Saturday, 11 July 2026

जब भी समय मिले अपनी साँसों पर ध्यान दो ---

 जब भी समय मिले अपनी साँसों पर ध्यान दो ---

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यह हमारा भ्रम है कि हम सांसें ले रहे हैं। हमारे माध्यम से भगवान स्वयं साँस ले रहे हैं। वे ही हमारे हृदय में धडक रहे हैं, वे ही इन आँखों से देख रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, और इस मष्तिष्क से वे ही सोच रहे हैं। इन कानों से मंत्र-श्रवण भी वे ही कर रहे हैं, और जप भी वे ही कर रहे हैं। हम अपना मन उनमें लगा देंगे तो हमारा काम बड़ा आसान हो जाएगा। मन को भगवान में लगाना -- इस सृष्टि में सबसे अधिक कठिन काम है। मन -- भगवान में लग गया तो मान लीजिये कि आधे से अधिक युद्ध हम जीत चुके हैं।
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सत्संग भी आवश्यक है, भजन-कीर्तन भी आवश्यक है, इनसे मन में बुरे विचार नहीं आते। रामचरितमानस और गीता में भगवान ने आश्वासन दे रखा है कि वे अपने भक्त की रक्षा भी करते हैं, मार्गदर्शन और सहायता भी करते हैं। एक श्रौत्रीय ब्रहमनिष्ठ गुरु के रूप में भगवान स्वयं आते हैं। सर्वदा यह बोध रखो कि एकमात्र कर्ता भगवान स्वयं हैं, और हम तो एक निमित्त मात्र हैं। फिर जीवन में एक क्रांति आ जाएगी।
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लोकयात्रा के लिए मिला हुआ यह शरीर रूपी वाहन स्वस्थ रहे, इसके लिए हठयोग भी आवश्यक है और घनीभूत प्राण तत्व के रूप में जब कुंडलिनी जागरण हो तब मार्गदर्शन और सहायता के लिए गुरु भी परमावश्यक है। उस समय गुरु की सहायता और मार्गदर्शन की सबसे अधिक आवश्यकता पड़ती है। गुरु की सहायता के बिना भटकाव का भय रहता है। सूक्ष्म जगत की महान आत्माएँ भी मार्गदर्शन और सहायता करती हैं।
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अंतिम बात यह कहना चाहता हूँ कि बिना भक्ति के कोई भी साधक एक मिलिमीटर भी आगे नहीं बढ़ सकता। बिना भक्ति के ज्ञान और वैराग्य -- कुछ भी नहीं मिलता। आध्यात्म के मार्ग पर भक्ति ही ऊर्जा है। अतः ऐसे ग्रन्थों का स्वाध्याय करें जिनसे हमारे ज्ञान और भक्ति में वृद्धि हो। भक्तों के साथ ही रहें, और विष की तरह कुसंग को त्याग दो।
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एकमात्र सत्य केवल परमात्मा है। हमारी सारी आशाएँ, अपेक्षाएँ, आकांक्षाएँ और पृथकता का बोध -- हमारी विवेकाग्नि में भस्म हो जाये। विवेक की उस अग्नि को अपने अंतर में हमें स्वयं ही प्रज्ज्वलित करना होगा। हमारा पूर्ण समर्पण "कैवल्य" यानि "अनन्य" के बोध व चेतना में ही रहे। यही अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति है, जो गीता के उपदेशों का सार है। जो इस संकेत को समझ कर उस का आचरण करेंगे, उनका निश्चित रूप से कल्याण होगा। सारा मार्गदर्शन श्रीमद्भगवद्गीता व उपनिषदों में है।
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मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
ॐ नमः शिवाय !! ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ जुलाई २०२१

"यदि आप "लोभ और अहंकार" से स्वयं को मुक्त कर सकते हो, और "ब्रह्मचर्य" का पालन कर सकते हो तो आध्यात्मिक साधना आपके लिए है, अन्यथा भूल जाइये॥"

 "यदि आप "लोभ और अहंकार" से स्वयं को मुक्त कर सकते हो, और "ब्रह्मचर्य" का पालन कर सकते हो तो आध्यात्मिक साधना आपके लिए है, अन्यथा भूल जाइये॥"

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कल रात्रि को ध्यान में जगन्माता का उपरोक्त संदेश मुझे मिला जिसे ज्यों का त्यों यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। भगवान ने बस ये दो ही शर्तें रखी हैं -- (१) लोभ और अहंकार से मुक्ति, और (२) ब्रह्मचर्य का पालन॥
कोई तीसरी कोई बात नहीं कही है। यदि किसी को ये स्वीकार्य नहीं है, तो कोई बात नहीं। संसार में असंख्य लोग नित्य जन्म लेते हैं, और काल-कवलित होते हैं। आप भी उनमें हैं। आपकी आवश्यकता भगवान को नहीं है।
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भगवान ने आपको "विवेक" दिया है जिसके प्रकाश में आप जीवन-यापन कीजिये। इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं कहना है। ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
११ जुलाई २०२४

तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटों से भी प्यार

भगवान से उनके प्रेम से अतिरिक्त अन्य कुछ भी मांगना भगवान का अपमान है। यह नकारात्मक बात दिमाग से निकाल दीजिये कि कोई मुझे आशीर्वाद दे और परिस्थितियाँ मेरे अनुकूल रहें। यह एक सूक्ष्म लोभ और अहंकार मात्र है, जिनसे मुक्त हुए बिना कोई भी आध्यात्मिक सफलता नहीं मिलती। आध्यात्मिक सफलता मिलती है सिर्फ समर्पण से।

तेरे फूलों से भी प्यार, तेरे काँटों से भी प्यार
चाहे खुशी भरा संसार, चाहे आँसूओं की धार
जो तू देना चाहे दे दे कर्तार, दुनिया के पालनहार
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अपनी आस्था को विचलित न होने दें, परमात्मा का अधिक से अधिक ध्यान करें।
असत्य और अज्ञान की अंधकारमय शक्तियों का नाश निश्चित है। निरंतर प्रभु की चेतना में स्थिर रहें, यह बोध रखें कि हमारी आभा और स्पंदन पूरी सृष्टि और सभी प्राणियों की सामूहिक चेतना में व्याप्त हैं, और सब का कल्याण कर रहे हैं। प्रभु की सर्वव्यापकता हमारी ही सर्वव्यापकता है, सभी प्राणियों और सृष्टि के साथ हम एक हैं। हमारा प्रेम पूरी सृष्टि का कल्याण कर रहा है। हम और हमारे प्रभु एक हैं।
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ जुलाई २०२४