक स्वतंत्रता होगी जिसमें मैं सभी के साथ एक होऊंगा। घनीभूत प्राण-तत्व के रूप में जगन्माता जब तक इस देह में विचरण कर रही हैं, तब तक यह देह जीवंत है। जगन्माता मुझे एक और अवसर दे रही हैं, परमशिव पुरुषोत्तम से साक्षात्कार करने का। क्या आभार व्यक्त करूँ जगन्माता का ? उनकी कृपा असीम है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ जून २०२६

जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम। घर हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम॥

 जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम। घर हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम॥

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मनुस्मृति में और श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान ने चार वर्ण ही बताए हैं। लेकिन भारत का विधान सैंकड़ों जातियाँ बताता है। संविधान का अर्थ होता है -- समान विधान। लेकिन यहाँ तो संविधान नहीं, बहुविधान है। अगड़ा, पिछड़ा, अति-पिछड़ा, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, विशेष पिछड़ी जाति, अल्प-संख्यक, बहू-संख्यक आदि अनेक जातियाँ हैं। हिंदुओं में भी सैंकड़ों जातियाँ हैं और मुसलमानों में भी सैकड़ों जातियाँ हैं। जातिगत आरक्षण बंद हो जाये और सरकारी कागचों में जाति का उल्लेख बंद हो जाये तो जातिवाद स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन जातिवाद को कोई समाप्त नहीं करना चाहता। यहाँ तो विधर्मी भी कोट पर जनेऊ पहिनते हैं, और स्वयं को उस गौत्र का ब्राह्मण बताते हैं जिस का कोई अस्तित्व ही नहीं है। उनका एकमात्र उद्देश्य भारत को तोड़कर यहाँ शासन करना, और देश को लूटना है।
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सारी सृष्टि ब्रह्ममय है, अतः हमारी एक ही जाति है, और हमारे माता-पिता भी राम ही हैं। सृष्टि का अनंत विस्तार ही महाशून्य है जो हमारा घर है। हमारी साधना भी मूल रूप से एक ही है जिसे अनाहद नाद का श्रवण कहते हैं। लोग हिमालय में क्यों जाते हैं ? सिर्फ इसीलिए जाते हैं कि वहाँ विस्तार की अनुभूति होती है और अनाहत नाद की ध्वनि स्वतः ही हर समय सुनाई देती है। मैं स्वयं अनेक बार अल्मोड़ा जिले के रानीखेत क्षेत्र में दूनागिरी पर्वत की ओर साधना के उद्देश्य से गया हूँ। वहाँ परमात्मा का ध्यान भी स्वतः ही हो जाता है, और ध्यान लगते ही प्रणव की ध्वनि भी अंतर में स्वतः ही गूंजने लगती है। कृपा शंकर २ जून २०२६

जाने-अनजाने में कभी किसी जन्म में कोई पुण्य किया होगा जो अब फलीभूत हो रहा है।

 जाने-अनजाने में कभी किसी जन्म में कोई पुण्य किया होगा जो अब फलीभूत हो रहा है। प्रातःकाल मैं सोकर नहीं उठता। स्वयं परमात्मा ही सोकर उठते हैं। निरंतर उन्हीं की चेतना बनी रहती है। अब जीवन का हरेक क्षण वे ही जी रहे हैं। भगवान ने मुझे सब कर्तव्यों से मुक्त कर दिया है। मेरा इस जीवन अब कोई कर्तव्य अवशिष्ट नहीं है। मेरा एकमात्र कर्तव्य निज जीवन में उन्हें निरंतर व्यक्त करना है, अन्य कोई कर्तव्य नहीं है। उनकी चेतना समष्टि में व्याप्त हो। किसी अन्य का कोई अस्तित्व नहीं है। अब पीछे मुड़कर देखने का अवकाश नहीं है। सामने भगवान स्वयं बिराजमान हैं। अब जीवन परमात्ममय है। उनके सिवाय कुछ भी अन्य नहीं है। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!

कृपा शंकर
४ जून २०२६

यह सारा ब्रह्मांड / सारी सृष्टि -- हमारी देह है ---

 यह सारा ब्रह्मांड / सारी सृष्टि -- हमारी देह है ---

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पूर्ण रूपेण शांत होकर निज चेतना में इस देह के उच्चतम परम ज्योतिर्मय बिन्दु पर भगवान विष्णु, या उनके किसी अवतार, या भगवान शिव के, अनंत सर्वव्यापी रूप का ध्यान कीजिये। सारी सृष्टि उनमें है, और वे सारी सृष्टि में हैं। अपना स्वयं का विलय भी उन्हीं में कर दीजिए। जहां तक कर्ताभाव का प्रश्न है, कर्ता भी उन्हीं को या हनुमान जी को बनाइए। यह बात संभवतः आपको विचित्र लगे, लेकिन यह सत्य है कि हनुमान जी ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो शिव भी हैं और शक्ति भी हैं। उनकी उपासना दोनों के रूप में की जा सकती है। वे सर्वशक्तिशाली और तमाम क्षुद्रताओं से परे हैं। कुंडलिनी महाशक्ति की अनुभूति भी सभी साधकों को होती है, और कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में हनुमान जी की अनुभूति भी सभी साधकों को कभी कभी हो जाती है।
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शिव पूजा और श्रीमद्भगवद्गीता का नित्य स्वाध्याय कीजिए। इससे आपके हरेक संशय का निवारण होगा। अजपा-जप या श्रीमद्भगवद्गीता में बताई गई किसी विधि से जप व ध्यान कीजिए। श्रीरामचरितमानस और भागवत पुराण का स्वाध्याय भी बहुत अधिक लाभदायी होगा। आप वीतराग, स्थितप्रज्ञ, और निःस्त्रेगुण्य बनें। आप कूटस्थ-चैतन्य में स्थित हों।
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पहले मैं परमात्मा के परम शिव रूप के ध्यान का साक्षी था, आजकल भगवान अपने पुरुषोत्तम रूप का ध्यान मुझे निमित्त बनाकर स्वयं कर रहे हैं।
नारायण !! आपका आशीर्वाद बना रहे, और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।
मंगलमय शुभकामना के साथ आपको ॐ नमो नारायण !!
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"। ॐ तत् सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
६ जून २०२६

