जहां तक मेरी सोच है, भारत और सनातन-धर्म दोनों आपस में गूँथे हुए एक ही हैं। भारत की उन्नति वर्णाश्रम-व्यवस्था से थी। मैं यहाँ ब्राह्मण जाति की बात नहीं कर रहा, ब्राह्मणत्व की बात कर रहा हूँ। जिस दिन से भारत में अंग्रेजों ने गुरुकुल शिक्षा पद्धति समाप्त की, ब्राह्मणत्व का ह्रास आरंभ हुआ और अब ब्राह्मणत्व लगभग समाप्त हो चुका है। उसके अवशेष ही बाकी बचे हैं। ब्राह्मणत्व ही अन्य सब वर्णों का मार्गदर्शन करता था। भारत के उत्थान का कारण ब्राह्मणत्व की प्रखरता थी। ब्राह्मणत्व का ह्रास ही राष्ट्र का पतन है।
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ब्राह्मणत्व है ब्राह्मी स्थिति, वीतरागता, स्थितप्रज्ञता, और ब्रह्म से एकत्व। जहां ये सद्गुण होते हैं, वहाँ एक ब्रह्मतेज जागृत होता है। वह ब्रह्मतेज जब तक जिस समाज में रहता है, उस समाज का कभी पतन नहीं हो सकता।
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यह बात मेरी चेतना में आई और मैंने कह दी। जिस की जैसी बुद्धि होती है वह वैसी ही बात करता है। मेरी गहनतम अभीप्सा है कि भारत में एक ब्रह्मतेज जागृत हो, और भगवान राम जैसे शासक हों। भगवान श्रीराम हमारे परम आदर्श और परम उपास्य हैं। अभी तो हम असहाय हैं, अतः सब कुछ राम जी के हाथों में सौंप दिया है। लेकिन निश्चित रूप से वे एक न एक दिन वे स्वयं को हमारे में व्यक्त करेंगे।
"नीलाम्बुज-श्यामल-कोमलाङ्गं सीता-समारोपित-वाम-भागम्।
पाणौ महा-सायक-चारु-चापं
नमामि रामं रघुवंश-नाथम्॥"
"यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके,
भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्।
सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्री शंकरः पातु माम्॥" (श्रीरामचरितमानस)
हरिः ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
१५ जून २०२६
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