हमारे सब दुःखों, अभावों, पीड़ाओं, और कष्टों का एकमात्र कारण परमात्मा से हमारी दूरी है। इसका प्रमाण वेदों में है।
"ॐ खं ब्रह्म" -- यह एक अत्यंत गहरा और शक्तिशाली वेद वाक्य है। यह वाक्य सर्वोच्च सत्य परमात्मा (ब्रह्म) के स्वरूप को दर्शाता है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार "ॐ", "तत्" और "सत्" ये परमात्मा के तीन नाम हैं। "ॐ" — ईश्वर का मूल और सर्वोच्च नाम है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। वेदों के आदेशानुसार हम हर शुभ कार्य से पूर्व "ॐ" का उच्चारण करते हैं।
"खं" का अर्थ है — "आकाश"। आकाश जिस प्रकार सर्वत्र फैला हुआ असीम और अनंत है, उसी प्रकार परमात्मा भी सर्वव्यापी असीम और अनंत हैं। दुःख का अर्थ है — परमात्मा से दूरी। इसी प्रकार सुख का अर्थ है — परमात्मा से समीपता। सुख सिर्फ परमात्मा में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सांसारिकता में सुख की खोज ही सब दुःखों का एकमात्र कारण है। सुख की अपेक्षा सदा दुःखदायी है। परमात्मा से प्रेम सदा आनंददायी है। उस आनंद की एक झलक पाने के पश्चात संसार की असारता का बोध होता है। सच्चा सुख — उनके श्रीचरणों में आश्रय पाना है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० जून २०२६
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