"पुरुषोत्तम" शब्द का अर्थ जो मुझे समझ में आया है --

 "पुरुषोत्तम" शब्द का अर्थ जो मुझे समझ में आया है --

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यहाँ मैं सही या गलत की बात नहीं कर रहा। बात मैं उस तथ्य की कर रहा हूँ, जो मुझे समझ में आया है। मेरी समझ सही भी हो सकती है और गलत भी। इसका निर्णय परमात्मा के हाथ में है। मुझे पुरुषोत्तम शब्द के तीन अर्थ समझ में आए हैं, जो निम्न हैं ---
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(१) पुरुष शब्द का प्रयोग वेदों में भगवान नारायण यानि विष्णु के लिए किया गया है। जहां पुरुष और प्रकृति -- दोनों एक साथ हैं, दोनों में कोई भेद नहीं है, वह भगवान का पुरुषोत्तम रूप है। उपासना हमें पुरुषोत्तम की ही करनी चाहिए। भगवान विष्णु ही यह सम्पूर्ण विश्व यानि सृष्टि हैं। जिसने इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण कर रखा है, वह प्रकृति है। जहां दोनों एक साथ होते हैं, वहाँ वे पुरुषोत्तम हैं।
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(२) भगवान श्रीकृष्ण का ही एक नाम गोविंद है। गोविंद का शाब्दिक अर्थ है जो हमारे भीतर के अंधकार यानि तमस को नष्ट करे। श्रीराधा उस शक्ति का नाम है जिसने इस समस्त सृष्टि को धारण कर रखा है। जहां भगवती श्रीराधा और भगवान गोविंद -- दोनों एक हैं, वह भगवान का पुरुषोत्तम रूप है।
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(३) जहां शिव और शक्ति दोनों एक हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है, दोनों एक हैं। जो परमशिव हैं, वे ही पुरुषोत्तम हैं, क्योंकि दोनों की अनुभूतियाँ एक सी हैं। कुंडलिनी महाशक्ति जब परमशिव से मिलकर एक हो जाती है, तब जो रूप व्यक्त होता है, वह "पुरुषोत्तम" है।
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अब सब तरह के विवादों को त्याग कर हमें परमात्मा के पुरुषोत्तम रूप की उपासना करनी चाहिए। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ नमः शिवाय।
कृपा शंकर / ८ जून २०२६
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पुनश्च: -- पुरुषोत्तम क्षेत्र
जगन्नाथ पुरी को ही पुरुषोत्तम क्षेत्र कहते हैं। यह एक मोक्षदायिनी तीर्थ है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण (जगन्नाथ) को समर्पित है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण के अनुसार यहाँ भगवान जगन्नाथ स्वयं निवास करते हैं।

भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं ---

 भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं। धर्म-निरपेक्षता का अर्थ है -- अधर्म-सापेक्षता। भारत की अस्मिता "सनातन-धर्म" है।सनातन धर्म ही भारत है, और भारत ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म का उत्थान ही भारत का उत्थान है, और सनातन धर्म का पतन ही भारत का पतन है। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है। रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ ही भारत के प्राण हैं। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में जो आश्वासन दिया है, उसी पर आस्था और श्रद्धा-विश्वास के कारण हम जीवित हैं। अन्यथा अब तक जीवित रहने का अन्य कोई कारण नहीं है।

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४:७॥"
"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥४:८॥"
"जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥४:९॥"
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४:११॥"

एक बार अपने गंतव्य पर पहुँच जाने के पश्चात किसी मार्गदर्शिका की आवश्यकता नहीं पड़ती।

 एक बार अपने गंतव्य पर पहुँच जाने के पश्चात किसी मार्गदर्शिका की आवश्यकता नहीं पड़ती। भगवान जब स्वयं ही हमारे समक्ष हैं तो किसी मार्गदर्शक सिद्धांत की अब और आवश्यकता नहीं है। उनके अमृतसिंधु में डूबकर स्वयं अमृतमय हो जाएँ।

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यह समस्त अनंत सृष्टि हमारा ही विस्तार है। परनिंदा व आत्म-प्रशंसा --- दोनों ही नर्क के द्वार हैं। स्वयं को निमित्त मात्र बनाकर, नित्य प्रातः और सायं दो-दो घंटे, भगवान का ध्यान भगवान को ही कर्ता बना कर कीजिये। यह सब से बड़ी सेवा है जो हम अपने राष्ट्र, धर्म, और समष्टि की कर सकते हैं। हमारे चारों ओर छाया असत्य का अंधकार दूर होगा। सत्य के प्रकाश से सम्पूर्ण अस्तित्व आलोकित होगा। परमात्मा ही एकमात्र सत्य हैं, जिन की प्रत्यक्ष उपस्थिती हमारे चैतन्य में निरंतर बनी रहे। कुछ राक्षसी/आसुरी शक्तियाँ जो हमें भटकाने का पूरा प्रयास करती हैं, अब हमारा कुछ भी अहित नहीं कर सकेंगी।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ शिव !!
कृपा शंकर
१० जून २०२६

हमारे सब दुःखों, अभावों, पीड़ाओं, और कष्टों का एकमात्र कारण परमात्मा से हमारी दूरी है। इसका प्रमाण वेदों में है।

हमारे सब दुःखों, अभावों, पीड़ाओं, और कष्टों का एकमात्र कारण परमात्मा से हमारी दूरी है। इसका प्रमाण वेदों में है।
"ॐ खं ब्रह्म" -- यह एक अत्यंत गहरा और शक्तिशाली वेद वाक्य है। यह वाक्य सर्वोच्च सत्य परमात्मा (ब्रह्म) के स्वरूप को दर्शाता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार "ॐ", "तत्" और "सत्" ये परमात्मा के तीन नाम हैं। "ॐ" — ईश्वर का मूल और सर्वोच्च नाम है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। वेदों के आदेशानुसार हम हर शुभ कार्य से पूर्व "ॐ" का उच्चारण करते हैं।
"खं" का अर्थ है — "आकाश"। आकाश जिस प्रकार सर्वत्र फैला हुआ असीम और अनंत है, उसी प्रकार परमात्मा भी सर्वव्यापी असीम और अनंत हैं। दुःख का अर्थ है — परमात्मा से दूरी। इसी प्रकार सुख का अर्थ है — परमात्मा से समीपता। सुख सिर्फ परमात्मा में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सांसारिकता में सुख की खोज ही सब दुःखों का एकमात्र कारण है। सुख की अपेक्षा सदा दुःखदायी है। परमात्मा से प्रेम सदा आनंददायी है। उस आनंद की एक झलक पाने के पश्चात संसार की असारता का बोध होता है। सच्चा सुख — उनके श्रीचरणों में आश्रय पाना है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० जून २०२६

