प्रश्नोपनिषद के ऊपर एक लघु चर्चा ---
अथर्ववेद के ब्राह्मण भाग के अंतर्गत प्रश्नोपनिषद पर थोड़ी आध्यात्मिक चर्चा करेंगे। कुछ दिनों पूर्व मांडूक्योपनिषद की चर्चा की गई थी। मांडूक्योपनिषद का ही विस्तार प्रश्नोपनिषद है। इस पर अनेक विस्तृत भाष्य हैं। मैं आचार्य शंकर के भाष्य की सहायता लेता हूँ समझने के लिए, क्योंकि बौद्धिक रूप से यह मेरे अधिक अनुकूल है।
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ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमा चभिर्यजत्राः।
स्थिरैरस्तुष्टुवा सस्तनभिर्व्य शेम देवहितं यदायुः॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
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विषय से हटकर यह बता देना चाहता हूँ कि प्राण-तत्व, कुंडलिनी महाशक्ति, और परमब्रह्म परमात्मा को हम कुछ वर्षो की नियमित कठोर ध्यान-साधना के उपरांत हरिःकृपा से अनुभूत करने लगते हैं। ये अनुभूति के विषय हैं। कुछ वर्षों की साधना के उपरांत इनका आभास नित्य होने लगता है। उस समय प्रश्नोपनिषद का स्वाध्याय हमारी साधना को और भी अधिक दृढ़ बनाता है। अतः यह बहुत अधिक महत्वपूर्ण उपनिषद है। ऋषियों द्वारा पूछे गए उनके छह प्रश्न और महर्षि पिप्पलाद द्वारा दिये गए उनके उत्तरों का स्वाध्याय हमारी साधना में बहुत अधिक सहायक होगा। जहां तक मैं जानता हूँ, प्राण-तत्व पर इतनी गहन और विस्तृत चर्चा अन्यत्र कहीं भी, कभी भी नहीं हुई है।
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सतयुग में एक बार भारत के छह महान ऋषि एक साथ उस समय के महानतम ब्रह्मज्ञ महर्षि पिप्पलाद के पास गये और परब्रह्म के बारे में जिज्ञासा व्यक्त की। महर्षि पिप्पलाद ने उनकी बात बड़े ध्यान से सुनी, और उनसे एक वर्ष तक वहीं रहकर कठोर तपस्या करने को कहा। साथ में यह भी कहा कि एक वर्ष तक की आपकी कठोर तपस्या के उपरांत ही मैं यह विचार करूंगा कि आपको कुछ बताया जाये या नहीं।
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उन सब ऋषियों ने महर्षि पिप्पलाद के आश्रम में एक वर्ष तक गहन तपस्या की। एक वर्ष पूर्ण होने पर उन सब ऋषियों की तपस्या से प्रसन्न होकर महर्षि पिप्पलाद ने उन सब को अपने पास बुलाया और कुछ भी प्रश्न पूछने को कहा।
उन छः ऋषियों ने एक-एक प्रश्न (कुल छः प्रश्न) महर्षि पिप्पलाद से किए। वे सभी प्रश्न आध्यात्मिक दृष्टि से बड़े गूढ़ हैं। महर्षि पिप्पलाद ने उन सब प्रश्नों का उत्तर बड़ी गहनता से दिया, और बड़े प्रेम से उन सब ऋषियों को अपने आश्रम से विदा किया। वे सारे प्रश्न और महर्षि पिप्पलाद द्वारा दिये गए उत्तर प्रश्नोपनिषद में हैं।
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यह सब जानने के लिए स्वयं आपको उपनिषदों का स्वाध्याय करना होगा। कहीं पर कुछ पूछना है तो भगवान शिव (दक्षिणामूर्ति) से अपने मौन में ही पूछिए। भगवान शिव से उनका उत्तर आपको उनके मौन में ही मिलेगा।
उपनिषदों का स्वाध्याय ईशावास्योपनिषद से आरंभ कीजिये। फिर अपनी रुचि के अनुसार स्वाध्याय कीजिये। अंत में बृहदारण्यकोपनिषद का स्वाध्याय कीजिये। वहाँ महर्षि याज्ञवलक्य के उपदेश आपको ज्ञान के महाअरण्य में ऐसा उलझा देंगे कि आपका बाहर निकलना बड़ा कठिन होगा। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ मई २०२६
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पुनश्च: ----- भगवती का आदेश है कि मैं और भी अधिक गहन और दीर्घ काल तक साधना करूँ। माँ का आदेश मानना ही होगा। अतः में अनुपलब्ध रहूँ, तो यह जगन्माता के आदेश की पालना ही होगी। मैं सदा आपके साथ हूँ। एक पल के लिए भी आपसे पृथक नहीं हूँ।
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