Friday, 26 June 2026

निर्जला एकादशी, भगवान विष्णु की अनंतता, व ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान --- .

 निर्जला एकादशी, भगवान विष्णु की अनंतता, व ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान ---

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दिनांक २५ जून २०२६ को निर्जला एकादशी है। मेरे लिए तो यह भगवान की निष्काम भक्ति का एक बहाना है। इसके बारे में सारी जानकारी अंतर्जाल, समाचार पत्रों और धार्मिक पुस्तकों में उपलब्ध है। कोई भी संशय हो तो उसका निवारण अपने यहाँ के स्थानीय कर्मकांडी विद्वान पंडित जी से करें। हमारे समाज में तो महिलाओं को सब पता होता है, अतः किसी से कुछ पूछना नहीं पड़ता, सारा काम सहज रूप से समाज की माताओं के निर्देशन में स्वतः ही हो जाता है।
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जब भी आत्म-प्रेरणा मिले नारायण की ज्योतिर्मय अनंतता का ध्यान करते हुए उनमें अपनी चेतना का पूर्ण समर्पण कर दें। ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान आदि से निवृत होकर पूर्व या उत्तर दिशा में मुंह रखते हुए, एक ऊनी आसन पर बैठें। मेरुदण्ड उन्नत, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, और दृष्टिपथ भ्रूमध्य की ओर। आवश्यक हो तो नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लें। कुछ देर तक प्राणायाम करें, शरीर को दो-तीन बार तनावग्रस्त और शिथिल करें। एक ज्योति की कल्पना करें जो आपके आज्ञाचक्र से निकलकर सारे ब्रह्मांड में व्याप्त हो गई है। वह ज्योति सम्पूर्ण ब्रह्मांड में है, और सम्पूर्ण ब्रह्मांड उस ज्योति में है। वह ज्योति ही ज्योतिर्मय ब्रह्म है। कुछ महीनों के साधना के पश्चात वह ब्रह्मज्योति स्वतः ही ध्यान में प्रकट होगी। भगवान विष्णु ही यह सम्पूर्ण विश्व बन गए हैं। यह समस्त सृष्टि भगवान विष्णु का अनंत रूप है। सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान भगवान विष्णु की अनंतता का ध्यान है। ध्यान करते करते एक समय ऐसा आएगा जब आपके सहस्त्रारचक्र से ऊपर का आवरण हट जाएगा। उस समय इस शरीर से बाहर निकल जाएँ। भगवान की अनंतता बड़ी आकर्षक है, उस ओर ध्यान न देकर ऊपर उठते ही जाएँ, उठते ही जाएँ, उठते ही जाएँ। ऊपर ही ऊपर एक परम ज्योतिर्मय लोक है, जिसके बारे में गीता के पुरुषोत्तम-योग में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥" (१५:६)
इससे मिलते जुलते मंत्र कठोपनिषद और श्वेताश्वतरोपनिषद में भी हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम-योग का ऊर्ध्वमूल भी यही है।
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जब तक आपकी चेतना यहाँ है, आपकी भौतिक मृत्यु नहीं होगी क्योंकि जब तक प्रारब्ध है, तब तक यह जीवन रहेगा। एक बहुत पतली सी सफेद रंग की डोर के साथ आप अपनी भौतिक देह से भी जुड़े रहोगे।
अपनी साधना का आरंभ अजपा-जप से करें। यह एक वैदिक साधना है जिसे वेदों में हंसवती ऋक कहा गया है। इसे हंस:योग भी कहते हैं। रामचरितमानस में इसके बारे में लिखा है --
"सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा॥"
(‘वह ब्रह्म मैं हूँ’ यह जो अखंड वृत्ति है, वही ज्ञान दीपक की प्रचंड दीपशिखा है।जब आत्मानुभव के सुख का सुंदर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रम का नाश हो जाता है।)
गुरु की आज्ञा से "सोहं" के स्थान पर "हंसः" मंत्र का जप भी किया जा सकता है। फल उतना ही प्राप्त होता है। गुरु की आज्ञा से श्वास के साथ मैं भी सोहं के स्थान हंसः मंत्र का जप ही करता हूँ।
अजपा जप के पश्चात गीता के आठवें अध्याय में बताई हुई विधि से प्रणव का ध्यान करें। साधना का समापन जपयोग करते हुए करें। तत्पश्चात विश्वशांति और सर्वस्व के कल्याण की प्रार्थना करें। तभी साधना फलीभूत होगी।
ॐ तत् सत् !! ॐ शिव !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२४ जून २०२६
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पुनश्च :--- आज का दिन दान-पुण्य का है। अपनी सीमा में रहते हुए अपनी क्षमतानुसार दान-पुण्य करें।

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