गीता का पुरुषोत्तम योग ---

 गीता का पुरुषोत्तम योग ---

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जो सारी सृष्टि में व्याप्त है, जिससे यह सारी सृष्टि निर्मित हुई है, भगवान विष्णु का वह विराटतम अनंत रूप ही पुरुषोत्तम है। पूर्ण परमप्रेम यानि पूर्ण भक्ति से आप विष्णु के इस अनंत रूप का ध्यान कीजिये, आप निहाल व कृतकृत्य हो जाओगे। सारी साधनाओं का सार व उनकी अंतिम परिणिति यह पुरुषोत्तम योग है। जो पुरुषोत्तम हैं, वे ही परमशिव हैं। तत्व रूप में उनमें कोई भेद नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता का सार पुरुषोत्तम योग है। जितनी क्षमता भगवान ने दी है, उसका सदुपयोग कीजिये। ॐ तत् सत् !!
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श्रीभगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ৷৷15.1৷৷
भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा इस वृक्ष के पत्ते वैदिक स्तोत्र है, जो इस अविनाशी वृक्ष को जानता है वही वेदों का जानकार है। ৷৷15.1৷৷
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अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ৷৷15.2৷৷
भावार्थ : इस संसार रूपी वृक्ष की समस्त योनियाँ रूपी शाखाएँ नीचे और ऊपर सभी ओर फ़ैली हुई हैं, इस वृक्ष की शाखाएँ प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा विकसित होती है, इस वृक्ष की इन्द्रिय-विषय रूपी कोंपलें है, इस वृक्ष की जड़ों का विस्तार नीचे की ओर भी होता है जो कि सकाम-कर्म रूप से मनुष्यों के लिये फल रूपी बन्धन उत्पन्न करती हैं৷৷15.2৷৷
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न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्‍गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा৷৷15.3৷৷
भावार्थ : इस संसार रूपी वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत में नहीं किया जा सकता है क्योंकि न तो इसका आदि है और न ही इसका अन्त है और न ही इसका कोई आधार ही है, अत्यन्त दृड़ता से स्थित इस वृक्ष को केवल वैराग्य रूपी हथियार के द्वारा ही काटा जा सकता है৷৷15.3৷৷
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ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी৷৷15.4৷৷
भावार्थ : वैराग्य रूपी हथियार से काटने के बाद मनुष्य को उस परम-लक्ष्य (परमात्मा) के मार्ग की खोज करनी चाहिये, जिस मार्ग पर पहुँचा हुआ मनुष्य इस संसार में फिर कभी वापस नही लौटता है, फिर मनुष्य को उस परमात्मा के शरणागत हो जाना चाहिये, जिस परमात्मा से इस आदि-रहित संसार रूपी वृक्ष की उत्पत्ति और विस्तार होता है৷৷15.4৷৷
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निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌৷৷15.5৷৷
भावार्थ : जो मनुष्य मान-प्रतिष्ठा और मोह से मुक्त है तथा जिसने सांसारिक विषयों में लिप्त मनुष्यों की संगति को त्याग दिया है, जो निरन्तर परमात्म स्वरूप में स्थित रहता है, जिसकी सांसारिक कामनाएँ पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी है और जिसका सुख-दुःख नाम का भेद समाप्त हो गया है ऎसा मोह से मुक्त हुआ मनुष्य उस अविनाशी परम-पद (परम-धाम) को प्राप्त करता हैं৷৷15.5৷৷
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न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम৷৷15.6৷৷
भावार्थ : उस परम-धाम को न तो सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा प्रकाशित करता है और न ही अग्नि प्रकाशित करती है, जहाँ पहुँचकर कोई भी मनुष्य इस संसार में वापस नहीं आता है वही मेरा परम-धाम है৷৷15.6৷৷
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श्रीभगवानुवाच
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति৷৷15.7৷৷
भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में प्रत्येक शरीर में स्थित जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है, जो कि मन सहित छहों इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति के अधीन होकर कार्य करता है ৷৷15.7৷৷
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शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌৷৷15.8৷৷
भावार्थ : शरीर का स्वामी जीवात्मा छहों इन्द्रियों के कार्यों को संस्कार रूप में ग्रहण करके एक शरीर का त्याग करके दूसरे शरीर में उसी प्रकार चला जाता है जिस प्रकार वायु गन्ध को एक स्थान से ग्रहण करके दूसरे स्थान में ले जाती है৷৷15.8৷৷
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श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते৷৷15.9৷৷
भावार्थ : इस प्रकार दूसरे शरीर में स्थित होकर जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन की सहायता से ही विषयों का भोग करता है৷৷15.9৷৷
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उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌ ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः৷৷15.10৷৷
भावार्थ : जीवात्मा शरीर का किस प्रकार त्याग कर सकती है, किस प्रकार शरीर में स्थित रहती है और किस प्रकार प्रकृति के गुणों के अधीन होकर विषयों का भोग करती है, मूर्ख मनुष्य कभी भी इस प्रक्रिया को नहीं देख पाते हैं केवल वही मनुष्य देख पाते हैं जिनकी आँखें ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो गयी हैं৷৷15.10৷৷
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यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्‌ ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः৷৷15.11৷৷
भावार्थ : योग के अभ्यास में प्रयत्नशील मनुष्य ही अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को देख सकते हैं, किन्तु जो मनुष्य योग के अभ्यास में नहीं लगे हैं ऐसे अज्ञानी प्रयत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं देख पाते हैं৷৷15.11৷৷
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यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌ ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌৷৷15.12৷৷
भावार्थ : हे अर्जुन! जो प्रकाश सूर्य में स्थित है जिससे समस्त संसार प्रकाशित होता है, जो प्रकाश चन्द्रमा में स्थित है और जो प्रकाश अग्नि में स्थित है, उस प्रकाश को तू मुझसे ही उत्पन्न समझ৷৷15.12৷৷
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गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः৷৷15.13৷৷
भावार्थ : मैं ही प्रत्येक लोक में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सभी प्राणीयों को धारण करता हूँ और मैं ही चन्द्रमा के रूप से वनस्पतियों में जीवन-रस बनकर समस्त प्राणीयों का पोषण करता हूँ৷৷15.13৷৷
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अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌৷৷15.14৷৷
भावार्थ : मैं ही पाचन-अग्नि के रूप में समस्त जीवों के शरीर में स्थित रहता हूँ, मैं ही प्राण वायु और अपान वायु को संतुलित रखते हुए चार प्रकार के (चबाने वाले, पीने वाले, चाटने वाले और चूसने वाले) अन्नों को पचाता हूँ৷৷15.14৷৷
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सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌ ৷৷15.15৷৷
भावार्थ : मैं ही समस्त जीवों के हृदय में आत्मा रूप में स्थित हूँ, मेरे द्वारा ही जीव को वास्तविक स्वरूप की स्मृति, विस्मृति और ज्ञान होता है, मैं ही समस्त वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ, मुझसे ही समस्त वेद उत्पन्न होते हैं और मैं ही समस्त वेदों को जानने वाला हूँ৷৷15.15৷৷
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द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ৷৷15.16৷৷
भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में दो प्रकार के ही जीव होते हैं एक नाशवान (क्षर) और दूसरे अविनाशी (अक्षर), इनमें समस्त जीवों के शरीर तो नाशवान होते हैं और समस्त जीवों की आत्मा को अविनाशी कहा जाता है৷৷15.16৷৷
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उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः৷৷15.17৷৷
भावार्थ : परन्तु इन दोनों के अतिरिक्त एक श्रेष्ठ पुरुष है जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह अविनाशी भगवान तीनों लोकों में प्रवेश करके सभी प्राणीयों का भरण-पोषण करता है৷৷15.17৷৷
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यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः৷৷15.18৷৷
भावार्थ : क्योंकि मैं ही क्षर और अक्षर दोनों से परे स्थित सर्वोत्तम हूँ, इसलिये इसलिए संसार में तथा वेदों में पुरुषोत्तम रूप में विख्यात हूँ৷৷15.18৷৷
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यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌ ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ৷৷15.19৷৷
भावार्थ : हे भरतवंशी अर्जुन! जो मनुष्य इस प्रकार मुझको संशय-रहित होकर भगवान रूप से जानता है, वह मनुष्य मुझे ही सब कुछ जानकर सभी प्रकार से मेरी ही भक्ति करता है৷৷15.19৷৷
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इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्‍बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ৷৷15.20৷৷
भावार्थ : हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह शास्त्रों का अति गोपनीय रहस्य मेरे द्वारा कहा गया है, हे भरतवंशी जो मनुष्य इस परम-ज्ञान को इसी प्रकार से समझता है वह बुद्धिमान हो जाता है और उसके सभी प्रयत्न पूर्ण हो जाते हैं৷৷15.20৷৷
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ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥
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पुनश्च: --- सर्व कालव्यापी निज परम चैतन्य में ईश्वर की चेतना का निरंतर विस्तार ही इस जीवन का उद्देश्य है। अपने प्रारब्ध कर्मों के भोग के लिए यह अति अति कष्टमय जन्म लिया था। अगले जन्म में जन्म से ही ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की पूर्णता हो, यह ईश्वर से प्रार्थना है।
८ जून २०२५ को "पुरुषोत्तम" शब्द के अपनी समझ के अनुसार मैंने ३ अर्थ बताए थे। उनका अवलोकन एक बार अवश्य कर लीजिये। .
पुनश्च: --- पुरुषोत्तम मास के समाप्त होने में एक सप्ताह बचा है। नीचे दिये गये पुरुषोत्तम मंत्र, और श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय का नित्य पाठ करें। यदि आपका संस्कृत भाषा में शुद्ध उच्चारण है तो वैदिक पुरुष सूक्त का नित्य पाठ करें। "पुरुष" शब्द का प्रयोग भगवान नारायण यानि विष्णु के विराट, अनंत, और सर्वव्यापी रूप के लिए किया गया है। पुरुष सूक्त के प्रथम भाग में सौलह मंत्र हैं, और दूसरे भाग में छह मंत्र हैं। इसके पाठ के आरंभ करने से पूर्व किसी विद्वान आचार्य से परामर्श कर लें कि आपका उच्चारण शुद्ध है या नहीं है। वैदिक मंत्रों में शुद्ध उच्चारण का होना आवश्यक है। पुरुषोत्तम मंत्र पौराणिक है।
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पुरुषोत्तम मंत्र :---
"नमः श्रीकृष्णचन्द्राय परिपूर्णतमाय च। असङ्ख्याण्डाधिपतये गोलोकपतये नमः॥
श्रीराधापतये तुभ्यं व्रजाधीशाय ते नमः। नमः श्रीनन्दपुत्राय यशोदानन्दनाय च॥
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। यदूत्तम जगन्नाथ पाहि मां पुरुषोत्तम॥"

