जब भी समय मिले अपनी साँसों पर ध्यान दो ---
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यह हमारा भ्रम है कि हम सांसें ले रहे हैं। हमारे माध्यम से भगवान स्वयं साँस ले रहे हैं। वे ही हमारे हृदय में धडक रहे हैं, वे ही इन आँखों से देख रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, और इस मष्तिष्क से वे ही सोच रहे हैं। इन कानों से मंत्र-श्रवण भी वे ही कर रहे हैं, और जप भी वे ही कर रहे हैं। हम अपना मन उनमें लगा देंगे तो हमारा काम बड़ा आसान हो जाएगा। मन को भगवान में लगाना -- इस सृष्टि में सबसे अधिक कठिन काम है। मन -- भगवान में लग गया तो मान लीजिये कि आधे से अधिक युद्ध हम जीत चुके हैं।
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सत्संग भी आवश्यक है, भजन-कीर्तन भी आवश्यक है, इनसे मन में बुरे विचार नहीं आते। रामचरितमानस और गीता में भगवान ने आश्वासन दे रखा है कि वे अपने भक्त की रक्षा भी करते हैं, मार्गदर्शन और सहायता भी करते हैं। एक श्रौत्रीय ब्रहमनिष्ठ गुरु के रूप में भगवान स्वयं आते हैं। सर्वदा यह बोध रखो कि एकमात्र कर्ता भगवान स्वयं हैं, और हम तो एक निमित्त मात्र हैं। फिर जीवन में एक क्रांति आ जाएगी।
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लोकयात्रा के लिए मिला हुआ यह शरीर रूपी वाहन स्वस्थ रहे, इसके लिए हठयोग भी आवश्यक है और घनीभूत प्राण तत्व के रूप में जब कुंडलिनी जागरण हो तब मार्गदर्शन और सहायता के लिए गुरु भी परमावश्यक है। उस समय गुरु की सहायता और मार्गदर्शन की सबसे अधिक आवश्यकता पड़ती है। गुरु की सहायता के बिना भटकाव का भय रहता है। सूक्ष्म जगत की महान आत्माएँ भी मार्गदर्शन और सहायता करती हैं।
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अंतिम बात यह कहना चाहता हूँ कि बिना भक्ति के कोई भी साधक एक मिलिमीटर भी आगे नहीं बढ़ सकता। बिना भक्ति के ज्ञान और वैराग्य -- कुछ भी नहीं मिलता। आध्यात्म के मार्ग पर भक्ति ही ऊर्जा है। अतः ऐसे ग्रन्थों का स्वाध्याय करें जिनसे हमारे ज्ञान और भक्ति में वृद्धि हो। भक्तों के साथ ही रहें, और विष की तरह कुसंग को त्याग दो।
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एकमात्र सत्य केवल परमात्मा है। हमारी सारी आशाएँ, अपेक्षाएँ, आकांक्षाएँ और पृथकता का बोध -- हमारी विवेकाग्नि में भस्म हो जाये। विवेक की उस अग्नि को अपने अंतर में हमें स्वयं ही प्रज्ज्वलित करना होगा। हमारा पूर्ण समर्पण "कैवल्य" यानि "अनन्य" के बोध व चेतना में ही रहे। यही अनन्य अव्यभिचारिणी भक्ति है, जो गीता के उपदेशों का सार है। जो इस संकेत को समझ कर उस का आचरण करेंगे, उनका निश्चित रूप से कल्याण होगा। सारा मार्गदर्शन श्रीमद्भगवद्गीता व उपनिषदों में है।
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मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
ॐ नमः शिवाय !! ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ जुलाई २०२१