Wednesday, 20 May 2026

ब्रह्मज्ञान का अभाव इस संसार में हमारी दुर्गति का मुख्य कारण है --- .

ब्रह्मज्ञान का अभाव इस संसार में हमारी दुर्गति का मुख्य कारण है ---
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ब्रह्मज्ञान ही हमारी वास्तविक शक्ति है। ब्रह्मज्ञ होने पर असत्य और अंधकार की शक्तियाँ हमारा कुछ भी अहित नहीं कर सकतीं। हम ब्रह्ममय हों, यही समष्टि की सबसे बड़ी सेवा है।
ब्रह्मज्ञान के लिए सर्वप्रथम तो परमात्मा से प्रार्थना करें, फिर किन्हीं श्रौत्रीय (जिन्हें श्रुतियों यानि वेदों का ज्ञान हो) और ब्रहमनिष्ठ महात्मा (जिनकी पूर्ण निष्ठा ब्रह्म में हो) से मार्गदर्शन प्राप्त कर उनके सान्निध्य में उनके द्वारा बताई हुई विधि से वैदिक साधना का आरंभ करें।
यदि ऐसे आचार्य नहीं भी मिलते हैं तो दक्षिणामूर्ति रूप में भगवान शिव, और जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण तो हैं ही। उन्हें गुरु मान कर उपनिषदों व श्रीमद्भगवद्गीता में बताई हुई साधना का आरंभ करें। फिर वे लौकिक सद्गुरु की उचित व्यवस्था भी कर देंगे। लौकिक रूप से एक ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय आचार्य ही सद्गुरु हो सकता है। अन्य कोई नहीं।
ब्रह्मज्ञान ही भूमाविद्या है। ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार ने अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को ब्रह्मज्ञान का जो उपदेश दिया था, उसका नाम उन्होने भूमा-विद्या रखा।
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भगवान विष्णु या भगवान शिव की निरंतर विस्तृत हो रही ज्योतिर्मय सर्वव्यापक अनंतता का ही कूटस्थ-चैतन्य में ध्यान करें। साधनाकाल में अपने इस नश्वर देह को भूल जाएँ। परमात्मा की ज्योतिर्मय अनंतता ही हमारा शरीर है, और हम परमात्मा के साथ एक हैं। ध्यान साधना में अकिंचन-भाव को भूल जाएँ, और सर्वदा सर्वस्व-भाव में ही स्थित रहें।
मेरुदंड सर्वदा उन्नत और ठुड्डी भूमि के सामानांतर रहे। पूर्ण खेचरी या अर्ध-खेचरी मुद्रा में ध्यानस्थ होने से पूर्व कुछ देर तक प्राणायाम करें, फिर "अजपा-जप" से आरंभ करें। तत्पश्चात मूर्धा में प्रणव मंत्र का जप करें। भगवान की कृपा फलीभूत हुई तो सारा मार्गदर्शन और साधना में सफलता भी प्राप्त हो जाएगी। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
१९ मई २०२६