ब्राह्मणत्व का ह्रास ही राष्ट्र का पतन है ---

 जहां तक मेरी सोच है, भारत और सनातन-धर्म दोनों आपस में गूँथे हुए एक ही हैं। भारत की उन्नति वर्णाश्रम-व्यवस्था से थी। मैं यहाँ ब्राह्मण जाति की बात नहीं कर रहा, ब्राह्मणत्व की बात कर रहा हूँ। जिस दिन से भारत में अंग्रेजों ने गुरुकुल शिक्षा पद्धति समाप्त की, ब्राह्मणत्व का ह्रास आरंभ हुआ और अब ब्राह्मणत्व लगभग समाप्त हो चुका है। उसके अवशेष ही बाकी बचे हैं। ब्राह्मणत्व ही अन्य सब वर्णों का मार्गदर्शन करता था। भारत के उत्थान का कारण ब्राह्मणत्व की प्रखरता थी। ब्राह्मणत्व का ह्रास ही राष्ट्र का पतन है।

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ब्राह्मणत्व है ब्राह्मी स्थिति, वीतरागता, स्थितप्रज्ञता, और ब्रह्म से एकत्व। जहां ये सद्गुण होते हैं, वहाँ एक ब्रह्मतेज जागृत होता है। वह ब्रह्मतेज जब तक जिस समाज में रहता है, उस समाज का कभी पतन नहीं हो सकता।
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यह बात मेरी चेतना में आई और मैंने कह दी। जिस की जैसी बुद्धि होती है वह वैसी ही बात करता है। मेरी गहनतम अभीप्सा है कि भारत में एक ब्रह्मतेज जागृत हो, और भगवान राम जैसे शासक हों। भगवान श्रीराम हमारे परम आदर्श और परम उपास्य हैं। अभी तो हम असहाय हैं, अतः सब कुछ राम जी के हाथों में सौंप दिया है। लेकिन निश्चित रूप से वे एक न एक दिन वे स्वयं को हमारे में व्यक्त करेंगे।
"नीलाम्बुज-श्यामल-कोमलाङ्गं सीता-समारोपित-वाम-भागम्।
पाणौ महा-सायक-चारु-चापं
नमामि रामं रघुवंश-नाथम्॥"
"यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके,
भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्री शंकरः पातु माम्‌॥" (श्रीरामचरितमानस)
हरिः ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
१५ जून २०२६

परमात्मा की एक शक्ति है जिसने इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण कर रखा है, प्राण रूप में समस्त चैतन्य वे स्वयं हैं, उपासना उन्हीं की करें ---

परमात्मा की एक शक्ति है जिसने इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण कर रखा है, प्राण रूप में समस्त चैतन्य वे स्वयं हैं। उपासना उन्हीं की करें। ऐसे ही परमात्मा का एक परम ज्योतिर्मय रूप है जो हमारे भीतर के तमस को दूर करता है, उसी का ध्यान करें, और उसी को जीवन में अवतरित करें। परमात्मा से कुछ भी नहीं मांगें, अपितु अपना सम्पूर्ण अस्तित्व उन्हें समर्पित कर दें।
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मेरे पास बहुत सारे व्हाट्सऐप आये हुए हैं। सभी को बिना पढ़े ही डिलीट कर रहा हूँ। मुझे आपसे कोई अन्य अपेक्षा नहीं है। एक ही प्रार्थना है जो ऊपर लिख चुका हूँ। दुबारा लिख रहा हूँ कि "उसी शक्ति की उपासना करें, जिसने इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड को धारण कर चैतन्य बना रखा है। परमात्मा के उसी परम ज्योतिर्मय रूप का ध्यान करें जो आपके गहन तमस को दूर कर रहा है।"
आप निश्चिंत रहें, मैं आपसे कभी कुछ भी नहीं माँगूँगा, मैं कोई मांगतोड़ा मंगता-भिखारी नहीं, परमात्मा का अमृतपुत्र हूँ, जो अपनी चेतना में परमात्मा के साथ एक है।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ॐ शिव॥
कृपा शंकर
१८ जून २०२६
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"मांगतोड़ा" शब्द का अर्थ -- राजस्थान में मांगतोड़ा या मांगतोड़ उस व्यक्ति को कहते हैं जो दूसरों से हमेशा कुछ-न-कुछ मांगने की आदत रखता है। जब कोई व्यक्ति बार-बार लोगों से कुछ न कुछ मांगता रहता है, उसे मांगतोड़ा या मांगतोड़ कहा जाता है। ऐसे ही परमात्मा का एक परम ज्योतिर्मय रूप है जो हमारे भीतर के तमस को दूर करता है, उसी का ध्यान करें, और उसी को जीवन में अवतरित करें। परमात्मा से कुछ भी नहीं मांगें, अपितु अपना सम्पूर्ण अस्तित्व उन्हें समर्पित कर दें।

