Friday, 26 June 2026

नित्य नियमित ध्यान-साधना बहुत अधिक आवश्यक है ---

 नित्य नियमित ध्यान-साधना बहुत अधिक आवश्यक है ---

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श्रीमद्भगवद्गीता का स्वाध्याय हमें सिखाता है कि हमारा निर्माण हमारे विचारों से ही होता है। हमारे विचार हर समय सकारात्मक, शांत, कर्तव्यनिष्ठ, और अनासक्त होने चाहिए। हमारा मन ही हमारे बंधन और मुक्ति का कारण है। हमारे विचारों में स्थिरता, समभाव और ईश्वर में अटूट विश्वास का होना अत्यंत आवश्यक है। हमारे विचार ऐसे हों जो सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय में सदा संतुलित और स्थिर रहें। चंचल मन को साधना बहुत आवश्यक है। अनुशासित मन सबसे बड़ा मित्र होता है, जबकि अनियंत्रित मन सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। समभाव में स्थिति का अर्थ है सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय जैसी विपरीत परिस्थितियों में मन को स्थिर और शांत रखना। यह सब तभी संभव है जब हम नित्य नियमित रूप से परमात्मा का ध्यान करें।
२० जून २०२६

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