ईश्वर को प्रसन्न करने का एकमात्र मार्ग ---

 ईश्वर को प्रसन्न करने का एकमात्र मार्ग ---

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हमारा हर विचार श्रेष्ठ और पवित्र हो, क्योंकि हमारे विचार ही हमारे कर्म हैं, जिनका फल मिले बिना नहीं रहता। इससे अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है। जैसा हम सोचेंगे, वैसा ही वही कई गुणा बढ़कर हमें मिलेगा। हमारे विचार सदा पवित्र हों। यह बात मैं चुनौती देकर डंके की चोट कह रहा हूँ। यह सृष्टि का अटल नियम और परम सत्य है।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर / १९ जून २०२६
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पुनश्च: एक महात्मा जी और एक वेश्या -- दोनों पड़ोसी थे। महात्मा जी दिन-रात उस वेश्या के बारे सोचते थे, और वह वेश्या दिन-रात परमात्मा का चिंतन करती थी। संयोग से दोनों की मृत्यु एक साथ हुई। मरणोपरांत उस वेश्या को स्वर्ग की ओर ले जाया जाने लगा, और महात्मा जी को नर्क की ओर। महात्मा जी ने बहुत विरोध किया और यमदूतों को यहाँ तक कह दिया कि तुम लोग इधर का माल उधर, और उधर का माल इधर कर रहे हो। यमदूतों ने कहा कि हम लोग कोई भूल नहीं करते।
हम लोग कितना भी दान-पुण्य और तप कर लें, लेकिन यदि हमारे विचार सही नहीं है, तो हमारी तपस्या निष्फल है।

नित्य नियमित ध्यान-साधना बहुत अधिक आवश्यक है ---

 नित्य नियमित ध्यान-साधना बहुत अधिक आवश्यक है ---

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श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय हमें सिखाता है कि हमारा निर्माण हमारे विचारों से ही होता है। हमारे विचार हर समय सकारात्मक, शांत, कर्तव्यनिष्ठ, और अनासक्त होने चाहिए। हमारा मन ही हमारे बंधन और मुक्ति का कारण है। हमारे विचारों में स्थिरता, समभाव और ईश्वर में अटूट विश्वास का होना अत्यंत आवश्यक है। हमारे विचार ऐसे हों जो सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय में सदा संतुलित और स्थिर रहें। चंचल मन को साधना बहुत आवश्यक है। अनुशासित मन सबसे बड़ा मित्र होता है, जबकि अनियंत्रित मन सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। समभाव में स्थिति का अर्थ है सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय जैसी विपरीत परिस्थितियों में मन को स्थिर और शांत रखना। यह सब तभी संभव है जब हम नित्य नियमित रूप से परमात्मा का ध्यान करें।
२० जून २०२६

२१ जून को ही भारत में योग-दिवस क्यों मनाया जाता है ?

 २१ जून को ही भारत में योग-दिवस क्यों मनाया जाता है ?

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आज २१ जून का दिन हमारी पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (जहाँ भारत स्थित है) का सबसे लंबा यानी बड़ा दिन है, वहीं दक्षिणी गोलार्ध का सबसे छोटा दिन है। उत्तरी गोलार्ध में इसे ग्रीष्म संक्रांति (Summer Solstice) कहा जाता है। आने वाले कल से दिन क्रमशः छोटे होते जायेंगे। इसीलिए भारत सरकार ने आज के दिन को विश्व योग दिवस मनाने की परंपरा आरंभ की है। उत्तरी गोलार्ध में आज के दिन सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सबसे अधिक समय तक पड़ती हैं, जिससे दिन की अवधि लगभग १३ से १४ घंटों तक की होती है। इसके विपरीत, २१ दिसंबर को वर्ष का सबसे छोटा दिन, और सबसे बड़ी रात होगी।
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झुंझुनूं नगर में जहाँ मैं रहता हूँ, आज प्रातः ६.३० बजे से स्वर्ण-जयंती स्टेडियम में सार्वजनिक योग अभ्यास का बड़ा भव्य कार्यक्रम जिला प्रशासन की ओर से हुआ। योगाचार्य पवन सैनी के नेतृत्व में हजारों लोगों ने योगाभ्यास भारत सरकार के प्रोटोकॉल के अनुसार किया। बड़ा भव्य कार्यक्रम था, कोई कमी नहीं थी।

अति निकट भविष्य में भारत एक सतोगुण प्रधान अति पराक्रमी देश होगा, जहाँ असत्य के अंधकार का कोई अवशेष नहीं रहेगा।

 अति निकट भविष्य में भारत एक सतोगुण प्रधान अति पराक्रमी देश होगा, जहाँ असत्य के अंधकार का कोई अवशेष नहीं रहेगा। ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति सभी के जीवन में होगी। हमारी सारी आध्यात्मिक साधना इसी उद्देश्य के लिए है। हमारा उच्चतम दायित्व परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण है। सबसे बड़ी सेवा जो हम समाज, राष्ट्र और दूसरों के लिए कर सकते हैं, वह है परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण। जिस प्रकार एक इंजन अपने ड्राइवर के हाथों में सब कुछ सौंप देता है, एक विमान अपने पायलट के हाथों में सब कुछ सौंप देता है वैसे ही हम चाहते हैं कि हमारी अपनी सम्पूर्ण सत्ता परमात्मा के हाथों में हो। ॐ तत् सत् !!

कृपा शंकर २१ जून २०२६

भगवान के वास्तविक भक्त केवल वर्तमान में जीते हैं। उनका भूतकाल से कोई संबंध नहीं होता।

 भगवान के वास्तविक भक्त केवल वर्तमान में जीते हैं। उनका भूतकाल से कोई संबंध नहीं होता।

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अनेक हिन्दू ग्रन्थों का स्वाध्याय करने के उपरांत जो मुझे समझ में आया, उसे सार रूप में यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ --- "चिंतन पुरुषार्थ का करो, न कि विगत कर्मों का। पुरुषार्थ करो, तप करो, जीवन में पवित्रता लाओ, एकाग्रता और ध्यान का अभ्यास करो। भूतकाल से तुम्हारा कोई संबंध नहीं है। तुम वही हो जो वर्तमान में हो। भाग्यवादी मत बनो। जड़ता का परित्याग करो। निर्भय रहो, और प्रणव का निरंतर जप करो। लोभ और अहंकार ही हमारे पतन का एकमात्र कारण हैं। सब तरह की आकांक्षाओं से हमें मुक्त होना ही पड़ेगा।"
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ऊपर जो अपने अनुभवों का सार लिखा है, वह सत्य है। अनेक गोपनीय रहस्य मेरे समक्ष अनावृत हुए हैं, जो व्यक्तिगत हैं, किसी अन्य को बताए नहीं जा सकते। जब तक संतुष्टि न मिले, तब तक भगवान का खूब ध्यान करें। उन्हें अपनी स्मृति में हर समय रखें। जब भी समय मिले भगवान का स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करें। गीता में भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
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प्रार्थना ---
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥" (गीता)
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ जून २०२६

ईश्वर से ईश्वर के अतिरिक्त हमें कुछ अन्य चाहिए ही नहीं ---

 ईश्वर से ईश्वर के अतिरिक्त हमें कुछ अन्य चाहिए ही नहीं ---

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जिस समय हम परमात्मा का चिंतन करते हैं, उस समय हमारा कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता। जहाँ कोई अन्य है ही नहीं, वहाँ कैसा एकांत? जब तक स्वयं का पृथक अस्तित्व है, तब तक वहाँ ईश्वर नहीं है। भगवान हमें अनन्य भाव से भक्ति करने को कहते हैं। जहाँ कोई अन्य नहीं है, वहीं अनन्य भक्ति है। यह अनन्य भाव ही कैवल्य है। स्वयं की पृथकता के बोध को भी मिटाना पड़ता है, ईश्वर से पृथक किसी भी अन्य कामना को गीता में भगवान ने "व्यभिचार" की संज्ञा दी है। वे हमसे अव्यभिचारिणी भक्ति मांगते हैं।
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जब तक हम स्वयं को यह भौतिक शरीर यानि देह मानते हैं,और इसी के सुख के लिए सब कुछ करते हैं, तब तक हम भगवान से दूर हैं। यह शरीर एक साधन मात्र है, और कुछ भी नहीं।
ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२२ जून २०२६

आपसे दिल लगाकर देख लिया। अब देखने को और कुछ भी नहीं बचा है।

 आपसे दिल लगाकर देख लिया। अब देखने को और कुछ भी नहीं बचा है।

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मेरे जीवन में अंधकार है, तो इसका एकमात्र कारण मेरा तमोगुण है। मेरे जीवन में प्रकाश है, तो वह सतोगुण से है। और मेरे जीवन में यदि कर्मठता है, तो वह रजोगुण से है। मुझे निमित्त बनाकर सब कुछ जब परमात्मा स्वयं कर रहे हैं, तो मेरे लिए उन को समर्पित होने से अतिरिक्त अन्य कुछ भी करने योग्य नहीं है।
उनके त्रिगुणात्मक संसार से मैंने दिल लगाकर देख लिया है, जिससे निराशा, छल-कपट और धोखा ही धोखा मिला। अब देखने को और कुछ भी नहीं बचा है।
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भगवान हमें सतोगुण, रजोगुण, और तमोगुण, इन तीनों गुणों से परे जाने को कहते हैं --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- हे अर्जुन, वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है, तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित, और आत्मवान् बनो॥
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भगवान हमें "निस्त्रेगुण्य" (त्रिगुणातीत) होने को कहते हैं, लेकिन यह भी बता रहे हैं कि उसके लिये पहले हमें "निर्द्वन्द्व" "नित्यसत्त्वस्थ" "निर्योगक्षेम" और "आत्मवान्' होना होगा।
आचार्य शंकर ने अपने भाष्य में इनका अर्थ इस तरह किया है --
(१) निर्द्वंद्व -- सुख-दुःखके हेतु जो परस्पर विरोधी (युग्म) पदार्थ हैं उनका नाम द्वन्द्व है, उनसे रहित होना होगा।
(२) नित्यसत्त्वस्थ -- का अर्थ है कि सदा सत्त्वगुण के आश्रित हों।
(३) निर्योगक्षेम -- अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करने का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम क्षेम है। योगक्षेम को प्रधान मानने वाले की कल्याण मार्ग में प्रवृत्ति होनी अत्यन्त कठिन है, अतः तू योगक्षेम को न चाहने वाला हो।
(४) आत्मवान् — अर्थात् (आत्मविषयों में) प्रमादरहित हो। तुझ स्वधर्मानुष्ठान में लगे हुए के लिए यह उपदेश है।
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भगवान आगे कहते हैं --
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥२:४८॥"
अर्थात् -- हे धनंजय, आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है॥
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आचार्य शंकर ने इस मंत्र की बहुत सुंदर व्याख्या की है। उन्हीं के शब्दों का प्रयोग कर रहा हूँ --
यदि कर्मफल से प्रेरित होकर कर्म नहीं करने चाहियें, तो फिर किस प्रकार करने चाहियें? इस पर भगवान यहाँ प्रकाश डालते हैं -- "ईश्वर मुझ पर प्रसन्न हों", -- इस आशारूप आसक्ति को भी छोड़कर कर कर्म कर। हे धनंजय, योग में स्थित होकर केवल ईश्वर के लिय ही कर्म कर। फलतृष्णारहित पुरुष द्वारा कर्म किये जानेपर अन्तःकरण की शुद्धि से उत्पन्न होनेवाली ज्ञानप्राप्ति तो सिद्धि है, और उससे विपरीत (ज्ञानप्राप्तिका न होना) असिद्धि है। ऐसी सिद्धि और असिद्धि में भी सम होकर अर्थात् दोनोंको तुल्य समझकर कर्म कर।
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वह कौन सा योग है जिसमें स्थित होकर कर्म करने के लिये भगवान ने कहा है --
यही जो सिद्धि और असिद्धि में समत्व है इसीको योग कहते हैं। गीता में कर्म, भक्ति, और ज्ञान -- सिर्फ इन तीन विषयों पर ही भगवान ने उपदेश दिये हैं। इन तीनों विषयों में ही उन्होंने सारे सनातन धर्म को लपेट लिया है। योग का सार है --"समत्व"। इस परिप्रेक्ष्य में समत्व ही योग है, और यह "समत्व" ही गीता का सार है। समत्व में स्थित होकर ही हम निष्त्रैगुण्य यानि त्रिगुणातीत हो सकते हैं। यही जीवन का सार है। भगवान श्रीकृष्ण को "वासुदेव" इसीलिए कहते हैं कि वे सर्वत्र समभाव में स्थित हैं।
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मुझे जैसा समझ में आया, वैसा ही मैंने यहाँ लिख दिया। भगवान की कृपा के अतिरिक्त मुझ में कोई अन्य क्षमता नहीं है। उनकी कृपा पर ही आश्रित हूँ।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२३ जून २०२६
(संशोधित व पुनःप्रस्तुत)

हमारी कोई आयु नहीं हो सकती। हमारा जन्म ही नहीं हुआ तो आयु कैसे हो सकती है?

 वह परिवर्तन हम स्वयं हैं जो विश्व में होते हुए देखना चाहते हैं। अन्धकार का सकारात्मक प्रतिकार निरंतर होते रहना चाहिये। पूरे विश्व में उथल-पुथल हो जाये, या सारा ब्रह्मांड टूट कर बिखर जाये, हमारे ह्रदय में शान्ति बनी रहनी चाहिये। यह तभी संभव है जब हम निरंतर कूटस्थ-चैतन्य यानि ब्राह्मी स्थिति में रहें। परमात्मा की शक्ति -- सृष्टि की धारा को बदलने में पूर्णतः सक्षम है। कमी हमीं में है। हम उनका स्मरण नहीं करते, उनके प्रति समर्पित होकर नहीं रहते।

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हमारी कोई आयु नहीं हो सकती। हमारा जन्म ही नहीं हुआ तो आयु कैसे हो सकती है? जन्म तो इस शरीर का हुआ था। हमारा कभी जन्म ही नहीं हुआ।"
"न मे मृत्युशंका न में जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्मः।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
अपनी आस्था को अडिग रहने दें। ॐ तत् सत्। ॐ शिव। ॐ स्वस्ति॥
कृपा शंकर
२३ जून २०२६

"अहं ब्रह्मास्मि" यानि मैं ब्रह्म हूँ, या "शिवोहं" यानि मैं शिव हूँ; यह कहना अहंकार नहीं है। अहंकार है स्वयं को यह देह, मन, और बुद्धि समझ लेना।

 "अहं ब्रह्मास्मि" यानि मैं ब्रह्म हूँ, या "शिवोहं" यानि मैं शिव हूँ; यह कहना अहंकार नहीं है। अहंकार है स्वयं को यह देह, मन, और बुद्धि समझ लेना।

अहंकार व ब्रह्मभाव में बहुत अंतर है। सांसारिक बुद्धि के तमोगुण प्रधान लोग, ब्रह्मभाव को अहंकार मानते हैं। ब्राह्मी चेतना से युक्त जब कोई योग साधक "शिवोSहम् शिवोSहम्" या "अहम् ब्रह्मास्मि" कहता है तब यह उसकी अहंकार की यात्रा यानि कोई ego trip नहीं है। यह उसका वास्तविक अंतर्भाव है। आत्मा का धर्म है -- परमात्मा के प्रति अभीप्सा और परम प्रेम। यही हमारा सही धर्म है। और भी आगे बढ़ें तो परमात्मा की सर्वव्यापकता के साथ एक होकर हम कह सकते हैं -- "शिवोंहं शिवोहं" या "अहं ब्रह्मास्मि|"
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शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि को निज स्वरुप समझना ही अहंकार है| वास्तव में 'अहं' केवल सर्वव्यापि आत्म-तत्व का नाम है जिसे हम नहीं समझते इसलिए अपने शरीर, मन और बुद्धि आदि को ही हम स्वयं मान लेते हैं| यही अहंकार है| हम परमात्मा के अंश हैं, परमात्मा के अमृतपुत्र हैं, और सच्चिदानंद के साथ एक हैं| यह होते हुए भी स्वयं को शरीर समझते हैं, यह अहंकार है|
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शरीर के धर्म हैं -- भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी आदि| प्राणों का धर्म है बल आदि| मन का धर्म है राग-द्वेष, मद यानि घमंड आदि| चित्त का धर्म है वासनाएँ आदि| इन सब को अपना समझना अहंकार है|
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आत्मा का धर्म है -- परमात्मा के प्रति अभीप्सा और परम प्रेम| यही हमारा सही धर्म है| और भी आगे बढ़ें तो परमात्मा की सर्वव्यापकता के साथ एक होकर हम कह सकते हैं -- "शिवोंहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि|"
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यह अनुभूति का विषय है, बुद्धि का नहीं, अतः इस विषय पर और अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है| आप सब निजात्माओं में व्यक्त परमात्मा को मेरा नमन|
गुरु ॐ | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | अयमात्मा ब्रह्म |
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् || ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२३ जून २०२१

निर्जला एकादशी, भगवान विष्णु की अनंतता, व ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान --- .

 निर्जला एकादशी, भगवान विष्णु की अनंतता, व ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान ---

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दिनांक २५ जून २०२६ को निर्जला एकादशी है। मेरे लिए तो यह भगवान की निष्काम भक्ति का एक बहाना है। इसके बारे में सारी जानकारी अंतर्जाल, समाचार पत्रों और धार्मिक पुस्तकों में उपलब्ध है। कोई भी संशय हो तो उसका निवारण अपने यहाँ के स्थानीय कर्मकांडी विद्वान पंडित जी से करें। हमारे समाज में तो महिलाओं को सब पता होता है, अतः किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ता, सारा काम सहज रूप से समाज की माताओं के निर्देशन में स्वतः ही हो जाता है।
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जब भी आत्म-प्रेरणा मिले नारायण की ज्योतिर्मय अनंतता का ध्यान करते हुए उनमें अपनी चेतना का पूर्ण समर्पण कर दें। ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान आदि से निवृत होकर पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह रखते हुए, एक ऊनी आसन पर बैठें। मेरुदण्ड उन्नत, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, और दृष्टिपथ भ्रूमध्य की ओर। आवश्यक हो तो नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लें। कुछ देर तक प्राणायाम करें, शरीर को दो-तीन बार तनावग्रस्त और शिथिल करें। एक ज्योति की कल्पना करें जो आपके आज्ञाचक्र से निकलकर सारे ब्रह्मांड में व्याप्त हो गई है। वह ज्योति सम्पूर्ण ब्रह्मांड में है, और सम्पूर्ण ब्रह्मांड उस ज्योति में है। वह ज्योति ही ज्योतिर्मय ब्रह्म है। कुछ महीनों के साधना के पश्चात वह ब्रह्मज्योति स्वतः ही ध्यान में प्रकट होगी। भगवान विष्णु ही यह सम्पूर्ण विश्व बन गए हैं। यह समस्त सृष्टि भगवान विष्णु का अनंत रूप है। सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान भगवान विष्णु की अनंतता का ध्यान है। ध्यान करते करते एक समय ऐसा आएगा जब आपके सहस्त्रारचक्र से ऊपर का आवरण हट जाएगा। उस समय इस शरीर से बाहर निकल जाएँ। भगवान की अनंतता बड़ी आकर्षक है, उस ओर ध्यान न देकर ऊपर उठते ही जाएँ, उठते ही जाएँ, उठते ही जाएँ। ऊपर ही ऊपर एक परम ज्योतिर्मय लोक है, जिसके बारे में गीता के पुरुषोत्तम-योग में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥" (१५:६)
इससे मिलते जुलते मंत्र कठोपनिषद और श्वेताश्वतरोपनिषद में भी हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम-योग का ऊर्ध्वमूल भी यही है।
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जब तक आपकी चेतना यहाँ है, आपकी भौतिक मृत्यु नहीं होगी क्योंकि जब तक प्रारब्ध है, तब तक यह जीवन रहेगा। एक बहुत पतली सी सफेद रंग की डोर के साथ आप अपनी भौतिक देह से भी जुड़े रहोगे।
अपनी साधना का आरंभ अजपा-जप से करें। यह एक वैदिक साधना है जिसे वेदों में हंसवती ऋक कहा गया है। इसे हंस:योग भी कहते हैं। रामचरितमानस में इसके बारे में लिखा है --
"सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥"
(‘वह ब्रह्म मैं हूँ’ यह जो अखंड वृत्ति है, वही ज्ञान दीपक की प्रचंड दीपशिखा है।जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है।)
गुरु की आज्ञा से "सोहं" के स्थान पर "हंसः" मंत्र का जप भी किया जा सकता है। फल उतना ही प्राप्त होता है। गुरु की आज्ञा से श्वास के साथ मैं भी सोहं के स्थान हंसः मंत्र का जप ही करता हूँ।
अजपा जप के पश्चात गीता के आठवें अध्याय में बताई हुई विधि से प्रणव का ध्यान करें। साधना का समापन जपयोग करते हुए करें। तत्पश्चात विश्वशांति और सर्वस्व के कल्याण की प्रार्थना करें। तभी साधना फलीभूत होगी।
ॐ तत् सत् !! ॐ शिव !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२४ जून २०२६
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पुनश्च :--- आज का दिन दान-पुण्य का है। अपनी सीमा में रहते हुए अपनी क्षमतानुसार दान-पुण्य करें।

भारत की वर्तमान समस्याओं का समाधान ---

 भारत की वर्तमान समस्याओं का समाधान ---

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इस विषय पर बड़ी गंभीरता से मैंने चिंतन किया है, और मैं स्पष्ट रूप से इस निर्णय पर पहुंचा हूँ कि भारत की सभी समस्याओं का समाधान सत्य-सनातन-धर्म की दृढ़तापूर्वक पुनः प्रतिष्ठा से ही संभव है। जब तक हमारी आस्था -- पुनर्जन्म, कर्मफल, और आत्मा की शाश्वतता में नहीं होगी, तब तक हमारे राष्ट्रीय चरित्र में कोई सुधार नहीं आ सकता।
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हमारा मूल है सनातन-धर्म, जिसमें हमें दृढ़ता से बापस लौटना ही पड़ेगा। भारत में समाज को प्रेरणा और शक्ति मिलती थी — ब्राह्मणत्व से। भारतीय संस्कृति और दर्शन में ब्राह्मणत्व का अर्थ किसी जाति विशेष से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के सर्वोच्च चरित्र, ज्ञान, और आध्यात्मिक अवस्था से है। "ब्रह्म" का ज्ञाता जो परम-सत्य परमात्मा को जानता है, ब्राह्मण है। "ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः"। सात्विक आचरण, लोभ, मोह, और अहंकार से मुक्त होकर ज्ञान, सत्य और सदाचार का पालन ही ब्राह्मणत्व है। त्याग, संयम, ज्ञानार्जन, जन-कल्याण और तपस्या को जीवन का मुख्य उद्देश्य मानना -- ब्राह्मणत्व है। उस ब्राह्मणत्व को जागृत किये बिना राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता। यह ब्राह्मणत्व ही समाज का नेतृत्व कर सकता है।
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हमें आवश्यकता है एक ब्रह्म-शक्ति की। ब्रह्म-शक्ति का अर्थ -- "परमब्रह्म परमात्मा की शक्ति" यानि आध्यात्मिक ऊर्जा है। यह इस सृष्टि की सर्वोच्च चेतना है, जो आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करती है। इसके लिए अनेक साधकों को साधना यानि तपस्या करनी पड़ेगी। यह ब्राह्मणत्व ही भारत की रक्षा कर सकता है, अन्य कुछ भी नहीं। यही हमारी साधना हो।
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"नमस्ते लोकनाथाय नमस्ते सृष्टिकारिणे।
नमस्ते वेदरूपाय नमस्ते ब्रह्मणे नमः॥"
"ॐ वेदात्मने विद्महे, हिरण्यगर्भाय धीमहि, तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्॥"
ॐ तत् सत्॥ ॐ स्वस्ति॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ जून २०२६
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पुनश्च: --- मैं अब तक लगभग ४५०० छोटे-बड़े आलेख लिख चुका हूँ। और कुछ भी लिखने की इच्छा अब नहीं रही है। बाकी बचा हुआ सारा जीवन परमब्रह्म की ध्यान साधना में ही बीत जाये। जीवन में खूब स्वाध्याय किया है, अब केवल परमात्मा का ध्यान करने की अभीप्सा ही बची है। कोई आकांक्षा नहीं रही है।

शैतान (Devil) और शैतानियत (Evil) क्या है? .....

 शैतान (Devil) और शैतानियत (Evil) क्या है? .....

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एक बात तो मैं पूरे आत्म-विश्वास से कह रहा हूँ कि इब्राहिमी मतों (Abrahamic religions) (इस्लाम, ईसाईयत और यहूदी) में जिसे "शैतान" कहा गया है, वह कोई व्यक्ति नहीं है| इसका किसी प्रेतलोक या पैशाचिक जगत से भी कोई संबंध नहीं है| यह एक विकृत विचार मात्र है जो दूसरों पर दोषारोपण करता है और हमें कामचोर व आलसी बनाता है| इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी या कोई भी शैतान नहीं है|
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भारत में कभी भी "शैतान" की परिकल्पना नहीं की गई थी| यह विशुद्ध रूप से एक विजातीय शब्द है| इब्राहिमी मतों के अनुसार भगवान सही रास्ते पर ले जाता है पर शैतान गलत रास्ते पर भटका देता है| शैतान का अर्थ लोग लगाते हैं कि वह कोई राक्षस या बाहरी शक्ति है पर यह सत्य नहीं है|
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शैतान शब्द एक बहाना मात्र है .... स्वयं के दोष को छिपाने का और दूसरों पर दोष आरोपित करने का| शैतान एक अतृप्त वासना है जो क्रोध को जन्म देती है, क्रोध बुद्धि का विनाश कर देता है और मनुष्य का पतन हो जाता है| भगवान हमें इस शैतान से बचाए|
कृपा शंकर
२६ जून २०२०

सारी कामनाएँ, सारी अपेक्षाएँ, और सारे विचार -- परमात्मा को समर्पित हैं। हृदय में जब परमात्मा स्वयं बिराजमान हैं, तो उन्हें छोड़कर अन्यत्र कहाँ जाएँ? .

सारी कामनाएँ, सारी अपेक्षाएँ, और सारे विचार -- परमात्मा को समर्पित हैं। हृदय में जब परमात्मा स्वयं बिराजमान हैं, तो उन्हें छोड़कर अन्यत्र कहाँ जाएँ?
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"यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥१०:३९॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् - हे अर्जुन ! जो समस्त भूतों की उत्पत्ति का बीज (कारण) है, वह भी में ही हूँ, क्योंकि ऐसा कोई चर और अचर भूत नहीं है, जो मुझसे रहित है॥
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जब सब कुछ परमात्मा ही है तो अब उनके अतिरिक्त अन्य किसी से कोई अपेक्षा भी नहीं रही है। अब किसी भी तरह के परिवाद, निंदा और आलोचना (Complain, Condemn, Criticize) का समय नहीं है। जो भी समय शेष है, उसमें सिर्फ हरिःचिंतन, अन्य कुछ भी नहीं।
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सारी कामनाएँ, सारी अपेक्षाएँ, और सारे विचार -- परमात्मा को समर्पित हैं। हृदय में जब परमात्मा स्वयं बिराजमान हैं, तो उन्हें छोड़कर अन्यत्र कहाँ जाएँ? जो भी बात कहनी है, प्रत्यक्ष परमात्मा से ही कहेंगे। अधिक समय हमारे पास नहीं है।
संसार को, और परमात्मा की समस्त रचना को धन्यवाद और नमस्ते !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ जून २०२४